Plate Tectonics and Continental Drift

महाद्वीपीय विस्थापन, प्लेट विवर्तनिकी और पृथ्वी की गतिशीलता

परिचय

पृथ्वी की सतह भूगर्भीय समय में निरंतर परिवर्तित होती रही है। महाद्वीप और महासागर पृथ्वी के कठोर बाहरी भाग से संबंधित हैं, जिसकी प्लेटें लगातार गति करती हैं। इस गति के कारण पर्वतों का निर्माण, महासागरों का खुलना और बंद होना, समुद्री गर्त, भूकंप, ज्वालामुखी तथा अनेक प्रमुख स्थलरूप विकसित होते हैं।

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) ने यह विचार प्रस्तुत किया कि वर्तमान महाद्वीप अतीत में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और बाद में अलग-अलग दिशाओं में विस्थापित हुए।

समुद्र-तल प्रसरण (Sea-Floor Spreading) के प्रमाणों ने महासागरीय भूपर्पटी के निर्माण और विस्तार की प्रक्रिया को स्पष्ट किया। बाद में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory) ने महाद्वीपीय गति, भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वत निर्माण को समझने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक ढाँचा प्रदान किया।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना और प्लेटों का संबंध

प्लेट विवर्तनिकी को समझने के लिए पृथ्वी की बाहरी परतों के बीच अंतर जानना आवश्यक है।

भाग अर्थ एवं विशेषता प्लेट विवर्तनिकी में भूमिका
भूपर्पटी (Crust) पृथ्वी की सबसे बाहरी ठोस परत। यह महाद्वीपीय और महासागरीय प्रकार की होती है। महाद्वीपीय और महासागरीय भूपर्पटी लिथोस्फीयर का हिस्सा हैं।
लिथोस्फीयर (Lithosphere) भूपर्पटी और ऊपरी मेंटल का कठोर बाहरी भाग। यही अनेक विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है।
एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) ऊपरी मेंटल का अपेक्षाकृत कमजोर और दीर्घकाल में विकृत होने वाला क्षेत्र। इसके ऊपर लिथोस्फीयर प्लेटों की गति संभव होती है।
मेंटल (Mantle) भूपर्पटी के नीचे स्थित विशाल चट्टानी परत। मेंटल की गतिशीलता और प्लेटों के साथ होने वाली अंतःक्रियाएँ प्लेट गति को प्रभावित करती हैं।

महत्त्वपूर्ण अंतर: लिथोस्फीयर और भूपर्पटी एक ही चीज नहीं हैं। लिथोस्फीयर में भूपर्पटी के साथ ऊपरी मेंटल का कठोर भाग भी शामिल होता है।

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत

जर्मन वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगेनर (Alfred Wegener) ने 1912 में महाद्वीपीय विस्थापन का विचार प्रस्तुत किया और 1915 में अपनी पुस्तक के माध्यम से इसे विस्तार से विकसित किया।

वेगेनर के अनुसार वर्तमान महाद्वीप कभी एक विशाल भू-भाग के रूप में जुड़े हुए थे, जिसे पैंजिया (Pangaea) कहा गया। उनके चारों ओर फैले विशाल महासागर को पैंथालासा (Panthalassa) कहा जाता है।

पैंजिया का विभाजन

वेगेनर के मॉडल के अनुसार पैंजिया का विभाजन दो बड़े भू-भागों में हुआ:

समय के साथ भू-भागों का विखंडन और विस्थापन जारी रहा। महाद्वीपों की वर्तमान स्थिति इसी दीर्घकालीन भूगर्भीय विकास का परिणाम है।

वेगेनर के सिद्धांत के प्रमाण

वेगेनर ने अपने सिद्धांत के समर्थन में भौगोलिक, भूगर्भीय, जीवाश्मीय और पुराजलवायु संबंधी प्रमाण प्रस्तुत किए।

1. तटरेखाओं का साम्य

दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट और अफ्रीका के पश्चिमी तट की आकृतियाँ एक-दूसरे से काफी हद तक मेल खाती हैं। यह समानता महाद्वीपों के पहले जुड़े होने की परिकल्पना के समर्थन में उपयोगी प्रमाण है।

