Deserts and Grasslands

विश्व के मरुस्थल एवं घासभूमियाँ

मरुस्थल एवं घासभूमि — परिचय

मरुस्थल (Desert) ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षण बहुत कम होता है और उपलब्ध नमी अत्यंत सीमित होती है। सामान्यतः मरुस्थलीय क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा लगभग 250 मिमी से कम मानी जाती है, हालांकि मरुस्थल की पहचान केवल वर्षा की किसी एक निश्चित सीमा पर निर्भर नहीं करती।

घासभूमि (Grassland) ऐसे प्राकृतिक वनस्पति प्रदेश हैं जहाँ घास प्रमुख वनस्पति होती है तथा वृक्षों का घनत्व सामान्यतः कम होता है। वर्षा, तापमान, मिट्टी, आग और चराई जैसी प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाएँ इनके स्वरूप को प्रभावित करती हैं।

मरुस्थल बनने के प्रमुख कारण

मरुस्थलों के प्रमुख प्रकार

मरुस्थलीय जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ

विश्व के प्रमुख मरुस्थल

मरुस्थल महाद्वीप प्रमुख विशेषता
सहारा अफ्रीका विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल
अरब मरुस्थल एशिया अरब प्रायद्वीप का विशाल शुष्क क्षेत्र
गोबी एशिया ठंडा महाद्वीपीय मरुस्थल
तक्लामकान एशिया चीन के तारिम बेसिन में स्थित
थार एशिया भारत–पाकिस्तान क्षेत्र
अटाकामा दक्षिण अमेरिका अत्यंत शुष्क तटीय मरुस्थल
कालाहारी अफ्रीका दक्षिणी अफ्रीका का अर्ध-शुष्क क्षेत्र
नामीब अफ्रीका ठंडी महासागरीय धारा से प्रभावित तटीय मरुस्थल
पेटागोनियन दक्षिण अमेरिका एंडीज के वर्षाछाया प्रभाव से संबंधित
ग्रेट विक्टोरिया ऑस्ट्रेलिया ऑस्ट्रेलिया का विशाल मरुस्थलीय क्षेत्र

सहारा मरुस्थल (Sahara Desert)

सहारा उत्तरी अफ्रीका में स्थित विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल है। इसका विस्तार अटलांटिक महासागर से लाल सागर तक व्यापक क्षेत्र में है।

ओएसिस (Oasis)

मरुस्थल में ऐसा स्थानीय क्षेत्र जहाँ भूजल या किसी अन्य स्रोत के कारण पर्याप्त जल उपलब्ध हो जाता है और वनस्पति तथा मानव बस्ती विकसित हो सकती है, उसे ओएसिस कहते हैं।

ओएसिस विशेष रूप से मरुस्थलीय कृषि, खजूर उत्पादन, पशुपालन और ऐतिहासिक व्यापारिक मार्गों के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं।

अटाकामा मरुस्थल (Atacama Desert)

अटाकामा दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर मुख्यतः उत्तरी चिली में स्थित है। यह पृथ्वी के अत्यंत शुष्क गैर-ध्रुवीय क्षेत्रों में से एक है।

नामीब मरुस्थल (Namib Desert)

नामीब दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका के अटलांटिक तट के साथ फैला हुआ तटीय मरुस्थल है। इसकी शुष्कता में बेंगुएला ठंडी महासागरीय धारा की महत्वपूर्ण भूमिका है।

समुद्र से आने वाली नम हवा ठंडी धारा के प्रभाव से संघनित होकर कोहरा पैदा कर सकती है, लेकिन पर्याप्त वर्षा नहीं होती। इसलिए यहाँ मरुस्थलीय परिस्थितियाँ बनी रहती हैं।

गोबी मरुस्थल (Gobi Desert)

गोबी एशिया के आंतरिक भाग में मंगोलिया और चीन के क्षेत्र में स्थित है। यह मुख्यतः एक ठंडा महाद्वीपीय मरुस्थल है।

थार मरुस्थल (Thar Desert)

थार मरुस्थल भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित है। भारत में इसका अधिकांश भाग राजस्थान में है।

मरुस्थलीय वनस्पति (Desert Vegetation)

मरुस्थलीय पौधों में जल की कमी से बचने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं। ऐसी वनस्पतियों को सामान्यतः Xerophytes कहा जाता है।

घासभूमि (Grasslands) — परिचय

घासभूमि ऐसे प्राकृतिक वनस्पति क्षेत्र हैं जहाँ घास प्रमुख होती है और वृक्षों का घनत्व सामान्यतः कम होता है। घासभूमियों का विकास मुख्यतः वर्षा की मात्रा, तापमान, मिट्टी, आग और चराई के संयुक्त प्रभाव से होता है।

घासभूमियाँ विशेष रूप से उन क्षेत्रों में विकसित होती हैं जहाँ वर्षा इतनी कम होती है कि घने वन नहीं बन पाते, लेकिन इतनी अधिक होती है कि लगातार मरुस्थलीय परिस्थितियाँ भी नहीं बनतीं।

घासभूमियों के प्रमुख प्रकार

विश्व की प्रमुख घासभूमियाँ

घासभूमि क्षेत्र प्रमुख विशेषता
Prairies उत्तरी अमेरिका गेहूँ एवं मक्का उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण
Pampas दक्षिण अमेरिका अत्यंत उपजाऊ समशीतोष्ण घासभूमि
Steppes यूरेशिया अर्ध-शुष्क समशीतोष्ण घासभूमि
Veld दक्षिण अफ्रीका पशुपालन एवं कृषि के लिए महत्वपूर्ण
Downs ऑस्ट्रेलिया पशुपालन एवं कृषि के लिए महत्वपूर्ण
Savanna अफ्रीका उष्णकटिबंधीय घास एवं बिखरे वृक्ष

