मुद्रा (Money) वह वस्तु या माध्यम है जिसे समाज व्यापक रूप से वस्तुओं और सेवाओं के भुगतान, मूल्य मापन तथा आर्थिक लेन-देन के लिए स्वीकार करता है।
सरल शब्दों में, मुद्रा ऐसी स्वीकृत आर्थिक इकाई है जिसके माध्यम से हम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य व्यक्त करते हैं तथा उनका क्रय-विक्रय करते हैं।
आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा केवल नोट और सिक्कों तक सीमित नहीं है। बैंक जमा, डिजिटल भुगतान और इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध धन भी आधुनिक मौद्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
मुद्रा के विकास से पहले वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) का उपयोग किया जाता था। इसमें एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान होता था।
इस प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या दोहरी इच्छाओं का संयोग (Double Coincidence of Wants) थी।
उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति के पास गेहूँ है और उसे कपड़ा चाहिए, तो उसे ऐसा व्यक्ति ढूँढना होगा जिसके पास कपड़ा हो और जिसे उसी समय गेहूँ चाहिए।
मुद्रा आधुनिक अर्थव्यवस्था में कई महत्वपूर्ण कार्य करती है। इसके चार मूलभूत कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
यदि किसी वस्तु को समाज व्यापक रूप से भुगतान के माध्यम के रूप में स्वीकार नहीं करता, तो वह आधुनिक अर्थ में प्रभावी मुद्रा का कार्य नहीं कर सकती।
मुद्रा का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है।
भारत में मुद्रा व्यवस्था का केंद्रीय संस्थान भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India — RBI) है।
भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति, बैंकिंग प्रणाली के विनियमन, मुद्रा प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत में बैंकनोट जारी करने की केंद्रीय भूमिका RBI की है। एक रुपये का नोट भारत सरकार द्वारा जारी किया जाता है, जबकि अन्य बैंकनोट RBI के माध्यम से जारी किए जाते हैं।
कानूनी मुद्रा (Legal Tender) ऐसी मुद्रा है जिसे कानून के अनुसार ऋण या भुगतान के निपटान के लिए स्वीकार किया जाना आवश्यक होता है, संबंधित कानूनी प्रावधानों और सीमाओं के अधीन।
UPSC में Legal Tender और केवल सामान्य रूप से स्वीकार किए जाने वाले भुगतान माध्यम के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है।
फिएट मुद्रा (Fiat Money) ऐसी मुद्रा है जिसका मूल्य मुख्यतः सरकार की कानूनी मान्यता और जनता के विश्वास पर आधारित होता है, न कि किसी निश्चित मात्रा में सोने या अन्य वस्तु में परिवर्तनीय होने पर।
आधुनिक अधिकांश राष्ट्रीय मुद्राएँ फिएट मुद्रा की प्रकृति रखती हैं।
प्रत्येक वित्तीय परिसंपत्ति मुद्रा नहीं होती। मुद्रा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका भुगतान में प्रत्यक्ष उपयोग है।
कुछ ऐसी वित्तीय परिसंपत्तियाँ जिन्हें अपेक्षाकृत आसानी से मुद्रा में बदला जा सकता है, उन्हें निकट-मुद्रा (Near Money) कहा जाता है।
उदाहरण के रूप में कुछ सावधि जमा या अन्य अत्यधिक तरल वित्तीय परिसंपत्तियाँ निकट-मुद्रा की अवधारणा से संबंधित हो सकती हैं।
तरलता (Liquidity) का अर्थ किसी परिसंपत्ति को बिना बहुत अधिक मूल्य-हानि के शीघ्र भुगतान योग्य माध्यम में बदल पाने की क्षमता है।
सामान्यतः नकद मुद्रा अत्यधिक तरल होती है, जबकि भूमि या भवन जैसी परिसंपत्तियों को तुरंत नकद में बदलना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है।
मुद्रा आपूर्ति (Money Supply) से आशय किसी अर्थव्यवस्था में किसी निश्चित समय पर उपलब्ध मौद्रिक परिसंपत्तियों की मात्रा से है।
भारत में मुद्रा आपूर्ति के विभिन्न मापों में मुद्रा की तरलता और बैंक जमा को अलग-अलग स्तरों पर शामिल किया जाता है।
