सरकारी बजट (Government Budget) किसी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और प्रस्तावित व्यय का विवरण है। इससे पता चलता है कि सरकार संसाधन कहाँ से जुटाएगी, किन क्षेत्रों पर खर्च करेगी और अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को कैसे पूरा करेगी।
भारत के केंद्रीय बजट को संविधान के अनुच्छेद 112 में वर्णित वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement) के माध्यम से संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
बजट केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं है। यह सरकार की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं को लागू करने का प्रमुख साधन है। उदाहरण के लिए, रेलवे, सड़क और सिंचाई पर पूंजीगत व्यय उत्पादन क्षमता बढ़ा सकता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर व्यय मानव विकास में योगदान देता है।
सरकार के संसाधन सीमित होते हैं, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, आधारभूत संरचना और सामाजिक सुरक्षा जैसी आवश्यकताएँ व्यापक होती हैं। बजट इन आवश्यकताओं के बीच संसाधनों के आवंटन में सहायता करता है।
भारत में वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है। उदाहरण के लिए, 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027 तक की अवधि वित्तीय वर्ष 2026-27 कहलाती है।
बजट में प्राप्तियों और व्यय के अनुमान दिए जाते हैं। ये अनुमान हैं, अंतिम वास्तविक आँकड़े नहीं। वास्तविक प्राप्तियों और व्यय में आर्थिक परिस्थितियों, कर संग्रह तथा नीतिगत परिवर्तनों के कारण अंतर हो सकता है।
केंद्रीय बजट को समझने के लिए दो प्रमुख वर्गीकरण याद रखें:
प्राप्तियों को राजस्व प्राप्तियों और पूंजीगत प्राप्तियों में तथा व्यय को राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय में बाँटा जाता है। यह वर्गीकरण राजकोषीय घाटे और राजस्व घाटे जैसी अवधारणाओं को समझने का आधार है।
राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts): ऐसी प्राप्तियाँ जो सामान्यतः सरकार की देनदारियाँ नहीं बढ़ातीं और उसकी परिसंपत्तियों को कम नहीं करतीं।
इनके दो प्रमुख स्रोत हैं:
पूंजीगत प्राप्तियाँ (Capital Receipts): ऐसी प्राप्तियाँ जिनसे सरकार की देनदारियाँ बढ़ सकती हैं या उसकी परिसंपत्तियाँ कम हो सकती हैं।
महत्त्वपूर्ण: सरकारी उधारी पूंजीगत प्राप्ति है, लेकिन इसे गैर-ऋण प्राप्ति नहीं माना जाता। इसलिए राजकोषीय घाटे की गणना में उधारी को कुल प्राप्तियों से घटाकर गैर-ऋण प्राप्तियों का उपयोग किया जाता है।
राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) में सामान्यतः सरकार के नियमित संचालन, सेवाओं और ऐसे खर्चों को शामिल किया जाता है जिनसे प्रत्यक्ष रूप से नई भौतिक परिसंपत्ति का निर्माण नहीं होता। वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और अनेक सब्सिडियाँ इसके उदाहरण हैं।
राजस्व व्यय को अनुत्पादक व्यय मानना गलत है। शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर होने वाला राजस्व व्यय मानव पूंजी तथा सामाजिक कल्याण के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकता है।
पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) में सामान्यतः परिसंपत्तियों के निर्माण या अधिग्रहण तथा ऋणों से संबंधित कुछ पूंजीगत लेन-देन शामिल होते हैं। सड़क, रेलवे लाइन, सिंचाई परियोजना और सरकारी भवन इसके उदाहरण हैं। राज्यों को पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए दिए जाने वाले कुछ ऋण भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
