स्थलरूप का परिचय (Landforms)
पृथ्वी की सतह पूर्णतः समतल नहीं है। कहीं ऊँचे पर्वत, कहीं विस्तृत
पठार, कहीं समतल मैदान तथा कहीं गहरी घाटियाँ और गर्त पाए जाते हैं।
पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले इन प्राकृतिक ऊँच-नीच एवं आकृतियों
को स्थलरूप (Landforms) कहा जाता है।
स्थलरूपों का निर्माण मुख्यतः पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों
(Endogenic Forces) तथा बाह्य शक्तियों (Exogenic Forces) के
संयुक्त प्रभाव से होता है।
आंतरिक शक्तियाँ मुख्यतः उत्थान, वलन, भ्रंशन, प्लेट विवर्तनिकी
तथा ज्वालामुखीय गतिविधियों द्वारा स्थलरूपों के निर्माण में
योगदान करती हैं। बाह्य शक्तियाँ अपक्षय, अपरदन, परिवहन और
निक्षेपण के माध्यम से स्थलरूपों को लगातार परिवर्तित करती रहती हैं।
स्थलरूपों को नियंत्रित करने वाले कारक
- प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) — पर्वतनिर्माण, भ्रंशन, ज्वालामुखीय गतिविधि एवं व्यापक भू-उत्थान में महत्वपूर्ण।
- अपक्षय (Weathering) — चट्टानों का अपने स्थान पर टूटना, विघटन या रासायनिक परिवर्तन।
- अपरदन (Erosion) — बहते जल, हिमनद, वायु तथा समुद्री तरंगों द्वारा पदार्थ का कटाव एवं हटाव।
- परिवहन (Transportation) — अपरदित पदार्थ का जल, वायु, हिमनद आदि द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना।
- निक्षेपण (Deposition) — परिवहित पदार्थ का गति कम होने पर किसी स्थान पर जमा होना।
- ज्वालामुखीय क्रिया (Volcanism) — लावा एवं ज्वालामुखीय पदार्थों के संचय से नए स्थलरूपों का निर्माण।
- भ्रंशन (Faulting) — भ्रंशों के साथ चट्टानी भू-खंडों के विस्थापन से स्थलाकृति में परिवर्तन।
पर्वत (Mountains)
आसपास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक ऊँचाई तथा सामान्यतः तीव्र
ढाल वाली प्रमुख स्थलाकृतियों को पर्वत कहा जाता है। पर्वतों की
ऊँचाई, आकार, निर्माण प्रक्रिया और चट्टानी संरचना अलग-अलग हो सकती है।
पर्वत केवल ऊँचे भू-भाग नहीं हैं, बल्कि वे जलवायु, जल-प्रवाह,
जैव-विविधता, प्राकृतिक वनस्पति और मानव बस्तियों को भी प्रभावित करते हैं।
पर्वतों का निर्माण
पर्वत निर्माण की प्रक्रिया को पर्वतनिर्माण (Orogeny) कहा जाता है।
इसका प्रमुख संबंध प्लेट विवर्तनिकी से है।
अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) पर प्लेटों के
टकराव से चट्टानों में संपीड़न, वलन तथा भ्रंशन हो सकता है।
इससे विशाल पर्वत प्रणालियों का निर्माण हो सकता है।
महाद्वीपीय और महाद्वीपीय प्लेटों की टक्कर से हिमालय जैसे वलित
पर्वतों का निर्माण हुआ है। महासागरीय और महाद्वीपीय प्लेटों के
अभिसरण पर सबडक्शन, ज्वालामुखीय गतिविधि और पर्वत निर्माण से
संबंधित प्रक्रियाएँ सक्रिय हो सकती हैं।
पर्वतों के प्रमुख प्रकार
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वलित पर्वत (Fold Mountains) —
मुख्यतः संपीड़न बलों के कारण चट्टानी परतों के वलन से निर्मित।
उदाहरण — हिमालय, आल्प्स, एंडीज।
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भ्रंशोत्थ पर्वत (Block Mountains) —
भ्रंशन के कारण भू-खंडों के ऊपर उठने या उनके आसपास के भू-भाग
के सापेक्ष नीचे धँसने से निर्मित।
उदाहरण — वोजेस एवं ब्लैक फॉरेस्ट।
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ज्वालामुखीय पर्वत (Volcanic Mountains) —
ज्वालामुखीय लावा, राख तथा अन्य पदार्थों के संचय से निर्मित।
उदाहरण — फूजी, किलिमंजारो।
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अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) —
लंबे समय तक अपरदन के बाद अपेक्षाकृत कठोर चट्टानों के अवशेष
के रूप में विकसित।
उदाहरण — अरावली।
वलित पर्वत (Fold Mountains)
जब क्षैतिज संपीड़न बलों के कारण चट्टानों की परतें मुड़कर
ऊपर-नीचे वलित हो जाती हैं, तब वलित पर्वतों का निर्माण हो सकता है।
वलित संरचना में उत्तल वलन को अपनति (Anticline) तथा अवतल वलन को
अभिनति (Syncline) कहा जाता है।
हिमालय विश्व की युवा और सक्रिय पर्वत प्रणालियों में से एक है।
भारतीय प्लेट और यूरेशियाई प्लेट के अभिसरण से संबंधित विवर्तनिक
गतिविधियाँ आज भी हिमालयी क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।
पर्वतों का भौगोलिक महत्व
- प्रमुख नदियों के उद्गम एवं जलागम क्षेत्रों के रूप में कार्य करते हैं।
- जलविद्युत उत्पादन की संभावनाएँ प्रदान करते हैं।
- विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं जैव-विविधता को समर्थन देते हैं।
- वन संसाधनों और औषधीय वनस्पतियों के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।
- पर्यटन एवं साहसिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक महत्व रखते हैं।
पठार (Plateaus)
आसपास के क्षेत्रों की तुलना में ऊँचा तथा अपेक्षाकृत विस्तृत
समतल या हल्की ढाल वाला भू-भाग पठार कहलाता है। पठार की सतह
पूर्णतः समतल होना आवश्यक नहीं है।
पठारों का निर्माण भू-उत्थान, ज्वालामुखीय लावा के व्यापक प्रसार,
अपरदन तथा विभिन्न विवर्तनिक प्रक्रियाओं सहित अनेक भूगर्भीय
प्रक्रियाओं से हो सकता है।
पठारों के प्रमुख प्रकार
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अंतरपर्वतीय पठार (Intermontane Plateaus) —
पर्वत प्रणालियों के बीच स्थित पठार।
उदाहरण — तिब्बती पठार।
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पर्वतपदीय पठार (Piedmont Plateaus) —
पर्वतों के आधार या निकटवर्ती क्षेत्रों में विकसित पठार।
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महाद्वीपीय पठार (Continental Plateaus) —
बड़े महाद्वीपीय क्षेत्रों में विस्तृत पठार, जिनका निर्माण
व्यापक भू-उत्थान या अन्य भूगर्भीय प्रक्रियाओं से हो सकता है।
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लावा पठार (Lava Plateaus) —
व्यापक लावा प्रवाहों के ठंडे होकर जमने से निर्मित।
उदाहरण — दक्कन का पठार।
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अपरदनी पठार (Erosional Plateaus) —
दीर्घकालीन अपरदन के कारण आसपास के क्षेत्र के अधिक क्षरण
के बाद अपेक्षाकृत ऊँचा भाग बच जाने से विकसित।
दक्कन का पठार (Deccan Plateau)
दक्कन का पठार प्रायद्वीपीय भारत का प्रमुख पठारी क्षेत्र है।
इसका अधिकांश भाग प्राचीन कठोर चट्टानों से बना है तथा पश्चिमी
भाग सामान्यतः पूर्वी भाग की तुलना में अधिक ऊँचा है।
इसके बड़े हिस्से पर बेसाल्टिक लावा का प्रभाव है। दक्कन ट्रैप
विशाल ज्वालामुखीय लावा प्रवाहों से संबंधित है, जिसने पश्चिमी
एवं मध्य प्रायद्वीपीय भारत के बड़े हिस्से को प्रभावित किया।
दक्कन के पठार से गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और तुंगभद्रा जैसी
प्रमुख नदियाँ संबंधित हैं। इनमें से अधिकांश नदियाँ सामान्यतः
पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जबकि
नर्मदा और ताप्ती जैसी प्रमुख नदियाँ पश्चिम की ओर बहकर
अरब सागर में गिरती हैं।
पठारों का महत्व
- खनिज संसाधनों के महत्वपूर्ण भंडार कई पठारी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- लौह अयस्क, मैंगनीज, बॉक्साइट आदि के अनेक क्षेत्र पठारी भागों में पाए जाते हैं।
- ढाल और जलप्रवाह के कारण कुछ क्षेत्रों में जलविद्युत उत्पादन की संभावनाएँ होती हैं।
- कुछ पठारी क्षेत्रों में काली मिट्टी जैसी महत्वपूर्ण कृषि मिट्टियाँ विकसित हुई हैं।
- जलप्रपातों एवं प्राकृतिक दृश्यों के कारण पर्यटन का महत्व है।
मैदान (Plains)
अपेक्षाकृत कम ऊँचाई और सामान्यतः हल्की ढाल वाले विस्तृत
समतल भू-भाग को मैदान कहा जाता है। मैदानों का निर्माण
निक्षेपण के साथ-साथ कुछ क्षेत्रों में अपरदन एवं अन्य
भू-आकृतिक प्रक्रियाओं से भी हो सकता है।
नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ पदार्थ के लंबे समय तक निक्षेपण से
बने मैदानों को जलोढ़ मैदान (Alluvial Plains) कहा जाता है।
मैदानों के प्रमुख प्रकार
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जलोढ़ मैदान (Alluvial Plains) —
नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के व्यापक निक्षेपण से।
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बाढ़ मैदान (Flood Plains) —
नदियों के बार-बार बाढ़ग्रस्त होने वाले क्षेत्रों में
अवसादों के निक्षेपण से।
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तटीय मैदान (Coastal Plains) —
समुद्र के किनारे स्थित विस्तृत निम्न भू-भाग, जिनका विकास
समुद्री एवं नदीय निक्षेपण तथा तटीय प्रक्रियाओं से प्रभावित हो सकता है।
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हिमानी मैदान (Glacial Plains) —
हिमनदों द्वारा परिवहित एवं निक्षेपित पदार्थों से संबंधित मैदान।
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पवन निक्षेपित मैदान —
वायु द्वारा लाए गए महीन अवसादों के संचय से विकसित मैदान।
भारत का उत्तरी मैदान (Northern Plains)
भारत का उत्तरी मैदान मुख्यतः सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र
नदी प्रणालियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से बना विशाल
मैदान है।
यह क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त जल उपलब्धता तथा
अपेक्षाकृत समतल स्थलाकृति के कारण भारत का प्रमुख कृषि क्षेत्र है।
उत्तरी मैदान में भाबर, तराई, भांगर और खादर जैसी विशिष्ट
भौगोलिक इकाइयाँ पाई जाती हैं।
भांगर और खादर
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भांगर (Bhangar) — पुराना जलोढ़ निक्षेप,
जो सामान्यतः बाढ़ के वर्तमान स्तर से ऊपर पाया जाता है।
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खादर (Khadar) — नया जलोढ़ निक्षेप,
जो नदियों द्वारा बाढ़ के दौरान या उसके प्रभाव वाले
क्षेत्रों में अपेक्षाकृत नए रूप में जमा किया जाता है।
खादर में नवीन जलोढ़ पदार्थों का लगातार या समय-समय पर
पुनर्निक्षेपण होता रहता है, इसलिए यह कृषि की दृष्टि से
अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पर्वत, पठार और मैदान — तुलनात्मक अध्ययन
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पर्वत — आसपास के क्षेत्रों की तुलना में
अधिक ऊँचाई, सामान्यतः तीव्र ढाल और ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति।
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पठार — आसपास के क्षेत्र से ऊँचा,
लेकिन शीर्ष भाग अपेक्षाकृत विस्तृत एवं समतल या हल्की ढाल वाला।
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मैदान — सामान्यतः कम ढाल वाला, विस्तृत
और अपेक्षाकृत समतल भू-भाग।
मानव जीवन पर स्थलरूपों का प्रभाव
स्थलरूप मानव बस्तियों, कृषि, परिवहन, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों
के वितरण को प्रभावित करते हैं।
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मैदानों में समतल भूमि और कई क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी के
कारण कृषि एवं घनी आबादी का विकास अपेक्षाकृत आसान होता है।
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पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल, जलवायु और दुर्गम भू-भाग के कारण
बस्तियों एवं परिवहन का स्वरूप अलग होता है।
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पठारी क्षेत्रों में खनिज संसाधनों की उपलब्धता के कारण
खनन एवं खनिज-आधारित उद्योग विकसित हो सकते हैं।
स्थलरूप एवं जलवायु
पर्वत वायुमंडलीय परिसंचरण तथा वर्षा के वितरण को प्रभावित करते हैं।
पर्वतों की पवनाभिमुख ढाल पर ओरोग्राफिक वर्षा (Orographic Rainfall)
हो सकती है, जबकि पवनविमुख ढाल पर वर्षाछाया क्षेत्र (Rain Shadow
Region) विकसित हो सकता है।
इसी कारण एक ही पर्वत प्रणाली के दो किनारों पर वर्षा की मात्रा
और प्राकृतिक वनस्पति में उल्लेखनीय अंतर पाया जा सकता है।
स्थलरूप और अपरदन
स्थलरूप स्थिर नहीं होते। नदियाँ, हिमनद, वायु, समुद्री तरंगें और
भूमिगत जल लगातार पृथ्वी की सतह को काटते, परिवहित करते और
पुनर्गठित करते रहते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में नदी अपरदन से गहरी घाटियाँ और गॉर्ज बन सकते हैं।
शुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन एवं निक्षेपण से बालू के टीले तथा
अन्य मरुस्थलीय स्थलरूप विकसित हो सकते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- स्थलरूपों के निर्माण में आंतरिक एवं बाह्य दोनों शक्तियों की भूमिका होती है।
- पर्वतनिर्माण (Orogeny) मुख्यतः प्लेट विवर्तनिकी से संबंधित है।
- हिमालय युवा वलित पर्वतों का प्रमुख उदाहरण है।
- अरावली भारत की प्राचीन पर्वत प्रणालियों में से एक है।
- दक्कन का पठार मुख्यतः प्रायद्वीपीय भारत में स्थित है।
- दक्कन ट्रैप विशाल बेसाल्टिक लावा प्रवाहों से संबंधित है।
- तिब्बती पठार विश्व का सबसे ऊँचा और विशाल पठारी क्षेत्र है।
- मैदानों का निर्माण अक्सर नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण से होता है।
- भारत का उत्तरी मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियों से संबंधित है।
- भांगर पुराना जलोढ़ तथा खादर नया जलोढ़ है।
- पर्वत वर्षा के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं।
- पवनविमुख क्षेत्र में वर्षाछाया विकसित हो सकती है।
- पठारी क्षेत्रों में खनिज संसाधनों की आर्थिक महत्ता अधिक हो सकती है।
- स्थलरूप समय के साथ अपरदन और निक्षेपण द्वारा निरंतर परिवर्तित होते रहते हैं।
परीक्षा में पूछे जाने योग्य अवधारणात्मक बिंदु
- पर्वत और पठार में भौगोलिक अंतर स्पष्ट कीजिए।
- वलित पर्वतों के निर्माण में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका समझाइए।
- पठारी क्षेत्रों में खनिज आधारित उद्योगों के विकास के कारण बताइए।
- उत्तरी मैदान भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण क्यों है?
- भांगर और खादर में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- पर्वत जलवायु और वर्षा के वितरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
- आंतरिक एवं बाह्य भू-आकृतिक शक्तियाँ स्थलरूपों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?