जलवायु (Climate) का अर्थ
किसी स्थान के वायुमंडल की दीर्घकालीन औसत अवस्था तथा तापमान, वर्षण,
आर्द्रता, पवन और अन्य मौसमी तत्वों के लंबे समय में देखे जाने वाले
प्रतिरूपों तथा परिवर्तनशीलता को जलवायु (Climate) कहा जाता है।
जलवायु का अध्ययन लंबे समय के मौसम संबंधी आँकड़ों के आधार पर किया जाता है।
विश्व मौसम संगठन (WMO) द्वारा जलवायु संबंधी मानकों के लिए सामान्यतः
30 वर्ष की अवधि के जलवायु सामान्यांक (Climate Normals) का उपयोग किया जाता है।
इसलिए जलवायु केवल किसी स्थान के औसत तापमान या वर्षा को नहीं बताती,
बल्कि उनके मौसमी प्रतिरूप और दीर्घकालीन परिवर्तनशीलता को भी समझने में सहायता करती है।
मौसम और जलवायु में अंतर
-
मौसम (Weather):
किसी स्थान और निश्चित समय पर वायुमंडल की अल्पकालिक स्थिति।
-
जलवायु (Climate):
लंबे समय में मौसम की औसत स्थिति, उसके प्रतिरूप और परिवर्तनशीलता।
-
मौसम कुछ घंटों, दिनों या सप्ताहों में तेजी से बदल सकता है,
जबकि जलवायु की पहचान लंबे समय के आँकड़ों से होती है।
-
मौसम पूर्वानुमान मुख्यतः अल्पकालीन परिस्थितियों पर केंद्रित होता है,
जबकि जलवायु अध्ययन दीर्घकालीन प्रतिरूपों और प्रवृत्तियों को समझता है।
जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
-
अक्षांश (Latitude):
सूर्य की किरणों के कोण और प्राप्त सौर ऊर्जा में अंतर पैदा करता है।
-
ऊँचाई (Altitude):
ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान सामान्यतः घटता है।
-
समुद्र से दूरी:
समुद्र तापमान को संतुलित करता है, जबकि महाद्वीपों के आंतरिक भागों में
तापमान की वार्षिक सीमा अधिक हो सकती है।
-
महासागरीय धाराएँ:
गर्म और ठंडी धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान तथा नमी की स्थिति को प्रभावित करती हैं।
-
स्थलाकृति (Relief):
पर्वत पवन दिशा, वर्षा के वितरण और स्थानीय तापमान को प्रभावित करते हैं।
-
प्रचलित पवनें:
नमी और ऊष्मा के स्थानांतरण को प्रभावित करती हैं।
-
वनस्पति:
वाष्पोत्सर्जन, सतही ऊर्जा संतुलन और स्थानीय आर्द्रता को प्रभावित कर सकती है।
जलवायु वर्गीकरण (Climate Classification)
पृथ्वी पर अनेक प्रकार की जलवायु पाई जाती हैं। तापमान, वर्षण,
आर्द्रता, जल संतुलन तथा अन्य जलवायवीय विशेषताओं के आधार पर समान
जलवायु वाले क्षेत्रों को समूहों में बाँटने की प्रक्रिया को
जलवायु वर्गीकरण (Climate Classification) कहा जाता है।
इसका उद्देश्य पृथ्वी की जटिल जलवायु व्यवस्था को कुछ व्यापक,
तुलनीय और वैज्ञानिक समूहों में समझना है।
जलवायु वर्गीकरण के आधार अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ वर्गीकरण
तापमान और वर्षण पर अधिक बल देते हैं, जबकि कुछ जल संतुलन,
संभावित वाष्पोत्सर्जन और वायुमंडलीय प्रक्रियाओं को अधिक महत्व देते हैं।
प्रमुख जलवायु वर्गीकरण पद्धतियाँ
- कोपेन वर्गीकरण (Köppen Classification)