पूंजीगत व्यय भविष्य की उत्पादन क्षमता बढ़ा सकता है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ परियोजना की गुणवत्ता, लागत, समय पर पूर्णता और उपयोग पर निर्भर करता है।
| आधार | राजस्व मद | पूंजीगत मद |
|---|---|---|
| प्राप्तियों के उदाहरण | कर, शुल्क, लाभांश | उधारी, ऋणों की वसूली, विनिवेश |
| व्यय के उदाहरण | वेतन, पेंशन, ब्याज | सड़क, रेलवे, परिसंपत्तियों का निर्माण |
| मुख्य विशेषता | सामान्यतः नियमित आय या संचालन से संबंधित | देनदारी या परिसंपत्ति की स्थिति में परिवर्तन से संबंधित हो सकती है |
परीक्षा में सावधानी: राजस्व और पूंजीगत का वर्गीकरण केवल इस आधार पर न करें कि खर्च उपयोगी है या नहीं। यह बजटीय लेखांकन का वर्गीकरण है।
बजट दस्तावेजों के नाम और उनकी प्रस्तुति का स्वरूप समय के साथ बदल सकता है। परीक्षा की तैयारी में संवैधानिक दस्तावेजों और उनके उद्देश्य के बीच अंतर स्पष्ट रखना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
केंद्रीय बजट तैयार करने में वित्त मंत्रालय विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से प्राप्तियों तथा व्यय के अनुमान प्राप्त करता है। इन अनुमानों की समीक्षा और समेकन के बाद सरकार बजट संसद के समक्ष प्रस्तुत करती है।
संसद में बजट पर सामान्य चर्चा होती है। इसके बाद मंत्रालयों की अनुदानों की मांगों पर विचार और लोकसभा में मतदान होता है। निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक पर भी कार्रवाई की जाती है।
अनुदानों की मांग: सामान्यतः लोकसभा इन मांगों पर मतदान करती है। संसद के वित्तीय नियंत्रण के कारण सरकार को स्वीकृत प्रक्रिया के बिना संचित निधि से धन खर्च करने का अधिकार नहीं है।
भारित व्यय (Charged Expenditure): इस व्यय पर लोकसभा में मतदान नहीं होता, हालांकि इस पर चर्चा की जा सकती है। इसके विपरीत, मतदान योग्य व्यय पर लोकसभा मतदान करती है। संविधान में कुछ पदों और दायित्वों से संबंधित व्यय को संचित निधि पर भारित किया गया है।
कर (Tax) सरकार द्वारा कानून के अधिकार के अंतर्गत लगाया जाने वाला अनिवार्य भुगतान है। करदाता को उसके द्वारा दिए गए कर के अनुपात में कोई प्रत्यक्ष व्यक्तिगत सेवा मिलना आवश्यक नहीं है।
कर सरकार के राजस्व का प्रमुख स्रोत है। इसके माध्यम से सरकार सार्वजनिक सेवाओं का वित्तपोषण करती है और आर्थिक व्यवहार, निवेश, उपभोग तथा आय वितरण को भी प्रभावित कर सकती है।
प्रत्यक्ष कर (Direct Tax): ऐसा कर जिसका कानूनी दायित्व सामान्यतः उसी व्यक्ति या संस्था पर होता है जो उसका भुगतान करती है। आयकर और निगम कर इसके उदाहरण हैं।
अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax): ऐसा कर जिसका आर्थिक भार कीमतों के माध्यम से दूसरे व्यक्ति तक स्थानांतरित हो सकता है। GST और सीमा शुल्क इसके उदाहरण हैं।
कर का कानूनी दायित्व और उसका अंतिम आर्थिक भार हमेशा एक ही व्यक्ति पर पड़े, यह आवश्यक नहीं है। वस्तु एवं सेवाओं की मांग और आपूर्ति की परिस्थितियाँ तय करती हैं कि कर का कितना भार उपभोक्ता और उत्पादक वहन करेंगे।
प्रगतिशील कर (Progressive Tax): इसमें आय बढ़ने के साथ लागू कर की दर बढ़ती है। इसका उपयोग भुगतान क्षमता के आधार पर कर भार निर्धारित करने के लिए किया जा सकता है।
आनुपातिक कर (Proportional Tax): इसमें संबंधित कर आधार के विभिन्न स्तरों पर कर की दर समान रहती है।
प्रतिगामी कर (Regressive Tax): इसमें कम आय वाले व्यक्तियों पर उनकी आय के अनुपात में प्रभावी कर भार अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। कुछ अप्रत्यक्ष करों का प्रभाव इस दृष्टि से चिंता का विषय हो सकता है, हालांकि वास्तविक प्रभाव वस्तु, कर दर और उपभोग के स्वरूप पर निर्भर करता है।
