जलवायु (Climate) किसी स्थान के लंबे समय तक देखे गए तापमान, वर्षा, आर्द्रता, वायुदाब, पवन आदि मौसम संबंधी तत्वों की औसत दशाओं के साथ-साथ उनकी परिवर्तनशीलता और चरम घटनाओं का दीर्घकालीन सांख्यिकीय स्वरूप है।
प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) वह वनस्पति है जो मानव द्वारा प्रत्यक्ष रूप से लगाए बिना किसी क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, स्थलरूप, जल उपलब्धता और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार प्राकृतिक रूप से विकसित होती है।
जलवायु और प्राकृतिक वनस्पति के बीच गहरा संबंध है। विशेष रूप से तापमान, वर्षा की मात्रा, वर्षा की मौसमी प्रकृति और नमी यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि किसी क्षेत्र में घने वन, घासभूमि, झाड़ीदार वनस्पति या मरुस्थलीय वनस्पति विकसित होगी।
विश्व की जलवायु को तापमान, वर्षा, मौसमी परिवर्तन, आर्द्रता और वायुमंडलीय दशाओं के आधार पर विभिन्न जलवायु प्रदेशों में बाँटा जा सकता है। जलवायु प्रदेशों को समझने के लिए अक्षांश + तापमान + वर्षा + वर्षा की मौसमी प्रकृति + प्राकृतिक वनस्पति के संबंध को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
भूमध्यरेखीय जलवायु मुख्यतः भूमध्य रेखा के आसपास लगभग 5° से 10° उत्तर और दक्षिण के क्षेत्रों में पाई जाती है। यहाँ पूरे वर्ष तापमान अधिक, आर्द्रता अधिक और वर्षा पर्याप्त होती है। दैनिक तापांतर की तुलना में वार्षिक तापांतर सामान्यतः बहुत कम होता है।
प्रमुख क्षेत्र: अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ भाग।
सवाना जलवायु उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में भूमध्यरेखीय जलवायु के बाहर पाई जाती है। इसकी प्रमुख विशेषता स्पष्ट वर्षा ऋतु और शुष्क ऋतु है। वर्षा की मौसमी प्रकृति के कारण यहाँ घास के साथ बिखरे हुए वृक्ष पाए जाते हैं।
प्रमुख क्षेत्र: अफ्रीकी सवाना, ब्राजील के कुछ भाग, वेनेजुएला के Llanos और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया।
सवाना में मौसमी वर्षा और घास की प्रधानता के कारण बड़े शाकाहारी जीवों तथा उनके शिकारी जीवों की विविधता विकसित हुई है। यह क्षेत्र वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है।
उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय मरुस्थल सामान्यतः लगभग 20°–30° अक्षांशों के आसपास पाए जाते हैं। उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पट्टियों में अवरोही वायु और स्थायी उच्च दाब वर्षा को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ मरुस्थलों के विकास में ठंडी महासागरीय धाराएँ भी योगदान देती हैं।
प्रमुख उदाहरण: सहारा, अरब मरुस्थल, नामीब और ऑस्ट्रेलिया के आंतरिक मरुस्थल। कालाहारी को सामान्यतः अर्ध-शुष्क क्षेत्र/स्टेपी-सदृश मरुस्थलीय क्षेत्र के रूप में समझना अधिक उचित है।
भूमध्यसागरीय जलवायु लगभग 30°–45° अक्षांशों के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में विशेष रूप से विकसित होती है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है — गर्म और शुष्क ग्रीष्म ऋतु तथा हल्की एवं वर्षायुक्त शीत ऋतु।
प्रमुख क्षेत्र: भूमध्य सागर का तटीय क्षेत्र, कैलिफोर्निया, मध्य चिली, दक्षिण-पश्चिमी दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया।