- थॉर्नथवेट वर्गीकरण (Thornthwaite Classification)
- ट्रेवार्था वर्गीकरण (Trewartha Classification)
इनमें व्लादिमीर कोपेन (Wladimir Köppen) द्वारा विकसित
वर्गीकरण विश्व भूगोल में सबसे अधिक चर्चित और परीक्षा की दृष्टि से
महत्वपूर्ण अनुभवजन्य जलवायु वर्गीकरणों में से एक है।
कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Köppen Climate Classification)
कोपेन ने जलवायु वर्गीकरण में मुख्य रूप से
तापमान और वर्षण (Temperature and Precipitation)
के दीर्घकालीन आँकड़ों का उपयोग किया।
प्राकृतिक वनस्पति को जलवायु की अभिव्यक्ति के रूप में महत्व देते हुए
उन्होंने तापमान और वर्षण की सीमाओं को वनस्पति के वितरण से जोड़ा।
इसलिए कोपेन का वर्गीकरण मुख्यतः एक
अनुभवजन्य (Empirical) जलवायु वर्गीकरण माना जाता है।
- तापमान और वर्षण इसके प्रमुख आधार हैं।
- वनस्पति और जलवायु के बीच संबंध को महत्व दिया गया।
- जलवायु क्षेत्रों को निश्चित मात्रात्मक सीमाओं के आधार पर अलग किया जाता है।
- विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु की तुलना करना आसान बनाता है।
कोपेन के पाँच मुख्य जलवायु समूह
कोपेन की मूल प्रणाली में विश्व की जलवायु को पाँच मुख्य समूहों में बाँटा गया।
इन्हें अंग्रेजी अक्षरों द्वारा दर्शाया जाता है।
| समूह |
जलवायु |
मुख्य पहचान |
| A |
उष्णकटिबंधीय |
सभी महीनों का औसत तापमान लगभग 18°C या अधिक |
| B |
शुष्क |
वर्षण, तापीय परिस्थितियों की तुलना में अपर्याप्त |
| C |
उष्ण समशीतोष्ण |
हल्की सर्दी और अपेक्षाकृत मध्यम तापमान |
| D |
शीत महाद्वीपीय |
ठंडी सर्दी और अधिक महाद्वीपीय तापमान अंतर |
| E |
ध्रुवीय |
सबसे गर्म महीने का औसत तापमान 10°C से कम |
प्रत्येक समूह के भीतर तापमान और वर्षा के मौसमी वितरण के आधार पर
अनेक उपप्रकार बनाए गए हैं।
A समूह — उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical Climate)
A समूह की प्रमुख विशेषता यह है कि
सभी महीनों का औसत तापमान लगभग 18°C या उससे अधिक रहता है।
यह जलवायु मुख्यतः भूमध्यरेखीय और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती है।
तापमान पूरे वर्ष ऊँचा रहता है, जबकि वर्षा की मात्रा और उसका मौसमी वितरण
क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
- पूरे वर्ष उच्च तापमान।
- वार्षिक तापमान सीमा सामान्यतः कम।
- वर्षा की मात्रा और मौसमी वितरण के आधार पर अलग-अलग उपप्रकार।
- घने वर्षावनों से लेकर मौसमी सवाना वनस्पति तक का विकास।
Af — उष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु (Tropical Rainforest Climate)
Af जलवायु में पूरे वर्ष उच्च तापमान और पर्याप्त वर्षा होती है।
इसकी प्रमुख विशेषता है कि किसी भी महीने में वर्षा बहुत कम होने वाली
स्पष्ट शुष्क ऋतु नहीं होती।
- पूरे वर्ष गर्म और आर्द्र परिस्थितियाँ।
- स्पष्ट शुष्क ऋतु का अभाव।
- भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में प्रमुख रूप से पाई जाती है।
- घने सदाबहार वर्षावन विकसित होते हैं।
- अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ भाग प्रमुख उदाहरण हैं।
उच्च तापमान और वर्षभर पर्याप्त नमी के कारण इन क्षेत्रों में
जैव विविधता सामान्यतः अत्यधिक समृद्ध होती है।
Am — उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate)
Am जलवायु में तापमान पूरे वर्ष ऊँचा रहता है तथा वर्षा की कुल मात्रा
अधिक हो सकती है। इसकी विशेषता वर्षा का स्पष्ट मौसमी वितरण और
मानसूनी प्रभाव है।
- पूरे वर्ष उच्च तापमान।
- एक प्रमुख वर्षा ऋतु।
- शुष्क ऋतु अपेक्षाकृत छोटी होती है।
- दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ भागों में पाई जाती है।
- मानसूनी पवनों के मौसमी परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रभाव।
Aw — उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु (Tropical Savanna Climate)
Aw जलवायु में पूरे वर्ष तापमान ऊँचा रहता है, लेकिन वर्षा मुख्यतः
गर्म ऋतु में होती है और एक स्पष्ट शुष्क ऋतु पाई जाती है।
- उच्च तापमान।
- स्पष्ट गीली और शुष्क ऋतु।
- ग्रीष्मकालीन वर्षा प्रमुख।
- शुष्क ऋतु अपेक्षाकृत लंबी हो सकती है।
- घासभूमि और छिटपुट वृक्षों वाली सवाना वनस्पति प्रमुख।
- अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के बड़े भागों में पाई जाती है।
B समूह — शुष्क जलवायु (Dry Climate)
B समूह में जलवायु की पहचान केवल वर्षा की कम मात्रा से नहीं की जाती।
इसमें वर्षण की उपलब्धता की तुलना उस क्षेत्र की
वाष्पीकरणीय माँग (Evaporative Demand) से की जाती है।
जब किसी क्षेत्र में उपलब्ध वर्षण वहाँ की तापीय परिस्थितियों के
सापेक्ष पर्याप्त नमी प्रदान नहीं कर पाता, तो उसे शुष्क जलवायु
समूह में रखा जाता है।
- जल की उपलब्धता सीमित।
- वाष्पीकरण की माँग अपेक्षाकृत अधिक।
- वनस्पति विरल या शुष्क परिस्थितियों के अनुकूलित।
- मरुस्थल और अर्द्ध-शुष्क स्टेपी प्रदेश प्रमुख।
BW — मरुस्थलीय जलवायु (Desert Climate)
BW समूह में उपलब्ध नमी अत्यधिक सीमित होती है और प्राकृतिक वनस्पति
सामान्यतः बहुत विरल होती है।
- BWh: गर्म मरुस्थलीय जलवायु।
- BWk: ठंडी मरुस्थलीय जलवायु।
- सहारा, अरब, ऑस्ट्रेलिया के बड़े मरुस्थलीय क्षेत्र प्रमुख उदाहरण हैं।
- गोबी और मध्य एशिया के कुछ आंतरिक क्षेत्र ठंडी मरुस्थलीय परिस्थितियों के उदाहरण हैं।
BS — अर्द्ध-शुष्क या स्टेपी जलवायु (Steppe Climate)
BS जलवायु मरुस्थलीय जलवायु की तुलना में कुछ अधिक आर्द्र होती है।
यहाँ उपलब्ध नमी घासभूमि के विकास के लिए पर्याप्त हो सकती है,
लेकिन घने वनों के लिए सामान्यतः पर्याप्त नहीं होती।
- BSh: गर्म अर्द्ध-शुष्क जलवायु।
- BSk: ठंडी अर्द्ध-शुष्क जलवायु।
- स्टेपी और अन्य शुष्क घासभूमि क्षेत्रों से संबंध।