कर आधार (Tax Base) उन आय, लेन-देन, वस्तुओं या आर्थिक गतिविधियों का दायरा है जिन पर किसी विशेष कर को लगाया जाता है। व्यापक कर आधार से सरकार को अपेक्षाकृत स्थिर राजस्व जुटाने में सहायता मिल सकती है।
कर अनुपालन (Tax Compliance): कानून के अनुसार आय या लेन-देन की घोषणा करना, आवश्यक विवरण दाखिल करना और देय कर का भुगतान करना।
कर चोरी (Tax Evasion): आय छिपाने, गलत विवरण देने या अन्य अवैध तरीकों से कर दायित्व से बचने का प्रयास।
कर नियोजन (Tax Planning): कानून के अंतर्गत उपलब्ध वैध प्रावधानों का उपयोग करके कर दायित्व का प्रबंधन करना। कर नियोजन और कर चोरी एक ही बात नहीं हैं। कर बचाव (Tax Avoidance) का मूल्यांकन संबंधित कानूनों और तथ्यों के आधार पर किया जाता है; इसे हर स्थिति में कर नियोजन का पर्याय नहीं मानना चाहिए।
वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax—GST) वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लागू एक व्यापक अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था है। भारत में इसे 1 जुलाई 2017 से लागू किया गया। इसने केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक साझा ढाँचे में समाहित किया।
GST की प्रमुख विशेषता इसका गंतव्य-आधारित स्वरूप (Destination-Based Taxation) है। सामान्यतः कर का राजस्व उस स्थान से जुड़ता है जहाँ वस्तु या सेवा का उपभोग होता है, न कि केवल उस स्थान से जहाँ उसका उत्पादन हुआ है।
GST ने अनेक करों और प्रक्रियाओं को एकीकृत किया, लेकिन सभी कर GST में शामिल नहीं हुए हैं। उदाहरण के लिए, पेट्रोलियम के कुछ प्रमुख उत्पादों और मानव उपभोग के लिए अल्कोहल से संबंधित कर व्यवस्था अलग बनी हुई है। किसी वस्तु पर लागू कर का निर्धारण उसके वर्तमान कानूनी वर्गीकरण और अधिसूचनाओं के आधार पर किया जाता है।
किसी लेन-देन पर कौन-सा GST लागू होगा, यह आपूर्ति के स्थान, आपूर्ति की प्रकृति और संबंधित कानूनी नियमों पर निर्भर करता है।
GST परिषद (GST Council) का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 279A है। यह केंद्र और राज्यों के बीच GST से जुड़े विषयों पर समन्वय करने वाला संवैधानिक निकाय है।
केंद्रीय वित्त मंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं। राज्यों के प्रतिनिधि भी परिषद में शामिल होते हैं। GST की दरों, छूट, मॉडल कानूनों और संबंधित विषयों पर परिषद सिफारिशें करती है।
परीक्षा के लिए: GST परिषद की सिफारिशों और लागू कानून या अधिसूचना के बीच अंतर समझें। परिषद की भूमिका महत्त्वपूर्ण है, लेकिन कर व्यवस्था का वास्तविक कानूनी संचालन संवैधानिक प्रावधानों और लागू कानूनों के अनुसार होता है।
इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit—ITC) के अंतर्गत पात्र व्यवसाय निर्धारित शर्तों के अधीन अपनी खरीद पर चुकाए गए GST का क्रेडिट बिक्री पर देय GST के विरुद्ध ले सकता है।
इसका उद्देश्य उत्पादन और वितरण की विभिन्न अवस्थाओं में करों के दोहराव को कम करना है। यदि पहले चरण में दिए गए कर का समायोजन उपलब्ध न हो, तो उस कर की लागत अगली अवस्था में जुड़ सकती है और आगे फिर कर लग सकता है। इसे करों का संचयी प्रभाव (Cascading Effect) कहा जाता है।
ITC लेने के लिए निर्धारित कानूनी शर्तों का पालन आवश्यक है। इसलिए यह मानना सही नहीं है कि प्रत्येक खरीद पर दिया गया GST बिना किसी शर्त के वापस मिल जाता है।
