मुद्रास्फीति (Inflation) किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में एक अवधि के दौरान निरंतर वृद्धि की प्रक्रिया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक वस्तु की कीमत समान दर से बढ़ती है।
मुद्रास्फीति बढ़ने पर मुद्रा की क्रय शक्ति (Purchasing Power) घटती है। अर्थात समान धनराशि से पहले की तुलना में कम वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदी जा सकती हैं।
किसी एक वस्तु, जैसे टमाटर, की कीमत बढ़ने मात्र से मुद्रास्फीति सिद्ध नहीं होती। इसके लिए वस्तुओं और सेवाओं के व्यापक समूह के मूल्य स्तर में परिवर्तन देखा जाता है।
मूल्य स्तर को मापने के लिए वस्तुओं और सेवाओं की एक प्रतिनिधि टोकरी (Basket) का उपयोग किया जाता है। इस टोकरी में शामिल वस्तुओं का महत्व और भार सूचकांक की गणना को प्रभावित करते हैं।
मुद्रास्फीति की दर बताती है कि किसी मूल्य सूचकांक में पिछली तुलनीय अवधि की तुलना में कितने प्रतिशत परिवर्तन हुआ है।
सूत्र:
मुद्रास्फीति दर = [(वर्तमान सूचकांक − पिछले सूचकांक) ÷ पिछले सूचकांक] × 100
उदाहरण:
यदि किसी मूल्य सूचकांक का मान पिछले वर्ष 150 था और इस वर्ष 159 हो गया, तो मुद्रास्फीति की दर होगी:
[(159 − 150) ÷ 150] × 100 = 6%
महत्त्वपूर्ण: यदि मुद्रास्फीति की दर 8% से घटकर 5% हो जाती है, तो कीमतों में वृद्धि की गति कम हुई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कीमतों का सामान्य स्तर घट गया है। इसे अवस्फीति (Disinflation) कहते हैं।
मुद्रास्फीति का वर्गीकरण उसकी गति, कारण और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के आधार पर किया जा सकता है।
धीमी मुद्रास्फीति (Creeping Inflation): इसमें कीमतें अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ती हैं।
चलती मुद्रास्फीति (Walking Inflation): यह अपेक्षाकृत तेज मूल्य वृद्धि को दर्शाने वाला एक पारंपरिक वर्गीकरण है। इसकी कोई सर्वमान्य संख्यात्मक सीमा नहीं है।
दौड़ती मुद्रास्फीति (Running Inflation): इसमें कीमतों में तेज वृद्धि होती है और आर्थिक निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। इसकी भी कोई सार्वभौमिक निर्धारित दर नहीं है।
अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation): इसमें कीमतें अत्यंत तीव्र गति से बढ़ती हैं और मुद्रा की क्रय शक्ति तेजी से गिर सकती है। इससे मुद्रा पर विश्वास, बचत और सामान्य आर्थिक लेन-देन प्रभावित होते हैं।
परीक्षा तथ्य: Creeping, Walking और Running Inflation के लिए पाठ्यपुस्तकों में दी गई सीमाएँ अलग-अलग हो सकती हैं। इन्हें कठोर और सार्वभौमिक नियम नहीं समझना चाहिए।
मांग-खींच मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation) तब उत्पन्न होती है जब अर्थव्यवस्था में कुल मांग (Aggregate Demand) उपलब्ध उत्पादन क्षमता और आपूर्ति की तुलना में अधिक हो जाती है।
सरल संबंध: कुल मांग में तेज वृद्धि + सीमित उत्पादन क्षमता → सामान्य कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव।
इसके संभावित कारण हैं:
मांग-खींच मुद्रास्फीति की स्थिति में मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के माध्यम से कुल मांग को प्रभावित किया जा सकता है। हालांकि, नीति का प्रभाव अर्थव्यवस्था की परिस्थितियों और मुद्रास्फीति के वास्तविक कारणों पर निर्भर करता है।
लागत-धक्का मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation) तब उत्पन्न होती है जब उत्पादन की लागत बढ़ती है और उत्पादक उस लागत वृद्धि का कुछ हिस्सा वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में स्थानांतरित कर देते हैं।
इसके प्रमुख कारण हैं:
लागत बढ़ने पर कीमतें कितनी बढ़ेंगी, यह मांग, प्रतिस्पर्धा, उत्पादकों की लाभ-सीमा और लागत को उपभोक्ता तक पहुँचाने की क्षमता पर निर्भर करता है।
आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) तब उत्पन्न हो सकती है जब आयातित वस्तुओं, कच्चे माल या ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं अथवा घरेलू मुद्रा विदेशी मुद्राओं के मुकाबले कमजोर होती है।
उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत के आयात बिल और घरेलू ऊर्जा लागत पर दबाव पड़ सकता है। इसके प्रभाव परिवहन, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों तक पहुँच सकते हैं।
घरेलू मुद्रा के मूल्य में गिरावट से आयात महँगे हो सकते हैं। विनिमय दर में परिवर्तन का घरेलू कीमतों पर पड़ने वाला प्रभाव Exchange Rate Pass-Through कहलाता है।
इसका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में परिवर्तन कितना बड़ा है, आयात पर निर्भरता कितनी है और करों, सब्सिडी तथा अन्य नीतियों में क्या परिवर्तन किए गए हैं।
संरचनात्मक मुद्रास्फीति (Structural Inflation) का संबंध अर्थव्यवस्था की दीर्घकालीन आपूर्ति-संबंधी कमजोरियों से हो सकता है।
उदाहरण:
खाद्य मुद्रास्फीति भोजन से संबंधित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि को दर्शाती है। इसका कारण खराब मौसम, फसल उत्पादन में कमी, भंडारण संबंधी समस्याएँ, परिवहन बाधाएँ या मांग-आपूर्ति में असंतुलन हो सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में केवल ब्याज दर बढ़ाना पर्याप्त नहीं हो सकता। कृषि उत्पादकता, भंडारण, बाजार संपर्क और आपूर्ति प्रबंधन में सुधार भी आवश्यक हो सकते हैं।
इस सिद्धांत को निम्न समीकरण से व्यक्त किया जाता है:
MV = PY
यदि मुद्रा की मात्रा वास्तविक उत्पादन की तुलना में लगातार तेजी से बढ़े और मुद्रा की संचलन गति स्थिर रहे, तो मूल्य स्तर पर ऊपर की ओर दबाव पड़ सकता है।
यह समीकरण अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि मुद्रा आपूर्ति में प्रत्येक वृद्धि से तुरंत समान अनुपात में मुद्रास्फीति होगी। वास्तविक परिणाम उत्पादन, मुद्रा की संचलन गति, ऋण, मांग और आर्थिक अपेक्षाओं पर भी निर्भर करते हैं।
कीन्सीय दृष्टिकोण कुल मांग और कुल आपूर्ति के संबंध पर जोर देता है। जब अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता उपलब्ध हो, तब मांग बढ़ने से उत्पादन और रोजगार बढ़ सकते हैं। लेकिन जब अर्थव्यवस्था अपनी उत्पादन क्षमता के निकट पहुँचती है, तब अतिरिक्त मांग का बड़ा हिस्सा कीमतों में वृद्धि के रूप में दिखाई दे सकता है।
मौद्रिकवादी विचारधारा मुद्रास्फीति के दीर्घकालीन व्यवहार में मुद्रा की मात्रा की भूमिका पर जोर देती है। इसके अनुसार यदि मुद्रा की मात्रा वास्तविक उत्पादन की तुलना में लंबे समय तक तेजी से बढ़ती है, तो सामान्य मूल्य स्तर पर दबाव पड़ सकता है।
आधुनिक विश्लेषण में मुद्रा आपूर्ति के साथ-साथ ब्याज दर, ऋण परिस्थितियाँ, उत्पादन क्षमता और मुद्रास्फीति की अपेक्षाएँ भी महत्वपूर्ण हैं।
मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ (Inflation Expectations) बताती हैं कि परिवार, व्यवसाय और निवेशक भविष्य में कीमतों में कितनी वृद्धि की आशा करते हैं।
यदि परिवार और व्यवसाय लगातार उच्च मुद्रास्फीति की अपेक्षा करें, तो मजदूरी, कीमतों और खरीद संबंधी निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। इससे पहले से मौजूद मुद्रास्फीतिकारी दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।
मजदूरी-मूल्य सर्पिल (Wage-Price Spiral) ऐसी संभावित प्रक्रिया है जिसमें बढ़ती कीमतों के जवाब में मजदूरी बढ़ाने की मांग होती है और बढ़ती श्रम लागत के जवाब में व्यवसाय कीमतें बढ़ा सकते हैं। इससे कीमतों और मजदूरी में बार-बार वृद्धि का चक्र बन सकता है।
