Interior of the Earth

पृथ्वी की आंतरिक संरचना

परिचय

पृथ्वी एक पूर्णतः ठोस पिंड नहीं है। इसके अंदर तापमान, दबाव, घनत्व और पदार्थों की भौतिक अवस्था में गहराई के साथ परिवर्तन होता है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझना भूगोल, प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखिता, भूकंप तथा पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पृथ्वी का आंतरिक भाग सीधे मानव अवलोकन के लिए उपलब्ध नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों ने मुख्यतः भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves), गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र, ज्वालामुखीय पदार्थों, उल्कापिंडों तथा प्रयोगशाला अध्ययनों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अनुमान लगाया है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना जानने के प्रमुख स्रोत

पृथ्वी के अंदर की जानकारी प्राप्त करने के स्रोतों को सामान्यतः प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रमाणों में बाँटा जा सकता है।

प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources)

अप्रत्यक्ष स्रोत (Indirect Sources)

प्रत्यक्ष प्रमाणों की सीमाएँ

मनुष्य पृथ्वी के केंद्र के पास तक प्रत्यक्ष रूप से नहीं पहुँच सकता। मानव-निर्मित गहरी ड्रिलिंग भी पृथ्वी की कुल त्रिज्या की तुलना में बहुत कम गहराई तक ही पहुँच पाती है।

इसलिए पृथ्वी के अधिकांश आंतरिक भाग के बारे में हमारी जानकारी अप्रत्यक्ष प्रमाणों पर आधारित है, जिनमें भूकंपीय तरंगें सबसे महत्वपूर्ण हैं।

ज्वालामुखीय पदार्थों का महत्व

ज्वालामुखीय उद्गार के दौरान पृथ्वी के अंदर से मैग्मा, गैस तथा चट्टानी पदार्थ सतह पर आते हैं। इन पदार्थों के रासायनिक एवं खनिजीय अध्ययन से पृथ्वी के कुछ अपेक्षाकृत गहरे भागों की संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

हालांकि ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी के केंद्र से सीधे नहीं आते, इसलिए इनके आधार पर पूरे आंतरिक भाग की संरचना निर्धारित नहीं की जा सकती।

उल्कापिंडों से जानकारी

उल्कापिंडों को पृथ्वी और सौरमंडल के निर्माण से संबंधित प्राचीन पदार्थों के प्रतिनिधि के रूप में अध्ययन किया जाता है।

इनके रासायनिक संघटन से यह अनुमान लगाने में सहायता मिलती है कि पृथ्वी के निर्माण के समय किन तत्वों और खनिजीय पदार्थों की उपलब्धता रही होगी।

लौह और निकेल से समृद्ध उल्कापिंडों का अध्ययन पृथ्वी के धात्विक आंतरिक भाग को समझने में विशेष रूप से उपयोगी है।

भूकंपीय तरंगें – सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण

भूकंप के समय उत्पन्न तरंगें पृथ्वी के विभिन्न आंतरिक भागों से होकर गुजरती हैं। इनके वेग, दिशा और व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों से वैज्ञानिक पृथ्वी की आंतरिक परतों की जानकारी प्राप्त करते हैं।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में मुख्यतः P Waves और S Waves अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

P Waves

S Waves

सतही तरंगें (Surface Waves)

सतही तरंगें पृथ्वी की सतह के निकट संचरित होती हैं। इनमें Love Waves और Rayleigh Waves प्रमुख हैं।

ये सामान्यतः भूकंप से होने वाली सतही क्षति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन पृथ्वी की गहरी आंतरिक संरचना जानने के लिए P और S Waves अधिक उपयोगी हैं।

भूकंपीय छाया क्षेत्र (Seismic Shadow Zone)

पृथ्वी के अंदर विभिन्न परतों में भूकंपीय तरंगों की गति और दिशा बदलती है। इसके कारण कुछ क्षेत्रों में विशेष भूकंपीय तरंगें सीधे दर्ज नहीं होतीं। इन्हें Seismic Shadow Zones कहा जाता है।

S Waves द्रव बाहरी कोर से होकर नहीं गुजरतीं। इसके कारण पृथ्वी के बाहरी कोर की द्रव अवस्था के संबंध में महत्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त होता है और S Waves का एक व्यापक छाया क्षेत्र दिखाई देता है।

P Waves बाहरी कोर में प्रवेश करते समय अपवर्तित होती हैं। इसके कारण P Waves के वेग और दिशा में परिवर्तन होता है तथा उनका भी एक विशिष्ट छाया क्षेत्र बनता है।

पृथ्वी की प्रमुख आंतरिक परतें

रासायनिक संघटन और संरचना के आधार पर पृथ्वी को मुख्यतः तीन बड़े भागों में समझा जाता है:

इनके बीच कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ या असांतत्य (Discontinuities) पाई जाती हैं।

भूपर्पटी (Crust)

भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे बाहरी ठोस परत है। यह पृथ्वी की कुल त्रिज्या की तुलना में बहुत पतली है।

भूपर्पटी को मुख्यतः दो प्रकारों में बाँटा जाता है:

महाद्वीपीय भूपर्पटी

महासागरीय भूपर्पटी

महाद्वीपीय और महासागरीय भूपर्पटी में अंतर

विशेषता महाद्वीपीय भूपर्पटी महासागरीय भूपर्पटी
मोटाई अधिक कम
घनत्व कम अधिक
प्रमुख चट्टान ग्रेनाइटिक बेसाल्टिक
आयु बहुत पुराने क्षेत्र पाए जाते हैं सामान्यतः अपेक्षाकृत युवा
सबडक्शन तुलनात्मक रूप से कम अभिसारी सीमाओं पर सामान्य

मेंटल (Mantle)

मेंटल भूपर्पटी के नीचे स्थित विशाल परत है और पृथ्वी के आयतन का सबसे बड़ा भाग इसी से संबंधित है।

इसका संघटन मुख्यतः सिलिकेट खनिजों से संबंधित है तथा इसमें मैग्नीशियम और लौह की महत्वपूर्ण मात्रा पाई जाती है।

मेंटल पूरी तरह तरल नहीं है। इसका अधिकांश भाग ठोस अवस्था में है, लेकिन लंबे भूगर्भीय समय में उच्च तापमान और दबाव के कारण इसमें बहुत धीमी गति से प्रवाह हो सकता है।

मेंटल की प्रमुख संरचनात्मक इकाइयाँ

ऊपरी मेंटल (Upper Mantle)

ऊपरी मेंटल का कुछ कठोर भाग लिथोस्फीयर में शामिल होता है, जबकि उसके नीचे अपेक्षाकृत कमजोर और नम्य क्षेत्र एस्थेनोस्फीयर से संबंधित है।

निचला मेंटल (Lower Mantle)

अधिक गहराई पर बढ़ते दबाव के कारण खनिजों की संरचना और भौतिक गुण बदलते हैं। निचला मेंटल कोर की सीमा तक फैला हुआ है।

एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere)

एस्थेनोस्फीयर ऊपरी मेंटल का अपेक्षाकृत कमजोर और अधिक नम्य क्षेत्र है। इसमें पदार्थ पूर्णतः तरल नहीं होता, बल्कि लंबे भूगर्भीय समय में प्लास्टिक जैसी गति प्रदर्शित कर सकता है।

प्लेट विवर्तनिकी के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके ऊपर कठोर लिथोस्फेरिक प्लेटें गतिशील होती हैं। आधुनिक भू-विज्ञान में एस्थेनोस्फीयर की सीमा को एक समान और निश्चित गहराई वाली परत नहीं माना जाता।

लिथोस्फीयर (Lithosphere)

लिथोस्फीयर में भूपर्पटी + ऊपरी मेंटल का कठोर भाग शामिल होता है।

यह कई कठोर प्लेटों में विभाजित है जिन्हें विवर्तनिक प्लेटें (Tectonic Plates) कहा जाता है।

इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि लिथोस्फीयर केवल भूपर्पटी के बराबर नहीं है।

कोर (Core)

पृथ्वी का सबसे आंतरिक भाग कोर कहलाता है। इसका निर्माण मुख्यतः लौह (Iron) और निकेल (Nickel) जैसे भारी तत्वों से संबंधित माना जाता है।

पृथ्वी का कोर दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है:

बाहरी कोर (Outer Core)

बाहरी कोर मुख्यतः द्रव अवस्था में माना जाता है।

S Waves इसके माध्यम से नहीं गुजरतीं, जबकि P Waves इसके माध्यम से गुजरती हैं और अपवर्तन के कारण उनकी दिशा तथा गति बदलती है।

बाहरी कोर में विद्युत-चालक द्रव पदार्थ की गति और संवहन पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आंतरिक कोर (Inner Core)

अत्यधिक दबाव के कारण आंतरिक कोर मुख्यतः ठोस अवस्था में माना जाता है, जबकि इसका संघटन मुख्यतः लौह-निकेल से संबंधित है।

यहाँ तापमान अत्यधिक अधिक होने के बावजूद अत्यधिक दबाव पदार्थ को ठोस अवस्था में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और बाहरी कोर

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र मुख्यतः बाहरी कोर में विद्युत-चालक द्रव पदार्थ की गति से संबंधित Geodynamo प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न माना जाता है।

बाहरी कोर में संवहन तथा पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव विद्युत धाराओं और चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण तथा उसके बने रहने में योगदान देता है।

पृथ्वी की प्रमुख असांतत्य (Discontinuities)

पृथ्वी की विभिन्न आंतरिक परतों के बीच ऐसे क्षेत्र पाए जाते हैं जहाँ भूकंपीय तरंगों के वेग और व्यवहार में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। इन्हें Discontinuities कहा जाता है।

मोहो असांतत्य (Mohorovičić Discontinuity)

इसे सामान्यतः Moho कहा जाता है। यह भूपर्पटी और मेंटल के बीच की सीमा है।

इस सीमा के नीचे भूकंपीय तरंगों के वेग में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।

गुटेनबर्ग असांतत्य (Gutenberg Discontinuity)

यह मेंटल और बाहरी कोर के बीच की सीमा है।

इस सीमा के पार S Waves का संचरण नहीं होता और P Waves के व्यवहार में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। यह बाहरी कोर की द्रव अवस्था के संबंध में महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करता है।

लेहमैन असांतत्य (Lehmann Discontinuity)

यह बाहरी कोर और आंतरिक कोर के बीच की सीमा से संबंधित है। भूकंपीय तरंगों के व्यवहार के अध्ययन से आंतरिक कोर की ठोस अवस्था के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सार

परत मुख्य विशेषता प्रमुख संघटन
Crust सबसे बाहरी ठोस परत सिलिकेट खनिज
Mantle सबसे विशाल आंतरिक परत Mg और Fe युक्त सिलिकेट
Outer Core मुख्यतः द्रव अवस्था मुख्यतः Fe-Ni
Inner Core मुख्यतः ठोस अवस्था मुख्यतः Fe-Ni

गहराई के साथ तापमान में परिवर्तन

पृथ्वी के अंदर सामान्यतः गहराई बढ़ने के साथ तापमान बढ़ता है। भूपर्पटी के ऊपरी भाग में तापमान वृद्धि को समझने के लिए Geothermal Gradient की अवधारणा उपयोगी है।

हालांकि यह तापमान वृद्धि पृथ्वी के सभी भागों में समान दर से नहीं होती। स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियाँ, चट्टानों की प्रकृति तथा तापीय प्रवाह इसमें परिवर्तन उत्पन्न कर सकते हैं।

गहराई के साथ दबाव और घनत्व

पृथ्वी के अंदर गहराई बढ़ने के साथ ऊपर स्थित पदार्थों के भार के कारण दबाव सामान्यतः बढ़ता है।

गहराई के साथ पदार्थों के संपीड़न और भारी तत्वों की अधिकता के कारण घनत्व भी सामान्यतः बढ़ता है।

पृथ्वी का रासायनिक संघटन

पृथ्वी में ऑक्सीजन, सिलिकॉन, एल्युमिनियम, लौह, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व महत्वपूर्ण मात्रा में पाए जाते हैं।

पृथ्वी की सतही चट्टानों में ऑक्सीजन और सिलिकॉन का विशेष महत्व है, जबकि गहरे धात्विक भागों में लौह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भौतिक गुणों के आधार पर पृथ्वी की संरचना

रासायनिक संरचना के अलावा पृथ्वी को उसके भौतिक एवं यांत्रिक गुणों के आधार पर भी विभाजित किया जाता है।

पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा के स्रोत

पृथ्वी के अंदर अत्यधिक ऊष्मा मौजूद है। इसके प्रमुख स्रोतों में निम्न शामिल हैं:

पृथ्वी की आंतरिक संरचना और प्लेट विवर्तनिकी

पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा मेंटल के भीतर पदार्थ की धीमी गति तथा संवहन जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। लिथोस्फेरिक प्लेटों की गति को केवल एक सरल "Convection Current" से समझना पर्याप्त नहीं है।

आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी में स्लैब पुल (Slab Pull), रिज पुश (Ridge Push), प्लेटों के भीतर के बल तथा मेंटल की गतिशील प्रक्रियाओं को सम्मिलित रूप से देखा जाता है।

Isostasy और पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Isostasy का अर्थ पृथ्वी के लिथोस्फेरिक भागों का नीचे स्थित अधिक नम्य पदार्थ के ऊपर गुरुत्वीय संतुलन में रहना है।

पर्वतों की जड़ें अपेक्षाकृत गहराई तक जा सकती हैं। हिमालय जैसे ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को समझने में Isostasy की अवधारणा उपयोगी है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सरल क्रम

सतह से केंद्र की ओर क्रम:

भूपर्पटी → ऊपरी मेंटल → एस्थेनोस्फीयर → निचला मेंटल → बाहरी कोर → आंतरिक कोर

ध्यान रखें कि लिथोस्फीयर और एस्थेनोस्फीयर का विभाजन मुख्यतः यांत्रिक गुणों पर आधारित है, जबकि Crust, Mantle और Core का विभाजन मुख्यतः रासायनिक/संरचनात्मक आधार पर किया जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

सामान्य गलतियाँ

संभावित प्रश्न

"भूकंपीय तरंगों के व्यवहार के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना की व्याख्या कीजिए। पृथ्वी के बाहरी एवं आंतरिक कोर के संबंध में इन तरंगों से क्या जानकारी प्राप्त होती है?"

उत्तर में पहले पृथ्वी के आंतरिक भाग के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष स्रोतों का उल्लेख करें। इसके बाद P और S Waves की विशेषताओं को समझाएँ। Seismic Shadow Zone तथा S Waves के बाहरी कोर से न गुजरने के प्रमाण को समझाएँ। अंत में Crust, Mantle, Outer Core और Inner Core की संरचना तथा अवस्था से जोड़कर उत्तर को निष्कर्ष तक ले जाएँ।

Quick Revision