भारत की नदियाँ देश की भौतिक संरचना, जलवायु, कृषि, अर्थव्यवस्था, सभ्यता और मानव बस्तियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नदियाँ सिंचाई, पेयजल, जलविद्युत, मत्स्य पालन, परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों के लिए जल उपलब्ध कराती हैं।
भारत की अधिकांश प्रमुख नदियाँ अंततः बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में गिरती हैं। हालांकि, कुछ नदियाँ शुष्क क्षेत्रों में झीलों, दलदली भूमि या रेतीले मैदानों में समाप्त हो जाती हैं। इसे अंतर्देशीय अपवाह (Inland Drainage) कहते हैं।
उद्गम, जल की उपलब्धता, प्रवाह की प्रकृति और भू-आकृतिक विशेषताओं के आधार पर भारतीय नदियों को सामान्यतः दो प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है:
| नदी तंत्र | उद्गम एवं प्रवाह | प्रमुख नदियाँ | अंतिम निकास |
|---|---|---|---|
| सिंधु नदी तंत्र | तिब्बती पठार से निकलकर हिमालय और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र से प्रवाहित | सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज | अरब सागर |
| गंगा नदी तंत्र | हिमालय से निकलकर उत्तरी विशाल मैदान में प्रवाहित | गंगा, यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन, गोमती | बंगाल की खाड़ी |
| ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र | तिब्बती पठार से निकलकर अरुणाचल प्रदेश और असम से प्रवाहित | ब्रह्मपुत्र, दिबांग, लोहित, सुबनसिरी | बांग्लादेश में गंगा प्रणाली के साथ बंगाल की खाड़ी |
| पूर्ववाहिनी प्रायद्वीपीय नदियाँ | मुख्यतः पठारी एवं पश्चिमी घाट के क्षेत्रों से निकलती हैं | महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, पेन्नार | मुख्यतः बंगाल की खाड़ी |
| पश्चिमवाहिनी प्रायद्वीपीय नदियाँ | मुख्यतः पश्चिम दिशा में बहती हैं | नर्मदा, तापी, माही, साबरमती | अरब सागर |
हिमालयी नदियों का उद्गम हिमालय, तिब्बती पठार और उससे जुड़े उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में होता है। इनमें वर्षा के साथ-साथ हिमनदों और हिमक्षेत्रों से पिघलने वाला जल भी योगदान देता है।
सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख हिमालयी नदियों का प्रवाह सामान्यतः पूरे वर्ष बना रहता है। इसलिए इन्हें बारहमासी नदियाँ (Perennial Rivers) कहा जाता है। हालांकि, इनके जल प्रवाह की मात्रा मौसम के अनुसार बदलती रहती है।
सिंधु नदी का उद्गम तिब्बती पठार में मानसरोवर झील के निकट क्षेत्र से माना जाता है। यह लद्दाख से होकर बहती है, पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अंततः अरब सागर में गिरती है।
सिंधु नदी तंत्र की पाँच प्रमुख सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज हैं। ये नदियाँ पंजाब क्षेत्र के ऐतिहासिक और भौगोलिक विकास में महत्वपूर्ण रही हैं।
| नदी | उद्गम या प्रमुख विशेषता | नदी तंत्र में योगदान |
|---|---|---|
| झेलम | जम्मू-कश्मीर के कश्मीर घाटी क्षेत्र से संबंधित | चिनाब नदी तंत्र में मिलती है; वुलर झील इसके प्रवाह से संबंधित है। |
| चिनाब | हिमाचल प्रदेश में चंद्र और भागा नदियों के संगम से बनती है | सिंधु नदी तंत्र की प्रमुख सहायक नदी। |
| रावी | हिमाचल प्रदेश के हिमालयी क्षेत्र से निकलती है | पंजाब क्षेत्र से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है। |
| ब्यास | हिमाचल प्रदेश में रोहतांग दर्रे के निकट क्षेत्र से निकलती है | हरिके के निकट सतलुज में मिलती है। |
| सतलुज | तिब्बती पठार के राक्षसताल क्षेत्र के निकट उद्गम | हिमाचल प्रदेश और पंजाब से होकर पाकिस्तान में सिंधु तंत्र का भाग बनती है। |
पंजाब नाम का संबंध पाँच नदियों वाले ऐतिहासिक क्षेत्र से है। ये पाँच नदियाँ हैं:
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी तंत्र के जल के बँटवारे और उपयोग से संबंधित समझौते को सिंधु जल संधि कहा जाता है। इस पर वर्ष 1960 में हस्ताक्षर किए गए थे।
परीक्षा तथ्य: संधि को केवल इस रूप में याद न करें कि पश्चिमी नदियों का जल पूरी तरह भारत के लिए प्रतिबंधित था। संधि में घरेलू उपयोग, गैर-उपभोगात्मक उपयोग और निर्धारित शर्तों के अंतर्गत अन्य उपयोगों के प्रावधान भी हैं।
गंगा नदी तंत्र उत्तरी भारत के विशाल जलोढ़ मैदान के निर्माण, कृषि, पेयजल और जनसंख्या के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी सहायक नदियाँ हिमालयी और प्रायद्वीपीय दोनों क्षेत्रों से आती हैं।