यह प्रक्रिया हर स्थिति में नहीं होती। इसका प्रभाव उत्पादकता, मजदूरी समझौतों, मांग और व्यवसायों की मूल्य निर्धारण क्षमता पर निर्भर करता है।
फिलिप्स वक्र (Phillips Curve) मुद्रास्फीति और बेरोजगारी के बीच संभावित संबंध को समझाने वाला आर्थिक मॉडल है।
पारंपरिक अल्पकालीन विश्लेषण में कुछ परिस्थितियों में कम बेरोजगारी के साथ मजदूरी और कीमतों पर अधिक दबाव देखा जा सकता है। लेकिन यह संबंध स्थायी या हर समय समान नहीं रहता।
प्राकृतिक बेरोजगारी दर (Natural Rate of Unemployment) श्रम बाजार में मौजूद संरचनात्मक और घर्षणात्मक कारणों से बनी रहने वाली बेरोजगारी की अवधारणा है।
मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को ध्यान में रखने वाले आधुनिक विश्लेषण में दीर्घकालीन फिलिप्स वक्र को सामान्यतः ऊर्ध्वाधर दर्शाया जाता है। इसका आशय यह है कि दीर्घकाल में केवल अधिक मुद्रास्फीति के माध्यम से बेरोजगारी को स्थायी रूप से प्राकृतिक दर से नीचे रखना संभव नहीं माना जाता।
मुद्रास्फीति को मापने के लिए अलग-अलग सूचकांकों का उपयोग किया जाता है। इनका दायरा और उद्देश्य अलग होता है, इसलिए सभी सूचकांक एक ही समय पर समान दर दिखाएँ, यह आवश्यक नहीं है।
| सूचकांक | मुख्य अर्थ | प्रमुख उपयोग | महत्त्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|---|
| उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) | उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की टोकरी की कीमतों में परिवर्तन। | खुदरा मुद्रास्फीति और जीवन-यापन की लागत का आकलन। | भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लिए CPI आधारित मुद्रास्फीति का उपयोग होता है। |
| थोक मूल्य सूचकांक (WPI) | थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन। | थोक वस्तु कीमतों की प्रवृत्ति का अध्ययन। | यह CPI की तरह उपभोक्ता सेवाओं की व्यापक टोकरी को नहीं मापता। |
| GDP Deflator | घरेलू रूप से उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के नाममात्र तथा वास्तविक मूल्य के बीच अनुपात। | अर्थव्यवस्था के घरेलू उत्पादन के व्यापक मूल्य परिवर्तन का आकलन। | इसका दायरा घरेलू अंतिम उत्पादन से जुड़ा है और यह आयातित उपभोग वस्तुओं को सीधे उसी रूप में शामिल नहीं करता जिस रूप में वे CPI में शामिल हो सकती हैं। |
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index — CPI) उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की प्रतिनिधि टोकरी की कीमतों में परिवर्तन मापता है।
भारत में मौद्रिक नीति के लिए खुदरा मुद्रास्फीति का आकलन करते समय CPI आधारित मुद्रास्फीति को विशेष महत्व दिया जाता है।
थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index — WPI) थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन को दर्शाता है। यह वस्तुओं की थोक कीमतों की प्रवृत्ति को समझने में उपयोगी है, लेकिन इसे उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली अंतिम कीमतों का पूर्ण विकल्प नहीं माना जा सकता।
GDP Deflator नाममात्र GDP और वास्तविक GDP के अनुपात से प्राप्त मूल्य सूचकांक है।
GDP Deflator = (नाममात्र GDP ÷ वास्तविक GDP) × 100
CPI के विपरीत, GDP Deflator घरेलू रूप से उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य परिवर्तन पर केंद्रित होता है। इसलिए दोनों सूचकांकों की मुद्रास्फीति दरों में अंतर हो सकता है।
शीर्षक मुद्रास्फीति (Headline Inflation) संबंधित मूल्य सूचकांक की व्यापक टोकरी में शामिल सभी प्रमुख घटकों के मूल्य परिवर्तन को दर्शाती है।
मूल मुद्रास्फीति (Core Inflation) अंतर्निहित मुद्रास्फीतिकारी दबाव को समझने के लिए उपयोग की जाने वाली अवधारणा है। सामान्य विश्लेषण में अत्यधिक अस्थिर घटकों, विशेषकर खाद्य और ईंधन, को अलग करके अध्ययन किया जाता है।
