महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents) क्या हैं?
महासागरों और समुद्रों के भीतर जल का अपेक्षाकृत नियमित एवं निश्चित दिशा में होने वाला
क्षैतिज प्रवाह महासागरीय धारा (Ocean Current) कहलाता है।
ये धाराएँ सतही जल से लेकर गहरे महासागरीय जल तक विभिन्न स्तरों पर पाई जाती हैं।
महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण भाग हैं।
वे निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर ऊष्मा के स्थानांतरण तथा
ठंडे जल के पुनर्वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- महासागरीय धाराएँ सतही और गहरे जल की हो सकती हैं।
- इनकी दिशा और गति पवन, कोरिओलिस बल, तापमान, लवणता, घनत्व तथा समुद्री बेसिन की आकृति से प्रभावित होती है।
- ये जलवायु, मत्स्य पालन, समुद्री परिवहन और समुद्री पारिस्थितिकी को प्रभावित करती हैं।
महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
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प्रचलित पवनें (Prevailing Winds):
सतही समुद्री धाराओं के निर्माण और दिशा निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।
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कोरिओलिस बल (Coriolis Force):
पृथ्वी के घूर्णन के कारण गतिशील जल की दिशा को मोड़ता है।
उत्तरी गोलार्ध में प्रवाह सामान्यतः दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ता है।
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तापमान का अंतर:
तापमान में अंतर समुद्री जल के घनत्व को प्रभावित करता है।
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लवणता (Salinity):
लवणता में परिवर्तन समुद्री जल के घनत्व में अंतर पैदा करता है।
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घनत्व का अंतर (Density Difference):
तापमान और लवणता से उत्पन्न घनत्व भिन्नता गहरे महासागरीय परिसंचरण को प्रभावित करती है।
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महाद्वीपों की स्थिति:
महाद्वीपों और समुद्री बेसिनों की आकृति धाराओं के मार्ग को मोड़ती और नियंत्रित करती है।
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समुद्र तल की आकृति:
गहरे समुद्री परिसंचरण के मार्ग में समुद्र तल की स्थलाकृति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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समुद्र तल की ऊँचाई में अंतर और दाब प्रवणता:
समुद्री जल के क्षैतिज वितरण और परिसंचरण को प्रभावित कर सकते हैं।
महासागरीय धाराओं के प्रमुख प्रकार
महासागरीय धाराओं को तापमान, गहराई और उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
तापमान के आधार पर इन्हें मुख्यतः गर्म और ठंडी धाराओं में बाँटा जाता है।
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गर्म धाराएँ (Warm Currents):
सामान्यतः निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर अपेक्षाकृत गर्म जल ले जाती हैं।
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ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
सामान्यतः उच्च अक्षांशों या ठंडे समुद्री क्षेत्रों से निम्न अक्षांशों की ओर अपेक्षाकृत ठंडा जल ले जाती हैं।
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सतही धाराएँ (Surface Currents):
मुख्यतः पवन, कोरिओलिस प्रभाव और समुद्री बेसिन की आकृति से प्रभावित होती हैं।
