भारत की जलवायु को सामान्यतः उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate) कहा जाता है। इसकी प्रमुख विशेषता ऋतुओं के अनुसार तापमान, वायुदाब, पवनों और वर्षा में होने वाला स्पष्ट परिवर्तन है।
भारत की जलवायु केवल अक्षांश से निर्धारित नहीं होती। हिमालय, भारतीय महासागर, स्थल और समुद्र के बीच तापीय अंतर, मानसूनी परिसंचरण, जेट धाराएँ, पश्चिमी विक्षोभ तथा विभिन्न महासागरीय-वायुमंडलीय घटनाएँ इसकी जलवायु को प्रभावित करती हैं।
इसलिए UPSC के लिए भारतीय जलवायु को केवल “चार ऋतुओं” के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं है। मानसून की उत्पत्ति, उसकी प्रगति, सक्रियता-विराम, वापसी, वर्षा के असमान वितरण तथा ENSO और IOD जैसी घटनाओं के साथ उसके संबंध को समझना आवश्यक है।
भारतीय जलवायु अनेक भौगोलिक एवं वायुमंडलीय कारकों की संयुक्त क्रिया का परिणाम है।
| कारक | जलवायु पर प्रभाव |
|---|---|
| अक्षांश | सौर विकिरण और तापमान के क्षेत्रीय वितरण को प्रभावित करता है। |
| हिमालय | मध्य एशिया की ठंडी हवाओं को रोकता है तथा मानसूनी पवनों के मार्ग और वर्षा को प्रभावित करता है। |
| समुद्र से दूरी | तटीय क्षेत्रों में समुद्री प्रभाव के कारण तापमान का वार्षिक अंतर अपेक्षाकृत कम रहता है। |
| महाद्वीपीयता | समुद्र से दूर आंतरिक क्षेत्रों में तापमान का वार्षिक एवं दैनिक अंतर अधिक हो सकता है। |
| स्थलाकृति | पर्वत पवनों को ऊपर उठाकर वर्षा करा सकते हैं और दूसरी ओर वर्षा-छाया क्षेत्र बना सकते हैं। |
| मानसूनी पवनें | भारत की अधिकांश मौसमी वर्षा का प्रमुख स्रोत हैं। |
| जेट धाराएँ | मानसून के आगमन, सक्रियता और वापसी सहित वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करती हैं। |
| महासागरीय घटनाएँ | ENSO और IOD जैसी घटनाएँ मानसून की वर्षा और परिसंचरण को प्रभावित कर सकती हैं। |
भारत का मुख्य भू-भाग लगभग 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक फैला है। कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य भाग से गुजरती है।
इसलिए भारत के दक्षिणी भाग में उष्णकटिबंधीय प्रभाव अधिक है, जबकि उत्तरी भाग में उपोष्णकटिबंधीय विशेषताएँ अधिक स्पष्ट होती हैं। फिर भी केवल अक्षांश भारत की जलवायु को नहीं समझा सकता, क्योंकि मानसूनी परिसंचरण, हिमालय और स्थलाकृति का भी महत्वपूर्ण प्रभाव है।
हिमालय भारतीय जलवायु व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मध्य एशिया से आने वाली अत्यधिक ठंडी महाद्वीपीय हवाओं के लिए एक प्राकृतिक अवरोध का कार्य करता है।
इसके अतिरिक्त, हिमालय और उससे जुड़ी पर्वत प्रणालियाँ मानसूनी पवनों के उत्तर की ओर प्रवाह को प्रभावित करती हैं और नम वायु के ऊपर उठने तथा वर्षा होने में सहायता करती हैं।
भारतीय प्रायद्वीप तीन ओर से समुद्र से घिरा है। अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर भारतीय जलवायु को नमी प्रदान करने के साथ तापमान को भी नियंत्रित करते हैं।
समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों में तापमान का वार्षिक अंतर सामान्यतः कम होता है, जबकि समुद्र से दूर आंतरिक क्षेत्रों में महाद्वीपीय प्रभाव अधिक स्पष्ट होता है।
समुद्र से दूर स्थित क्षेत्रों में समुद्री प्रभाव कम होने के कारण तापमान में अधिक मौसमी उतार-चढ़ाव होता है। इसे महाद्वीपीयता (Continentality) कहा जाता है।
उत्तर-पश्चिमी भारत में गर्मियों में अत्यधिक तापमान और सर्दियों में अपेक्षाकृत कम तापमान महाद्वीपीय प्रभाव की महत्वपूर्ण विशेषता है।
मानसून ऐसी मौसमी पवन प्रणाली है जिसमें वर्ष के अलग-अलग समय में पवनों की दिशा और परिसंचरण में व्यापक परिवर्तन होता है।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः जून से सितंबर के बीच देश के अधिकांश भाग में वार्षिक वर्षा का प्रमुख स्रोत होता है।
भारतीय मानसून की पारंपरिक व्याख्या में भूमि और समुद्र के बीच मौसमी तापीय अंतर को महत्वपूर्ण माना जाता है। गर्मियों में भारतीय भू-भाग के तेजी से गर्म होने से निम्न दाब की स्थिति विकसित होती है, जबकि हिंद महासागर के ऊपर अपेक्षाकृत उच्च दाब की स्थिति बनी रह सकती है।
