भारत की वर्तमान स्थलाकृति (Physiography) का निर्माण भूगर्भीय संरचना, प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics), अपक्षय (Weathering), अपरदन (Erosion), निक्षेपण (Deposition) तथा दीर्घकालीन भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के संयुक्त प्रभाव से हुआ है।
भारत को उसकी भौतिक संरचना और स्थलरूपों के आधार पर सामान्यतः 6 प्रमुख भौतिक विभागों में बाँटा जाता है। ये विभाग भूगर्भीय इतिहास, ऊँचाई, चट्टानों, जलवायु और नदी प्रणालियों की दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न हैं।
| भौतिक विभाग | उत्पत्ति एवं संरचना | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| हिमालय एवं उत्तर-पूर्वी पर्वत | प्लेटों के अभिसरण से निर्मित पर्वतीय क्षेत्र | नवीन वलित पर्वत, ऊँची चोटियाँ और गहरी घाटियाँ |
| उत्तरी विशाल मैदान | सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र के जलोढ़ निक्षेप | समतल, उपजाऊ और घनी आबादी वाला क्षेत्र |
| प्रायद्वीपीय पठार | प्राचीन आग्नेय एवं कायांतरित शैलें | प्राचीन भू-भाग, पठार और खनिज संसाधन |
| भारतीय मरुस्थल | शुष्क जलवायु और पवनों द्वारा निर्मित स्थलरूप | कम वर्षा, बालू के टीले और विरल वनस्पति |
| तटीय मैदान | प्रायद्वीपीय पठार और समुद्र के बीच का क्षेत्र | डेल्टा, मुहाने, लैगून और समुद्री व्यापार |
| द्वीप समूह | विभिन्न भूगर्भीय एवं जैविक प्रक्रियाओं से निर्मित द्वीप | प्रवाल द्वीप, पर्वतीय द्वीप और सामरिक महत्व |
हिमालय भारत की उत्तरी सीमा के साथ फैली नवीन वलित पर्वत प्रणाली (Young Fold Mountain System) है। इसका निर्माण भारतीय प्लेट के उत्तर की ओर बढ़ने और यूरेशियन प्लेट से टकराने के कारण हुआ।
भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच अभिसरण आज भी जारी है। इसी कारण हिमालय भूगर्भीय रूप से सक्रिय क्षेत्र है और यहाँ भूकंप, भूस्खलन तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बना रहता है।
हिमालय पश्चिम में सिंधु नदी के मोड़ के निकट से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक लगभग 2,400 किमी लंबाई में फैला है। इसकी चौड़ाई पश्चिमी भाग में अपेक्षाकृत अधिक तथा पूर्वी भाग में कम है।
हिमालय को उत्तर से दक्षिण की ओर मुख्यतः तीन समानांतर श्रेणियों में बाँटा जाता है।
| श्रेणी | स्थिति | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| हिमाद्रि | सबसे उत्तरी | सबसे ऊँची प्रमुख श्रेणी, ऊँची चोटियाँ और हिमनद |
| हिमाचल | हिमाद्रि के दक्षिण में | पर्वतीय घाटियाँ, पीर पंजाल और धौलाधार जैसी श्रेणियाँ |
| शिवालिक | सबसे दक्षिणी | अपेक्षाकृत नवीन अवसादी शैलें और दून घाटियाँ |
हिमाद्रि हिमालय की सबसे उत्तरी और सबसे ऊँची प्रमुख श्रेणी है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 6,000 मीटर के आसपास मानी जाती है।
| चोटी | स्थान | महत्व |
|---|---|---|
| कंचनजंघा | सिक्किम–नेपाल सीमा | भारत से संबंधित सर्वोच्च पर्वत चोटी |
| नंदा देवी | उत्तराखंड | पूरी तरह भारत के भीतर स्थित सर्वोच्च पर्वत चोटियों में प्रमुख |
| कामेत | उत्तराखंड | गढ़वाल हिमालय की महत्वपूर्ण ऊँची चोटी |
| नुन-कुन पर्वत समूह | लद्दाख क्षेत्र | जांस्कर क्षेत्र का महत्वपूर्ण पर्वत समूह |
| माउंट एवरेस्ट | नेपाल–चीन सीमा | विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटी |
हिमाद्रि के दक्षिण में लघु हिमालय स्थित है। इसकी ऊँचाई सामान्यतः महान हिमालय से कम है। यहाँ अनेक पर्वतीय घाटियाँ, वन क्षेत्र और प्रसिद्ध पर्वतीय नगर पाए जाते हैं।
