कृषि (Agriculture) भारत की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समाज का एक महत्वपूर्ण आधार है। कृषि का संबंध केवल फसल उत्पादन से नहीं है, बल्कि इसमें पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, वानिकी और कृषि से संबंधित अनेक गतिविधियाँ भी शामिल हैं।
भारत की विशाल जनसंख्या, विविध जलवायु, विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ, मानसूनी वर्षा और अलग-अलग स्थलाकृतियाँ देश में कृषि की अत्यधिक विविधता पैदा करती हैं।
UPSC के लिए कृषि को समझने की मुख्य कड़ी है — जलवायु + मिट्टी + सिंचाई + कृषि तकनीक + बाजार + किसान → फसल पैटर्न एवं कृषि उत्पादकता ।
किसी क्षेत्र में कौन-सी फसल उगाई जाएगी और उसकी उत्पादकता कितनी होगी, यह अनेक प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों पर निर्भर करता है।
भारत में कृषि के विभिन्न रूप प्राकृतिक परिस्थितियों, जनसंख्या दबाव, बाजार और तकनीकी विकास के आधार पर विकसित हुए हैं।
जब किसान मुख्य रूप से अपनी और अपने परिवार की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कृषि करता है, तो इसे निर्वाह कृषि कहा जाता है।
इसमें उत्पादन का बड़ा हिस्सा स्थानीय उपभोग के लिए इस्तेमाल हो सकता है। भारत के पारंपरिक कृषि क्षेत्रों में निर्वाह कृषि के विभिन्न रूप ऐतिहासिक रूप से पाए गए हैं।
जब कृषि उत्पादन मुख्य रूप से बाजार में बिक्री और आय अर्जित करने के उद्देश्य से किया जाता है, तो उसे वाणिज्यिक कृषि कहा जाता है।
कपास, गन्ना, तंबाकू, चाय, कॉफी, रबर तथा अनेक तिलहन और बागवानी फसलें विभिन्न क्षेत्रों में वाणिज्यिक कृषि से जुड़ी हैं।
बड़े क्षेत्र में एक प्रमुख व्यावसायिक फसल का वैज्ञानिक और संगठित तरीके से उत्पादन रोपण कृषि की विशेषता है।
प्रमुख उदाहरण:
रोपण कृषि सामान्यतः प्रसंस्करण उद्योग और बाजार से गहराई से जुड़ी होती है।
भारत में फसल चक्र मुख्यतः मानसून और तापमान की मौसमी स्थिति से प्रभावित होता है। सामान्यतः तीन प्रमुख कृषि ऋतुओं का अध्ययन किया जाता है:
खरीफ फसलों की बुवाई सामान्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के आसपास की जाती है और इनकी कटाई वर्षा ऋतु के बाद होती है।
प्रमुख खरीफ फसलें:
खरीफ फसलों का उत्पादन मानसून की समयबद्धता और वर्षा के वितरण से विशेष रूप से प्रभावित होता है।
रबी फसलों की बुवाई सामान्यतः मानसून के बाद शीत ऋतु में होती है और इनकी कटाई वसंत ऋतु में की जाती है।
प्रमुख रबी फसलें:
रबी कृषि के लिए शीतकालीन तापमान और सिंचाई की उपलब्धता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रबी की कटाई और खरीफ की बुवाई के बीच गर्मी के अपेक्षाकृत छोटे मौसम में उगाई जाने वाली फसलों को जायद फसलें कहा जाता है।
उदाहरण:
धान भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है। इसे सामान्यतः उच्च तापमान और पर्याप्त जल उपलब्धता की आवश्यकता होती है।
भारत में धान की खेती मुख्यतः मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है, लेकिन सिंचाई की सहायता से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसका उत्पादन संभव है।
प्रमुख क्षेत्र:
धान की उत्पादकता केवल वर्षा पर निर्भर नहीं करती; सिंचाई, उच्च उपज वाली किस्में, कृषि तकनीक और प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हैं।
गेहूँ भारत की प्रमुख रबी खाद्यान्न फसल है। इसकी वृद्धि के लिए ठंडी अवस्था और पकने के समय अपेक्षाकृत शुष्क तथा साफ मौसम सामान्यतः अनुकूल होता है।
प्रमुख क्षेत्र:
उत्तर-पश्चिमी भारत में सिंचाई और हरित क्रांति के कारण गेहूँ उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