- कई क्षेत्रों में मरुस्थल और अधिक आर्द्र प्रदेशों के बीच संक्रमण क्षेत्र के रूप में मिलती है।
C समूह — उष्ण समशीतोष्ण जलवायु (Temperate Climate)
C समूह को सामान्यतः उष्ण समशीतोष्ण या मध्यम अक्षांशीय जलवायु से जोड़ा जाता है।
Köppen-Geiger के आधुनिक रूप में सामान्यतः सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान
-3°C से अधिक और 18°C से कम तथा सबसे गर्म महीने का
औसत तापमान 10°C से अधिक होने की शर्तों का उपयोग किया जाता है।
विभिन्न स्रोतों में 0°C और -3°C की सीमा के कारण थोड़ी भिन्नता मिल सकती है।
इसलिए परीक्षा में दिए गए प्रश्न के संदर्भ और प्रयुक्त वर्गीकरण संस्करण को ध्यान में रखना चाहिए।
C समूह में तापमान अत्यधिक नहीं होता और वर्षा का वितरण क्षेत्र के अनुसार
पूरे वर्ष या किसी विशेष ऋतु में अधिक हो सकता है।
Csa और Csb — भूमध्यसागरीय जलवायु (Mediterranean Climate)
भूमध्यसागरीय जलवायु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है—
गर्म और शुष्क ग्रीष्म ऋतु तथा अपेक्षाकृत नम शीत ऋतु।
- Csa: गर्म ग्रीष्म वाली भूमध्यसागरीय जलवायु।
- Csb: अपेक्षाकृत ठंडी/कम गर्म ग्रीष्म वाली भूमध्यसागरीय जलवायु।
- भूमध्यसागर के आसपास प्रमुख रूप से पाई जाती है।
- कैलिफोर्निया, मध्य चिली, दक्षिण-पश्चिमी दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कुछ भागों में भी मिलती है।
- ग्रीष्मकालीन शुष्कता और शीतकालीन वर्षा इसकी विशिष्ट पहचान है।
उपोष्ण उच्च दाब की स्थिति ग्रीष्मकालीन शुष्कता में तथा
मध्य अक्षांशीय पश्चिमी पवनों से जुड़ी मौसम प्रणालियाँ शीतकालीन
वर्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
Cfa और Cfb — आर्द्र समशीतोष्ण जलवायु
Cfa और Cfb दोनों में वर्षा वर्ष के बड़े भाग में उपलब्ध रहती है,
लेकिन तापमान और गर्मी की तीव्रता में अंतर होता है।
- Cfa: आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय जलवायु, जिसमें गर्म ग्रीष्म ऋतु होती है।
- Cfb: महासागरीय/पश्चिमी समुद्री प्रकार की जलवायु, जिसमें ग्रीष्म ऋतु अपेक्षाकृत ठंडी होती है।
- Cfa पूर्वी महाद्वीपीय तटों के मध्य अक्षांशीय भागों में पाई जा सकती है।
- Cfb पश्चिमी यूरोप और अन्य समुद्री प्रभाव वाले क्षेत्रों में प्रमुख है।
D समूह — शीत महाद्वीपीय जलवायु (Cold Continental Climate)
D समूह मुख्यतः उत्तरी गोलार्ध के मध्य और उच्च अक्षांशों के
महाद्वीपीय आंतरिक भागों में पाया जाता है। इसकी विशेषता
ठंडी सर्दी और मौसमी तापमान में बड़ा अंतर है।
आधुनिक Köppen-Geiger प्रणाली में D समूह के लिए सामान्यतः
सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान -3°C या उससे कम
और सबसे गर्म महीने का औसत तापमान 10°C से अधिक होना महत्वपूर्ण है।
- ठंडी और लंबी शीत ऋतु।
- गर्मियों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है।
- वार्षिक तापमान सीमा बड़ी हो सकती है।