मूल मुद्रास्फीति की गणना की पद्धति अलग-अलग विश्लेषणों में भिन्न हो सकती है। इसलिए इसे बिना संदर्भ के एक ही निश्चित सूचकांक या आधिकारिक परिभाषा के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
परीक्षा के लिए: शीर्षक मुद्रास्फीति उपभोक्ता के सामने आने वाली समग्र मूल्य वृद्धि समझने में उपयोगी है, जबकि मूल मुद्रास्फीति अंतर्निहित मूल्य दबाव का संकेत दे सकती है।
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) ऐसी मौद्रिक नीति व्यवस्था है जिसमें केंद्रीय बैंक के लिए मुद्रास्फीति का निर्धारित लक्ष्य तय किया जाता है।
भारत में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting) व्यवस्था अपनाई गई है। इसका उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि आर्थिक वृद्धि को भी ध्यान में रखा जाता है।
भारत में CPI आधारित मुद्रास्फीति के लिए अधिसूचित लक्ष्य 4 प्रतिशत है, जिसमें ±2 प्रतिशत अंक का सहनशीलता दायरा है। अर्थात निर्धारित ढाँचे में लक्ष्य-दायरा 2% से 6% है।
यह लक्ष्य और सहनशीलता दायरा निर्धारित अवधि के लिए सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाते हैं। परीक्षा में लक्ष्य से संबंधित प्रश्न आने पर लागू अवधि और नवीनतम आधिकारिक अधिसूचना की जाँच करना उचित है।
मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee — MPC) भारत की मौद्रिक नीति व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। यह नीति दर से संबंधित निर्णय लेकर मुद्रास्फीति को निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप रखने में भूमिका निभाती है।
MPC में कुल 6 सदस्य होते हैं:
RBI का गवर्नर MPC का पदेन अध्यक्ष होता है। निर्णय मतदान के माध्यम से लिए जाते हैं। बराबर मत होने की स्थिति में अध्यक्ष के पास निर्णायक मत होता है।
MPC का मुख्य कार्य मौद्रिक नीति दर निर्धारित करना है। यह खाद्य उत्पादन, परिवहन, भंडारण या अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को सीधे नियंत्रित नहीं कर सकती। इसलिए आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति से निपटने के लिए अन्य नीतियों का सहयोग आवश्यक हो सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ब्याज दरों, तरलता प्रबंधन और अन्य मौद्रिक साधनों के माध्यम से अर्थव्यवस्था की वित्तीय परिस्थितियों को प्रभावित करता है।
जब मुद्रास्फीति का दबाव व्यापक और लगातार बना हो, तो अपेक्षाकृत सख्त मौद्रिक नीति के माध्यम से मांग और ऋण विस्तार को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा सकता है।
सामान्य मौद्रिक नीति संचरण:
नीति दर में वृद्धि → ऋण की लागत बढ़ सकती है → उपभोग और निवेश की मांग पर दबाव → समय के साथ मुद्रास्फीति का दबाव कम हो सकता है।
इसका प्रभाव तुरंत नहीं आता। मौद्रिक नीति का असर आर्थिक गतिविधि और कीमतों तक पहुँचने में समय ले सकता है।
यदि मुद्रास्फीति मुख्यतः खाद्य आपूर्ति में कमी के कारण हो, तो ब्याज दर बढ़ाने से खाद्य उत्पादन तुरंत नहीं बढ़ेगा। हालांकि, व्यापक और लगातार मूल्य दबाव को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति फिर भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) सरकार के कराधान, सार्वजनिक व्यय और उधारी से संबंधित होती है। सरकार इन साधनों के माध्यम से कुल मांग को प्रभावित कर सकती है।
जब कीमतों पर दबाव मुख्यतः आपूर्ति की कमी से उत्पन्न हो, तब सरकार निम्न उपायों पर विचार कर सकती है:
इन उपायों का चयन मुद्रास्फीति के कारण, राजकोषीय लागत, किसानों और उत्पादकों के हितों तथा दीर्घकालीन उत्पादन प्रोत्साहनों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