यह मेल वर्तमान समुद्री तटों के बजाय महाद्वीपीय शेल्फ की सीमाओं को ध्यान में रखने पर अधिक स्पष्ट हो सकता है।

2. भूगर्भीय समानताएँ

अलग-अलग महाद्वीपों पर समान आयु और संरचना वाली चट्टानों तथा पर्वतीय प्रणालियों की समानताएँ पाई जाती हैं।

उदाहरण के लिए, उत्तरी अमेरिका के एप्लेशियन पर्वतों और यूरोप के कुछ पर्वतीय क्षेत्रों की चट्टानी संरचनाओं में समानताएँ पाई जाती हैं। इन समानताओं को अटलांटिक महासागर के खुलने से पहले भू-भागों के जुड़े होने के प्रमाणों में शामिल किया जाता है।

3. जीवाश्म प्रमाण

कुछ प्राचीन जीवों और वनस्पतियों के जीवाश्म आज एक-दूसरे से दूर स्थित महाद्वीपों पर पाए गए हैं। इनका वितरण महाद्वीपों के अतीत में जुड़े होने की परिकल्पना का समर्थन करता है।

4. पुराजलवायु प्रमाण (Palaeoclimatic Evidence)

पुराजलवायु का अर्थ अतीत की जलवायु से है। वर्तमान उष्ण क्षेत्रों में प्राचीन हिमानी निक्षेपों और हिमानी खरोंचों का मिलना संकेत देता है कि इन क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और जलवायु अतीत में अलग रही होगी।

भारत, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ भागों में पाए गए प्राचीन हिमानी प्रमाण गोंडवानालैंड के पुनर्निर्माण में महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

5. पर्वत श्रृंखलाओं की निरंतरता

अलग-अलग महाद्वीपों पर स्थित कुछ पर्वत प्रणालियों और भूगर्भीय संरचनाओं की समानता यह संकेत देती है कि वे कभी एक व्यापक पर्वतीय प्रणाली के भाग रहे होंगे।

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की सीमाएँ

वेगेनर ने महाद्वीपों के विस्थापन के समर्थन में कई प्रमाण दिए, लेकिन वह महाद्वीपों को गति देने वाले तंत्र की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर सके।

उन्होंने ध्रुवीय पलायन बल (Pole-Fleeing Force) और ज्वारीय बल (Tidal Force) जैसे कारणों का प्रस्ताव किया था। बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ कि ये बल महाद्वीपों की गति को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इसलिए वेगेनर का सिद्धांत महाद्वीपों के विस्थापन की अवधारणा के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण था, लेकिन प्लेटों की गति के आधुनिक वैज्ञानिक तंत्र को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

समुद्र-तल प्रसरण सिद्धांत (Sea-Floor Spreading)

1960 के दशक में अमेरिकी भूवैज्ञानिक हैरी हेस (Harry Hess) और अन्य वैज्ञानिकों के कार्यों ने समुद्र-तल प्रसरण की अवधारणा को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस सिद्धांत के अनुसार मध्य-महासागरीय कटकों पर मेंटल से मैग्मा ऊपर उठता है। ठंडा होकर यह नई महासागरीय भूपर्पटी बनाता है। नई भूपर्पटी के बनने से पहले की भूपर्पटी कटक से दूर की ओर विस्थापित होती जाती है।

मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge)

मध्य-महासागरीय कटक महासागरों के भीतर फैली विशाल पर्वतीय प्रणालियाँ हैं। ये मुख्यतः अपसारी प्लेट सीमाओं से संबंधित होती हैं।

यहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं और नई महासागरीय भूपर्पटी का निर्माण होता है। इसका प्रमुख उदाहरण मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge) है।

समुद्र-तल का चुंबकीय प्रमाण

महासागरीय चट्टानों में उनके निर्माण के समय पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा से संबंधित अभिलेख सुरक्षित रह सकते हैं। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में भूगर्भीय इतिहास के दौरान कई बार ध्रुवीयता का उलटाव (Magnetic Reversal) हुआ है।

मध्य-महासागरीय कटकों के दोनों ओर लगभग सममित चुंबकीय धारियाँ पाई जाती हैं। यह व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि नई भूपर्पटी कटक पर बनती है और दोनों ओर फैलती है।