- महाद्वीपीयता का प्रभाव स्पष्ट।
- कनाडा, अलास्का और रूस के बड़े भागों में विभिन्न D प्रकार पाए जाते हैं।
Df — वर्षभर आर्द्र महाद्वीपीय जलवायु
Df प्रकार में किसी एक स्पष्ट ऋतु में शुष्कता का प्रभुत्व नहीं होता।
वर्षा वर्ष के अलग-अलग समय पर होती रहती है।
- ठंडी शीत ऋतु।
- गर्मियों में तापमान में स्पष्ट वृद्धि।
- वर्षा का अपेक्षाकृत वर्षभर वितरण।
- उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया के बड़े भागों में विभिन्न रूपों में पाया जाता है।
Dw और Ds — मौसमी शुष्कता वाले महाद्वीपीय प्रदेश
कुछ महाद्वीपीय क्षेत्रों में वर्षा का वितरण मौसमी होता है।
ऐसे क्षेत्रों में किसी विशेष ऋतु में स्पष्ट शुष्कता दिखाई देती है।
- Dw: शीत ऋतु में शुष्कता और गर्म ऋतु में अधिक वर्षा।
- Ds: ग्रीष्म ऋतु में शुष्कता।
- पूर्वी एशिया के कुछ भागों में Dw प्रकार महत्वपूर्ण है।
- Ds प्रकार कुछ पर्वतीय और उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
E समूह — ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)
E समूह में सबसे गर्म महीने का औसत तापमान भी
10°C से कम रहता है।
इसलिए यहाँ वृक्षों की सामान्य वृद्धि के लिए पर्याप्त गर्मी उपलब्ध नहीं होती।
- अत्यंत निम्न तापमान।
- उच्च अक्षांशों में प्रमुखता।
- वनस्पति अत्यंत सीमित।
- मुख्यतः Tundra और Ice Cap प्रकारों में विभाजित।
ET — टुंड्रा जलवायु (Tundra Climate)
ET जलवायु में सबसे गर्म महीने का औसत तापमान
0°C से 10°C से कम के बीच रहता है।
इतनी कम गर्मी के कारण सामान्य वृक्षों का विकास संभव नहीं होता।
- वृक्षों की वृद्धि के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं।
- काई, लाइकेन, छोटी झाड़ियाँ और अल्पकालिक वनस्पति मिलती है।
- आर्कटिक तटवर्ती क्षेत्रों में प्रमुख।
- उत्तरी कनाडा, अलास्का और उत्तरी रूस के कुछ क्षेत्रों में पाया जाता है।
EF — हिमाच्छादित जलवायु (Ice Cap Climate)
EF जलवायु में वर्ष के किसी भी महीने का औसत तापमान
0°C से ऊपर नहीं जाता। इसलिए स्थायी हिमावरण
और बर्फ की उपस्थिति इसकी प्रमुख विशेषता है।
- अत्यंत निम्न तापमान।
- स्थायी बर्फ और हिम।
- वनस्पति का लगभग पूर्ण अभाव।
- अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के विशाल हिमाच्छादित भाग प्रमुख उदाहरण हैं।
H — उच्च पर्वतीय जलवायु (Highland Climate)
H को Köppen की मूल पाँच-समूह प्रणाली का छठा मुख्य समूह नहीं माना जाता।
बाद के कुछ संशोधनों और व्यावहारिक अनुप्रयोगों में उच्च पर्वतीय क्षेत्रों
को अलग से Highland Climate के रूप में दर्शाया गया है।
- ऊँचाई के कारण तापमान सामान्यतः कम।
- ऊँचाई बढ़ने के साथ जलवायु में क्रमिक परिवर्तन।
- ढाल की दिशा के अनुसार ताप और वर्षा में अंतर।
- पर्वतीय अवरोध के कारण वर्षा का असमान वितरण।
- हिमालय, एंडीज और रॉकी पर्वत जैसे क्षेत्रों में ऊँचाई के अनुसार अनेक जलवायु अवस्थाएँ मिलती हैं।