प्रेयरी (Prairies)

प्रेयरी उत्तरी अमेरिका के आंतरिक मैदानों में विस्तृत समशीतोष्ण घासभूमि है। यह मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के कुछ भागों में पाई जाती है।

पम्पास (Pampas)

पम्पास दक्षिण अमेरिका में मुख्यतः अर्जेंटीना और उरुग्वे के क्षेत्र में स्थित उपजाऊ समशीतोष्ण घासभूमि है।

स्टेपी (Steppes)

स्टेपी मुख्यतः यूरेशिया के आंतरिक भागों में फैली अर्ध-शुष्क समशीतोष्ण घासभूमि है।

वेल्ड (Veld)

वेल्ड दक्षिणी अफ्रीका की घासभूमियों के लिए प्रयुक्त शब्द है। दक्षिण अफ्रीका के आंतरिक पठारी क्षेत्रों में इसका व्यापक विस्तार है।

डाउन्स (Downs)

डाउन्स ऑस्ट्रेलिया के कुछ समशीतोष्ण घासभूमि क्षेत्रों के लिए प्रयुक्त नाम है। ये विशेष रूप से पशुपालन और कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

सवाना (Savanna)

सवाना उष्णकटिबंधीय घासभूमि है जिसमें घास के साथ बिखरे हुए वृक्ष पाए जाते हैं। यहाँ वर्षा और शुष्क ऋतु स्पष्ट रूप से अलग होती हैं।

घासभूमियों में आग की भूमिका

घासभूमियों में प्राकृतिक या मानव-जनित आग वनस्पति की संरचना को प्रभावित करती है। कई घास प्रजातियाँ आग के बाद पुनः तेजी से विकसित हो सकती हैं।

नियंत्रित आग कुछ क्षेत्रों में झाड़ियों और वृक्षों के अत्यधिक विस्तार को रोक सकती है, लेकिन अत्यधिक या अनियंत्रित आग मिट्टी, जैव विविधता और कार्बन भंडार को नुकसान पहुँचा सकती है।

घासभूमियाँ और पशुपालन

घासभूमियाँ प्राकृतिक चरागाहों के रूप में महत्वपूर्ण हैं। विश्व के अनेक बड़े पशुपालन क्षेत्र घासभूमियों से जुड़े हैं।

घासभूमियाँ और कृषि

समशीतोष्ण घासभूमियों में सामान्यतः गहरी और जैविक पदार्थों से समृद्ध मिट्टी विकसित हो सकती है। इसी कारण प्रेयरी और पम्पास जैसे क्षेत्र व्यावसायिक कृषि के महत्वपूर्ण केंद्र बने हैं।

मरुस्थल और घासभूमि — तुलनात्मक अध्ययन

आधार मरुस्थल घासभूमि
वर्षा बहुत कम मरुस्थल से अधिक
वनस्पति विरल घास प्रमुख
वृक्ष बहुत कम समशीतोष्ण घासभूमि में कम, सवाना में बिखरे हुए
मुख्य आर्थिक गतिविधि पशुपालन, खनन, सिंचित कृषि कृषि एवं पशुपालन
जल उपलब्धता अत्यंत सीमित मौसमी एवं क्षेत्रानुसार पर्याप्त

मरुस्थलीकरण (Desertification)

मरुस्थलीकरण का अर्थ शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता तथा पारिस्थितिक गुणवत्ता में गिरावट से है। यह केवल प्राकृतिक मरुस्थल के विस्तार के समान नहीं है।

मरुस्थलीकरण को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में अत्यधिक चराई, वनों की कटाई, अस्थिर कृषि, मिट्टी का क्षरण, अनुचित सिंचाई, जलवायु परिवर्तन और जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन शामिल हो सकते हैं।

मरुस्थलीकरण रोकने के उपाय

जलवायु परिवर्तन का मरुस्थल और घासभूमियों पर प्रभाव

मरुस्थल और घासभूमि का पारिस्थितिक महत्व

महत्वपूर्ण तथ्य

सामान्य गलतियाँ

विश्लेषण

मरुस्थल और घासभूमियाँ पृथ्वी के ऐसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं जहाँ जल उपलब्धता, तापमान और मौसमी परिस्थितियाँ वनस्पति के स्वरूप को नियंत्रित करती हैं। मरुस्थलों में जल की कमी के कारण विशिष्ट अनुकूलन वाली वनस्पतियाँ विकसित होती हैं, जबकि घासभूमियों में मौसमी वर्षा तथा आग और चराई जैसी प्रक्रियाएँ वनस्पति की संरचना को प्रभावित करती हैं।

आधुनिक समय में जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक चराई, भूमि क्षरण और अस्थिर कृषि के कारण इन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है। इसलिए मरुस्थलीकरण की रोकथाम, टिकाऊ चरागाह प्रबंधन, जल संरक्षण, मृदा संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को एकीकृत दृष्टिकोण के रूप में अपनाना आवश्यक है।

Quick Revision — एक नजर में

निष्कर्ष

मरुस्थल और घासभूमियाँ केवल शुष्क या खाली भूभाग नहीं हैं, बल्कि अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं। UPSC के लिए इनके अध्ययन में जलवायु → वर्षा → वनस्पति → मिट्टी → कृषि/पशुपालन → मानव गतिविधि → पर्यावरणीय समस्याएँ के पूरे संबंध को समझना आवश्यक है।