महासागरीय भूपर्पटी की आयु

महासागरीय भूपर्पटी सामान्यतः महाद्वीपीय भूपर्पटी की तुलना में युवा होती है। मध्य-महासागरीय कटक के पास की चट्टानें अपेक्षाकृत नई होती हैं, जबकि कटक से दूर जाने पर उनकी आयु सामान्यतः बढ़ती जाती है।

इसका कारण यह है कि कटक पर नई महासागरीय भूपर्पटी बनती रहती है। पुरानी महासागरीय भूपर्पटी अंततः सबडक्शन क्षेत्रों में मेंटल में वापस जा सकती है।

समुद्र-तल प्रसरण के प्रमुख प्रमाण

प्रमाण मुख्य अवलोकन महत्त्व
चुंबकीय धारियाँ कटक के दोनों ओर लगभग सममित चुंबकीय धारियाँ। नई भूपर्पटी के दोनों ओर फैलने का समर्थन।
चट्टानों की आयु कटक के पास चट्टानें अपेक्षाकृत युवा और दूर अधिक पुरानी। महासागरीय भूपर्पटी के निर्माण और प्रसरण का प्रमाण।
ऊष्मा प्रवाह मध्य-महासागरीय कटकों के आसपास अपेक्षाकृत अधिक ऊष्मा प्रवाह। ऊपर उठते गर्म पदार्थ और नई भूपर्पटी के निर्माण से संबंध।
समुद्री तल की संरचना कटक के आसपास ज्वालामुखीय गतिविधि और नई चट्टानों का निर्माण। अपसारी प्लेट सीमा की सक्रियता का प्रमाण।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)

प्लेट विवर्तनिकी आधुनिक भूगोल और भूविज्ञान का एक व्यापक सिद्धांत है। इसके अनुसार पृथ्वी का कठोर बाहरी भाग, अर्थात लिथोस्फीयर, अनेक बड़ी और छोटी प्लेटों में विभाजित है।

ये प्लेटें एस्थेनोस्फीयर के ऊपर गति करती हैं। उनकी परस्पर गति, टक्कर और एक-दूसरे के सापेक्ष विस्थापन से भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण, महासागरीय गर्त और अन्य भूगर्भीय घटनाएँ होती हैं।

प्रमुख विवर्तनिक प्लेटें

पृथ्वी पर कई बड़ी और छोटी प्लेटें हैं। प्रमुख प्लेटों में निम्नलिखित शामिल हैं:

ध्यान दें: प्लेटों की संख्या इस बात पर निर्भर कर सकती है कि बड़े प्लेटीय भागों के साथ छोटी प्लेटों और माइक्रोप्लेटों को अलग-अलग गिना जा रहा है या नहीं।

भारतीय प्लेट

भारतीय प्लेट उत्तर की ओर गति करते हुए यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। इस अभिसरण के कारण हिमालय क्षेत्र में संपीड़न, वलन, भ्रंशन और भूकंपीय गतिविधियाँ जारी रहती हैं।

भारतीय प्लेट की गति हिमालय और तिब्बती पठार के विकास को समझने के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। यह गति आज भी जारी है, इसलिए हिमालय भूगर्भीय दृष्टि से एक सक्रिय पर्वतीय प्रणाली है।

प्लेट सीमाओं के प्रकार

प्लेटों की परस्पर गति के आधार पर उनकी सीमाओं को मुख्यतः तीन प्रकारों में बाँटा जाता है:

प्लेट सीमाओं की तुलनात्मक सारणी

सीमा का प्रकार प्लेटों की गति भूपर्पटी पर प्रभाव प्रमुख स्थलरूप/घटनाएँ उदाहरण
अपसारी (Divergent) प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं। नई भूपर्पटी बन सकती है। मध्य-महासागरीय कटक, रिफ्ट घाटी, ज्वालामुखी और उथले भूकंप। मध्य-अटलांटिक कटक, पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट।
अभिसारी (Convergent) प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं। सबडक्शन में भूपर्पटी मेंटल में जा सकती है; महाद्वीपीय टक्कर में भूपर्पटी मोटी हो सकती है। महासागरीय गर्त, ज्वालामुखीय चाप, वलित पर्वत और भूकंप। हिमालय, एंडीज पर्वत, जापान के आसपास के क्षेत्र।
रूपांतर (Transform) प्लेटें एक-दूसरे के पास से क्षैतिज रूप से खिसकती हैं। सामान्यतः न नई भूपर्पटी बनती है, न भूपर्पटी सीधे नष्ट होती है। भ्रंश और भूकंप। सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault)।

