पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले प्रमुख स्थलरूपों में पर्वत (Mountains), पठार (Plateaus) और मैदान (Plains) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका वर्तमान स्वरूप पृथ्वी की अंतर्जात (Endogenic) तथा बहिर्जात (Exogenic) प्रक्रियाओं की दीर्घकालीन क्रियाओं का परिणाम है।
इन स्थलरूपों का प्रभाव केवल भौतिक भूगोल तक सीमित नहीं है। कृषि, जल संसाधन, खनिज, उद्योग, परिवहन, जनसंख्या वितरण, जलवायु, जैव-विविधता और मानव सभ्यताओं के विकास पर भी इनका गहरा प्रभाव पड़ता है।
पर्वत, पठार और मैदान के निर्माण तथा परिवर्तन को समझने के लिए पृथ्वी की आंतरिक एवं बाहरी शक्तियों को समझना आवश्यक है।
पर्वत पृथ्वी की सतह के ऐसे ऊँचे भू-भाग हैं जो आसपास के क्षेत्र की तुलना में काफी ऊँचे होते हैं और सामान्यतः तीव्र ढाल तथा ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति प्रदर्शित करते हैं। पर्वत की पहचान केवल उसकी ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसके सापेक्ष उत्थान और स्थलाकृति से भी की जाती है।
पर्वतों का निर्माण मुख्यतः वलन, भ्रंशन, ज्वालामुखीय गतिविधि और भू-पर्पटी के उत्थान जैसी प्रक्रियाओं से हो सकता है। लंबे समय तक अपरदन इनके वर्तमान स्वरूप को लगातार बदलता रहता है।
1. वलित पर्वत (Fold Mountains)
जब प्लेटों की गति के कारण संपीडनात्मक बल चट्टानों पर कार्य करते हैं, तो चट्टानी परतों में वलन पड़ सकता है। लंबे समय में इन वलनों तथा संबंधित उत्थान से विशाल पर्वत श्रृंखलाओं का निर्माण हो सकता है।
विश्व के कई युवा वलित पर्वत सक्रिय या अपेक्षाकृत सक्रिय प्लेट अभिसरण क्षेत्रों से संबंधित हैं।
2. भ्रंशोत्थ पर्वत (Block Mountains)
भ्रंशन के कारण भू-पर्पटी के कुछ खंड ऊपर उठ सकते हैं तथा कुछ खंड नीचे धँस सकते हैं। ऊपर उठे हुए चट्टानी खंडों से भ्रंशोत्थ पर्वत विकसित हो सकते हैं।
3. ज्वालामुखीय पर्वत (Volcanic Mountains)
ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा, राख और अन्य ज्वालामुखीय पदार्थों के बार-बार जमाव से ज्वालामुखीय पर्वत बन सकते हैं।
4. अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains)
लंबे समय तक अपक्षय और अपरदन के बाद अधिक कठोर चट्टानों के अपेक्षाकृत कम अपरदित भाग ऊँचे भू-भाग के रूप में बचे रह सकते हैं। ऐसे पर्वतीय अवशेषों को अवशिष्ट पर्वत कहा जाता है।
भारत की अरावली पर्वतमाला को अत्यंत प्राचीन एवं लंबे समय से अपरदित पर्वतीय प्रणाली के उदाहरण के रूप में समझा जाता है।
पर्वतों को उनकी भूवैज्ञानिक आयु, संरचना और अपरदन की अवस्था के आधार पर सामान्यतः युवा और प्राचीन पर्वतों के रूप में समझाया जाता है।
युवा पर्वत सामान्यतः अधिक ऊँचे, तीव्र ढाल वाले और अपेक्षाकृत अधिक ऊबड़-खाबड़ हो सकते हैं। हिमालय और आल्प्स इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
प्राचीन पर्वत लंबे समय तक अपक्षय और अपरदन के कारण अपेक्षाकृत नीची तथा गोलाकार आकृति ग्रहण कर सकते हैं। अरावली और एपलाचियन इसके उदाहरण हैं।
हिमालय भारतीय प्लेट और यूरेशियाई प्लेट के अभिसरण से संबंधित युवा वलित पर्वत प्रणाली है। भारतीय प्लेट का उत्तर की ओर निरंतर अभिसरण इस क्षेत्र को सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र बनाए रखता है और यहाँ भूकंपीय गतिविधि का जोखिम भी महत्वपूर्ण है।
हिमालय की ऊँचाई, हिमनद और नदियाँ भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु, जल संसाधन, कृषि और पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
पर्वत वायुमंडलीय परिसंचरण और वर्षा के वितरण को प्रभावित करते हैं। नम हवाएँ पर्वत की पवनाभिमुख ढाल पर ऊपर उठती हैं और ठंडी होकर संघनित होती हैं, जिससे Orographic Rainfall (पर्वतीय वर्षा) हो सकती है।
पर्वत की दूसरी ओर स्थित क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसे Rain Shadow Effect (वर्षाछाया प्रभाव) कहा जाता है।
ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान, वर्षा और नमी की स्थितियों में परिवर्तन होता है। इसलिए पर्वतों में ऊँचाई के साथ वनस्पति और जैव-विविधता के क्षेत्र बदलते जाते हैं।
इसे Altitudinal Zonation (ऊँचाई के अनुसार पारिस्थितिक क्षेत्रीयता) कहा जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित दूरी के भीतर अनेक प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र मिल सकते हैं।
पठार ऊँचे तथा अपेक्षाकृत समतल या हल्की ढाल वाले विस्तृत भू-भाग हैं। इन्हें सामान्यतः Tablelands भी कहा जाता है।
पठारों का निर्माण भूगर्भीय उत्थान, ज्वालामुखीय लावा, अपरदन, निक्षेपण तथा अन्य भू-आकृतिक प्रक्रियाओं से हो सकता है। इसलिए सभी पठारों का निर्माण एक ही प्रक्रिया से नहीं होता।
1. अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau)
दो या अधिक पर्वत प्रणालियों के बीच स्थित ऊँचे पठारों को अंतरापर्वतीय पठार कहा जाता है।
2. पादपर्वतीय पठार (Piedmont Plateau)
पर्वतीय क्षेत्र के पादप्रदेश के निकट स्थित पठारी या उच्चभूमि क्षेत्रों को पादपर्वतीय पठार कहा जाता है। इनमें पर्वत और निम्नभूमि के बीच संक्रमण की विशेषताएँ मिल सकती हैं।
3. महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau)
बड़े महाद्वीपीय भू-भागों में विस्तृत पठारी क्षेत्र महाद्वीपीय पठार कहलाते हैं।
4. ज्वालामुखीय पठार (Volcanic Plateau)
अत्यधिक मात्रा में लावा के विस्तृत क्षेत्र में फैलकर ठंडा होने से ज्वालामुखीय पठार बन सकते हैं।
भारत का दक्कन पठार विशाल बेसाल्टिक लावा प्रवाह से संबंधित एक प्रमुख उदाहरण है।
दक्कन क्षेत्र का बड़ा भाग प्राचीन विशाल बेसाल्टिक लावा प्रवाह से निर्मित है। इन लावा प्रवाहों ने विस्तृत क्षेत्र को ढक लिया और बाद में अपक्षय तथा अपरदन ने वर्तमान स्थलरूप को विकसित किया।
दक्कन ट्रैप क्षेत्र की बेसाल्टिक चट्टानें काली मिट्टी के निर्माण से भी जुड़ी हैं, जो विशेष रूप से कपास की खेती के लिए महत्वपूर्ण है।
कई प्राचीन पठारी क्षेत्रों में कठोर आग्नेय और कायांतरित चट्टानें तथा धात्विक खनिज पाए जाते हैं। इसलिए अनेक पठारी क्षेत्र खनन एवं खनिज आधारित उद्योगों के महत्वपूर्ण केंद्र बने हैं।
पठारी क्षेत्रों में नदियाँ कठोर चट्टानों तथा ऊँचाई में अचानक परिवर्तन वाले भागों से होकर बह सकती हैं। ढाल में पर्याप्त परिवर्तन होने पर जलप्रपात विकसित हो सकते हैं।
इसी कारण कुछ पठारी क्षेत्रों में जलविद्युत उत्पादन की महत्वपूर्ण संभावनाएँ पाई जाती हैं।
मैदान विस्तृत, अपेक्षाकृत समतल और कम ढाल वाले भू-भाग हैं। ये नदियों, समुद्र, हिमनदों तथा पवन द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण से या कुछ क्षेत्रों में दीर्घकालीन अपरदन से विकसित हो सकते हैं।
1. जलोढ़ मैदान (Alluvial Plains)
नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण से बनने वाले मैदान जलोढ़ मैदान कहलाते हैं।
2. बाढ़ मैदान (Flood Plains)
नदी के किनारे बाढ़ के दौरान अवसादों के निक्षेपण से बनने वाले मैदानों को बाढ़ मैदान कहा जाता है।
बाढ़ मैदान सामान्यतः उपजाऊ होते हैं, लेकिन बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण यहाँ आपदा जोखिम भी अधिक हो सकता है।
3. तटीय मैदान (Coastal Plains)
समुद्र के किनारे स्थित अपेक्षाकृत समतल भू-भाग तटीय मैदान कहलाते हैं। इनके निर्माण में समुद्री निक्षेपण, नदी निक्षेपण, तटीय उत्थान और समुद्र-स्तर में परिवर्तन जैसी प्रक्रियाओं की भूमिका हो सकती है।
हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ अवसादों से निर्मित भारत का उत्तरी मैदान कृषि, जनसंख्या और परिवहन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके कुछ प्रमुख भौगोलिक भाग निम्न हैं:
मैदानों में सामान्यतः समतल भूमि, उपजाऊ मिट्टी और जल की उपलब्धता के कारण कृषि का विकास अपेक्षाकृत आसान होता है।
विशेषकर जलोढ़ मैदानों में नदियों द्वारा नए अवसादों के निक्षेपण के कारण मिट्टी की उर्वरता बनी रह सकती है। हालांकि अत्यधिक बाढ़, जलभराव, लवणता और नदी-तट अपरदन जैसी समस्याएँ कृषि को प्रभावित कर सकती हैं।
विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ नदी घाटियों और मैदानों में विकसित हुईं क्योंकि यहाँ जल, कृषि योग्य भूमि और परिवहन की सुविधाएँ उपलब्ध थीं।
कुछ मैदानों या विस्तृत समतल/हल्की ढाल वाले क्षेत्रों में जलवायु और वर्षा की परिस्थितियों के अनुसार विशाल घासभूमियाँ विकसित हुई हैं।
मैदानों में कम ढाल और अपेक्षाकृत समतल सतह के कारण सड़क, रेलमार्ग और नहरों का निर्माण पर्वतीय क्षेत्रों की तुलना में सामान्यतः आसान होता है।
इसी कारण मैदानों में बड़े शहर, औद्योगिक केंद्र और परिवहन नेटवर्क अधिक विकसित हो सकते हैं। हालांकि बाढ़, जलभराव और नदी-पथ परिवर्तन जैसी समस्याएँ आधारभूत संरचना के लिए चुनौती बन सकती हैं।
| आधार | पर्वत | पठार | मैदान |
|---|---|---|---|
| सापेक्ष ऊँचाई | सामान्यतः अधिक | सामान्यतः आसपास के मैदान से अधिक | सामान्यतः कम |
| सतह | ऊबड़-खाबड़ एवं तीव्र ढाल | ऊँची एवं अपेक्षाकृत समतल | समतल या हल्की ढाल |
| प्रमुख संसाधन | जल, वन, जैव-विविधता, पर्यटन | खनिज, जलविद्युत | उपजाऊ मिट्टी, कृषि, जल |
| जनसंख्या | सामान्यतः कम | क्षेत्रानुसार भिन्न | सामान्यतः अधिक |
| परिवहन | अपेक्षाकृत कठिन | क्षेत्रानुसार मध्यम कठिनाई | अपेक्षाकृत आसान |
ये तीनों स्थलरूप पूरी तरह अलग-अलग और स्थिर इकाइयाँ नहीं हैं। एक ही क्षेत्र में इनके बीच संक्रमण हो सकता है और भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ लगातार इनके स्वरूप को बदलती रहती हैं।
उदाहरण के लिए, पर्वतीय क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ अवसाद लेकर आती हैं। निचले भागों में यही अवसाद जमा होकर जलोढ़ मैदान का निर्माण कर सकते हैं।
नदी के ऊपरी भाग में अधिक ढाल के कारण ऊर्ध्वाधर अपरदन की भूमिका सामान्यतः अधिक होती है। मध्य भाग में परिवहन और पार्श्व अपरदन का महत्व बढ़ सकता है, जबकि निचले भाग में निक्षेपण अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। यह एक सामान्य प्रवृत्ति है और प्रत्येक नदी में बिल्कुल समान रूप से नहीं होती।
जलवायु परिवर्तन पर्वतीय हिमनदों, बर्फ के संचय, पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र और नदी प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। हिमनदों के द्रव्यमान में परिवर्तन से पर्वतीय नदियों के जल प्रवाह की मौसमी प्रकृति भी प्रभावित हो सकती है।
मैदानों में समुद्र-स्तर वृद्धि, बाढ़ और तटीय अपरदन का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि पठारी एवं शुष्क क्षेत्रों में जल उपलब्धता, भूमि क्षरण और सूखे की समस्या प्रमुख चुनौतियाँ हो सकती हैं।
पर्वत, पठार और मैदान पृथ्वी के भौतिक भू-दृश्य की तीन महत्वपूर्ण इकाइयाँ हैं, लेकिन इनके बीच स्पष्ट सीमा हमेशा नहीं होती। अंतर्जात शक्तियाँ बड़े स्थलरूपों के निर्माण में भूमिका निभाती हैं, जबकि बहिर्जात शक्तियाँ उन्हें लगातार काटती, परिवहन करती और पुनः निर्मित करती रहती हैं।
पर्वत जल के प्रमुख स्रोत तथा जलवायु नियंत्रक हैं, पठार खनिज संसाधनों और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि मैदान कृषि, परिवहन, उद्योग और घनी मानव बस्तियों के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल होते हैं।
इसलिए इन तीनों स्थलरूपों का अध्ययन केवल उनकी आकृति के आधार पर नहीं, बल्कि निर्माण प्रक्रिया + संसाधन + जलवायु + मानव गतिविधि + पर्यावरणीय जोखिम के समन्वित दृष्टिकोण से करना चाहिए।
पर्वत, पठार और मैदान पृथ्वी के भौतिक भूगोल की आधारभूत स्थलाकृतियाँ हैं। इनका वर्तमान स्वरूप पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों तथा अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण जैसी बाहरी प्रक्रियाओं के दीर्घकालीन प्रभाव का परिणाम है।
इनका अध्ययन करते समय केवल उदाहरण याद करना पर्याप्त नहीं है। यह समझना आवश्यक है कि किस प्रक्रिया से कौन-सा स्थलरूप बना, वह कहाँ पाया जाता है, उसके संसाधन क्या हैं और मानव जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है।