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गहरी समुद्री धाराएँ (Deep Ocean Currents):
मुख्यतः तापमान और लवणता से उत्पन्न घनत्व अंतर से प्रभावित होती हैं।
सतही महासागरीय धाराएँ
महासागर की ऊपरी परतों में बहने वाली धाराओं को सतही महासागरीय धाराएँ कहा जाता है।
इन पर वैश्विक पवन व्यवस्था और पृथ्वी के घूर्णन का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है।
- व्यापारिक पवनें उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सतही जल के पश्चिम की ओर प्रवाह को प्रभावित करती हैं।
- पछुआ पवनें मध्य और उच्च अक्षांशों में महासागरीय जल के प्रवाह को प्रभावित करती हैं।
- कोरिओलिस प्रभाव धाराओं की दिशा को मोड़ता है।
- महाद्वीपों की स्थिति के कारण धाराएँ मुड़कर बड़े महासागरीय परिसंचरण तंत्र बनाती हैं।
महासागरीय परिसंचरण चक्र (Ocean Gyres)
महासागर के भीतर बड़े पैमाने पर वृत्ताकार या अंडाकार रूप में घूमने वाली
सतही धाराओं की व्यवस्था को महासागरीय परिसंचरण चक्र (Ocean Gyre) कहते हैं।
- उत्तरी गोलार्ध के प्रमुख उपोष्णकटिबंधीय महासागरीय चक्र सामान्यतः दक्षिणावर्त घूमते हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध के प्रमुख उपोष्णकटिबंधीय महासागरीय चक्र सामान्यतः वामावर्त घूमते हैं।
- इनकी दिशा पर कोरिओलिस बल और महाद्वीपीय तटरेखाओं का प्रभाव होता है।
- व्यापारिक पवनें और पछुआ पवनें इनके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- महासागरीय चक्र ऊष्मा के पुनर्वितरण और समुद्री पारिस्थितिकी को प्रभावित करते हैं।
उत्तरी अटलांटिक महासागर की प्रमुख धाराएँ
- उत्तरी भूमध्यरेखीय धारा (North Equatorial Current): गर्म धारा, सामान्यतः पश्चिम की ओर बहती है।
- गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream): फ्लोरिडा जलडमरूमध्य से उत्तर-पूर्व की ओर बहने वाली शक्तिशाली गर्म धारा, जो उत्तर अटलांटिक परिसंचरण का महत्वपूर्ण भाग है।
- उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift): उत्तर अटलांटिक में गल्फ स्ट्रीम प्रणाली से संबंधित गर्म जल का पूर्वोत्तर की ओर परिवहन करती है।
- कैनरी धारा (Canary Current): ठंडी धारा, उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका के तट के पास दक्षिण की ओर बहती है।
- लैब्राडोर धारा (Labrador Current): ठंडी धारा, कनाडा के तट के पास दक्षिण की ओर बहती है।
- दक्षिण भूमध्यरेखीय धारा (South Equatorial Current): उष्णकटिबंधीय अटलांटिक में सामान्यतः पश्चिम की ओर बहती है।
दक्षिणी अटलांटिक की प्रमुख धाराएँ
- दक्षिण भूमध्यरेखीय धारा: गर्म जल को सामान्यतः पश्चिम की ओर ले जाती है।
- ब्राजील धारा (Brazil Current): गर्म धारा, दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है।
- बेंगुएला धारा (Benguela Current): ठंडी धारा, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका के तट के साथ उत्तर की ओर बहती है।
- फॉकलैंड/माल्विनास धारा (Falkland/Malvinas Current): ठंडी धारा, दक्षिण अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट के पास उत्तर की ओर बहती है।
- दक्षिण अटलांटिक धारा: पछुआ पवनों से प्रभावित होकर सामान्यतः पूर्व की ओर बहती है।
उत्तरी प्रशांत महासागर की प्रमुख धाराएँ
- उत्तरी भूमध्यरेखीय धारा: गर्म धारा, सामान्यतः पश्चिम की ओर बहती है।
- कुरोशियो धारा (Kuroshio Current): गर्म धारा, जापान के तट के पास उत्तर-पूर्व की ओर बहती है।