अपसारी प्लेट सीमा (Divergent Boundary)

जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, तो उनके बीच मेंटल से गर्म पदार्थ ऊपर उठ सकता है। ठंडा होने पर यह नई भूपर्पटी का निर्माण करता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

उदाहरण: मध्य-अटलांटिक कटक और पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट।

अभिसारी प्लेट सीमा (Convergent Boundary)

जब दो प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, तो परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि वे महासागरीय हैं या महाद्वीपीय।

1. महासागरीय–महाद्वीपीय अभिसरण

अधिक घनी महासागरीय प्लेट अपेक्षाकृत कम घनी महाद्वीपीय प्लेट के नीचे धँस सकती है। इस प्रक्रिया को सबडक्शन (Subduction) कहा जाता है।

इसके परिणामस्वरूप निम्नलिखित स्थलरूप और घटनाएँ हो सकती हैं:

उदाहरण: नाज़्का प्लेट का दक्षिण अमेरिकी प्लेट के नीचे जाना, जिससे एंडीज पर्वत क्षेत्र की ज्वालामुखीय गतिविधि और पर्वत निर्माण संबंधित हैं।

2. महाद्वीपीय–महाद्वीपीय अभिसरण

जब दो महाद्वीपीय प्लेटें टकराती हैं, तो उनकी अपेक्षाकृत कम घनत्व वाली भूपर्पटी का एक प्लेट के रूप में दूसरी के नीचे धँसना कठिन होता है। इससे चट्टानों में संपीड़न, वलन, भ्रंशन और भूपर्पटी का मोटा होना जैसी प्रक्रियाएँ होती हैं।

उदाहरण: भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर से हिमालय तथा तिब्बती पठार के विकास में योगदान मिला।

3. महासागरीय–महासागरीय अभिसरण

दो महासागरीय प्लेटों के अभिसरण पर सामान्यतः अधिक घनी प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे सबडक्ट हो सकती है। इससे महासागरीय गर्त और ज्वालामुखीय द्वीप चाप (Island Arc) बन सकते हैं।

उदाहरण: जापान और मरियाना द्वीप चाप क्षेत्र महासागरीय प्लेटों की जटिल अंतःक्रियाओं से संबंधित हैं।

रूपांतर प्लेट सीमा (Transform Boundary)

जब दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर विपरीत दिशाओं में या अलग-अलग गति से क्षैतिज रूप में खिसकती हैं, तो ऐसी सीमा को रूपांतर सीमा कहा जाता है।

इन सीमाओं पर सामान्यतः न नई भूपर्पटी बनती है और न पुरानी भूपर्पटी सीधे नष्ट होती है। प्लेटों के बीच घर्षण से तनाव जमा हो सकता है और अचानक विस्थापन से भूकंप उत्पन्न हो सकता है।

उदाहरण: कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश।

तीनों प्रकार की प्लेट सीमाओं में अंतर

आधार अपसारी सीमा अभिसारी सीमा रूपांतर सीमा
प्लेटों की गति एक-दूसरे से दूर एक-दूसरे की ओर एक-दूसरे के पास से क्षैतिज गति
भूपर्पटी नई भूपर्पटी बन सकती है। सबडक्शन में भूपर्पटी नष्ट हो सकती है; टक्कर में मोटी हो सकती है। सामान्यतः भूपर्पटी का निर्माण या विनाश नहीं होता।
प्रमुख स्थलरूप कटक और रिफ्ट घाटी गर्त, पर्वत और ज्वालामुखीय चाप भ्रंश
भूकंप मुख्यतः उथले उथले से गहरे तक हो सकते हैं। मुख्यतः उथले
उदाहरण मध्य-अटलांटिक कटक हिमालय, एंडीज सैन एंड्रियास भ्रंश

प्लेट गति को संचालित करने वाले बल

प्लेटों की गति को केवल एक कारण से समझाना उचित नहीं है। आधुनिक भू-विज्ञान में प्लेटों पर लगने वाले विभिन्न बलों, मेंटल की गतिशीलता और प्लेट सीमाओं पर होने वाली प्रक्रियाओं की संयुक्त भूमिका मानी जाती है।