राजकोषीय नीति वह नीति है जिसके माध्यम से सरकार कराधान, सार्वजनिक व्यय और उधारी का उपयोग करके आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। केंद्रीय बजट इसका प्रमुख साधन है।
जब मांग कमजोर हो और बेरोजगारी अधिक हो, तब सरकार सार्वजनिक निवेश या लक्षित सहायता बढ़ाकर आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे सकती है। दूसरी ओर, अत्यधिक मांग और मुद्रास्फीति के दबाव के समय राजकोषीय विस्तार को नियंत्रित करना उपयोगी हो सकता है।
राजकोषीय नीति का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि अर्थव्यवस्था किस स्थिति में है, व्यय किस क्षेत्र में किया जा रहा है, उसका वित्तपोषण कैसे हो रहा है और मौद्रिक नीति कैसी है।
इन नीतियों का प्रभाव स्वचालित नहीं होता। यदि अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षमता खाली है, तो अतिरिक्त सरकारी मांग उत्पादन बढ़ा सकती है। यदि आपूर्ति सीमित है, तो वही मांग कीमतों पर अधिक दबाव डाल सकती है।
राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उसकी कुल गैर-ऋण प्राप्तियों के बीच का अंतर है। यह बताता है कि सरकार को अपनी वित्तीय आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए कितने अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता है।
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − कुल गैर-ऋण प्राप्तियाँ
गैर-ऋण प्राप्तियों में राजस्व प्राप्तियाँ तथा ऋणों की वसूली और विनिवेश जैसी पूंजीगत प्राप्तियाँ शामिल हो सकती हैं। सरकारी उधारी को गैर-ऋण प्राप्तियों में शामिल नहीं किया जाता, क्योंकि उधारी से सरकार की देनदारी बढ़ती है।
उदाहरण: यदि कुल व्यय 100 रुपये और कुल गैर-ऋण प्राप्तियाँ 75 रुपये हैं, तो राजकोषीय घाटा 25 रुपये होगा। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को उधारी सहित अन्य वित्तपोषण स्रोतों की आवश्यकता हो सकती है।
राजस्व घाटा (Revenue Deficit) तब होता है जब राजस्व व्यय, राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो।
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ
यदि राजस्व प्राप्तियाँ 80 रुपये और राजस्व व्यय 95 रुपये है, तो राजस्व घाटा 15 रुपये होगा। इसका अर्थ है कि सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ उसके राजस्व व्यय को पूरा नहीं कर रही हैं।
प्राथमिक घाटा (Primary Deficit) राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान घटाने पर प्राप्त होता है।
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान
यदि राजकोषीय घाटा 100 रुपये और ब्याज भुगतान 70 रुपये है, तो प्राथमिक घाटा 30 रुपये होगा। इससे पता चलता है कि ब्याज भुगतान को अलग रखने पर वर्तमान राजकोषीय स्थिति कैसी है।
यदि ब्याज भुगतान राजकोषीय घाटे से अधिक हो, तो प्राथमिक घाटा ऋणात्मक हो सकता है। ऐसी स्थिति को प्राथमिक अधिशेष (Primary Surplus) कहा जाता है।
| अवधारणा | सूत्र | मुख्य अर्थ |
|---|---|---|
| राजस्व घाटा | राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ | राजस्व प्राप्तियों और राजस्व व्यय का अंतर |
| राजकोषीय घाटा | कुल व्यय − कुल गैर-ऋण प्राप्तियाँ | सरकार की कुल वित्तीय आवश्यकता का संकेत |
| प्राथमिक घाटा | राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान | ब्याज भुगतान हटाने के बाद राजकोषीय स्थिति |
UPSC तथ्य: इन तीनों घाटों के सूत्रों को आपस में न मिलाएँ। राजस्व घाटा राजस्व मदों से, राजकोषीय घाटा कुल व्यय और गैर-ऋण प्राप्तियों से तथा प्राथमिक घाटा ब्याज भुगतान से संबंधित है।