- उत्तरी प्रशांत धारा (North Pacific Current): पछुआ पवनों से प्रभावित होकर पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।
- कैलिफोर्निया धारा (California Current): ठंडी धारा, उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है।
- अलास्का धारा (Alaska Current): अपेक्षाकृत गर्म धारा, उत्तरी प्रशांत के उत्तर-पूर्वी भाग में बहती है।
दक्षिणी प्रशांत महासागर की प्रमुख धाराएँ
- दक्षिण भूमध्यरेखीय धारा: पश्चिम की ओर बहने वाली गर्म धारा।
- पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current): गर्म धारा, ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है।
- पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru/Humboldt Current): ठंडी धारा, दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के साथ उत्तर की ओर बहती है।
- दक्षिण प्रशांत धारा: उच्च दक्षिणी अक्षांशों में पछुआ पवनों से प्रभावित होकर सामान्यतः पूर्व की ओर बहती है।
हिंद महासागर की महासागरीय धाराएँ
हिंद महासागर की विशेषता यह है कि इसके उत्तरी भाग में मानसूनी पवनों के कारण
सतही महासागरीय परिसंचरण में स्पष्ट मौसमी परिवर्तन दिखाई देता है।
- दक्षिण भूमध्यरेखीय धारा
- सोमाली धारा (Somali Current)
- मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current)
- अगुलहास धारा (Agulhas Current)
- पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current)
- मानसूनी धाराएँ (Monsoon Currents)
उत्तरी हिंद महासागर में ग्रीष्म और शीत ऋतु में मानसूनी पवनों की दिशा बदलने के कारण
सतही समुद्री परिसंचरण की दिशा और तीव्रता में महत्वपूर्ण मौसमी परिवर्तन होता है।
सोमाली धारा (Somali Current)
सोमाली धारा अफ्रीका के पूर्वी तट के पास पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित
एक महत्वपूर्ण मौसमी धारा है। इसकी दिशा और तीव्रता मानसूनी पवनों के साथ बदलती है।
- दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दौरान यह उत्तर की ओर तीव्र प्रवाह विकसित कर सकती है।
- गर्मियों में सोमाली तट के पास पवन-प्रेरित अपवेलिंग विकसित होती है।
- अपवेलिंग के कारण पोषक तत्वों से भरपूर गहरा जल सतह के पास आता है।
- इससे समुद्री जैव उत्पादकता और मत्स्य संसाधनों को बढ़ावा मिल सकता है।
अगुलहास धारा (Agulhas Current)
अगुलहास धारा दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट के साथ
बहने वाली एक शक्तिशाली गर्म धारा है।
- यह दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के पास सामान्यतः दक्षिण की ओर बहती है।
- यह दक्षिण अफ्रीका के तटीय जलवायु को प्रभावित करती है।
- यह दक्षिणी महासागर की परिसंचरण प्रणाली से जुड़ी महत्वपूर्ण गर्म धारा है।
- इसका जल आगे दक्षिण की ओर पहुँचकर महासागरीय ऊष्मा के पुनर्वितरण में योगदान देता है।
अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current)
अंटार्कटिका के चारों ओर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली विशाल समुद्री धारा को
अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current - ACC)
कहा जाता है।
- यह पृथ्वी की सबसे बड़ी निरंतर महासागरीय धारा प्रणाली मानी जाती है।
- इसे सामान्यतः West Wind Drift भी कहा जाता है।