इस दाब प्रवणता के कारण समुद्र से स्थल की ओर नम पवनों का प्रवाह बढ़ता है। पृथ्वी का घूर्णन, स्थलाकृति, जेट धाराएँ, तिब्बती पठार तथा महासागर-वायुमंडल की परस्पर क्रियाएँ इस प्रणाली को और जटिल बनाती हैं।
स्थल समुद्र की तुलना में जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा होता है। गर्मियों में भारतीय भू-भाग के तेजी से गर्म होने से निम्न दाब की स्थिति मजबूत होती है और समुद्र से नम पवनों के प्रवाह के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं।
सर्दियों में स्थल तेजी से ठंडा होता है और उच्च दाब की स्थिति विकसित होती है। इससे पवनों की दिशा गर्मियों की तुलना में बदल जाती है।
तिब्बती पठार की अत्यधिक ऊँचाई और गर्मियों में उसका तापीय प्रभाव एशियाई मानसूनी परिसंचरण को प्रभावित करता है।
आधुनिक अध्ययन में तिब्बती पठार को केवल एक गर्म “हीटर” मानना पर्याप्त नहीं है। इसकी ऊँचाई, सतह का तापीय संतुलन, हिमावरण, आसपास की स्थलाकृति तथा ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण सभी मानसून की गतिशीलता से जुड़े हैं।
ऊपरी वायुमंडल में तीव्र गति से बहने वाली संकरी पवन पट्टियों को जेट धारा (Jet Stream) कहा जाता है। भारतीय मानसून के संदर्भ में उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट धारा और उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट धारा विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
गर्मियों में ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले परिवर्तन तथा उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट का विकास मानसून के सक्रिय होने से संबंधित प्रक्रियाओं का हिस्सा है।
भारत में प्रवेश करने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून की पवनों को सामान्यतः दो प्रमुख शाखाओं में समझा जाता है:
अरब सागर शाखा पश्चिमी तट की ओर बढ़ती है और पश्चिमी घाट से टकराकर ऊपर उठती है। इससे पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख भाग में भारी पर्वतीय वर्षा होती है।
पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित कुछ क्षेत्र वर्षा-छाया (Rain Shadow) में आते हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक के आंतरिक भाग इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर-पूर्व भारत तथा गंगा के मैदान की ओर बढ़ती है। मेघालय की पहाड़ियाँ नम पवनों को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
खासी पहाड़ियों के पवनाभिमुख क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा होती है। मौसिनराम और चेरापूंजी अत्यधिक वर्षा के लिए प्रसिद्ध हैं।
दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः जून के प्रारंभ में केरल के तट तक पहुँचता है और इसके बाद देश के विभिन्न भागों में क्रमशः आगे बढ़ता है।
मानसून की प्रगति हर वर्ष बिल्कुल समान नहीं होती। इसके आगमन, गति और देश के विभिन्न भागों तक पहुँचने के समय में वर्ष-दर-वर्ष परिवर्तन हो सकता है।
मानसून के आगमन के आसपास वर्षा में अचानक और स्पष्ट वृद्धि को मानसून का विस्फोट (Burst of Monsoon) कहा जाता है। यह वर्षा और पवन प्रणाली में अपेक्षाकृत तीव्र परिवर्तन को दर्शाता है।
मानसून के दौरान वर्षा लगातार समान मात्रा में नहीं होती। कुछ अवधि में व्यापक और तीव्र वर्षा होती है, जबकि कुछ अवधि में वर्षा बहुत कम हो जाती है।
मानसून के दौरान वर्षा में इस अस्थायी कमी को मानसून विराम (Break in Monsoon) कहा जाता है। इसके कारण कृषि, जल उपलब्धता और बाढ़ की स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
सितंबर के बाद तापमान और वायुदाब की स्थिति में परिवर्तन के साथ दक्षिण-पश्चिम मानसून धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिमी भारत से पीछे हटना शुरू करता है।
अक्टूबर-नवंबर में दक्षिणी प्रायद्वीप के कई हिस्सों में उत्तर-पूर्वी मानसून महत्वपूर्ण हो जाता है। बंगाल की खाड़ी में इस अवधि के दौरान चक्रवाती गतिविधि भी देखी जा सकती है।