कोपेन संकेताक्षरों को समझना
कोपेन वर्गीकरण में एक या अधिक अक्षरों का उपयोग करके किसी जलवायु की
तापमान और वर्षण संबंधी विशेषताओं को व्यक्त किया जाता है।
- A: उष्णकटिबंधीय
- B: शुष्क
- C: उष्ण समशीतोष्ण
- D: शीत महाद्वीपीय
- E: ध्रुवीय
- f: स्पष्ट शुष्क ऋतु का अभाव
- m: मानसूनी/कम अवधि की शुष्क ऋतु वाला उष्णकटिबंधीय प्रकार
- w: शीत ऋतु में शुष्कता
- s: ग्रीष्म ऋतु में शुष्कता
- a: बहुत गर्म ग्रीष्म
- b: अपेक्षाकृत कम गर्म ग्रीष्म
- c: छोटी और अपेक्षाकृत ठंडी ग्रीष्म ऋतु
- d: अत्यधिक ठंडी शीत ऋतु; मुख्यतः D समूह के कुछ उपप्रकारों में
उदाहरण के लिए Csa में C मुख्य जलवायु समूह,
s ग्रीष्मकालीन शुष्कता और a गर्म ग्रीष्म को दर्शाता है।
भारत की जलवायु और कोपेन वर्गीकरण
भारत में विशाल अक्षांशीय विस्तार, ऊँचाई, हिमालय, समुद्र से दूरी,
स्थलाकृति तथा मानसूनी परिसंचरण के कारण अनेक जलवायु परिस्थितियाँ
पाई जाती हैं। इसलिए भारत को केवल एक ही Köppen जलवायु समूह में रखना उचित नहीं है।
-
पश्चिमी राजस्थान और आसपास के शुष्क क्षेत्र — BWh/BS जैसे शुष्क प्रकार।
-
पश्चिमी तट और पूर्वोत्तर के अत्यधिक वर्षा वाले कुछ क्षेत्र —
उष्णकटिबंधीय आर्द्र और मानसूनी प्रकारों से संबंधित।
-
प्रायद्वीपीय भारत के कई भाग — उष्णकटिबंधीय सवाना और मानसूनी परिस्थितियों से संबंधित।
-
उत्तरी मैदानों के कई भाग — उपोष्णकटिबंधीय जलवायु के विभिन्न रूप।
-
हिमालय के ऊँचे भाग — ऊँचाई के कारण ठंडी और कुछ स्थानों पर
टुंड्रा जैसी परिस्थितियाँ।
ध्यान रखें कि भारत के लिए Köppen वर्गीकरण का सटीक क्षेत्रीय वितरण
प्रयुक्त संशोधित प्रणाली और मानचित्र के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है।
कोपेन वर्गीकरण की विशेषताएँ
- सरल और तुलनात्मक रूप से आसानी से समझी जाने वाली प्रणाली।
- तापमान और वर्षण के मात्रात्मक आँकड़ों पर आधारित।
- वनस्पति और जलवायु के बीच संबंध को महत्व देती है।
- विश्व स्तर पर जलवायु मानचित्र तैयार करने में उपयोगी।
- विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु की तुलना करना आसान बनाती है।
- जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में जलवायु क्षेत्रों में संभावित बदलावों के अध्ययन में उपयोगी।
कोपेन वर्गीकरण की सीमाएँ
-
यह मुख्यतः तापमान और वर्षण पर आधारित है; इसलिए वायुमंडलीय परिसंचरण
की पूरी गतिशीलता को सीधे नहीं समझाता।
-
एक ही जलवायु समूह के भीतर स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण
महत्वपूर्ण अंतर हो सकते हैं।
-
ऊँचाई और स्थलाकृति जैसे कारकों को मूल प्रणाली में सीमित रूप से व्यक्त किया गया है।
-
वास्तविक जलवायु की जटिलता को सीमित संख्या के वर्गों में बाँटने के कारण
कुछ संक्रमण क्षेत्रों की विविधता कम दिखाई दे सकती है।
-
जलवायु परिवर्तन के कारण किसी क्षेत्र की दीर्घकालीन जलवायु बदलने पर