प्रमुख श्रेणियाँ:
पीर पंजाल कश्मीर घाटी के दक्षिण में स्थित लघु हिमालय की महत्वपूर्ण पर्वत श्रेणी है।
शिवालिक हिमालय की सबसे दक्षिणी और अपेक्षाकृत नवीन श्रेणी है। इसमें नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से निर्मित अवसादी शैलों का व्यापक प्रतिनिधित्व मिलता है।
शिवालिक और लघु हिमालय के बीच पाई जाने वाली लंबी घाटियों को दून (Dun) कहा जाता है।
प्रमुख उदाहरण: देहरादून, कोटली दून और पटली दून।
पश्चिम से पूर्व की ओर हिमालय का पारंपरिक क्षेत्रीय विभाजन सिंधु, सतलुज, काली, तीस्ता और दिहांग जैसी नदियों के आधार पर किया जाता है।
| क्षेत्र | नदी सीमाएँ |
|---|---|
| पंजाब हिमालय | सिंधु और सतलुज के बीच |
| कुमाऊँ हिमालय | सतलुज और काली के बीच |
| नेपाल हिमालय | काली और तीस्ता के बीच |
| असम हिमालय | तीस्ता और दिहांग के बीच |
दिहांग के बाद हिमालय की पर्वतीय प्रणाली दक्षिण की ओर मुड़ती है और उत्तर-पूर्वी भारत में कई पहाड़ी श्रेणियों के रूप में विस्तृत होती है।
प्रमुख पहाड़ियाँ:
हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों (Alluvial Deposits) से निर्मित विशाल मैदान को उत्तरी मैदान कहा जाता है। इसका निर्माण लंबे समय तक निक्षेपण की प्रक्रिया से हुआ है।
यह मैदान मुख्यतः सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र से संबंधित है। इसकी उपजाऊ मिट्टी, समतल स्थलाकृति और जल उपलब्धता ने कृषि तथा घनी आबादी के विकास में योगदान दिया है।
उत्तरी मैदान को स्थलाकृति और जलोढ़ निक्षेपों की प्रकृति के आधार पर कई सूक्ष्म भागों में बाँटा जाता है।
| भाग | स्थिति/प्रकृति | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| भाबर | शिवालिक के दक्षिण में | कंकड़-पत्थरों वाला संकीर्ण क्षेत्र; कई छोटी धाराएँ भूमि के भीतर समा जाती हैं। |
| तराई | भाबर के दक्षिण में | आर्द्र क्षेत्र, जहाँ भूमिगत हुई अनेक धाराएँ फिर सतह पर प्रकट होती हैं। |
| भांगर | पुराना जलोढ़ | अपेक्षाकृत ऊँचा पुराना जलोढ़ क्षेत्र, जो सामान्यतः बाढ़ मैदान से ऊपर होता है। |
| खादर | नया जलोढ़ | बाढ़ से प्रभावित निचले मैदान, जहाँ नए जलोढ़ निक्षेप जमा होते रहते हैं। |
प्रायद्वीपीय पठार भारत के सबसे प्राचीन भू-भागों में से एक है। यह मुख्यतः कठोर आग्नेय और कायांतरित शैलों से बना है। इसका भूगर्भीय आधार लंबे समय से अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, हालांकि यहाँ भी भ्रंश, ज्वालामुखीय गतिविधियों के प्राचीन प्रमाण और भूकंपीय गतिविधियाँ मिलती हैं।
नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित विस्तृत पठारी क्षेत्र को सामान्यतः मध्य उच्चभूमि कहा जाता है।
प्रमुख भाग:
अरावली भारत की अत्यंत प्राचीन पर्वत प्रणालियों में से एक है। यह गुजरात से राजस्थान होते हुए हरियाणा और दिल्ली क्षेत्र की ओर विस्तृत होती है।
गुरु शिखर अरावली की सबसे ऊँची चोटी है, जो राजस्थान के माउंट आबू क्षेत्र में स्थित है।
छोटानागपुर पठार मुख्यतः झारखंड तथा आसपास के क्षेत्रों में विस्तृत है। यह खनिज संसाधनों की दृष्टि से भारत के महत्वपूर्ण पठारी क्षेत्रों में से एक है।
प्रमुख खनिज:
दक्कन का पठार प्रायद्वीपीय भारत का विशाल पठारी क्षेत्र है। इसका बड़ा भाग नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है और इसकी सामान्य आकृति त्रिभुजाकार मानी जाती है।