सर्दियों की शुरुआत में भारतीय भू-भाग से समुद्र की ओर बहने वाली उत्तर-पूर्वी पवनें सामान्यतः शुष्क होती हैं। बंगाल की खाड़ी से गुजरते समय इनमें नमी आ जाती है।
इसलिए तमिलनाडु तथा दक्षिण-पूर्वी तट के लिए अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली वर्षा में उत्तर-पूर्वी मानसून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान तमिलनाडु का बड़ा भाग पश्चिमी घाट की स्थिति और पवन दिशा के कारण अपेक्षाकृत कम वर्षा प्राप्त करता है। इसके विपरीत अक्टूबर-दिसंबर में उत्तर-पूर्वी पवनें बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण करके तमिलनाडु के तट की ओर आती हैं।
इसलिए तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा में उत्तर-पूर्वी मानसून का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
भारतीय मौसम विभाग भारत के वार्षिक मौसम चक्र को व्यापक रूप से चार प्रमुख ऋतुओं में विभाजित करता है।
| ऋतु | अवधि | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| शीत ऋतु | दिसंबर से फरवरी | ठंडा एवं अपेक्षाकृत शुष्क मौसम, पश्चिमी विक्षोभ |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च से मई | उच्च तापमान, लू, स्थानीय संवहनीय वर्षा |
| दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु | जून से सितंबर | मुख्य मानसूनी वर्षा |
| लौटता मानसून | अक्टूबर से नवंबर | मानसून की वापसी, चक्रवाती गतिविधि और दक्षिण-पूर्वी तट पर वर्षा |
दिसंबर से फरवरी के दौरान सूर्य की आभासी स्थिति दक्षिण की ओर होने के कारण भारत के अधिकांश भाग में तापमान कम हो जाता है। उत्तर-पश्चिमी भारत में महाद्वीपीय प्रभाव के कारण ठंड अधिक अनुभव होती है।
पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागरीय क्षेत्र और पश्चिमी एशिया से जुड़े समशीतोष्ण अक्षांशीय तंत्र हैं, जो पश्चिमी पवनों के साथ भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ते हैं।
इनके कारण उत्तर-पश्चिमी भारत में सर्दियों के दौरान वर्षा तथा हिमालयी क्षेत्रों में हिमपात हो सकता है।
यह शीतकालीन वर्षा गेहूँ जैसी रबी फसलों के लिए महत्वपूर्ण होती है।
मार्च से मई के दौरान सूर्य की आभासी स्थिति उत्तर की ओर बढ़ने के साथ भारतीय भू-भाग गर्म होने लगता है। मई और जून के आसपास उत्तर-पश्चिमी तथा मध्य भारत के कई हिस्सों में अत्यधिक तापमान दर्ज किया जाता है।
उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी भारत में गर्मियों के दौरान चलने वाली अत्यधिक गर्म और शुष्क हवाओं को लू कहा जाता है।
यह राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावी हो सकती है।
गर्मियों में स्थानीय संवहनीय गतिविधियों के कारण आंधी-तूफान और वर्षा की घटनाएँ होती हैं।
जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत के अधिकांश भागों में वर्षा का मुख्य स्रोत होता है।
भारत की कृषि, जलाशयों, भूजल पुनर्भरण, जलविद्युत उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मानसूनी वर्षा से गहराई से जुड़ी हुई है।
भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। एक ही समय में कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा हो सकती है, जबकि अन्य क्षेत्र कम वर्षा प्राप्त कर सकते हैं।
पश्चिमी घाट का पवनाभिमुख भाग और उत्तर-पूर्व भारत अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आते हैं, जबकि पश्चिमी राजस्थान और लद्दाख जैसे क्षेत्र बहुत कम वर्षा प्राप्त करते हैं।
जब नम पवनें किसी पर्वत से टकराकर ऊपर उठती हैं, तो ऊँचाई बढ़ने के साथ वायु ठंडी होती है। संघनन के बाद वर्षा हो सकती है। इसे पर्वतीय या ओरोग्राफिक वर्षा कहा जाता है।
पश्चिमी घाट और मेघालय की पहाड़ियाँ भारत में इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
पर्वत के पवनाभिमुख भाग पर वर्षा होने के बाद जब वायु दूसरी ओर नीचे उतरती है, तो वह अपेक्षाकृत शुष्क हो जाती है। इस कारण पर्वत की दूसरी ओर कम वर्षा वाला क्षेत्र विकसित हो सकता है।
पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्र वर्षा-छाया प्रभाव के उदाहरण हैं।
एल-नीनो उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग में समुद्री सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने से संबंधित महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है।
एल-नीनो वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर सकता है और भारतीय मानसून पर भी प्रभाव डाल सकता है। हालांकि प्रत्येक एल-नीनो वर्ष में भारत में वर्षा का प्रभाव बिल्कुल समान नहीं होता।
ला-नीना में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है।
ला-नीना की स्थिति भारतीय मानसून के लिए सामान्यतः अधिक अनुकूल परिसंचरण से जुड़ी हो सकती है, लेकिन भारत में वास्तविक वर्षा अनेक अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक कारकों पर भी निर्भर करती है।
ENSO एक संयुक्त महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के समुद्री तापमान तथा वायुमंडलीय दाब और परिसंचरण में परस्पर संबंधित परिवर्तन होते हैं।
UPSC में ENSO को केवल “El Niño = कम मानसून” के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं है। ENSO का प्रभाव भारतीय महासागर की स्थितियों तथा अन्य वायुमंडलीय प्रक्रियाओं के साथ मिलकर मानसून को प्रभावित करता है।
Indian Ocean Dipole हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी भागों के बीच समुद्री सतह के तापमान में असामान्य अंतर से संबंधित महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है।
सकारात्मक IOD में पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत गर्म और पूर्वी भाग अपेक्षाकृत ठंडा हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह भारतीय मानसून के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है।
MJO उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पूर्व की ओर बढ़ने वाली संवहन और वर्षा की सक्रियता से संबंधित एक मौसमी-वायुमंडलीय घटना है।
यह मानसून के सक्रिय और कमजोर चरणों के समय तथा तीव्रता को प्रभावित कर सकती है।
भारत के दोनों समुद्री तट उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से प्रभावित हो सकते हैं। बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती गतिविधि विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
अक्टूबर-नवंबर में लौटते मानसून के दौरान बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती गतिविधि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे तटीय क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारत की कृषि का एक बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर है। इसलिए मानसून की समयबद्धता, अवधि, तीव्रता और स्थानिक वितरण कृषि उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
मानसून की देर से शुरुआत, लंबे वर्षा-विराम, अत्यधिक वर्षा या मानसून की जल्दी वापसी से फसलों पर अलग-अलग प्रकार के प्रभाव पड़ सकते हैं।
मानसून का प्रभाव कृषि से आगे बढ़कर ग्रामीण मांग, खाद्य कीमतों, जलविद्युत, जलाशयों, बिजली उत्पादन और अनेक आर्थिक गतिविधियों तक पहुँचता है।
इसलिए भारतीय मानसून को केवल मौसम संबंधी घटना न मानकर आर्थिक और सामाजिक प्रणाली का महत्वपूर्ण घटक समझना चाहिए।
भारत में तापमान, वर्षा, समुद्र से दूरी और स्थलाकृति की विविधता के कारण अलग-अलग जलवायु क्षेत्र पाए जाते हैं।
तापमान और वर्षा की मात्रा तथा उसका मौसमी वितरण प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार को प्रभावित करते हैं।
तापमान, वर्षा और अपक्षय की प्रक्रियाएँ मृदा निर्माण को प्रभावित करती हैं। इसलिए भारत की अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में अलग-अलग प्रकार की मिट्टियाँ विकसित हुई हैं।
अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में निक्षालन (Leaching) की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है, जबकि शुष्क क्षेत्रों में अधिक वाष्पीकरण के कारण लवणों का संचय हो सकता है।