ज्वार, बाजरा और रागी जैसे अनाजों को सामान्यतः मिलेट्स (Millets) कहा जाता है। भारत में इनके पोषण, जल दक्षता और जलवायु-सहनशीलता के कारण महत्व को फिर से बढ़ावा मिला है।
मिलेट्स सामान्यतः कम वर्षा और अपेक्षाकृत कठिन कृषि परिस्थितियों में भी उगाए जा सकते हैं। इसलिए इन्हें जलवायु-सहनीय कृषि के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत में चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर और मटर जैसी अनेक दलहन फसलें उगाई जाती हैं।
दलहन प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं और कई दलहनी पौधों की जड़ों में राइजोबियम (Rhizobium) जैसे जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध के कारण नाइट्रोजन स्थिरीकरण में योगदान हो सकता है।
इसलिए फसल चक्र में दलहनों का उपयोग मृदा स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
भारत में मूंगफली, सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और अरंडी प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल हैं।
तिलहन उत्पादन खाद्य तेल की घरेलू उपलब्धता और कृषि आय दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
गन्ना एक लंबी अवधि की उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय नकदी फसल है। इसे पर्याप्त तापमान और जल की आवश्यकता होती है।
भारत में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार सहित अनेक राज्यों में गन्ने की खेती की जाती है।
गन्ना कृषि सीधे चीनी उद्योग से जुड़ा है, इसलिए कृषि-उद्योग संबंध को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण उदाहरण है।
कपास भारत की प्रमुख रेशेदार और वाणिज्यिक फसलों में से एक है। यह गर्म जलवायु और पर्याप्त वृद्धि अवधि वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह विकसित होती है।
काली मिट्टी कपास के लिए विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है क्योंकि इसकी जलधारण क्षमता अधिक होती है।
प्रमुख क्षेत्र:
चाय एक महत्वपूर्ण रोपण फसल है। इसे सामान्यतः गर्म और आर्द्र जलवायु, पर्याप्त वर्षा तथा अच्छी जल निकासी वाली ढालदार भूमि पसंद होती है।
प्रमुख क्षेत्र:
चाय उत्पादन में मिट्टी, ढाल, वर्षा, तापमान और श्रम की उपलब्धता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में कॉफी मुख्यतः दक्षिण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाती है। कर्नाटक इसका महत्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र है। इसके अतिरिक्त केरल और तमिलनाडु में भी कॉफी की खेती होती है।
कॉफी के लिए छायादार परिस्थितियाँ, उपयुक्त तापमान और अच्छी जल निकासी वाली भूमि महत्वपूर्ण होती है।
प्राकृतिक रबर को उच्च तापमान, पर्याप्त वर्षा और आर्द्र जलवायु पसंद होती है।
केरल भारत में प्राकृतिक रबर के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ भागों में भी इसका उत्पादन होता है।
बागवानी (Horticulture) में फल, सब्जियाँ, फूल, मसाले, औषधीय एवं सुगंधित पौधों जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों का उत्पादन शामिल है।
भारत में आम, केला, सेब, अंगूर, संतरा, अनार, नारियल, मसाले और अनेक सब्जियों की खेती विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में होती है।
बागवानी में प्रति इकाई क्षेत्र अधिक मूल्य प्राप्त करने की संभावना होती है, लेकिन इसके लिए भंडारण, शीत-श्रृंखला और बाजार तक बेहतर पहुँच आवश्यक है।
भारत में मानसून की अनिश्चितता के कारण सिंचाई कृषि की उत्पादकता और स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार है।