मुद्रा आपूर्ति को समझना मुद्रास्फीति, ब्याज दर, आर्थिक गतिविधि और मौद्रिक नीति के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मौद्रिक समुच्चय (Monetary Aggregates) अर्थव्यवस्था में मुद्रा और उससे संबंधित तरल परिसंपत्तियों की विभिन्न परिभाषाओं को दर्शाते हैं।
भारत में RBI द्वारा मुद्रा के विभिन्न माप प्रकाशित किए जाते हैं। इनके बीच की अवधारणात्मक संरचना समझना महत्वपूर्ण है।
सामान्य दृष्टिकोण से M3 को भारत में व्यापक मुद्रा का प्रमुख माप समझना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
मुद्रा गुणक (Money Multiplier) यह समझाने में सहायता करता है कि बैंकिंग प्रणाली में आधार मुद्रा या रिजर्व में परिवर्तन किस प्रकार कुल जमा और व्यापक मुद्रा में अपेक्षाकृत बड़ा परिवर्तन पैदा कर सकता है।
सरल मॉडल में मुद्रा गुणक को आरक्षित अनुपात के व्युत्क्रम से जोड़ा जाता है:
मुद्रा गुणक = 1 ÷ आरक्षित अनुपात
वास्तविक अर्थव्यवस्था में मुद्रा सृजन केवल आरक्षित अनुपात पर निर्भर नहीं करता। ऋण की मांग, बैंक की सावधानी, नकदी रखने की प्रवृत्ति, पूँजी आवश्यकताएँ और अन्य नियामकीय कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।
बैंक (Bank) एक वित्तीय मध्यस्थ संस्था है जो जनता से जमा स्वीकार करती है और विभिन्न व्यक्तियों तथा संस्थाओं को ऋण एवं अन्य वित्तीय सेवाएँ उपलब्ध कराती है।
बैंक बचतकर्ताओं और उधारकर्ताओं के बीच मध्यस्थता करके आर्थिक संसाधनों को अधिक उत्पादक गतिविधियों की ओर प्रवाहित करने में सहायता करते हैं।
बैंक विभिन्न प्रकार की जमा स्वीकार करते हैं। इनमें तरलता, ब्याज और निकासी की शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं।
वाणिज्यिक बैंक केवल पहले से उपलब्ध मुद्रा को उधार नहीं देते, बल्कि बैंकिंग प्रणाली में जमा और ऋण की प्रक्रिया के माध्यम से व्यापक मुद्रा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जब बैंक किसी ग्राहक को ऋण देता है, तो उसके खाते में जमा राशि बनाई जा सकती है। इस प्रकार बैंकिंग प्रणाली में ऋण और जमा का विस्तार होता है।
इसे ऋण सृजन (Credit Creation) कहा जाता है।
बैंकों की ऋण सृजन क्षमता असीमित नहीं होती।
भारत की बैंकिंग प्रणाली में केंद्रीय बैंक, वाणिज्यिक बैंक, सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक तथा अन्य विनियमित बैंकिंग संस्थाएँ शामिल हैं।
व्यापक रूप से बैंकिंग व्यवस्था को निम्नलिखित भागों में समझा जा सकता है:
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है। इसकी स्थापना 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत हुई थी।
RBI का राष्ट्रीयकरण 1949 में हुआ।
केंद्रीय बैंक के रूप में RBI का कार्य केवल मुद्रा जारी करने तक सीमित नहीं है। यह मौद्रिक नीति, बैंकिंग विनियमन, विदेशी मुद्रा प्रबंधन, भुगतान प्रणाली, सरकारी बैंकिंग और वित्तीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
RBI वाणिज्यिक बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य करता है। आवश्यकता पड़ने पर बैंकिंग प्रणाली को तरलता उपलब्ध कराने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
RBI बैंकों के नकद आरक्षित प्रबंधन, नियमन, पर्यवेक्षण और भुगतान व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण कार्य करता है।
अंतिम ऋणदाता (Lender of Last Resort) के रूप में केंद्रीय बैंक ऐसी परिस्थितियों में बैंकिंग प्रणाली को तरलता सहायता प्रदान कर सकता है जब कोई बैंक सामान्य बाजार स्रोतों से पर्याप्त धन प्राप्त करने में कठिनाई का सामना कर रहा हो।
इसका उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में अचानक उत्पन्न तरलता संकट को नियंत्रित करने में सहायता करना है।
नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio — CRR) वह अनुपात है जिसके अनुसार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को अपनी निर्धारित देनदारियों का एक हिस्सा RBI के पास नकद आरक्षित के रूप में रखना होता है।
