पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा निर्मित विभिन्न आकार, ऊँचाई और ढाल वाली भौतिक आकृतियों को स्थलाकृति (Landform) कहा जाता है। पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ, डेल्टा, मरुस्थल और तटीय आकृतियाँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
स्थलाकृतियों का निर्माण एवं उनका निरंतर परिवर्तन मुख्यतः दो प्रकार की शक्तियों के परस्पर प्रभाव से होता है—
पृथ्वी की स्थलाकृतियाँ किसी एक प्रक्रिया से नहीं बनतीं। अनेक अंतर्जात एवं बहिर्जात प्रक्रियाएँ लंबे समय तक कार्य करके भू-दृश्य का निर्माण, अपरदन और पुनर्गठन करती हैं।
पर्वत पृथ्वी की सतह के ऐसे ऊँचे एवं सामान्यतः तीव्र ढाल वाले भू-भाग हैं जो आसपास के क्षेत्र से स्पष्ट रूप से ऊँचे होते हैं। पर्वतों का निर्माण वलन, भ्रंशन, ज्वालामुखीय गतिविधि तथा अन्य भूगर्भीय प्रक्रियाओं से हो सकता है।
1. वलित पर्वत (Fold Mountains)
संपीडनात्मक प्लेट विवर्तनिक बलों के कारण चट्टानी परतों में वलन पड़ने से वलित पर्वत बनते हैं। ये प्रायः अभिसारी प्लेट सीमाओं से संबंधित होते हैं।
आधुनिक वलित पर्वतों की अनेक प्रणालियाँ सक्रिय या अपेक्षाकृत सक्रिय प्लेट सीमाओं से जुड़ी हुई हैं।
2. भ्रंशोत्थ पर्वत (Block Mountains)
भ्रंशन के कारण पृथ्वी की पर्पटी के कुछ खंड ऊपर उठ सकते हैं और कुछ खंड नीचे धँस सकते हैं। ऊपर उठे हुए खंडों से भ्रंशोत्थ पर्वत बन सकते हैं।
3. ज्वालामुखीय पर्वत (Volcanic Mountains)
ज्वालामुखीय उद्गार से निकला लावा, राख तथा अन्य ज्वालामुखीय पदार्थ समय के साथ जमा होकर ज्वालामुखीय पर्वत बना सकते हैं।
4. अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains)
लंबे समय तक अपरदन के बाद कठोर चट्टानों के अपेक्षाकृत सुरक्षित बचे हुए भाग अवशिष्ट पर्वत या अवशिष्ट उच्चभूमि का रूप ले सकते हैं।
अरावली पर्वतमाला को सामान्यतः अत्यंत प्राचीन एवं दीर्घकालीन अपरदन से प्रभावित पर्वत प्रणाली के उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है।
पठार ऊँचे एवं अपेक्षाकृत समतल या हल्के ढाल वाले विस्तृत भू-भाग हैं। इन्हें सामान्यतः Tableland भी कहा जाता है।
पठारों का निर्माण ज्वालामुखीय गतिविधि, भूगर्भीय उत्थान, लावा प्रवाह, अपरदन तथा अन्य भू-आकृतिक प्रक्रियाओं से हो सकता है।
1. अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau)
पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित ऊँचे पठार अंतरापर्वतीय पठार कहलाते हैं।
2. पादपर्वतीय पठार (Piedmont Plateau)
पर्वतों के आधार या पादप्रदेश के समीप स्थित पठारों को पादपर्वतीय पठार कहा जाता है।
3. महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau)
विशाल स्थलीय क्षेत्रों में विस्तृत और महाद्वीपीय स्तर पर फैले पठारों को महाद्वीपीय पठार कहा जाता है।
अफ्रीकी पठार तथा ब्राजीलियन पठार इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
4. ज्वालामुखीय पठार (Volcanic Plateau)
बड़े पैमाने पर लावा प्रवाह के बार-बार फैलने और जमने से ज्वालामुखीय पठार बन सकते हैं।
दक्कन का पठार विशाल बेसाल्टिक लावा प्रवाह से संबंधित पठारी क्षेत्र का प्रमुख उदाहरण है।
मैदान अपेक्षाकृत समतल और निम्न ढाल वाले विस्तृत भू-भाग हैं। इनका निर्माण मुख्यतः नदी द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण, समुद्री निक्षेपण तथा कुछ क्षेत्रों में अपरदनात्मक प्रक्रियाओं से हो सकता है।
मानव सभ्यता के विकास में मैदानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है क्योंकि यहाँ उपजाऊ मिट्टी, जल की उपलब्धता और अपेक्षाकृत आसान परिवहन की सुविधा मिलती है।
1. जलोढ़ मैदान (Alluvial Plains)
नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ अवसादों के निक्षेपण से जलोढ़ मैदान बनते हैं।
2. जलोढ़ बाढ़ मैदान (Flood Plains)
नदियों में बार-बार आने वाली बाढ़ के दौरान नदी के आसपास के क्षेत्रों में अवसाद जमा होते हैं, जिससे बाढ़ मैदान विकसित होते हैं।
3. तटीय मैदान (Coastal Plains)
समुद्र के किनारे स्थित अपेक्षाकृत समतल क्षेत्रों को तटीय मैदान कहा जाता है। इनका निर्माण समुद्री निक्षेपण, नदी निक्षेपण तथा अन्य तटीय भू-आकृतिक प्रक्रियाओं से हो सकता है।
दो ऊँचे भू-भागों के बीच स्थित लंबा निम्न क्षेत्र घाटी कहलाता है। घाटियों का निर्माण नदियों, हिमनदों, भ्रंशन तथा अन्य अपरदनात्मक प्रक्रियाओं से हो सकता है।
नदियाँ अपने प्रवाह के दौरान तल एवं किनारों का अपरदन करती हैं। ऊपरी पर्वतीय भागों में नदी का ऊर्ध्वाधर अपरदन अधिक होने के कारण संकरी एवं गहरी घाटियाँ विकसित हो सकती हैं।
समय के साथ अपरदन, परिवहन और निक्षेपण की प्रक्रियाओं में परिवर्तन होता रहता है और नदी घाटी का स्वरूप भी विकसित होता रहता है।
हिमनदों द्वारा घाटियों के अपरदन से सामान्यतः चौड़ी U-आकार की घाटियाँ बनती हैं।
इसके विपरीत नदियों द्वारा निर्मित युवा घाटियाँ अक्सर V-आकार की होती हैं।
मरुस्थल ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षा अत्यंत कम होती है और उपलब्ध नमी बहुत सीमित होती है। सामान्यतः इन क्षेत्रों में वाष्पीकरण एवं वाष्पोत्सर्जन की संभावित दर वर्षा की तुलना में अधिक होती है।
मरुस्थल केवल गर्म क्षेत्रों में ही नहीं पाए जाते। ध्रुवीय क्षेत्रों में भी अत्यंत कम वर्षा के कारण शीत मरुस्थल (Polar Deserts) पाए जाते हैं।
पवन द्वारा अपरदन और निक्षेपण मरुस्थलीय भू-दृश्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके साथ अपवाह की कमी और अपक्षय जैसी प्रक्रियाएँ भी मरुस्थलीय स्थलरूपों को प्रभावित करती हैं।
पवन द्वारा उड़ाकर लाई गई रेत के निक्षेपण से बालू के टीले बनते हैं। उनकी आकृति पवन की दिशा, रेत की उपलब्धता तथा वनस्पति की स्थिति पर निर्भर करती है।
प्रमुख प्रकारों में Barchan, Seif और Parabolic Dunes शामिल हैं।
चूना पत्थर जैसी घुलनशील चट्टानों पर जल की रासायनिक क्रिया, विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड युक्त जल द्वारा घुलनशीलता, से विकसित स्थलाकृतियों को कार्स्ट स्थलाकृति कहा जाता है।
गुफाओं की छत से नीचे की ओर लटकने वाली निक्षेपित संरचना स्टैलेक्टाइट कहलाती है, जबकि गुफा के तल से ऊपर की ओर विकसित संरचना स्टैलेग्माइट कहलाती है।
जब दोनों संरचनाएँ आपस में मिल जाती हैं तो स्तंभाकार संरचना विकसित हो सकती है।
समुद्री तरंगों, ज्वारीय क्रिया, समुद्री धाराओं तथा तटीय निक्षेपण के कारण तटों पर अनेक स्थलाकृतियाँ विकसित होती हैं।
सामान्य क्रम में समुद्री अपरदन के बढ़ने पर गुफा → मेहराब → स्तंभ जैसी अवस्थाएँ विकसित हो सकती हैं, यद्यपि वास्तविक तटीय विकास स्थानीय चट्टानी संरचना और तरंग ऊर्जा जैसी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
नदियाँ अपने मार्ग में अपरदन, परिवहन और निक्षेपण करती हैं। नदी की ऊपरी, मध्य और निचली अवस्थाओं में अलग-अलग स्थलरूप विकसित होते हैं।
ऊपरी नदी प्रवाह:
मध्य एवं निचला नदी प्रवाह:
नदी के मैदानी भाग में पार्श्व अपरदन और निक्षेपण के कारण नदी घुमावदार मार्ग बनाने लगती है। इन घुमावों को Meanders कहा जाता है।
जब किसी मेन्डर का घुमाव मुख्य नदी से कटकर अलग हो जाता है, तो अर्धचंद्राकार ऑक्स-बो झील बन सकती है।
नदी जब समुद्र या झील में प्रवेश करती है तो उसकी गति कम हो सकती है और अवसादों का निक्षेपण होने लगता है। पर्याप्त निक्षेपण और अनुकूल तटीय परिस्थितियों में नदीमुख के पास डेल्टा का विकास हो सकता है।
नील, गंगा-ब्रह्मपुत्र और मिसिसिपी डेल्टा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
हिमनद अपने प्रवाह के दौरान चट्टानों का अपरदन, परिवहन और निक्षेपण करते हैं। इनके कारण पर्वतीय तथा निम्न क्षेत्रों में विशिष्ट स्थलरूप विकसित होते हैं।
हिमानी अपरदन से बनी गहरी U-आकार की घाटी जब हिमनद के पीछे हटने के बाद समुद्री जल से भर जाती है तो उसे Fjord कहा जाता है।
नॉर्वे, न्यूजीलैंड और चिली के कुछ तटीय क्षेत्रों में फ्योर्ड महत्वपूर्ण रूप से पाए जाते हैं।
ज्वालामुखीय गतिविधि से भी अनेक विशिष्ट स्थलरूप बनते हैं। लावा, राख और अन्य ज्वालामुखीय पदार्थों के जमाव तथा ज्वालामुखीय संरचनाओं के धँसने से सतह की आकृति में व्यापक परिवर्तन हो सकता है।
बड़े ज्वालामुखीय उद्गार के बाद मैग्मा कक्ष से बड़ी मात्रा में पदार्थ निकलने और उसके बाद ज्वालामुखीय संरचना के धँसने से एक बड़े कटोरेनुमा अवसाद का निर्माण हो सकता है, जिसे कैल्डेरा कहा जाता है।
शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पवन अपरदन और निक्षेपण का महत्वपूर्ण कारक है।
अपक्षय (Weathering) में चट्टानों का विघटन या अपघटन सामान्यतः उसी स्थान पर होता है, जबकि अपरदन (Erosion) में अपक्षयित या ढीले पदार्थ का हटना तथा उसका परिवहन शामिल होता है।
यह अंतर बार-बार पूछे जाने वाले मूलभूत भू-आकृतिक concepts में से एक है।
| अंतर्जात प्रक्रियाएँ | बहिर्जात प्रक्रियाएँ |
|---|---|
| प्लेट विवर्तनिकी | नदी अपरदन |
| भ्रंशन | हिमानी अपरदन |
| वलन | पवन अपरदन |
| ज्वालामुखीय क्रिया | समुद्री अपरदन |
| भूकंपीय गतिविधि | निक्षेपण |
स्थलाकृतियाँ मानव बस्तियों, कृषि, परिवहन, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों के वितरण को प्रभावित करती हैं। हालांकि मानव गतिविधियों का वितरण केवल स्थलाकृति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि जलवायु, संसाधन, तकनीक और ऐतिहासिक परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण हैं।
ऊँचाई, ढाल और पर्वतों की दिशा स्थानीय तथा क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करती है। पर्वतों के कारण आर्द्र वायु ऊपर उठती है, जिससे Orographic Rainfall हो सकती है।
पर्वत की पवनाभिमुख ढाल पर अधिक वर्षा और पवनविमुख ढाल पर कम वर्षा होने से Rain Shadow Region विकसित हो सकता है।
पृथ्वी की प्रमुख स्थलाकृतियाँ अंतर्जात और बहिर्जात शक्तियों के लंबे समय तक चलने वाले परस्पर प्रभाव का परिणाम हैं। प्लेट विवर्तनिकी पर्वत, पठार और ज्वालामुखीय संरचनाओं के निर्माण में आधारभूत भूमिका निभाती है, जबकि अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण इन स्थलरूपों को लगातार परिवर्तित करते रहते हैं।
स्थलाकृतियों का महत्व केवल भौतिक भूगोल तक सीमित नहीं है। इनका प्रभाव मिट्टी, जल संसाधन, कृषि, खनिज, परिवहन, जनसंख्या वितरण और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है। इसलिए स्थलाकृतियों का अध्ययन भू-आकृतिक प्रक्रिया + उदाहरण + मानव-भौगोलिक प्रभाव के साथ करना अधिक उपयोगी है।
पृथ्वी की प्रमुख स्थलाकृतियाँ उसके गतिशील भूगर्भीय इतिहास और सतही प्रक्रियाओं का परिणाम हैं। पर्वत, पठार और मैदान जैसी विशाल स्थलाकृतियों से लेकर डेल्टा, गुफा, बालू के टीले और समुद्री चट्टानों जैसी स्थलाकृतियों तक, प्रत्येक का निर्माण किसी विशिष्ट प्रक्रिया या प्रक्रियाओं के समूह से जुड़ा है। इनका अध्ययन प्रक्रिया → स्थलरूप → उदाहरण → मानव जीवन पर प्रभाव के क्रम में करना अधिक उपयोगी रहेगा।