मुद्रास्फीति का प्रभाव उसकी दर, अवधि, कारण और आय समूहों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
ध्यान दें कि मध्यम और स्थिर मुद्रास्फीति का प्रभाव अत्यधिक तथा अस्थिर मुद्रास्फीति से अलग हो सकता है। हर प्रकार की मुद्रास्फीति के आर्थिक परिणाम समान नहीं होते।
| अवधारणा | अर्थ | उदाहरण या विशेषता |
|---|---|---|
| मुद्रास्फीति (Inflation) | सामान्य मूल्य स्तर में वृद्धि। | मुद्रास्फीति की दर 5% है। |
| अवस्फीति (Disinflation) | मुद्रास्फीति की दर में कमी। | दर 8% से घटकर 5% हो गई, लेकिन कीमतें अभी भी बढ़ रही हैं। |
| अपस्फीति (Deflation) | सामान्य मूल्य स्तर में लगातार गिरावट। | व्यापक कीमतों में गिरावट से मांग और उत्पादन पर दबाव पड़ सकता है। |
| स्टैगफ्लेशन (Stagflation) | कमजोर आर्थिक वृद्धि या ठहराव के साथ मुद्रास्फीति का दबाव। | नीति-निर्माताओं के सामने वृद्धि और मूल्य स्थिरता का कठिन संतुलन। |
परीक्षा में सामान्य गलती: Disinflation को Deflation नहीं लिखना चाहिए। पहली स्थिति में कीमतों की वृद्धि दर घटती है; दूसरी स्थिति में सामान्य मूल्य स्तर गिरता है।
मुद्रास्फीति को कभी-कभी मुद्रास्फीति कर कहा जाता है क्योंकि कीमतें बढ़ने से मुद्रा रखने वाले लोगों की वास्तविक क्रय शक्ति घट सकती है।
यह सामान्य अर्थ में सरकार द्वारा लगाया गया प्रत्यक्ष कर नहीं है। यह उस स्थिति को समझाने वाली अवधारणा है जिसमें मुद्रा का वास्तविक मूल्य घटने से नकद धन रखने वालों की क्रय शक्ति कम होती है।
वास्तविक ब्याज दर मुद्रास्फीति के प्रभाव को ध्यान में रखकर ब्याज प्रतिफल की वास्तविक क्रय शक्ति को समझने में मदद करती है।
सरल अनुमान:
वास्तविक ब्याज दर ≈ नाममात्र ब्याज दर − मुद्रास्फीति दर
उदाहरण के लिए, यदि जमा पर नाममात्र ब्याज दर 7% है और मुद्रास्फीति 5% है, तो अनुमानित वास्तविक ब्याज दर लगभग 2% होगी।
अधिक सटीक गणना के लिए:
वास्तविक ब्याज दर = [(1 + नाममात्र ब्याज दर) ÷ (1 + मुद्रास्फीति दर)] − 1
इस सूत्र में दरों को दशमलव रूप में रखा जाता है। व्यवहार में वास्तविक प्रतिफल का आकलन करते समय कर और अन्य लागतें भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि के बीच संबंध सरल या हमेशा समान नहीं होता। कम और स्थिर मुद्रास्फीति की स्थिति में व्यवसायों और परिवारों के लिए आर्थिक निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
दूसरी ओर, अत्यधिक या अस्थिर मुद्रास्फीति से वास्तविक आय, बचत, निवेश और आर्थिक नियोजन प्रभावित हो सकते हैं।
मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए यदि बहुत सख्त नीति अपनाई जाती है, तो कुछ परिस्थितियों में मांग, निवेश और रोजगार पर अल्पकालीन दबाव भी पड़ सकता है।
इसलिए मौद्रिक नीति में मूल्य स्थिरता, आर्थिक गतिविधि और वित्तीय परिस्थितियों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है।
संभावित प्रश्न: “भारत में मुद्रास्फीति के प्रमुख कारणों की चर्चा करते हुए इसके नियंत्रण के उपायों का विश्लेषण कीजिए।”
उत्तर की संरचना:
भूमिका: मुद्रास्फीति की संक्षिप्त परिभाषा और क्रय शक्ति से उसका संबंध लिखें।
कारण: मांग-खींच, लागत-धक्का, आयातित, खाद्य और संरचनात्मक कारणों को अलग-अलग समझाएँ।
प्रभाव: निम्न आय वर्ग, वास्तविक आय, बचत, निवेश, आय वितरण और आर्थिक स्थिरता पर प्रभाव का विश्लेषण करें।
उपाय: मौद्रिक नीति, राजकोषीय नीति और आपूर्ति-पक्षीय सुधारों को मुद्रास्फीति के कारण के अनुसार प्रस्तुत करें।
निष्कर्ष: मूल्य स्थिरता के लिए केवल मांग नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं है। दीर्घकाल में उत्पादकता, भंडारण, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा सुरक्षा और प्रभावी बाजार व्यवस्था में सुधार भी महत्वपूर्ण हैं।