CRR में परिवर्तन बैंकिंग प्रणाली की उपलब्ध तरलता और ऋण देने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
CRR बढ़ने पर सामान्यतः बैंकों के पास ऋण देने के लिए उपलब्ध संसाधन कम हो सकते हैं। CRR घटने पर विपरीत दिशा में प्रभाव पड़ सकता है।
सांविधिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio — SLR) के अंतर्गत बैंकों को अपनी निर्धारित देनदारियों का एक निश्चित हिस्सा अनुमत तरल परिसंपत्तियों में रखना होता है।
SLR का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त तरलता और सुरक्षा बनाए रखना तथा बैंकों की परिसंपत्ति संरचना को प्रभावित करना है।
रेपो दर (Repo Rate) वह दर है जिस पर RBI पात्र प्रतिभूतियों के बदले बैंकों को अल्पकालीन धन उपलब्ध कराता है।
रेपो दर मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
सामान्यतः रेपो दर बढ़ने पर बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से धन प्राप्त करना महँगा होता है, जिससे ऋण की लागत और आर्थिक गतिविधि पर प्रभाव पड़ सकता है।
रिवर्स रेपो की अवधारणा में बैंक अपनी अतिरिक्त तरलता को केंद्रीय बैंक के पास रखने के बदले प्रतिफल प्राप्त करते हैं।
भारत की आधुनिक मौद्रिक नीति व्यवस्था में RBI तरलता प्रबंधन के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग करता है और केवल किसी एक दर पर निर्भर नहीं रहता।
खुले बाजार परिचालन (Open Market Operations — OMO) के माध्यम से RBI सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद या बिक्री करता है।
जब केंद्रीय बैंक प्रतिभूतियाँ खरीदता है, तो बैंकिंग प्रणाली में तरलता बढ़ सकती है। बिक्री की स्थिति में तरलता पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए OMO मौद्रिक नीति के तरलता प्रबंधन का महत्वपूर्ण साधन है।
मौद्रिक नीति (Monetary Policy) का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा और ऋण की स्थितियों को इस प्रकार प्रभावित करना है कि मूल्य स्थिरता के साथ आर्थिक गतिविधि और वित्तीय स्थिरता के व्यापक उद्देश्यों को समर्थन मिले।
RBI ब्याज दर, तरलता और अन्य मौद्रिक साधनों के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली को प्रभावित करता है।
बैंक दर (Bank Rate) वह दर है जिसका उपयोग RBI की मौद्रिक एवं विनियामक व्यवस्था में दीर्घकालीन वित्तीय संकेतक के रूप में किया जाता है।
बैंक दर को रेपो दर के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए। दोनों की अवधारणा और परिचालन संदर्भ अलग हैं।
वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks) वे बैंक हैं जो मुख्य रूप से जमा स्वीकार करने और ऋण उपलब्ध कराने जैसी बैंकिंग गतिविधियाँ करते हैं।
भारत में वाणिज्यिक बैंक सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और विदेशी बैंक जैसी श्रेणियों में पाए जाते हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Public Sector Banks) वे बैंक हैं जिनमें सरकार की प्रमुख हिस्सेदारी होती है।
इनका महत्व केवल बैंकिंग सेवाओं तक सीमित नहीं है। कृषि ऋण, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, वित्तीय समावेशन और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
निजी क्षेत्र के बैंकों में निजी स्वामित्व की प्रमुख भूमिका होती है। आधुनिक तकनीक, डिजिटल बैंकिंग और प्रतिस्पर्धी वित्तीय सेवाओं के विस्तार में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
बैंकिंग क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी दोनों प्रकार के बैंक अर्थव्यवस्था में ऋण और वित्तीय सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks — RRBs) मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग और ऋण सुविधाओं को बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित किए गए।