महाराष्ट्र का बड़ा भाग दक्कन ट्रैप से संबंधित है, जिसका निर्माण प्राचीन व्यापक बेसाल्टिक लावा प्रवाहों से हुआ। इस क्षेत्र की काली मिट्टी कपास की खेती के लिए महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी घाट अरब सागर के समानांतर प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी किनारे पर स्थित पर्वतीय प्रणाली है।
पूर्वी घाट भारत के पूर्वी तट के समानांतर स्थित हैं, लेकिन पश्चिमी घाट की तुलना में अधिक खंडित और असतत हैं।
महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ पूर्वी घाट को काटते हुए बंगाल की खाड़ी की ओर बहती हैं।
| आधार | पश्चिमी घाट | पूर्वी घाट |
|---|---|---|
| स्थिति | पश्चिमी तट के समानांतर | पूर्वी तट के समानांतर |
| निरंतरता | अपेक्षाकृत अधिक निरंतर | अधिक खंडित |
| नदियों का प्रभाव | कुछ नदियाँ इन्हें काटती हैं | कई बड़ी नदियाँ इन्हें काटती हैं |
| वर्षा पर प्रभाव | अरब सागर शाखा की पवनों को ऊपर उठाकर पश्चिमी ढाल पर वर्षा बढ़ाते हैं | पश्चिमी घाट जैसी निरंतर अवरोधक भूमिका नहीं |
अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में स्थित शुष्क क्षेत्र को भारतीय मरुस्थल या थार मरुस्थल कहा जाता है। इसका अधिकांश भाग राजस्थान में है, जबकि इसका विस्तार पाकिस्तान तक भी है।
लूनी नदी का उद्गम अरावली क्षेत्र में अजमेर के निकट होता है। यह राजस्थान के शुष्क क्षेत्र से होकर बहती है और कच्छ के रण की दिशा में जाती है।
इसके निचले भाग में जल की लवणता बढ़ सकती है। शुष्क जलवायु, उच्च वाष्पीकरण और सीमित जल प्रवाह इस क्षेत्र की नदी प्रणालियों को प्रभावित करते हैं।
प्रायद्वीपीय पठार और समुद्र के बीच स्थित मैदानों को तटीय मैदान कहा जाता है। इन्हें मुख्यतः पश्चिमी तटीय मैदान और पूर्वी तटीय मैदान में बाँटा जाता है।
पश्चिमी तटीय मैदान अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच स्थित है। यह सामान्यतः पूर्वी तटीय मैदान की तुलना में अधिक संकीर्ण है।
प्रमुख भाग:
पूर्वी तटीय मैदान बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट के बीच स्थित है। यह सामान्यतः पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है।
प्रमुख भाग:
महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ पूर्वी तट पर बड़े डेल्टा का निर्माण करती हैं। इन क्षेत्रों में नदी द्वारा लाए गए अवसादों का निक्षेपण डेल्टा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
| आधार | पश्चिमी तटीय मैदान | पूर्वी तटीय मैदान |
|---|---|---|
| समुद्र | अरब सागर | बंगाल की खाड़ी |
| चौड़ाई | अधिकतर संकीर्ण | अधिकतर चौड़ा |
| प्रमुख नदी स्थलरूप | कई स्थानों पर मुहाने | बड़े डेल्टा अधिक सामान्य |
| प्रमुख क्षेत्र | कोंकण, कन्नड़ और मालाबार | उत्कल, उत्तरी सरकार और कोरोमंडल |
भारत के प्रमुख द्वीप समूह दो समुद्री क्षेत्रों में स्थित हैं। इनके भूगर्भीय निर्माण, स्थलाकृति और प्राकृतिक संसाधनों में अंतर है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी के पूर्वी भाग में स्थित हैं। ये एक जलमग्न पर्वतीय प्रणाली के उभरे हुए भागों से संबंधित हैं और इनके कई द्वीप पर्वतीय एवं वनाच्छादित हैं।
लक्षद्वीप अरब सागर में स्थित प्रवाल द्वीपों (Coral Islands) का समूह है। इनका निर्माण मुख्यतः प्रवाल भित्तियों और अन्य जैविक समुद्री निक्षेपों से संबंधित है।
प्रवाल भित्तियाँ समुद्री जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समुद्र के तापमान में वृद्धि, प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय दबावों से प्रभावित हो सकती हैं।