यह जलवायु सामान्यतः 40°–60° अक्षांशों के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में पाई जाती है। पश्चिमी पवनें समुद्र से नमी लाती हैं और समुद्र का प्रभाव तापमान के मौसमी अंतर को कम करता है।
प्रमुख क्षेत्र: पश्चिमी यूरोप, न्यूजीलैंड, दक्षिणी चिली और उत्तरी अमेरिका का प्रशांत उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र।
इन वनों में वृक्ष प्रतिकूल ऋतु, विशेषकर ठंड या शुष्कता के दौरान, अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये सामान्यतः मध्यम तापमान और पर्याप्त लेकिन अत्यधिक न होने वाली वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
यूरोप, पूर्वी उत्तरी अमेरिका और पूर्वी एशिया में इनके प्रमुख क्षेत्र पाए जाते हैं।
स्टेपी अर्ध-शुष्क घासभूमि है। यहाँ वर्षा मरुस्थल से अधिक होती है, लेकिन कई क्षेत्रों में इतनी कम होती है कि घने वृक्षों वाले वन विकसित नहीं हो पाते। इसकी सीमा जलवायु और वर्षा की मौसमी प्रकृति के अनुसार बदलती है।
प्रमुख क्षेत्र: यूरेशियन स्टेपी, उत्तरी अमेरिका की प्रेयरी के अपेक्षाकृत शुष्क भाग और दक्षिण अमेरिका के कुछ अर्ध-शुष्क घासभूमि क्षेत्र।
| घासभूमि | महाद्वीप | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| Prairies | उत्तरी अमेरिका | समशीतोष्ण घासभूमि |
| Pampas | दक्षिण अमेरिका | उपजाऊ समशीतोष्ण घासभूमि |
| Steppes | यूरेशिया | अर्ध-शुष्क घासभूमि |
| Veld | दक्षिण अफ्रीका | समशीतोष्ण/उपोष्ण घासभूमि क्षेत्र |
| Downs | ऑस्ट्रेलिया | घासभूमि क्षेत्र |
| Savanna | अफ्रीका | उष्णकटिबंधीय घासभूमि |
समुद्र से दूर महाद्वीपों के आंतरिक भागों में समुद्री प्रभाव कम होने के कारण तापमान में मौसमी अंतर अधिक होता है। इस विशेषता को महाद्वीपीयता (Continentality) कहा जाता है।
टैगा वन मुख्यतः उत्तरी गोलार्ध के उच्च अक्षांशों में पाए जाते हैं। यहाँ लंबी और अत्यधिक ठंडी सर्दियाँ तथा छोटी गर्मियाँ होती हैं। यह विश्व के प्रमुख स्थलीय जैव-प्रदेशों (Biome) में से एक है।
टुंड्रा जलवायु ध्रुवों के निकट स्थित उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में पाई जाती है। यहाँ वर्ष का अधिकांश भाग अत्यधिक ठंडा रहता है और गर्मी का मौसम बहुत छोटा होता है। पेड़ों की वृद्धि तापमान, छोटी वृद्धि ऋतु और कई स्थानों पर Permafrost के कारण सीमित रहती है।
इस जलवायु में तापमान इतना कम रहता है कि वर्ष भर बर्फ और हिम का प्रभुत्व बना रह सकता है। स्थलीय वनस्पति लगभग अनुपस्थित होती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु मुख्यतः ऊँचाई, अक्षांश, ढाल, ढाल की दिशा, पवनों और स्थानीय स्थलाकृति पर निर्भर करती है। ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटने के कारण एक ही पर्वत पर अलग-अलग ऊँचाई पर अलग-अलग वनस्पति क्षेत्र पाए जा सकते हैं।
इसे ऊँचाई आधारित वनस्पति क्रम (Altitudinal Zonation) कहा जाता है। यह कई मामलों में अक्षांश के साथ होने वाले वनस्पति परिवर्तन के समान क्रम प्रदर्शित करता है।
वनस्पति के वितरण में वर्षा की कुल मात्रा के साथ-साथ वर्षा की मौसमी प्रकृति, तापमान और मिट्टी की जलधारण क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
पौधों की वृद्धि के लिए तापमान की एक निश्चित सीमा आवश्यक होती है। अत्यधिक ठंड या अत्यधिक गर्मी पौधों की वृद्धि को सीमित कर सकती है। इसलिए समान वर्षा वाले दो क्षेत्रों में भी तापमान के अंतर के कारण अलग-अलग प्रकार की वनस्पति विकसित हो सकती है।