- यह अटलांटिक, प्रशांत और हिंद महासागरों के बीच जल के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- अंटार्कटिका को चारों ओर से घेरने वाली यह धारा दक्षिणी महासागर की प्रमुख विशेषता है।
- यह वैश्विक ऊष्मा, कार्बन और पोषक तत्वों के महासागरीय परिसंचरण में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
गर्म और ठंडी धाराओं का जलवायु पर प्रभाव
महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान और आर्द्रता को प्रभावित करती हैं।
गर्म धाराएँ सामान्यतः तटीय क्षेत्रों में ऊष्मा और नमी की उपलब्धता बढ़ा सकती हैं,
जबकि ठंडी धाराएँ तटीय वातावरण को अपेक्षाकृत ठंडा और कई परिस्थितियों में शुष्क बनाने में योगदान करती हैं।
- गर्म धाराएँ वायुमंडल को ऊष्मा प्रदान कर सकती हैं।
- ठंडी धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान को कम कर सकती हैं।
- ठंडी धाराओं वाले तटों पर स्थिर वायु और कम वर्षा की परिस्थितियाँ विकसित हो सकती हैं।
- गर्म और ठंडी धाराओं के मिलन वाले क्षेत्रों में घना कोहरा बन सकता है।
महासागरीय धाराएँ और मरुस्थल
महाद्वीपों के पश्चिमी तटों के पास बहने वाली ठंडी धाराएँ कई उपोष्णकटिबंधीय
क्षेत्रों में शुष्क परिस्थितियों के विकास में योगदान करती हैं।
हालांकि किसी मरुस्थल की उत्पत्ति केवल समुद्री धारा से नहीं होती; उपोष्ण उच्च दाब,
वायुमंडलीय परिसंचरण और स्थलाकृति भी महत्वपूर्ण हैं।
- पेरू/हम्बोल्ट धारा: अटाकामा मरुस्थल की अत्यधिक शुष्कता में योगदान करती है।
- बेंगुएला धारा: नामीब मरुस्थल की शुष्क परिस्थितियों में योगदान करती है।
- कैनरी धारा: उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका के तटीय क्षेत्रों की शुष्कता में योगदान करती है।
- कैलिफोर्निया धारा: पश्चिमी उत्तरी अमेरिका के तटीय जलवायु को प्रभावित करती है।
अपवेलिंग (Upwelling)
जब महासागर की गहराई में स्थित ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर जल ऊपर उठकर
सतह के निकट आता है, तो इस प्रक्रिया को अपवेलिंग (Upwelling) कहते हैं।
- ठंडा गहरा जल सतह के पास आता है।
- नाइट्रेट, फॉस्फेट और अन्य पोषक तत्व सतही जल में पहुँचते हैं।
- फाइटोप्लवक की वृद्धि बढ़ सकती है।
- इसके कारण समुद्री खाद्य श्रृंखला और मत्स्य उत्पादन अत्यधिक समृद्ध हो सकता है।
- पेरू-चिली तट विश्व के प्रमुख तटीय अपवेलिंग क्षेत्रों में से एक है।
- दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दौरान अरब सागर में भी महत्वपूर्ण अपवेलिंग होती है।
डाउनवेलिंग (Downwelling)
जब सतही समुद्री जल नीचे की ओर जाकर गहराई में पहुँचता है,
तो इस प्रक्रिया को डाउनवेलिंग (Downwelling) कहा जाता है।
- यह सतह से गहरे महासागर तक ऑक्सीजन पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
- ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडा और सघन जल नीचे जाने से गहरे समुद्री परिसंचरण को बढ़ावा मिलता है।
- यह वैश्विक महासागरीय परिसंचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation)
तापमान और लवणता से उत्पन्न समुद्री जल के घनत्व में अंतर के कारण होने वाले
गहरे महासागरीय परिसंचरण को थर्मोहेलाइन परिसंचरण कहा जाता है।
इसमें Thermo तापमान और Haline लवणता को दर्शाता है।
- ठंडा और अधिक लवणीय जल सामान्यतः अधिक सघन होता है।
- अधिक सघन जल नीचे की ओर डूब सकता है।
- गहरा जल महासागरों में लंबी दूरी तक प्रवाहित हो सकता है।
- यह वैश्विक ऊष्मा और पोषक तत्वों के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- इसे व्यापक रूप से Global Ocean Conveyor Belt की अवधारणा से जोड़ा जाता है।