राजकोषीय घाटे का मूल्यांकन केवल उसके आकार से नहीं किया जाना चाहिए। यह भी देखना आवश्यक है कि उधार से प्राप्त संसाधनों का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है और उसका दीर्घकालीन आर्थिक प्रभाव क्या होगा।
यदि उधारी से उत्पादक आधारभूत संरचना बनती है, तो भविष्य में उत्पादन, रोजगार और सरकारी राजस्व बढ़ने की संभावना हो सकती है। इसके विपरीत, लगातार बढ़ता ऋण और ब्याज भुगतान भविष्य के बजट पर दबाव डाल सकते हैं।
इसलिए राजकोषीय प्रबंधन में घाटे की मात्रा के साथ-साथ व्यय की गुणवत्ता, ऋण की स्थिरता और अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता भी महत्त्वपूर्ण हैं।
राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (Fiscal Responsibility and Budget Management Act) का उद्देश्य राजकोषीय प्रबंधन में अनुशासन, पारदर्शिता और दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।
राजकोषीय अनुशासन का अर्थ यह नहीं है कि सरकार कभी घाटा नहीं कर सकती। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि घाटा और सार्वजनिक ऋण टिकाऊ रहें तथा सरकारी वित्तीय स्थिति पर अनियंत्रित दबाव न पड़े।
आर्थिक मंदी, आपदा या अन्य असाधारण परिस्थितियों में राजकोषीय नीति को लचीलापन भी चाहिए। इसलिए राजकोषीय नियमों का मूल्यांकन आर्थिक परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
सार्वजनिक ऋण (Public Debt) सरकार द्वारा लिए गए ऋणों का संचय है। सरकार घरेलू स्रोतों से ऋण ले सकती है और लागू व्यवस्था के अनुसार कुछ बाहरी देनदारियाँ भी हो सकती हैं।
ऋण स्थिरता (Debt Sustainability) का अर्थ है कि सरकार भविष्य में अपने ऋण और ब्याज संबंधी दायित्वों को पूरा करने में सक्षम रहे, बिना गंभीर वित्तीय संकट या अत्यधिक समायोजन की आवश्यकता के।
ऋण स्थिरता पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है:
केवल विकास दर और ब्याज दर की तुलना से ऋण स्थिरता का पूरा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता; अन्य राजकोषीय परिस्थितियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं।
राजकोषीय गुणक बताता है कि सरकारी व्यय या करों में परिवर्तन से राष्ट्रीय आय में कितना परिवर्तन हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि सरकारी व्यय में 100 करोड़ रुपये की वृद्धि के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आय में 150 करोड़ रुपये की वृद्धि होती है, तो इस उदाहरण में व्यय गुणक 1.5 होगा।
वास्तविक अर्थव्यवस्था में गुणक का आकार उपभोग, बचत, आयात, करों, उत्पादन क्षमता, मौद्रिक नीति और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। सभी प्रकार के सरकारी व्यय का गुणक समान नहीं होता।
बजट आर्थिक विकास को सरकारी व्यय की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता के माध्यम से भी प्रभावित करता है। सड़क और रेलवे जैसी परियोजनाएँ परिवहन लागत घटा सकती हैं, बाजारों को जोड़ सकती हैं और निजी निवेश को प्रोत्साहित कर सकती हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर खर्च श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायता कर सकता है। सार्वजनिक निर्माण से प्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकता है, जबकि बेहतर आधारभूत संरचना निजी निवेश और आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रोजगार को बढ़ावा दे सकती है।
हालाँकि रोजगार पर वास्तविक प्रभाव परियोजनाओं की प्रकृति, श्रम की मांग, कौशल, स्थानीय परिस्थितियों और निजी निवेश की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है।