1. स्लैब पुल (Slab Pull)

जब ठंडी और अधिक घनी महासागरीय प्लेट सबडक्शन क्षेत्र में मेंटल की ओर नीचे जाती है, तो वह प्लेट के शेष भाग को भी खींच सकती है। इस बल को स्लैब पुल कहते हैं।

2. रिज पुश (Ridge Push)

मध्य-महासागरीय कटक आसपास के महासागरीय तल से ऊँचे होते हैं। कटक की ऊँचाई और गुरुत्वीय ढलान के कारण प्लेट की गति में योगदान मिल सकता है। इसे रिज पुश कहा जाता है।

3. मेंटल की गतिशीलता

पृथ्वी के भीतर ऊष्मा के अंतर से मेंटल पदार्थ की धीमी गति होती है। यह प्लेटों की गति और उनके नीचे लगने वाले बलों को प्रभावित करती है। हालांकि प्लेटों की गति को केवल सरल संवहन कोशिकाओं के माध्यम से समझना पर्याप्त नहीं है।

प्लेट गति के प्रमुख कारकों की तुलना

कारक प्रक्रिया मुख्य भूमिका
Slab Pull घनी महासागरीय प्लेट का सबडक्शन क्षेत्र में नीचे जाना। प्लेट के शेष भाग को खींचने में योगदान।
Ridge Push मध्य-महासागरीय कटक से गुरुत्वीय ढलान के कारण गति में योगदान। कटक से दूर प्लेट की गति में योगदान।
Mantle Dynamics मेंटल में ऊष्मीय अंतर और पदार्थ की धीमी गति। प्लेटों की गति और उनके साथ होने वाली अंतःक्रियाओं को प्रभावित करना।

प्लेट विवर्तनिकी और ज्वालामुखी

विश्व के अनेक सक्रिय ज्वालामुखी प्लेट सीमाओं के निकट पाए जाते हैं। हालांकि सभी ज्वालामुखी प्लेट सीमाओं पर स्थित नहीं होते।

प्लेट विवर्तनिकी और भूकंप

प्लेटों की गति से चट्टानों में तनाव जमा होता है। जब चट्टानें भ्रंश के सहारे अचानक खिसकती हैं और तनाव मुक्त होता है, तो भूकंप उत्पन्न हो सकता है।

अभिसारी सीमाओं पर उथले से गहरे भूकंप तक आ सकते हैं। अपसारी और रूपांतर सीमाओं पर सामान्यतः उथले भूकंप अधिक सामान्य होते हैं।

प्लेट सीमाओं और भूकंपों का संबंध

सीमा भूकंप की सामान्य प्रकृति कारण
अपसारी मुख्यतः उथले भूकंप प्लेटों का अलग होना और भ्रंशों का निर्माण।
अभिसारी उथले, मध्यम और गहरे भूकंप संभव। टक्कर, सबडक्शन और चट्टानों में तनाव।
रूपांतर मुख्यतः उथले भूकंप प्लेटों के क्षैतिज विस्थापन के दौरान तनाव का अचानक मुक्त होना।

प्लेट विवर्तनिकी और पर्वत निर्माण

प्लेटों की गति पर्वत निर्माण की प्रमुख प्रक्रियाओं में से एक है। जब दो महाद्वीपीय प्लेटें टकराती हैं, तो भूपर्पटी में संपीड़न, वलन और भ्रंशन के कारण विशाल पर्वत प्रणालियाँ विकसित हो सकती हैं।

हिमालय भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर से विकसित हुई पर्वतीय प्रणाली का प्रमुख उदाहरण है। दूसरी ओर, महासागरीय प्लेट के महाद्वीपीय प्लेट के नीचे जाने से एंडीज जैसे ज्वालामुखीय पर्वत विकसित हुए हैं।

द्वीप चाप (Island Arc)

महासागरीय–महासागरीय अभिसरण में एक प्लेट दूसरी के नीचे सबडक्ट हो सकती है। इससे उत्पन्न मैग्मा समुद्र के भीतर ज्वालामुखीय द्वीपों की श्रृंखला बना सकता है। ऐसी श्रृंखला को द्वीप चाप कहा जाता है।

महासागरीय गर्त (Ocean Trenches)

सबडक्शन क्षेत्रों में महासागरीय तल पर लंबे और अत्यंत गहरे गर्त बन सकते हैं। ये पृथ्वी के सबसे गहरे समुद्री क्षेत्रों में शामिल हैं।

मरियाना गर्त (Mariana Trench) विश्व का सबसे गहरा ज्ञात महासागरीय गर्त है। यह पश्चिमी प्रशांत महासागर में सबडक्शन क्षेत्र से संबंधित है।

विल्सन चक्र (Wilson Cycle)

विल्सन चक्र महासागरों के खुलने, फैलने, सिकुड़ने और अंततः बंद होने की दीर्घकालीन भूगर्भीय प्रक्रिया को समझाने वाली अवधारणा है।

इसके सामान्य चरणों में महाद्वीपीय रिफ्टिंग, नए महासागर का खुलना, महासागर का विस्तार, सबडक्शन की शुरुआत, महासागर का सिकुड़ना और अंततः महाद्वीपीय टक्कर शामिल हो सकते हैं।

चरण प्रमुख प्रक्रिया
रिफ्टिंग (Rifting) महाद्वीपीय भूपर्पटी में दरारें और रिफ्ट घाटियाँ विकसित होती हैं।
महासागर का खुलना नई महासागरीय भूपर्पटी बनने से एक संकीर्ण महासागर विकसित हो सकता है।
महासागर का विस्तार समुद्र-तल प्रसरण से महासागरीय बेसिन चौड़ा होता है।
सबडक्शन की शुरुआत महासागरीय भूपर्पटी का कुछ भाग मेंटल की ओर धँसने लगता है।
महासागर का सिकुड़ना सबडक्शन के कारण महासागरीय बेसिन का आकार घट सकता है।
महाद्वीपीय टक्कर महासागर बंद होने पर महाद्वीपीय भू-भाग टकरा सकते हैं और पर्वत बन सकते हैं।

विल्सन चक्र यह समझाता है कि महाद्वीप और महासागर भूगर्भीय समय में स्थिर नहीं रहते, बल्कि लगातार पुनर्गठित होते रहते हैं।

भारतीय प्लेट की गति और हिमालय

भारतीय प्लेट की उत्तर की ओर गति और यूरेशियन प्लेट से टक्कर हिमालय तथा तिब्बती पठार के विकास के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

इस टक्कर के प्रमुख परिणाम हैं:

हिमालय में भूकंप का जोखिम प्लेटों की निरंतर गति, भ्रंशों पर तनाव के संचय और क्षेत्र की जटिल भूगर्भीय संरचना से जुड़ा है।

भारतीय प्लेट और आसपास की प्लेटीय इकाइयाँ

भारतीय उपमहाद्वीप के आसपास यूरेशियन प्लेट, अरबियन प्लेट, ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और अंडमान-निकोबार क्षेत्र में स्थित जटिल प्लेटीय इकाइयों की अंतःक्रियाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

हिमालय क्षेत्र में भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर प्रमुख भूगर्भीय प्रक्रिया है। अंडमान-निकोबार क्षेत्र में सबडक्शन और संबंधित प्लेटीय अंतःक्रियाएँ भूकंप तथा ज्वालामुखीय गतिविधि से जुड़ी हैं।

भारत के लिए प्लेट विवर्तनिकी का महत्त्व

महाद्वीपीय विस्थापन से प्लेट विवर्तनिकी तक

वैज्ञानिक विचार / चरण मुख्य योगदान महत्त्व
Continental Drift महाद्वीप अतीत में जुड़े हुए थे और बाद में विस्थापित हुए। महाद्वीपों की गतिशीलता का विचार प्रस्तुत किया।
Sea-Floor Spreading मध्य-महासागरीय कटकों पर नई महासागरीय भूपर्पटी बनती है। महासागरीय तल के निर्माण और विस्तार की व्याख्या की।
Magnetic Evidence समुद्र तल पर लगभग सममित चुंबकीय धारियाँ मिलीं। समुद्र-तल प्रसरण के लिए महत्त्वपूर्ण प्रमाण मिला।
Plate Tectonics लिथोस्फीयर प्लेटों की गति और अंतःक्रिया से प्रमुख भूगर्भीय प्रक्रियाओं की व्याख्या। महाद्वीपीय गति, भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वत निर्माण को एक व्यापक ढाँचे में समझाया।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