इनके लक्षित लाभार्थियों में छोटे और सीमांत किसान, कृषि श्रमिक, कारीगर तथा ग्रामीण छोटे उद्यम शामिल रहे हैं।
सहकारी बैंक (Cooperative Banks) सहकारी सिद्धांतों पर आधारित बैंकिंग संस्थाएँ हैं।
ये विशेष रूप से कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, छोटे व्यवसाय और स्थानीय समुदायों की वित्तीय आवश्यकताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सहकारी बैंकिंग व्यवस्था में शहरी और ग्रामीण दोनों प्रकार की संस्थाएँ शामिल हो सकती हैं।
लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks) का उद्देश्य छोटे व्यवसायों, छोटे किसानों, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों और कम सेवा प्राप्त वर्गों को बैंकिंग सुविधाएँ और ऋण उपलब्ध कराने में सहायता करना है।
ये वित्तीय समावेशन को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा हैं।
भुगतान बैंक (Payments Banks) का उद्देश्य मुख्यतः छोटे जमा, भुगतान और धन हस्तांतरण जैसी सेवाओं को व्यापक बनाना है।
इनकी गतिविधियों पर सामान्य वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में नियामकीय सीमाएँ होती हैं। विशेष रूप से इनके ऋण देने संबंधी अधिकारों को सामान्य वाणिज्यिक बैंकों से अलग समझना चाहिए।
गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (Non-Performing Asset — NPA) ऐसी ऋण परिसंपत्ति है जिसमें निर्धारित अवधि तक ब्याज या मूलधन का भुगतान नियमानुसार नहीं हो पाता और वह नियामकीय मानकों के अनुसार गैर-निष्पादित बन जाती है।
NPA बढ़ने से बैंक की आय, पूँजी और नए ऋण देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
सकल NPA (Gross NPA) बैंक की कुल गैर-निष्पादित ऋण परिसंपत्तियों को दर्शाता है।
शुद्ध NPA (Net NPA) में प्रावधान और कुछ समायोजनों को ध्यान में रखने के बाद बैंक के वास्तविक NPA जोखिम की स्थिति को देखा जाता है।
Gross NPA और Net NPA के बीच वैचारिक अंतर महत्वपूर्ण है।
भारत में बैंकिंग क्षेत्र को अधिक पारदर्शी, मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए समय-समय पर अनेक सुधार किए गए हैं।
पुनर्पूंजीकरण (Recapitalisation) का अर्थ बैंक की पूँजी को मजबूत करना है ताकि वह संभावित नुकसान को सहन कर सके और पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराने में सक्षम रहे।
विशेष रूप से बड़े NPA के कारण बैंक की पूँजी कमजोर होने पर पुनर्पूंजीकरण बैंकिंग प्रणाली को स्थिर करने का एक साधन हो सकता है।
वित्तीय स्थिरता (Financial Stability) का अर्थ ऐसी वित्तीय व्यवस्था से है जिसमें बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएँ सामान्य परिस्थितियों तथा विभिन्न आर्थिक झटकों के दौरान भी अपना मध्यस्थता कार्य प्रभावी रूप से जारी रख सकें।
बैंकिंग संकट केवल बैंकों तक सीमित नहीं रहता। इससे निवेश, रोजगार, उत्पादन और आर्थिक वृद्धि पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) का अर्थ समाज के सभी वर्गों, विशेष रूप से कम आय और वंचित समूहों को उचित लागत पर उपयोगी वित्तीय सेवाओं तक पहुँच उपलब्ध कराना है।
इसमें बैंक खाता, बचत, ऋण, बीमा, पेंशन और भुगतान सेवाओं तक पहुँच शामिल हो सकती है।
वित्तीय समावेशन गरीबी कम करने, बचत बढ़ाने, औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जुड़ाव और सामाजिक सुरक्षा के विस्तार में सहायक हो सकता है।
प्रधानमंत्री जन-धन योजना का उद्देश्य बैंकिंग सेवाओं से वंचित या कम सेवा प्राप्त लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना है।
बैंक खाता, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल भुगतान और अन्य वित्तीय सेवाओं तक पहुँच ने वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया को व्यापक बनाने में सहायता की है।