यही कारण है कि भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में घने सदाबहार वन, समशीतोष्ण क्षेत्रों में पर्णपाती एवं शंकुधारी वन और ध्रुवीय क्षेत्रों में टुंड्रा जैसी वनस्पति पाई जाती है।
| जलवायु | प्रमुख वनस्पति | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| भूमध्यरेखीय | सदाबहार वर्षावन | अमेजन, कांगो, दक्षिण-पूर्व एशिया |
| सवाना | घास + बिखरे वृक्ष | अफ्रीका, ब्राजील, लानोस |
| मरुस्थलीय | काँटेदार/सूखा-सहिष्णु वनस्पति | सहारा, अरब, ऑस्ट्रेलिया |
| भूमध्यसागरीय | कठोर-पत्ती वाली झाड़ियाँ | भूमध्यसागर, कैलिफोर्निया |
| समुद्री पश्चिमी तट | पर्णपाती/मिश्रित वन | पश्चिमी यूरोप, न्यूजीलैंड |
| स्टेपी | घास | यूरेशिया |
| टैगा | शंकुधारी वन | रूस, कनाडा, अलास्का |
| टुंड्रा | काई, लाइकेन, छोटी झाड़ियाँ | आर्कटिक |
| ध्रुवीय हिम | लगभग कोई स्थलीय वनस्पति नहीं | अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड का आंतरिक भाग |
तापमान में वृद्धि, लंबे शुष्क मौसम, कम आर्द्रता और तेज हवाएँ कई क्षेत्रों में वनाग्नि के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। भूमध्यसागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों में गर्म और शुष्क ग्रीष्म ऋतु वनाग्नि के लिए विशेष रूप से अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कर सकती है।
वनाग्नि का प्रभाव केवल जलवायु पर निर्भर नहीं करता; वनस्पति का प्रकार, भूमि उपयोग, मानव गतिविधियाँ और अग्नि-प्रबंधन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में सामान्यतः प्राथमिक उत्पादकता और जैव विविधता अधिक हो सकती है। विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय वर्षावन पृथ्वी के सबसे समृद्ध स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल हैं।
इसके विपरीत अत्यधिक ठंडे, शुष्क या अत्यधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पर्यावरणीय परिस्थितियाँ अधिक कठोर होने के कारण कई स्थानों पर प्रजातियों की विविधता अपेक्षाकृत कम होती है। हालांकि, जैव विविधता केवल जलवायु पर निर्भर नहीं करती; स्थलरूप, विकासवादी इतिहास, मिट्टी और आवास की विविधता भी महत्वपूर्ण हैं।
विश्व की प्राकृतिक वनस्पति का वितरण मुख्यतः जलवायु, स्थलरूप, मिट्टी, जल उपलब्धता और जैविक प्रक्रियाओं के परस्पर संबंध का परिणाम है। तापमान और वर्षा की मात्रा के साथ-साथ उनकी मौसमी प्रकृति यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किसी क्षेत्र में वन, घासभूमि, झाड़ियाँ या मरुस्थलीय वनस्पति विकसित होगी।
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन इस प्राकृतिक संबंध को प्रभावित कर रहा है। तापमान वृद्धि, वर्षा की अनिश्चितता, सूखा, वनाग्नि, हिमनदों का पीछे हटना और समुद्र-स्तर वृद्धि के कारण अनेक पारिस्थितिकी तंत्रों की भौगोलिक सीमा बदल रही है। इसलिए वन संरक्षण को केवल वृक्षारोपण तक सीमित न रखकर पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण, भूमि प्रबंधन, जल प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन के साथ जोड़कर देखना आवश्यक है।
विश्व की जलवायु और प्राकृतिक वनस्पति का अध्ययन केवल अलग-अलग जलवायु प्रदेशों को याद करने का विषय नहीं है। UPSC के लिए यह समझना अधिक महत्वपूर्ण है कि अक्षांश → सौर विकिरण → तापमान → वायुदाब/पवन → वर्षा → मिट्टी एवं नमी → प्राकृतिक वनस्पति → मानव गतिविधि एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं।