पृथ्वी पर उपलब्ध वे प्राकृतिक पदार्थ और स्रोत जिनका उपयोग मानव अपनी आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक आवश्यकताओं के लिए करता है, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं। इनमें Mineral Resources (खनिज संसाधन) तथा Energy Resources (ऊर्जा संसाधन) का विशेष महत्व है।
खनिज उद्योग, निर्माण, परिवहन, कृषि, विद्युत उपकरण, आधारभूत संरचना और आधुनिक तकनीकी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। ऊर्जा संसाधन औद्योगिक उत्पादन, परिवहन, कृषि, संचार तथा घरेलू गतिविधियों को संचालित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
खनिजों का वितरण पृथ्वी पर समान नहीं है। इसका प्रमुख कारण अलग-अलग क्षेत्रों की Geological Structure (भूगर्भीय संरचना), चट्टानों की आयु एवं प्रकृति, प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखीय गतिविधियाँ, तलछटी निक्षेप और अन्य भूगर्भीय प्रक्रियाएँ हैं।
खनिजों को उनके भौतिक एवं आर्थिक उपयोग के आधार पर सामान्यतः निम्न वर्गों में बाँटा जाता है:
धात्विक खनिजों में लौह अयस्क, मैंगनीज, क्रोमाइट, तांबा, बॉक्साइट, सोना आदि आते हैं। अधात्विक खनिजों में चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम, नमक और फॉस्फेट आदि प्रमुख हैं। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस प्रमुख जीवाश्म ऊर्जा संसाधन हैं, जबकि यूरेनियम जैसे खनिज परमाणु ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे खनिज जिनसे धातु प्राप्त की जाती है, धात्विक खनिज कहलाते हैं। इन्हें व्यापक रूप से लौहधात्विक (Ferrous) और अलौहधात्विक (Non-Ferrous) खनिजों में बाँटा जाता है।
लौहधात्विक खनिज (Ferrous Minerals) — इनमें लौह से संबंधित औद्योगिक उपयोग महत्वपूर्ण होता है। लौह अयस्क, मैंगनीज और क्रोमाइट इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
अलौहधात्विक खनिज (Non-Ferrous Minerals) — इनमें लौह प्रमुख घटक नहीं होता। तांबा, बॉक्साइट, सोना, चाँदी, सीसा और जस्ता इसके उदाहरण हैं।
लौह अयस्क आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण खनिजों में से एक है। इससे मुख्यतः Iron and Steel Industry (लौह एवं इस्पात उद्योग) के लिए कच्चा माल प्राप्त होता है।
प्रमुख प्रकार:
हेमेटाइट और मैग्नेटाइट आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण लौह अयस्कों में शामिल हैं। अयस्क की गुणवत्ता मुख्यतः उसमें लौह की मात्रा और अशुद्धियों की उपस्थिति से प्रभावित होती है।
विश्व के महत्वपूर्ण लौह-अयस्क क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, भारत, रूस और दक्षिण अफ्रीका में पाए जाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया का Pilbara क्षेत्र और ब्राजील का Minas Gerais क्षेत्र विश्व के महत्वपूर्ण लौह-अयस्क क्षेत्रों के उदाहरण हैं।
मैंगनीज का उपयोग मुख्यतः इस्पात निर्माण में किया जाता है। यह इस्पात की मजबूती, कठोरता और घिसाव-प्रतिरोध बढ़ाने में सहायक होता है। इसका उपयोग मिश्रधातुओं तथा कुछ बैटरी और रासायनिक उद्योगों में भी किया जाता है।
विश्व के महत्वपूर्ण मैंगनीज उत्पादक देशों में दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, चीन, गैबॉन और भारत शामिल हैं।
Bauxite (बॉक्साइट) एल्युमिनियम का प्रमुख अयस्क है। एल्युमिनियम हल्का, अपेक्षाकृत मजबूत और जंग-प्रतिरोधी होने के कारण विमान, वाहन, विद्युत उपकरण, पैकेजिंग और निर्माण में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
बॉक्साइट कई उष्ण एवं आर्द्र क्षेत्रों में लंबे समय तक होने वाले तीव्र रासायनिक अपक्षय तथा Lateritization (लेटराइटीकरण) से संबंधित उच्चभूमि क्षेत्रों में पाया जाता है।
विश्व के प्रमुख बॉक्साइट उत्पादक देशों में ऑस्ट्रेलिया, गिनी, चीन, ब्राजील और भारत शामिल हैं।
तांबा एक महत्वपूर्ण अलौहधात्विक खनिज है। इसकी विद्युत एवं तापीय चालकता अधिक होने के कारण इसका उपयोग विद्युत तार, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, संचार उपकरण और विभिन्न मिश्रधातुओं में किया जाता है।
विश्व के प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्रों में चिली, पेरू, चीन, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका महत्वपूर्ण हैं।
चिली का Andes क्षेत्र विश्व के प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्रों में से एक है।
सोना एक बहुमूल्य धातु है जिसका उपयोग आभूषणों, निवेश, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में होता है। इसकी उच्च मूल्य-सघनता और रासायनिक स्थिरता के कारण इसका आर्थिक महत्व भी अधिक है।
विश्व के महत्वपूर्ण सोना उत्पादक देशों में चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं।
ऐसे खनिज जिनसे सामान्यतः धातु प्राप्त नहीं की जाती, अधात्विक खनिज कहलाते हैं।
प्रमुख उदाहरण:
चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है, जबकि फॉस्फेट और पोटाश उर्वरक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं।
चूना पत्थर का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग Cement Industry (सीमेंट उद्योग) में होता है। इसके अलावा इसका उपयोग लौह एवं इस्पात उद्योग में फ्लक्स, निर्माण तथा रासायनिक उद्योग में भी किया जाता है।
चूना पत्थर का वितरण मुख्यतः तलछटी चट्टानों और प्राचीन समुद्री निक्षेपों से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका वितरण कई अवसादी बेसिनों में पाया जाता है।
ऊर्जा संसाधन वे प्राकृतिक स्रोत हैं जिनसे उपयोगी ऊर्जा प्राप्त की जाती है। इन्हें अलग-अलग आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस परंपरागत तथा अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधन हैं। सौर, पवन, जलविद्युत, भू-तापीय और ज्वारीय ऊर्जा सामान्यतः नवीकरणीय स्रोतों में शामिल हैं। ध्यान रहे कि परंपरागत और नवीकरणीय एक-दूसरे के पूर्णतः विपरीत वर्ग नहीं हैं; जलविद्युत इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
कोयला प्राचीन वनस्पति पदार्थों के लंबे समय तक दबाव और ताप के प्रभाव से बनने वाला जीवाश्म ईंधन है। यह एक Non-Renewable Resource (अनवीकरणीय संसाधन) है।
कोयले के प्रमुख प्रकार:
सामान्यतः कोयले के Coalification (कोयलीकरण) की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर कार्बन की मात्रा और ऊष्मीय क्षमता बढ़ती है तथा नमी घटती है। एन्थ्रासाइट सबसे उच्च श्रेणी का कोयला माना जाता है।
भारत के अधिकांश गोंडवाना कोयले बिटुमिनस श्रेणी के हैं, जबकि तमिलनाडु का नेवेली क्षेत्र लिग्नाइट के लिए प्रसिद्ध है।
विश्व के प्रमुख कोयला क्षेत्र चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस में पाए जाते हैं।
कोयले का उपयोग तापीय विद्युत उत्पादन, इस्पात उद्योग तथा विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
पेट्रोलियम एक जीवाश्म ईंधन है जो मुख्यतः तलछटी बेसिनों में जैविक पदार्थों के लंबे समय तक दबाव और ताप के प्रभाव से भूगर्भीय प्रक्रियाओं द्वारा बनता है।
इसे अक्सर Black Gold (काला सोना) कहा जाता है क्योंकि इसका आर्थिक एवं रणनीतिक महत्व अत्यधिक है।
पेट्रोलियम से पेट्रोल, डीजल, केरोसीन, जेट ईंधन, लुब्रिकेंट्स तथा अनेक पेट्रोकेमिकल उत्पाद प्राप्त होते हैं।
पेट्रोलियम सामान्यतः अवसादी शैलों में Traps (भूगर्भीय फंदों/संरचनाओं) के भीतर संचित होता है।
विश्व के महत्वपूर्ण पेट्रोलियम क्षेत्रों में पश्चिम एशिया, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, वेनेजुएला और अफ्रीका के कुछ क्षेत्र शामिल हैं।
Persian Gulf क्षेत्र का वैश्विक ऊर्जा भूगोल में विशेष महत्व है क्योंकि यहाँ विशाल पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संसाधन पाए जाते हैं।
प्राकृतिक गैस एक गैसीय जीवाश्म ईंधन है जिसका प्रमुख घटक मीथेन (Methane) होता है। यह कोयले और पेट्रोलियम की तुलना में सामान्यतः कम कार्बन-उत्सर्जन वाला जीवाश्म ईंधन माना जाता है, लेकिन यह शून्य-उत्सर्जन ऊर्जा स्रोत नहीं है।
इसका उपयोग विद्युत उत्पादन, उर्वरक उद्योग, घरेलू ईंधन, औद्योगिक बॉयलर तथा CNG (Compressed Natural Gas) के रूप में परिवहन में किया जाता है।
प्राकृतिक गैस को पाइपलाइनों के माध्यम से लंबी दूरी तक पहुँचाया जा सकता है। LNG (Liquefied Natural Gas) के रूप में इसे समुद्री परिवहन द्वारा भी ले जाया जा सकता है।
Uranium (यूरेनियम) परमाणु ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख ईंधन है। परमाणु रिएक्टरों में Nuclear Fission (नाभिकीय विखंडन) के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त की जाती है।
परमाणु ऊर्जा की प्रमुख विशेषता यह है कि अपेक्षाकृत कम मात्रा के ईंधन से बहुत अधिक ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
विश्व के महत्वपूर्ण यूरेनियम उत्पादक देशों में कजाखस्तान, कनाडा, नामीबिया, ऑस्ट्रेलिया और रूस शामिल हैं।
सूर्य से प्राप्त विकिरण ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं। यह Renewable Energy (नवीकरणीय ऊर्जा) का प्रमुख स्रोत है।
उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्ण क्षेत्रों में पर्याप्त सौर विकिरण मिलने के कारण सौर ऊर्जा की व्यापक संभावनाएँ हैं। भारत में विशेष रूप से पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उच्च सौर क्षमता पाई जाती है।
सौर ऊर्जा का उपयोग बिजली उत्पादन, जल गर्म करने, सिंचाई पंप तथा विकेंद्रीकृत ग्रामीण ऊर्जा प्रणालियों में किया जा सकता है।
गतिशील वायु की ऊर्जा को Wind Turbine (पवन टर्बाइन) के माध्यम से विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है।
पवन ऊर्जा के लिए पर्याप्त और अपेक्षाकृत निरंतर गति वाली हवाएँ आवश्यक होती हैं। तटीय क्षेत्र, खुले मैदान तथा कुछ पर्वतीय दर्रों के आसपास इसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिल सकती हैं।
चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, भारत और अन्य देशों में पवन ऊर्जा का व्यापक उपयोग किया जाता है।
नदियों और ऊँचाई के अंतर से प्राप्त जल की स्थितिज ऊर्जा को टर्बाइन के माध्यम से विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है।
पर्वतीय और पठारी क्षेत्रों में तीव्र ढाल तथा पर्याप्त जल प्रवाह होने के कारण जलविद्युत की अच्छी संभावनाएँ होती हैं।
इसके लाभों में नवीकरणीय प्रकृति और बिजली उत्पादन के साथ सिंचाई तथा बाढ़ नियंत्रण जैसी बहुउद्देशीय उपयोगिता शामिल हो सकती है।
लेकिन बड़े बाँधों से विस्थापन, पारिस्थितिक परिवर्तन, तलछट की समस्या, मछली एवं जलीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव और नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं।
पृथ्वी के आंतरिक ताप से प्राप्त ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं। यह विशेष रूप से ज्वालामुखीय एवं विवर्तनिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में अधिक संभावित होती है।
आइसलैंड, न्यूजीलैंड, जापान, इंडोनेशिया और संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ क्षेत्र इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
समुद्र में ज्वार-भाटा और लहरों की ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है। ज्वारीय ऊर्जा मुख्यतः ज्वार की ऊँचाई में पर्याप्त अंतर तथा अनुकूल तटीय भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
फ्रांस, दक्षिण कोरिया और चीन में ज्वारीय ऊर्जा की महत्वपूर्ण परियोजनाएँ विकसित की गई हैं।
कृषि अवशेष, लकड़ी, पशु अपशिष्ट तथा अन्य जैविक पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा को बायोमास ऊर्जा कहा जाता है।
बायोगैस, बायोफ्यूल और बायोमास आधारित बिजली इसके प्रमुख रूप हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह ऊर्जा स्थानीय संसाधनों के उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और ऊर्जा की विकेंद्रीकृत उपलब्धता में सहायक हो सकती है। हालांकि इसके लिए टिकाऊ Biomass Supply (जैव-द्रव्य आपूर्ति) सुनिश्चित करना आवश्यक है।
| संसाधन | प्रमुख क्षेत्र/देश |
|---|---|
| लौह अयस्क | ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, भारत, रूस |
| तांबा | चिली, पेरू, चीन, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य |
| बॉक्साइट | ऑस्ट्रेलिया, गिनी, चीन, ब्राजील, भारत |
| सोना | चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा |
| कोयला | चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, रूस |
| पेट्रोलियम | पश्चिम एशिया, रूस, अमेरिका, कनाडा, वेनेजुएला |
| प्राकृतिक गैस | रूस, ईरान, कतर, अमेरिका, तुर्कमेनिस्तान |
| यूरेनियम | कजाखस्तान, कनाडा, नामीबिया, ऑस्ट्रेलिया |
खनिजों का वितरण मुख्यतः भूगर्भीय इतिहास और चट्टानों की प्रकृति पर निर्भर करता है। इसके प्रमुख कारक हैं:
उदाहरण के लिए, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मुख्यतः तलछटी बेसिनों से संबंधित हैं, जबकि कई धात्विक खनिज प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानों, आग्नेय-कायांतरित प्रक्रियाओं और विवर्तनिक क्षेत्रों से जुड़े होते हैं।
| खनिज/संसाधन | मुख्य उपयोग | प्रमुख क्षेत्र/उदाहरण |
|---|---|---|
| लौह अयस्क | लौह एवं इस्पात उद्योग | ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, भारत |
| मैंगनीज | इस्पात, मिश्रधातु | दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, भारत |
| बॉक्साइट | एल्युमिनियम उत्पादन | ऑस्ट्रेलिया, गिनी, भारत |
| तांबा | विद्युत, इलेक्ट्रॉनिक्स, मिश्रधातु | चिली, पेरू, चीन |
| चूना पत्थर | सीमेंट, निर्माण, इस्पात उद्योग | भारत के अनेक अवसादी क्षेत्र |
| कोयला | तापीय विद्युत, इस्पात उद्योग | चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया |
| पेट्रोलियम | ईंधन, पेट्रोकेमिकल उद्योग | पश्चिम एशिया, रूस, अमेरिका |
| प्राकृतिक गैस | विद्युत, उर्वरक, CNG | रूस, अमेरिका, पश्चिम एशिया |
| यूरेनियम | परमाणु ऊर्जा | कजाखस्तान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया |
खनिज संसाधन किसी देश के औद्योगिक विकास के लिए आधारभूत कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। लौह अयस्क और कोयला इस्पात उद्योग से, चूना पत्थर सीमेंट उद्योग से और बॉक्साइट एल्युमिनियम उद्योग से जुड़ा हुआ है।
इसी कारण कई औद्योगिक क्षेत्र खनिज संसाधनों के निकट विकसित हुए हैं। इसे Raw Material Orientation (कच्चे माल की ओर अवस्थिति) के रूप में समझा जा सकता है। हालांकि आधुनिक परिवहन और तकनीक के कारण उद्योगों का स्थान केवल कच्चे माल की उपलब्धता से तय नहीं होता।
ऊर्जा की उपलब्धता किसी देश की औद्योगिक क्षमता, परिवहन, कृषि उत्पादकता और जीवन स्तर को प्रभावित करती है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का महत्व केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। पेट्रोकेमिकल उद्योग के माध्यम से प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर, उर्वरक और अनेक रासायनिक उत्पादों का निर्माण होता है।
ऊर्जा संसाधनों का असमान वितरण वैश्विक Geopolitics (भू-राजनीति) को प्रभावित करता है।
पेट्रोलियम और गैस के प्रमुख क्षेत्रों तथा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के बीच संबंध वैश्विक व्यापार और रणनीतिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
Hormuz Strait, Strait of Malacca और Bab-el-Mandeb जैसे समुद्री मार्ग ऊर्जा व्यापार के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
अधिकांश खनिज Non-Renewable Resources (अनवीकरणीय संसाधन) हैं। इनका निर्माण मानव समय-मान की तुलना में अत्यंत धीमी गति से होता है। इसलिए इनके विवेकपूर्ण उपयोग और पुनर्चक्रण की आवश्यकता है।
संरक्षण के प्रमुख उपाय:
विश्व की ऊर्जा व्यवस्था धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करके कम-कार्बन और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ रही है।
इस परिवर्तन में Solar, Wind, Hydropower, Nuclear Energy, Battery Storage, Green Hydrogen और अन्य कम-कार्बन तकनीकों की भूमिका बढ़ रही है।
लेकिन ऊर्जा संक्रमण के लिए केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर्याप्त नहीं है। ऊर्जा भंडारण, विद्युत ग्रिड, महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता, तकनीकी क्षमता, निवेश और विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति भी आवश्यक हैं।
आधुनिक तकनीक, रक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संक्रमण के लिए कुछ खनिज विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। इन्हें Critical Minerals (महत्वपूर्ण खनिज) कहा जाता है।
किसी खनिज का Critical होना केवल उसके दुर्लभ होने पर निर्भर नहीं करता। उसके आर्थिक महत्व और आपूर्ति जोखिम (Supply Risk) भी महत्वपूर्ण होते हैं।
इनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और Rare Earth Elements (दुर्लभ मृदा तत्व) जैसे खनिज शामिल हो सकते हैं।
इनका उपयोग बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर पैनल, पवन टर्बाइन, रक्षा उपकरण और उच्च-तकनीकी उद्योगों में होता है।
इसलिए आधुनिक खनन में Sustainable Mining (सतत खनन), भूमि पुनर्वास, वैज्ञानिक Mine Closure (खनन बंदी) और पर्यावरणीय प्रबंधन का महत्व बढ़ रहा है।
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के दहन से कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
इसलिए ऊर्जा क्षेत्र जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, विद्युतीकरण, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ ईंधन और ऊर्जा भंडारण इस परिवर्तन के प्रमुख घटक हैं।
प्रश्न: विश्व में खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों का वितरण असमान क्यों है? इसके आर्थिक एवं भू-राजनीतिक प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर की दिशा: सबसे पहले खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की प्रकृति स्पष्ट करें। इसके बाद भूगर्भीय संरचना, प्लेट विवर्तनिकी, तलछटी बेसिन, चट्टानों की प्रकृति और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर वितरण की व्याख्या करें।
इसके बाद औद्योगिक विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक समुद्री मार्ग और भू-राजनीति पर प्रभाव लिखें। अंत में ऊर्जा संक्रमण, संसाधन संरक्षण, Recycling और सतत विकास की आवश्यकता का उल्लेख करें।
खनिज एवं ऊर्जा संसाधन आधुनिक सभ्यता और आर्थिक विकास की आधारभूत आवश्यकताएँ हैं। लेकिन इनके असमान वितरण, सीमित भंडार, पर्यावरणीय प्रभाव और भू-राजनीतिक महत्व के कारण इनका वैज्ञानिक एवं सतत प्रबंधन आवश्यक है।
भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था में नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, ऊर्जा भंडारण, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति, Recycling और तकनीकी नवाचार की भूमिका लगातार बढ़ेगी।