सामान्य गलतियाँ

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न

“महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की प्रमुख अवधारणाओं एवं सीमाओं की चर्चा करते हुए स्पष्ट कीजिए कि समुद्र-तल प्रसरण और प्लेट विवर्तनिकी ने पृथ्वी की गतिशीलता की समझ को किस प्रकार व्यापक बनाया।”

उत्तर लिखने की रूपरेखा

  1. भूमिका: पृथ्वी की सतह की गतिशील प्रकृति और महाद्वीपीय विस्थापन के विचार का परिचय दें।
  2. वेगेनर का सिद्धांत: पैंजिया, पैंथालासा, लॉरेशिया और गोंडवानालैंड का उल्लेख करें।
  3. प्रमाण: तटरेखाओं का साम्य, भूगर्भीय समानताएँ, जीवाश्म और पुराजलवायु प्रमाण समझाएँ।
  4. सीमाएँ: महाद्वीपों की गति के तंत्र की संतोषजनक व्याख्या का अभाव स्पष्ट करें।
  5. समुद्र-तल प्रसरण: मध्य-महासागरीय कटक, चुंबकीय धारियों और महासागरीय चट्टानों की आयु के प्रमाण दें।
  6. प्लेट विवर्तनिकी: अपसारी, अभिसारी और रूपांतर सीमाओं की व्याख्या करें।
  7. निष्कर्ष: भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण और महासागरों के विकास की व्याख्या में प्लेट विवर्तनिकी के महत्त्व को रेखांकित करें।

त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)

शब्द एक पंक्ति में अर्थ
Wegener महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत से संबंधित वैज्ञानिक।
Pangaea प्राचीन महाविशाल भू-भाग।
Panthalassa पैंजिया के चारों ओर स्थित विशाल महासागर।
Laurasia पैंजिया का उत्तरी प्रमुख भाग।
Gondwanaland पैंजिया का दक्षिणी प्रमुख भाग।
Sea-Floor Spreading मध्य-महासागरीय कटकों पर नई महासागरीय भूपर्पटी का निर्माण और विस्तार।
Mid-Oceanic Ridge अपसारी प्लेट सीमा से संबंधित महासागरीय पर्वतीय प्रणाली।
Divergent प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं।
Convergent प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं।
Transform प्लेटें एक-दूसरे के सापेक्ष क्षैतिज रूप से खिसकती हैं।
Subduction एक प्लेट का दूसरी प्लेट के नीचे मेंटल की ओर जाना।
Slab Pull सबडक्शन क्षेत्र में नीचे जाती घनी प्लेट द्वारा खिंचाव।
Ridge Push कटक की ऊँचाई और गुरुत्वीय ढलान से प्लेट गति में योगदान।
Himalaya भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर से संबंधित पर्वतीय प्रणाली।
Mariana Trench विश्व का सबसे गहरा ज्ञात महासागरीय गर्त।
San Andreas Fault कैलिफोर्निया में रूपांतर प्लेट सीमा से संबंधित भ्रंश।
Wilson Cycle महासागरों के खुलने, फैलने, सिकुड़ने और बंद होने की दीर्घकालीन प्रक्रिया।

निष्कर्ष

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत ने यह विचार स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई कि वर्तमान महाद्वीप भूगर्भीय समय में स्थिर नहीं रहे हैं। वेगेनर ने इसके समर्थन में तटरेखाओं, जीवाश्मों, भूगर्भीय संरचनाओं और पुराजलवायु से संबंधित प्रमाण दिए, लेकिन वह महाद्वीपों की गति के तंत्र की पर्याप्त व्याख्या नहीं कर सके।

समुद्र-तल प्रसरण, चुंबकीय प्रमाण और महासागरीय भूपर्पटी की आयु से संबंधित अध्ययनों ने इस विचार को मजबूत वैज्ञानिक आधार दिया। आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी इन प्रमाणों को एक व्यापक सिद्धांत में जोड़ती है और भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण, महासागरीय गर्त तथा महाद्वीपों और महासागरों के दीर्घकालीन विकास को समझने में सहायता करती है।