उसका वर्गीकरण भी समय के साथ बदल सकता है।
कोपेन और थॉर्नथवेट वर्गीकरण में अंतर
| आधार |
कोपेन |
थॉर्नथवेट |
| मुख्य आधार |
तापमान और वर्षण |
जल संतुलन और संभावित वाष्पोत्सर्जन |
| दृष्टिकोण |
मुख्यतः अनुभवजन्य |
नमी/जल संतुलन आधारित |
| वनस्पति से संबंध |
महत्वपूर्ण |
जल उपलब्धता से अधिक प्रत्यक्ष संबंध |
| मुख्य उपयोग |
विश्व के जलवायु क्षेत्रों का वर्गीकरण और मानचित्रण |
नमी की उपलब्धता और जल संतुलन का विश्लेषण |
जलवायु वर्गीकरण का भौगोलिक महत्व
- विश्व की प्राकृतिक वनस्पतियों के वितरण को समझने में सहायता।
- कृषि फसलों के भौगोलिक वितरण का अध्ययन।
- मानव बस्तियों और आर्थिक गतिविधियों पर जलवायु के प्रभाव को समझना।
- मरुस्थल, घासभूमि, वर्षावन और टुंड्रा जैसे जैव-भौगोलिक प्रदेशों की व्याख्या।
- जल संसाधनों और सूखे के अध्ययन में उपयोगी।
- जलवायु परिवर्तन के कारण जलवायु क्षेत्रों में होने वाले संभावित बदलावों का अध्ययन।
जलवायु और प्राकृतिक वनस्पति का संबंध
तापमान और वर्षण किसी क्षेत्र की वनस्पति को अत्यधिक प्रभावित करते हैं।
इसलिए कोपेन ने प्राकृतिक वनस्पति को जलवायु की अभिव्यक्ति के रूप में
महत्वपूर्ण संकेतक माना।
- Af — घने सदाबहार वर्षावन।
- Aw — सवाना घासभूमि और छिटपुट वृक्ष।
- BWh — अत्यंत विरल मरुस्थलीय वनस्पति।
- BS — स्टेपी या अर्द्ध-शुष्क घासभूमि।
- C प्रकार — समशीतोष्ण वनस्पतियों के विभिन्न रूप।
- ET — टुंड्रा वनस्पति।
- EF — लगभग वनस्पति-विहीन हिम क्षेत्र।
जलवायु और मानव गतिविधियाँ
जलवायु कृषि, पशुपालन, उद्योग, परिवहन, बस्तियों और ऊर्जा उपयोग को प्रभावित करती है।
जल की उपलब्धता, तापमान और ऋतु की अवधि किसी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों के लिए
महत्वपूर्ण सीमाएँ निर्धारित कर सकती हैं।
- उष्ण और आर्द्र क्षेत्रों में अधिक वर्षा वाली कृषि प्रणालियों की संभावना।
- शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई, जल संरक्षण और सूखा-रोधी कृषि का अधिक महत्व।
- समशीतोष्ण क्षेत्रों में गेहूँ, जौ और अन्य फसलों का व्यापक वितरण।
- ठंडे क्षेत्रों में कृषि अवधि सीमित होती है।
- चरम जलवायु मानव बस्तियों और आर्थिक गतिविधियों पर अधिक प्रतिबंध लगा सकती है।
अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
- कोपेन वर्गीकरण के पाँच मुख्य समूह — A, B, C, D और E।
- A — उष्णकटिबंधीय जलवायु।
- B — शुष्क जलवायु।
- C — उष्ण समशीतोष्ण जलवायु।
- D — शीत महाद्वीपीय जलवायु।
- E — ध्रुवीय जलवायु।
- Af — उष्णकटिबंधीय वर्षावन।
- Am — उष्णकटिबंधीय मानसूनी।
- Aw — उष्णकटिबंधीय सवाना।
- BW — मरुस्थलीय जलवायु।
- BS — स्टेपी या अर्द्ध-शुष्क जलवायु।
- Csa/Csb — भूमध्यसागरीय प्रकार।
- Df — वर्षभर आर्द्र महाद्वीपीय जलवायु।
- ET — टुंड्रा।
- EF — हिमाच्छादित जलवायु।
- कोपेन वर्गीकरण में तापमान और वर्षण प्रमुख आधार हैं।