महासागरीय धाराएँ और मत्स्य पालन
अपवेलिंग वाले क्षेत्रों तथा कुछ गर्म-ठंडी धाराओं के मिलन वाले क्षेत्रों में
पोषक तत्वों की उपलब्धता अधिक हो सकती है। इससे समुद्री जैव उत्पादकता बढ़ती है।
- पेरू-चिली तट का अपवेलिंग क्षेत्र विश्व के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों में से एक है।
- जापान के पास कुरोशियो और ओयाशियो धाराओं के प्रभाव से समृद्ध मत्स्य क्षेत्र विकसित हुआ है।
- नॉर्थ अटलांटिक में गर्म और ठंडी धाराओं के मिलन वाले क्षेत्रों में भी मत्स्य संसाधन महत्वपूर्ण हैं।
महासागरीय धाराएँ और कोहरा
जब गर्म और नम वायु किसी ठंडी समुद्री धारा के ऊपर से गुजरती है,
तो उसका तापमान कम होकर संघनन की स्थिति में पहुँच सकता है और घना कोहरा बन सकता है।
- न्यूफाउंडलैंड के पास गल्फ स्ट्रीम और लैब्राडोर धारा का मिलन महत्वपूर्ण है।
- इन धाराओं के तापमान में अंतर कोहरे के निर्माण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है।
- ऐसे क्षेत्रों में समुद्री नौवहन के लिए दृश्यता की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
एल नीनो (El Niño)
मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के सतही जल के असामान्य रूप से
गर्म होने की घटना को एल नीनो (El Niño) कहा जाता है।
यह ENSO (El Niño-Southern Oscillation) का गर्म चरण है।
- मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो सकता है।
- दक्षिण अमेरिकी तट के पास सामान्य अपवेलिंग कमजोर हो सकती है।
- समुद्री पोषक तत्वों की उपलब्धता और मत्स्य उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं।
- इसका प्रभाव वैश्विक वर्षा और तापमान के वितरण पर पड़ सकता है।
- भारत में मानसून पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन संबंध जटिल है और हर वर्ष समान नहीं होता।
ला नीना (La Niña)
उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग में समुद्री सतह के तापमान के
सामान्य से अधिक ठंडा होने की घटना को ला नीना (La Niña) कहते हैं।
यह ENSO का ठंडा चरण है।
- व्यापारिक पवनें सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अधिक मजबूत हो सकती हैं।
- पूर्वी प्रशांत में अपवेलिंग बढ़ सकती है।
- पूर्वी प्रशांत सामान्यतः पश्चिमी प्रशांत की तुलना में अधिक ठंडा रहता है।
- वैश्विक वर्षा एवं मौसम प्रणालियों पर इसका प्रभाव पड़ता है।
ज्वार-भाटा (Tides) क्या है?
चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण तथा पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की गति से उत्पन्न
महासागरीय जल स्तर के नियमित उतार-चढ़ाव को ज्वार-भाटा (Tides) कहा जाता है।
- ज्वार (High Tide): समुद्री जल स्तर का अपेक्षाकृत ऊँचा उठना।
- भाटा (Low Tide): समुद्री जल स्तर का अपेक्षाकृत नीचे होना।
- चंद्रमा का ज्वारीय प्रभाव सूर्य की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।
- सूर्य का गुरुत्वाकर्षण भी ज्वार की ऊँचाई को प्रभावित करता है।
ज्वार-भाटा के निर्माण में चंद्रमा की भूमिका
पृथ्वी के महासागरीय जल पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल प्रभाव डालता है।
पृथ्वी के चंद्रमा की ओर वाले भाग पर एक ज्वारीय उभार बनता है।
पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की गति से विपरीत दिशा में भी एक ज्वारीय उभार विकसित होता है।