सिंचाई के प्रमुख स्रोत:
सूक्ष्म सिंचाई में जल को पौधे की जड़ के पास नियंत्रित मात्रा में पहुँचाया जाता है।
इसकी दो प्रमुख प्रणालियाँ हैं:
इनका उद्देश्य जल की बचत, जल उपयोग दक्षता बढ़ाना और सिंचाई को अधिक लक्षित बनाना है।
भारत में हरित क्रांति मुख्यतः उच्च उपज वाली किस्मों, सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि अनुसंधान और बेहतर कृषि प्रबंधन के संयुक्त उपयोग से खाद्यान्न उत्पादन में तेज वृद्धि से जुड़ी है।
भारत में इसका प्रारंभिक प्रभाव विशेष रूप से गेहूँ और सिंचित क्षेत्रों में अधिक दिखाई दिया।
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख प्रारंभिक लाभार्थी क्षेत्रों में रहे।
कृषि विविधीकरण का अर्थ केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न फसलों, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन और अन्य कृषि गतिविधियों को अपनाना है।
इससे किसान की आय के स्रोत बढ़ सकते हैं और किसी एक फसल या मौसम पर निर्भरता कम हो सकती है।
अलग-अलग मौसमों में क्रमशः अलग फसलों को उगाने की वैज्ञानिक व्यवस्था को फसल चक्र कहा जाता है।
उदाहरण के लिए अनाज के साथ दलहन को शामिल करने से पोषक तत्वों के उपयोग का संतुलन बेहतर हो सकता है और मृदा स्वास्थ्य में सहायता मिल सकती है।
जब फसल उत्पादन के साथ पशुपालन जैसी गतिविधियाँ एक ही कृषि व्यवस्था में की जाती हैं, तो इसे मिश्रित खेती कहा जाता है।
इसमें कृषि और पशुपालन के बीच संसाधनों का पुनः उपयोग संभव होता है। उदाहरण के लिए पशुओं से प्राप्त जैविक पदार्थ खेतों में खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सीमित नमी का अधिकतम उपयोग करके की जाने वाली कृषि को शुष्क कृषि के संदर्भ में समझा जाता है।
ऐसे क्षेत्रों में सूखा-सहिष्णु फसलें, नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन और उपयुक्त फसल चक्र महत्वपूर्ण हैं।
भारत की कृषि पर मानसून का प्रभाव अत्यंत व्यापक है। मानसून की शुरुआत, वर्षा की मात्रा, वितरण, विराम और वापसी कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में मानसून की अनियमितता सूखा, फसल क्षति और आय में अस्थिरता का कारण बन सकती है।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी भूमि के विभाजन के कारण कई क्षेत्रों में कृषि जोत छोटी और अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित हो जाती है।
इससे आधुनिक कृषि मशीनरी का उपयोग, सिंचाई व्यवस्था और कृषि निवेश को कुशल तरीके से करना कठिन हो सकता है।
भारत के अनेक कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए भूजल का महत्वपूर्ण योगदान है। अत्यधिक दोहन से भूजल स्तर में गिरावट और दीर्घकालीन जल सुरक्षा की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
इसलिए फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, जल-कुशल फसलें और भूजल पुनर्भरण महत्वपूर्ण उपाय हैं।
कृषि जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र है। तापमान में वृद्धि, वर्षा की अनिश्चितता, सूखा, बाढ़, चक्रवात और गर्म हवाएँ फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं।
दूसरी ओर कृषि गतिविधियाँ भी जलवायु परिवर्तन में योगदान कर सकती हैं, विशेषकर भूमि उपयोग परिवर्तन, पशुपालन, उर्वरक उपयोग और कुछ कृषि प्रणालियों से जुड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के माध्यम से।