मुद्रास्फीति: यदि सरकार का व्यय कुल मांग को तेजी से बढ़ाता है और अर्थव्यवस्था में आपूर्ति पर्याप्त रूप से नहीं बढ़ पाती, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन जब उत्पादन क्षमता उपलब्ध हो, तो अतिरिक्त मांग से उत्पादन और रोजगार भी बढ़ सकते हैं।
आय असमानता: प्रगतिशील कराधान तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा पर लक्षित सार्वजनिक व्यय आय और अवसरों की असमानता कम करने में योगदान दे सकते हैं।
सामाजिक क्षेत्र: शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता और पोषण पर खर्च का मूल्यांकन केवल तत्काल वित्तीय लाभ से नहीं, बल्कि मानव विकास और दीर्घकालीन उत्पादकता से भी किया जाना चाहिए।
वित्त आयोग (Finance Commission) का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 280 में है। इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार किया जाता है। यह केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण से जुड़े विषयों पर सिफारिशें करता है।
इसकी प्रमुख भूमिकाओं में केंद्र और राज्यों के बीच विभाज्य करों के शुद्ध आगम के वितरण तथा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदानों के सिद्धांतों पर सिफारिश करना शामिल है। संविधान और कानून के अंतर्गत अन्य विषय भी इसे सौंपे जा सकते हैं।
राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) केंद्र और राज्यों के बीच कराधान शक्तियों, व्यय संबंधी जिम्मेदारियों और वित्तीय संसाधनों के वितरण की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य विभिन्न स्तरों की सरकारों को उनकी जिम्मेदारियाँ पूरी करने के लिए संसाधन उपलब्ध कराने में सहायता करना है।
वित्त आयोग की सिफारिशें और GST परिषद की भूमिका अलग-अलग हैं। वित्त आयोग व्यापक संघीय वित्तीय वितरण से संबंधित है, जबकि GST परिषद का कार्य GST से संबंधित विषयों पर केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय करना है।
भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India): अनुच्छेद 266(1) के अंतर्गत सरकार की प्रमुख प्राप्तियाँ, सरकारी उधारी और दिए गए ऋणों की वसूली से संबंधित धन इसमें शामिल होता है। इस निधि से धन निकालने के लिए निर्धारित संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund of India): अनुच्छेद 267 के अंतर्गत अप्रत्याशित और तत्काल व्यय की आवश्यकताओं के लिए व्यवस्था की गई है। इसका संचालन लागू संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुसार होता है।
लोक लेखा (Public Account of India): अनुच्छेद 266(2) के अंतर्गत ऐसी धनराशियाँ इसमें दर्ज की जाती हैं जो संचित निधि का हिस्सा नहीं हैं और जिनके संबंध में सरकार एक प्रकार के अभिरक्षक या लेखा-प्रबंधक की भूमिका निभा सकती है। भविष्य निधि और कुछ जमा राशियाँ इसके उदाहरण हैं।
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 110 | धन विधेयक की परिभाषा |
| 112 | वार्षिक वित्तीय विवरण |
| 113 | अनुदानों की मांग से संबंधित प्रक्रिया |
| 114 | विनियोग विधेयक |
| 115 | अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान |
| 116 | लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान |
| 117 | वित्तीय विधेयकों से संबंधित विशेष प्रावधान |
| 266 | भारत की संचित निधि और लोक लेखा |
| 267 | आकस्मिकता निधि |
| 279A | GST परिषद |
| 280 | वित्त आयोग |
विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) का उद्देश्य भारत की संचित निधि से स्वीकृत सरकारी व्यय के लिए धन निकालने की कानूनी अनुमति प्रदान करना है।