- चंद्रमा की निकटता के कारण उसका ज्वारीय प्रभाव सूर्य की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।
- पृथ्वी के घूर्णन के कारण विभिन्न तटीय क्षेत्रों में ज्वार और भाटा का क्रम दिखाई देता है।
- स्थानीय तटरेखा, समुद्र की गहराई और समुद्री बेसिन की आकृति ज्वार की वास्तविक ऊँचाई को प्रभावित करती है।
सूर्य की भूमिका
सूर्य का गुरुत्वाकर्षण भी समुद्री जल में ज्वारीय उभार उत्पन्न करता है।
यद्यपि सूर्य बहुत अधिक विशाल है, लेकिन पृथ्वी से उसकी अत्यधिक दूरी के कारण
उसका ज्वारीय प्रभाव चंद्रमा से कम होता है।
जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीधी रेखा में होते हैं,
तब सूर्य और चंद्रमा के ज्वारीय प्रभाव एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।
वसंत ज्वार (Spring Tide)
अमावस्या और पूर्णिमा के समय सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीधी रेखा में होते हैं।
इस स्थिति में सूर्य और चंद्रमा के ज्वारीय बल एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।
इससे सामान्य से अधिक ऊँचा ज्वार और अधिक नीचा भाटा उत्पन्न होता है।
- अमावस्या के समय वसंत ज्वार होता है।
- पूर्णिमा के समय भी वसंत ज्वार होता है।
- ज्वार-भाटा का अंतर अधिक होता है।
- यह ऋतु से संबंधित शब्द नहीं है; यह खगोलीय स्थिति से संबंधित है।
नीप ज्वार (Neap Tide)
प्रथम और तृतीय चतुर्थांश के चंद्र चरण में सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के संबंध में
लगभग समकोण पर होते हैं। इस स्थिति में दोनों के ज्वारीय प्रभाव आंशिक रूप से
एक-दूसरे का विरोध करते हैं।
- ज्वार अपेक्षाकृत कम ऊँचा होता है।
- भाटा अपेक्षाकृत कम नीचे जाता है।
- ज्वार और भाटा के बीच का अंतर कम होता है।
- यह अमावस्या और पूर्णिमा के लगभग एक सप्ताह बाद/पहले के आसपास होता है।
ज्वार की आवृत्ति
किसी तटीय क्षेत्र में ज्वार-भाटा की आवृत्ति स्थानीय समुद्री बेसिन,
तटरेखा और क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार बदल सकती है।
- अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-diurnal Tide): लगभग दो उच्च ज्वार और दो निम्न भाटे प्रतिदिन।
- दैनिक ज्वार (Diurnal Tide): लगभग एक उच्च ज्वार और एक निम्न भाटा प्रतिदिन।
- मिश्रित ज्वार (Mixed Tide): दो उच्च ज्वार और दो निम्न भाटे हो सकते हैं, लेकिन उनकी ऊँचाई समान नहीं होती।
ज्वार की ऊँचाई को प्रभावित करने वाले कारक
- चंद्रमा और सूर्य की स्थिति।
- चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी।
- तटरेखा की आकृति।
- समुद्र की गहराई।
- महाद्वीपीय शेल्फ की चौड़ाई।
- समुद्री बेसिन का आकार।
- स्थानीय हवाएँ।
- वायुदाब में परिवर्तन।
- समुद्री बेसिन की प्राकृतिक दोलनात्मक व्यवस्था।
बड़े ज्वार वाले क्षेत्र
विश्व के कुछ तटीय क्षेत्रों में तटरेखा और समुद्री बेसिन की आकृति के कारण
ज्वार की ऊँचाई बहुत अधिक हो सकती है।
- कनाडा की Bay of Fundy ज्वार की अत्यधिक ऊँचाई के लिए प्रसिद्ध है।
- फनल जैसी तटरेखा ज्वारीय जल को संकेंद्रित कर सकती है।
- समुद्री बेसिन की प्राकृतिक दोलन अवधि और ज्वारीय अवधि के बीच अनुकूलता भी ज्वार की ऊँचाई बढ़ा सकती है।
ज्वारीय धाराएँ (Tidal Currents)
ज्वार के आने और भाटा के जाने के दौरान समुद्री जल की क्षैतिज गति को
ज्वारीय धारा (Tidal Current) कहा जाता है।
- ज्वार के समय जल तट की ओर बढ़ सकता है।