डिजिटल बैंकिंग (Digital Banking) के अंतर्गत इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के माध्यम से बैंकिंग सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface — UPI) भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
UPI के माध्यम से बैंक खातों के बीच त्वरित डिजिटल भुगतान और धन हस्तांतरण किया जा सकता है।
डिजिटल भुगतान से लेन-देन की सुविधा बढ़ती है, लेकिन साइबर सुरक्षा, डिजिटल साक्षरता, धोखाधड़ी और डिजिटल विभाजन जैसी चुनौतियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
बैंकिंग के डिजिटलीकरण के साथ साइबर सुरक्षा का महत्व भी बढ़ा है।
सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग के लिए मजबूत प्रमाणीकरण, ग्राहक जागरूकता, डेटा सुरक्षा और संस्थागत साइबर सुरक्षा आवश्यक हैं।
बैंक बचत को निवेश में परिवर्तित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। वे परिवारों और संस्थाओं की बचत को एकत्र करके व्यवसायों, किसानों, उद्योगों और अन्य उत्पादक गतिविधियों को ऋण उपलब्ध कराते हैं।
इसलिए एक मजबूत बैंकिंग प्रणाली पूँजी निर्माण, निवेश, रोजगार और आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।
मुद्रा और बैंकिंग प्रणाली का मुद्रास्फीति से गहरा संबंध है। बैंकिंग प्रणाली में ऋण और मुद्रा की उपलब्धता बढ़ने से आर्थिक मांग प्रभावित हो सकती है।
यदि अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता की तुलना में मांग बहुत तेजी से बढ़ती है, तो मुद्रास्फीति का दबाव उत्पन्न हो सकता है।
इसी कारण RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से ब्याज दर और तरलता की स्थितियों को प्रभावित करता है।
ब्याज दर (Interest Rate) ऋण की लागत को प्रभावित करती है। ब्याज दरों में परिवर्तन से उपभोग, बचत, निवेश और ऋण की मांग पर प्रभाव पड़ सकता है।
सामान्यतः ब्याज दरों में वृद्धि ऋण को महँगा बनाती है, जबकि ब्याज दरों में कमी ऋण को अपेक्षाकृत सस्ता बना सकती है।
हालांकि वास्तविक अर्थव्यवस्था में इसका प्रभाव बैंकिंग प्रणाली, अपेक्षाओं, ऋण की मांग और आर्थिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
वित्तीय मध्यस्थता (Financial Intermediation) वह प्रक्रिया है जिसमें बैंक बचतकर्ताओं से संसाधन प्राप्त करके उन्हें ऋण लेने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं तक पहुँचाते हैं।
बैंक इस प्रक्रिया में जोखिम मूल्यांकन, भुगतान व्यवस्था, तरलता प्रबंधन और ऋण निगरानी जैसे कार्य भी करते हैं।
यदि प्रश्न हो — “भारत की आर्थिक वृद्धि में बैंकिंग प्रणाली की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।”
उत्तर की शुरुआत बैंकिंग प्रणाली की संक्षिप्त परिभाषा से की जा सकती है। इसके बाद बचत का संकलन, ऋण वितरण, पूँजी निर्माण, वित्तीय समावेशन, डिजिटल भुगतान और आर्थिक गतिविधियों में बैंकिंग की भूमिका समझानी चाहिए।
इसके बाद NPA, साइबर जोखिम, वित्तीय बहिष्करण, ऋण की गुणवत्ता और क्षेत्रीय असमानता जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया जा सकता है।
निष्कर्ष में मजबूत बैंकिंग विनियमन, तकनीकी नवाचार, वित्तीय समावेशन, जोखिम प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता को आगे की दिशा के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
मुद्रा → विनिमय, मूल्य मापन, मूल्य संचय और भविष्य के भुगतान का साधन
M1 → संकीर्ण मुद्रा का प्रमुख माप
M3 → व्यापक मुद्रा का प्रमुख माप
बैंक → जमा स्वीकार करना और ऋण प्रदान करना
RBI → भारत का केंद्रीय बैंक
CRR → RBI के पास नकद आरक्षित
SLR → अनुमत तरल परिसंपत्तियों में वैधानिक आरक्षित
Repo Rate → RBI से बैंकों की अल्पकालीन उधारी की प्रमुख दर
OMO → सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री द्वारा तरलता प्रबंधन
NPA → गैर-निष्पादित ऋण परिसंपत्ति
Financial Inclusion → सभी वर्गों तक उचित वित्तीय सेवाओं की पहुँच