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भारत में तापमान वृद्धि, अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ, लंबे गर्म मौसम, समुद्र-स्तर वृद्धि, हिमालयी हिमनदों में परिवर्तन और कुछ क्षेत्रों में चक्रवाती जोखिम जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।
इन प्रभावों का स्वरूप पूरे भारत में समान नहीं है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में क्षेत्रीय भिन्नता और स्थानीय अनुकूलन (Adaptation) को ध्यान में रखना आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन मानसून की कुल वर्षा, वर्षा की तीव्रता, वर्षा के दिनों तथा अत्यधिक वर्षा की घटनाओं के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है। इन परिवर्तनों के विभिन्न पहलुओं पर वैज्ञानिक अध्ययन जारी हैं।
इसलिए “मानसून कमजोर हो रहा है” जैसा सरल निष्कर्ष पर्याप्त नहीं है। कुल वर्षा, वर्षा की तीव्रता, स्थानिक वितरण और वर्षा-विराम अलग-अलग पहलू हैं।
मानसून की अत्यधिक वर्षा, नदी बेसिन में भारी वर्षा, हिमालयी नदियों का उच्च प्रवाह, शहरी जल निकासी की समस्या और बाढ़ मैदानों में मानव बसावट बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
बाढ़ को केवल “अधिक वर्षा” से जोड़ना उचित नहीं है। नदी की वहन क्षमता, भूमि उपयोग, जल निकासी और बाढ़ मैदान प्रबंधन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मानसून की वर्षा में कमी या उसके समय और स्थान में परिवर्तन कृषि एवं जल संसाधनों पर दबाव डाल सकता है।
सूखे का अध्ययन करते समय केवल वर्षा की कमी नहीं बल्कि मृदा नमी, जलाशयों, भूजल, फसल स्थिति और क्षेत्रीय जल मांग को भी ध्यान में रखना चाहिए।
भारतीय जलवायु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी मानसूनी प्रकृति तथा स्थानिक और मौसमी विविधता है। हिमालय, भारतीय महासागर, स्थल-समुद्र तापीय अंतर, वायुमंडलीय परिसंचरण और महासागरीय घटनाएँ मिलकर भारतीय मानसून की जटिल प्रणाली का निर्माण करती हैं।
मानसून भारत की कृषि और जल सुरक्षा का आधार है, लेकिन इसकी अनिश्चितता बाढ़, सूखा, फसल क्षति और जल संकट जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न कर सकती है। इसलिए जलवायु नीति में जल संरक्षण, सिंचाई दक्षता, फसल विविधीकरण, बाढ़ मैदान प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल कृषि पर ध्यान देना आवश्यक है।
UPSC दृष्टिकोण से भारतीय जलवायु को कारण → मानसून की उत्पत्ति → जेट धाराएँ → मानसून की शाखाएँ → ऋतुएँ → वर्षा वितरण → ENSO/IOD → कृषि एवं अर्थव्यवस्था → जलवायु परिवर्तन की परस्पर जुड़ी हुई श्रृंखला के रूप में समझना अधिक उपयोगी है।
| विषय | याद रखने योग्य तथ्य |
|---|---|
| भारतीय जलवायु | उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु |
| मुख्य वर्षा ऋतु | जून से सितंबर — दक्षिण-पश्चिम मानसून |
| मानसून की शाखाएँ | अरब सागर शाखा + बंगाल की खाड़ी शाखा |
| शीतकालीन वर्षा | उत्तर-पश्चिम भारत — पश्चिमी विक्षोभ |
| ग्रीष्मकालीन गर्म हवा | लू — उत्तर-पश्चिम भारत |
| प्री-मानसून तूफान | कालबैसाखी — पूर्वी भारत |
| तमिलनाडु की प्रमुख वर्षा | उत्तर-पूर्वी मानसून — अक्टूबर से दिसंबर |
| प्रशांत महासागर | ENSO — El Niño और La Niña |
| हिंद महासागर | IOD — Indian Ocean Dipole |
| पर्वतीय वर्षा | नम पवन + पर्वत = Orographic Rainfall |
| वर्षा-छाया | पर्वत के पवनविमुख भाग में अपेक्षाकृत कम वर्षा |
भारत की जलवायु एक जटिल मानसूनी प्रणाली है जिसमें स्थल, समुद्र, हिमालय, पठार, वायुमंडलीय परिसंचरण और महासागरीय घटनाएँ परस्पर जुड़ी हुई हैं। मानसून भारत की कृषि, जल, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी के लिए केंद्रीय महत्व रखता है।
भारतीय जलवायु को कारण → मानसून की उत्पत्ति → शाखाएँ → ऋतुएँ → वर्षा वितरण → ENSO/IOD → क्षेत्रीय प्रभाव → कृषि एवं अर्थव्यवस्था → जलवायु परिवर्तन की पूरी श्रृंखला में समझना सबसे उपयोगी रहेगा।