- प्राकृतिक वनस्पति को जलवायु की अभिव्यक्ति के रूप में महत्व दिया गया।
- भूमध्यसागरीय जलवायु की पहचान — शुष्क ग्रीष्म और नम शीत ऋतु।
- टुंड्रा में वृक्षों की सामान्य वृद्धि के लिए पर्याप्त गर्मी उपलब्ध नहीं होती।
- हिमाच्छादित जलवायु में किसी भी महीने का औसत तापमान 0°C से ऊपर नहीं जाता।
वैचारिक बिंदु
-
कोपेन वर्गीकरण केवल अक्षांश आधारित वर्गीकरण नहीं है;
इसमें तापमान और वर्षण की वास्तविक सीमाओं का उपयोग किया जाता है।
-
एक ही अक्षांश पर स्थित दो क्षेत्रों की जलवायु समान होना आवश्यक नहीं है,
क्योंकि समुद्र से दूरी, ऊँचाई, महासागरीय धाराएँ और स्थलाकृति भी प्रभाव डालते हैं।
-
भूमध्यसागरीय जलवायु का ग्रीष्मकालीन सूखापन उपोष्ण उच्च दाब से,
जबकि शीतकालीन वर्षा मध्य अक्षांशीय पश्चिमी पवनों से जुड़ी मौसम प्रणालियों से संबंधित है।
-
शुष्क जलवायु में केवल कम वर्षा देखना पर्याप्त नहीं है;
उपलब्ध वर्षण और वाष्पीकरणीय माँग के संबंध को भी देखना आवश्यक है।
-
भारत की जलवायु को केवल एक कोपेन समूह में रखना उचित नहीं है।
भारत में उष्णकटिबंधीय, शुष्क, उपोष्ण और पर्वतीय परिस्थितियों के अनेक प्रकार मिलते हैं।
-
कोपेन के अक्षर केवल याद करने के लिए नहीं हैं;
प्रत्येक अक्षर तापमान या वर्षण की किसी विशिष्ट विशेषता को व्यक्त करता है।
UPSC के लिए विश्लेषण
कोपेन वर्गीकरण को केवल A, B, C, D और E याद करके पूरा नहीं समझा जा सकता।
UPSC में प्रश्न आने पर वर्गीकरण के आधार, जलवायु की विशेषताओं,
प्राकृतिक वनस्पति और भौगोलिक वितरण के बीच संबंध स्थापित करना अधिक उपयोगी है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में वर्षभर उच्च तापमान और पर्याप्त वर्षा है,
तो उसे केवल “उष्णकटिबंधीय” कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना होगा कि
वर्षा पूरे वर्ष समान रूप से होती है या किसी विशेष ऋतु में केंद्रित है।
इसी आधार पर Af, Am और Aw जैसे प्रकारों में अंतर समझा जा सकता है।
इसी प्रकार B समूह में केवल “कम वर्षा” याद करना पर्याप्त नहीं है।
यह समझना आवश्यक है कि उपलब्ध वर्षण उस क्षेत्र की वाष्पीकरणीय माँग
की तुलना में कितना है।
सारांश
जलवायु किसी स्थान की दीर्घकालीन वायुमंडलीय अवस्था, उसके मौसमी
प्रतिरूप और परिवर्तनशीलता का अध्ययन है। पृथ्वी पर जलवायु की विविधता
को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए विभिन्न जलवायु वर्गीकरण विकसित किए गए हैं।
व्लादिमीर कोपेन का वर्गीकरण मुख्यतः तापमान और वर्षण के आँकड़ों पर आधारित
एक अनुभवजन्य प्रणाली है, जिसमें प्राकृतिक वनस्पति और जलवायु के संबंध को
भी महत्व दिया गया। इसमें A, B, C, D और E पाँच मुख्य समूह हैं।
इस वर्गीकरण को समझने का सही तरीका केवल संकेताक्षरों को रटना नहीं,
बल्कि तापमान → वर्षण → मौसमी वितरण → वनस्पति → भौगोलिक वितरण
के बीच संबंध को समझना है।