- भाटा के समय जल समुद्र की ओर लौटता है।
- संकरी खाड़ियों और जलडमरूमध्यों में इनकी गति काफी तेज हो सकती है।
- नौवहन और बंदरगाह गतिविधियों में इनका महत्व है।
ज्वार-भाटा का आर्थिक महत्व
- बंदरगाहों में बड़े जहाजों के प्रवेश और निकास को प्रभावित करता है।
- नदियों के मुहाने में नौवहन को प्रभावित करता है।
- ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन की संभावना प्रदान करता है।
- मछली पकड़ने की गतिविधियों पर प्रभाव डालता है।
- तटीय जल के प्राकृतिक मिश्रण में योगदान देता है।
- कुछ तटीय क्षेत्रों में अवसाद और पोषक तत्वों के परिवहन में भूमिका निभाता है।
ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy)
ज्वार-भाटा के कारण समुद्री जल के नियमित उतार-चढ़ाव और प्रवाह से ऊर्जा प्राप्त करने
की प्रक्रिया को ज्वारीय ऊर्जा कहते हैं।
- यह नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत है।
- ज्वार की नियमितता के कारण इसकी पूर्वानुमेयता कई अन्य नवीकरणीय स्रोतों की तुलना में अधिक हो सकती है।
- इसके लिए उपयुक्त तटीय स्थलाकृति और पर्याप्त ज्वारीय अंतर आवश्यक है।
- बाँध, ज्वारीय लैगून और ज्वारीय धारा टर्बाइन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
महासागरीय धाराएँ और ज्वार-भाटा में अंतर
| आधार |
महासागरीय धाराएँ |
ज्वार-भाटा |
| अर्थ |
समुद्री जल का अपेक्षाकृत नियमित क्षैतिज प्रवाह |
समुद्री जल स्तर का नियमित उतार-चढ़ाव |
| मुख्य कारण |
पवन, कोरिओलिस प्रभाव, तापमान, लवणता, घनत्व और समुद्री बेसिन की आकृति |
मुख्यतः चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण तथा पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की गति |
| प्रमुख प्रकार |
गर्म, ठंडी, सतही और गहरी धाराएँ |
Spring Tide, Neap Tide तथा विभिन्न tidal regimes |
| समय-मान |
मौसमी से लेकर दीर्घकालीन परिसंचरण तक |
नियमित खगोलीय चक्र के अनुसार |
| प्रमुख प्रभाव |
जलवायु, ऊष्मा वितरण, मत्स्य पालन और समुद्री परिवहन |
तटीय जल स्तर, ज्वारीय धाराएँ, नौवहन और ऊर्जा |
महासागरीय धाराएँ और वैश्विक ऊष्मा वितरण
महासागर पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में एक विशाल ऊष्मा भंडार की तरह कार्य करते हैं।
महासागरीय धाराएँ निम्न अक्षांशों में प्राप्त अतिरिक्त सौर ऊर्जा को
उच्च अक्षांशों तक पहुँचाने और ऊष्मा के पुनर्वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- गर्म धाराएँ उच्च अक्षांशों की ओर ऊष्मा का परिवहन करती हैं।
- ठंडी धाराएँ ठंडे जल को निम्न अक्षांशों की ओर ले जाती हैं।
- इससे विभिन्न क्षेत्रों के तापमान में अंतर को कम करने में सहायता मिल सकती है।
- समुद्री और वायुमंडलीय परिसंचरण मिलकर वैश्विक जलवायु प्रणाली को प्रभावित करते हैं।
महासागरीय धाराओं का समुद्री परिवहन पर प्रभाव
- जहाजों की गति और ईंधन खपत प्रभावित हो सकती है।
- धाराओं की दिशा और गति का उपयोग नौवहन मार्गों के निर्धारण में किया जाता है।
- तेज धाराएँ छोटे जहाजों के लिए चुनौती उत्पन्न कर सकती हैं।
- कोहरा और समुद्री तापमान में अंतर नौवहन सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
प्रमुख महासागरीय धाराएँ
| धारा |
तापमान |
मुख्य क्षेत्र/तट |
सामान्य दिशा/विशेषता |
| गल्फ स्ट्रीम |
गर्म |
उत्तरी अटलांटिक |
फ्लोरिडा से उत्तर-पूर्व की ओर |
| कैनरी धारा |
ठंडी |
उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका |
दक्षिण की ओर |
| लैब्राडोर धारा |
ठंडी |
कनाडा के तट के पास |
दक्षिण की ओर |
| ब्राजील धारा |
गर्म |
दक्षिण अमेरिका का पूर्वी तट |
दक्षिण की ओर |
| बेंगुएला धारा |
ठंडी |
दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका |
उत्तर की ओर |
| कुरोशियो |
गर्म |
जापान के पास |
उत्तर-पूर्व की ओर |
| कैलिफोर्निया धारा |
ठंडी |
उत्तरी अमेरिका का पश्चिमी तट |
दक्षिण की ओर |
| पेरू/हम्बोल्ट धारा |
ठंडी |
दक्षिण अमेरिका का पश्चिमी तट |
उत्तर की ओर |
| पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा |
गर्म |
ऑस्ट्रेलिया का पूर्वी तट |
दक्षिण की ओर |
| पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा |
ठंडी |
ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी तट |
उत्तर की ओर |
| अगुलहास धारा |
गर्म |
दक्षिण-पूर्वी अफ्रीका |
दक्षिण की ओर |
| अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा |
ठंडी/अंटार्कटिक जल से संबंधित |
अंटार्कटिका के चारों ओर |
पश्चिम से पूर्व |
महत्वपूर्ण वैचारिक बिंदु
-
गर्म समुद्री धारा का अर्थ यह नहीं है कि उसके आसपास हर परिस्थिति में अधिक वर्षा ही होगी।
वर्षा पर पवन, वायुमंडलीय स्थिरता, आर्द्रता और स्थलाकृति सहित कई कारकों का प्रभाव होता है।
-
ठंडी समुद्री धाराएँ कई पश्चिमी तटीय मरुस्थलों की शुष्कता में योगदान करती हैं,
लेकिन मरुस्थल निर्माण का कारण केवल समुद्री धारा नहीं होती।
-
अपवेलिंग समुद्र की सतह पर पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती है,
इसलिए ऐसे क्षेत्र सामान्यतः उच्च समुद्री जैव उत्पादकता से जुड़े होते हैं।
-
ENSO केवल महासागरीय घटना नहीं है; यह महासागर और वायुमंडल के
परस्पर संबंध से जुड़ी प्रणाली है।
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ज्वार की ऊँचाई केवल चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर नहीं करती;
तटरेखा, समुद्री बेसिन, गहराई और स्थानीय परिस्थितियाँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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Spring Tide का संबंध ऋतु से नहीं, बल्कि सूर्य-चंद्रमा-पृथ्वी की
विशेष ज्यामितीय स्थिति से है।
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Neap Tide में ज्वार-भाटा का अंतर कम होता है क्योंकि सूर्य और चंद्रमा के
ज्वारीय प्रभाव एक-दूसरे का आंशिक रूप से विरोध करते हैं।
सारांश
महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग हैं।
प्रचलित पवनें, कोरिओलिस बल, तापमान, लवणता, घनत्व, महाद्वीपों की स्थिति
तथा समुद्री बेसिन की आकृति इनके प्रवाह को प्रभावित करती है।
गर्म और ठंडी धाराएँ वैश्विक ऊष्मा वितरण, वर्षा, मरुस्थलों, मत्स्य संसाधनों
और तटीय जलवायु को प्रभावित करती हैं।
अपवेलिंग और डाउनवेलिंग महासागर के ऊर्ध्वाधर परिसंचरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं,
जबकि थर्मोहेलाइन परिसंचरण गहरे समुद्री जल के वैश्विक परिसंचरण की व्याख्या करता है।
दूसरी ओर, ज्वार-भाटा मुख्यतः चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से संबंधित है।
Spring Tide और Neap Tide इसकी महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं।
महासागरीय धाराओं और ज्वार-भाटा का अध्ययन जलवायु, समुद्री संसाधन,
मत्स्य पालन, ऊर्जा, तटीय भूगोल, ENSO और वैश्विक महासागरीय परिसंचरण जैसे
अनेक विषयों से सीधे जुड़ता है।