ऐसी कृषि प्रणाली जो उत्पादकता और किसान की आय को बनाए रखने के साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अनुकूलन तथा जहाँ संभव हो उत्सर्जन में कमी पर भी ध्यान दे, उसे जलवायु-स्मार्ट कृषि के व्यापक दृष्टिकोण से समझा जाता है।
इसके अंतर्गत जल-कुशल सिंचाई, सूखा-सहिष्णु किस्में, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, फसल विविधीकरण और मौसम आधारित कृषि सलाह महत्वपूर्ण हैं।
कृषि का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा से है। खाद्य सुरक्षा केवल पर्याप्त उत्पादन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि भोजन की उपलब्धता, पहुँच और उपयोग सहित व्यापक परिस्थितियों से जुड़ी होती है।
इसलिए कृषि नीति में उत्पादन बढ़ाने के साथ पोषण विविधता, भंडारण, वितरण और किसानों की आय जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।
कृषि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, आय और स्थानीय बाजारों को प्रभावित करती है। कृषि से जुड़े परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन क्षेत्र भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसीलिए कृषि का विकास केवल खेत में उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए; कृषि मूल्य श्रृंखला (Agricultural Value Chain) को मजबूत करना भी आवश्यक है।
अनेक उद्योग सीधे कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर निर्भर करते हैं।
इसलिए कृषि और उद्योग के बीच मजबूत संबंध ग्रामीण रोजगार और मूल्य संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण है।
ऐसी कृषि व्यवस्था जो वर्तमान पीढ़ी की खाद्य एवं आय संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की प्राकृतिक संसाधन क्षमता को नष्ट न करे, सतत कृषि के व्यापक सिद्धांत से संबंधित है।
प्रमुख उपाय:
भारत में कृषि प्राकृतिक परिस्थितियों और मानवीय हस्तक्षेप के संयुक्त प्रभाव से विकसित हुई है। मानसूनी जलवायु, मिट्टी की विविधता और विशाल कृषि योग्य भूमि ने भारत को विविध फसल प्रणालियों वाला देश बनाया है।
हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि की, लेकिन इसके लाभ क्षेत्रीय और फसल संबंधी रूप से समान नहीं रहे। इसके साथ भूजल दोहन, मृदा स्वास्थ्य और फसल विविधता जैसी नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
वर्तमान कृषि नीति के सामने प्रमुख चुनौती है कि उत्पादकता, किसान आय, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
| विषय | मुख्य बात |
|---|---|
| खरीफ | मानसून से जुड़ी फसलें — धान, मक्का, कपास, सोयाबीन |
| रबी | शीत ऋतु — गेहूँ, चना, सरसों, जौ |
| जायद | रबी और खरीफ के बीच — तरबूज, खरबूजा, सब्जियाँ |
| धान | उच्च तापमान और पर्याप्त जल — प्रमुख खाद्यान्न फसल |
| गेहूँ | प्रमुख रबी फसल — उत्तर-पश्चिमी भारत महत्वपूर्ण |
| कपास | काली मिट्टी से विशेष संबंध |
| चाय | गर्म-आर्द्र जलवायु और अच्छी जल निकासी |
| हरित क्रांति | HYV + सिंचाई + उर्वरक + तकनीक + कृषि अनुसंधान |
| सूक्ष्म सिंचाई | ड्रिप और स्प्रिंकलर — जल उपयोग दक्षता |
| सतत कृषि | उत्पादन + आय + संसाधन संरक्षण का संतुलन |
भारत की कृषि देश की भौगोलिक विविधता, मानसूनी जलवायु और विशाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ी हुई है। अलग-अलग जलवायु और मिट्टी के कारण देश में धान, गेहूँ, कपास, गन्ना, दलहन, तिलहन, चाय, कॉफी और अनेक बागवानी फसलों का उत्पादन होता है।
भविष्य की कृषि के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण, जलवायु-सहनीय कृषि, बेहतर भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक किसानों की पहुँच को साथ लेकर चलना आवश्यक है।