| आधार | अंडमान और निकोबार | लक्षद्वीप |
|---|---|---|
| स्थिति | बंगाल की खाड़ी | अरब सागर |
| उत्पत्ति | मुख्यतः जलमग्न पर्वतीय प्रणाली से संबंधित | मुख्यतः प्रवाल उत्पत्ति |
| विशेषता | पर्वतीय द्वीप और सक्रिय ज्वालामुखीय गतिविधि का उदाहरण | प्रवाल द्वीप और लैगून |
| महत्वपूर्ण तथ्य | बैरन द्वीप पर सक्रिय ज्वालामुखी | प्रवाल भित्तियों से संबंधित द्वीप समूह |
भारत के भौतिक विभाग एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं हैं। इनके बीच स्पष्ट भौगोलिक, जलवैज्ञानिक और भूगर्भीय संबंध है।
भारत की प्रमुख नदियों के स्वरूप को समझने में भौतिक विभागों का विशेष महत्व है। नदी की उत्पत्ति, जल की उपलब्धता और प्रवाह का स्वरूप उसके भौगोलिक क्षेत्र से प्रभावित होता है।
| नदी प्रणाली | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| हिमालयी नदियाँ | हिमपात, हिमनदों और वर्षा से जल प्राप्त करती हैं; अनेक नदियों में बारहमासी प्रवाह रहता है। |
| प्रायद्वीपीय नदियाँ | मुख्यतः वर्षा पर निर्भर; कई नदियाँ प्राचीन भू-भागों से होकर बहती हैं। |
| पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ | महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी बड़े डेल्टा बनाती हैं। |
| पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ | नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं और अरब सागर में मुहाने के निकट पहुँचती हैं। |
भारत की स्थलाकृति मानसूनी जलवायु और वर्षा के क्षेत्रीय वितरण को प्रभावित करती है। हिमालय और पश्चिमी घाट दोनों वर्षा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की भौतिक विविधता केवल स्थलाकृति की विविधता नहीं है, बल्कि यह कृषि, जल संसाधन, जलवायु, जैव विविधता, जनसंख्या वितरण, परिवहन और आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित करती है।
उदाहरण के लिए, उत्तरी मैदान की समतल एवं उपजाऊ भूमि ने घनी आबादी और कृषि के विकास को बढ़ावा दिया, जबकि प्रायद्वीपीय पठार की खनिज संपदा ने खनन और औद्योगिक गतिविधियों के विकास में योगदान दिया।
इसी प्रकार हिमालय जल संसाधनों और मानसून के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि तटीय मैदान समुद्री व्यापार, मत्स्य पालन और बंदरगाहों के विकास में योगदान देते हैं। इन भौतिक विभागों को समझना भारत के क्षेत्रीय विकास और प्राकृतिक संसाधनों के वितरण को समझने के लिए भी आवश्यक है।
| भौतिक विभाग | याद रखने योग्य बिंदु |
|---|---|
| हिमालय | नवीन वलित पर्वत — हिमाद्रि, हिमाचल और शिवालिक |
| उत्तरी मैदान | जलोढ़ निक्षेप — भाबर, तराई, भांगर और खादर |
| प्रायद्वीपीय पठार | प्राचीन कठोर भू-भाग — मध्य उच्चभूमि और दक्कन पठार |
| भारतीय मरुस्थल | थार — कम वर्षा, बालू के टीले और लूनी नदी |
| तटीय मैदान | पश्चिमी तट सामान्यतः संकीर्ण, पूर्वी तट अपेक्षाकृत चौड़ा |
| द्वीप समूह | अंडमान-निकोबार — बंगाल की खाड़ी; लक्षद्वीप — अरब सागर |
भारत की भौतिक संरचना अत्यंत विविध है। हिमालय से लेकर उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीपों तक प्रत्येक भौतिक विभाग भारत की जलवायु, कृषि, अर्थव्यवस्था, जैव विविधता और मानव बसावट को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है।
UPSC की तैयारी के लिए इन विभागों की केवल विशेषताएँ याद करना पर्याप्त नहीं है। उनकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रमुख स्थलरूपों, नदी प्रणालियों, जलवायु तथा आर्थिक महत्व के बीच संबंध समझना अधिक उपयोगी है।