वित्त विधेयक (Finance Bill) बजट में प्रस्तावित कर संबंधी परिवर्तनों को लागू करने के लिए आवश्यक विधायी प्रावधानों से संबंधित होता है।
दोनों विधेयकों का उद्देश्य अलग है। विनियोग विधेयक मुख्यतः स्वीकृत व्यय के लिए संचित निधि से धन निकालने से जुड़ा है, जबकि वित्त विधेयक बजट के कर प्रस्तावों को कानूनी प्रभाव देने से संबंधित है।
लेखानुदान (Vote on Account): संसद द्वारा सीमित अवधि के लिए आवश्यक सरकारी व्यय करने की अनुमति देने की व्यवस्था। इसका उद्देश्य पूरे बजट की प्रक्रिया पूरी होने तक आवश्यक सरकारी खर्च को जारी रखने में सहायता करना है।
अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant): जब किसी सेवा के लिए पहले स्वीकृत राशि पर्याप्त नहीं रहती, तो अतिरिक्त धन की स्वीकृति के लिए संसद के समक्ष प्रस्ताव लाया जा सकता है।
अतिरिक्त अनुदान (Additional Grant): जब चालू वित्तीय वर्ष में किसी नई सेवा के लिए व्यय की आवश्यकता होती है, तो लागू संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत अतिरिक्त स्वीकृति मांगी जा सकती है।
इन व्यवस्थाओं का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 115 और 116 सहित संबंधित प्रावधानों में मिलता है।
धन विधेयक की परिभाषा संविधान के अनुच्छेद 110 में दी गई है। इसमें केवल वही विषय शामिल होते हैं जो इस अनुच्छेद में निर्दिष्ट हैं, जैसे कुछ कर संबंधी विषय, भारत सरकार की उधारी और भारत की संचित निधि से धन के विनियोग से संबंधित प्रावधान।
महत्त्वपूर्ण: प्रत्येक वित्तीय विषय से संबंधित विधेयक धन विधेयक नहीं होता। धन विधेयक का निर्धारण अनुच्छेद 110 की शर्तों के आधार पर किया जाता है।
राजकोषीय नीति सरकार द्वारा कराधान, व्यय और उधारी के माध्यम से संचालित होती है। मौद्रिक नीति (Monetary Policy) भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित कानूनी ढाँचे के अंतर्गत मुद्रा, ऋण, ब्याज दरों और तरलता की परिस्थितियों को प्रभावित करती है।
दोनों नीतियाँ मुद्रास्फीति, मांग और आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन इनके साधन और संस्थागत भूमिकाएँ अलग हैं।
कर सुधारों का उद्देश्य पर्याप्त राजस्व जुटाने के साथ-साथ समानता, सरलता, पारदर्शिता और आर्थिक दक्षता में सुधार करना होना चाहिए।
संभावित प्रश्न: “सरकारी बजट आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और राजकोषीय स्थिरता का महत्त्वपूर्ण साधन है। चर्चा कीजिए।”
भूमिका: बजट को सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं, संसाधन आवंटन और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन के प्रमुख साधन के रूप में परिभाषित कीजिए।
मुख्य भाग:
चुनौतियाँ: राजकोषीय घाटा, सार्वजनिक ऋण, ब्याज भुगतान, कर अनुपालन और सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता।
निष्कर्ष: ऐसा संतुलित बजट आवश्यक है जो विकास और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा दे तथा दीर्घकालीन राजकोषीय स्थिरता भी बनाए रखे।
बजट और कर व्यवस्था सार्वजनिक वित्त के दो परस्पर जुड़े हुए पक्ष हैं। कर सरकार को संसाधन उपलब्ध कराते हैं, जबकि बजट यह निर्धारित करने में सहायता करता है कि उन संसाधनों का उपयोग कहाँ और किस उद्देश्य से किया जाए।
एक प्रभावी बजट के लिए पर्याप्त राजस्व संग्रह, न्यायसंगत कराधान, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक व्यय, नियंत्रित सार्वजनिक ऋण और संसदीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन आवश्यक है। यही संतुलन समावेशी विकास और दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता को मजबूत कर सकता है।