गंगा की मुख्य धारा का निर्माण उत्तराखंड में देवप्रयाग के निकट भागीरथी और अलकनंदा नदियों के संगम से होता है। इसके बाद नदी को गंगा कहा जाता है।
| नदी | उद्गम या प्रमुख क्षेत्र | गंगा तंत्र में महत्व |
|---|---|---|
| यमुना | उत्तराखंड का यमुनोत्री हिमनद क्षेत्र | प्रयागराज में गंगा से मिलती है। |
| घाघरा | हिमालयी क्षेत्र; नेपाल से होकर भारत में प्रवेश | गंगा की प्रमुख हिमालयी सहायक नदी। |
| गंडक | नेपाल हिमालय | बिहार में गंगा नदी तंत्र में मिलती है। |
| कोसी | नेपाल और तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों से संबंधित नदी तंत्र | बाढ़, अवसाद निक्षेपण और नदी मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध। |
| सोन | अमरकंटक पठारी क्षेत्र | प्रायद्वीपीय भारत से आने वाली प्रमुख गंगा सहायक नदी। |
| गोमती | उत्तर प्रदेश के पीलीभीत क्षेत्र से संबंधित | उत्तर प्रदेश से होकर गंगा में मिलती है। |
| रामगंगा | उत्तराखंड का कुमाऊँ हिमालय | गंगा की प्रमुख सहायक नदियों में से एक। |
| महानंदा | दार्जिलिंग हिमालय क्षेत्र | गंगा की पूर्वी सहायक नदी प्रणाली का भाग। |
यमुना का उद्गम उत्तराखंड में यमुनोत्री हिमनद के निकट होता है। यह हिमालय से निकलकर उत्तर भारत के मैदान में प्रवेश करती है और प्रयागराज में गंगा से मिलती है।
चंबल, सिंध, बेतवा और केन यमुना की प्रमुख प्रायद्वीपीय सहायक नदियाँ हैं।
गंगा और ब्रह्मपुत्र की संयुक्त नदी प्रणाली, जिसमें बांग्लादेश की मेघना नदी प्रणाली भी सम्मिलित होती है, विश्व के सबसे बड़े डेल्टा क्षेत्रों में से एक का निर्माण करती है।
इस डेल्टा के दक्षिणी भाग में सुंदरबन का विशाल मैंग्रोव वन क्षेत्र स्थित है। यह क्षेत्र जैव विविधता, तटीय सुरक्षा और बाघों के प्राकृतिक आवास के लिए प्रसिद्ध है।
ब्रह्मपुत्र का उद्गम तिब्बती पठार में हिमालय के निकट क्षेत्र से होता है। तिब्बत में इसे यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है।
हिमालय को पार करके भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद नदी सियांग या दिहांग नाम से जानी जाती है। दिबांग और लोहित जैसी नदियों के मिलने के बाद असम में इसका प्रमुख नाम ब्रह्मपुत्र हो जाता है। बांग्लादेश में इसकी मुख्य धारा को जमुना कहा जाता है।
माजुली असम में ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित एक प्रसिद्ध नदी द्वीप है। इसका भौगोलिक आकार नदी के अपरदन, अवसाद निक्षेपण और बाढ़ के कारण समय के साथ बदलता रहा है। यह अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और वैष्णव सत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
| आधार | हिमालयी नदियाँ | प्रायद्वीपीय नदियाँ |
|---|---|---|
| उद्गम | हिमालय, हिमनद और उच्च पर्वतीय क्षेत्र | पठार, पश्चिमी घाट और अन्य उच्चभूमि |
| जल का स्रोत | वर्षा और हिम-पिघलाव दोनों | मुख्यतः मानसूनी वर्षा; कुछ नदियों में अन्य स्रोतों का भी योगदान |
| प्रवाह | प्रमुख नदियाँ सामान्यतः बारहमासी | प्रवाह वर्षा और जलग्रहण क्षेत्र की स्थितियों से अधिक प्रभावित |
| घाटियाँ | ऊपरी भाग में गहरी और संकरी घाटियाँ | प्राचीन भू-भाग में विकसित घाटियाँ; कई स्थानों पर चौड़ी घाटियाँ |
| अपरदन एवं निक्षेपण | पर्वतों में अपरदन और मैदानों में निक्षेपण प्रमुख | भू-भाग, ढाल और वर्षा के अनुसार भिन्नता |
| बाढ़ | मानसूनी वर्षा, हिम-पिघलाव और अवसाद से प्रभावित | अत्यधिक वर्षा, बाँध संचालन और जलग्रहण क्षेत्र की स्थितियों से प्रभावित |
| डेल्टा | गंगा-ब्रह्मपुत्र जैसे तंत्र विशाल डेल्टा बनाते हैं | पूर्ववाहिनी नदियाँ सामान्यतः बड़े डेल्टा बनाती हैं |
प्रायद्वीपीय नदियाँ भारत के प्राचीन पठारी भू-भाग से संबंधित हैं। इनका अपवाह तंत्र लंबे भूवैज्ञानिक विकास, चट्टानों की संरचना, ढाल और मानसूनी वर्षा से प्रभावित होता है।
प्रायद्वीपीय नदियों को प्रवाह की दिशा के आधार पर दो प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है:
इनमें से प्रमुख नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। अपने मुहाने के निकट अवसाद जमा करने पर ये डेल्टा का निर्माण कर सकती हैं। डेल्टा का आकार नदी द्वारा लाए गए अवसाद, समुद्री तरंगों और ज्वारीय क्रियाओं पर निर्भर करता है।
महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के निकट सिहावा पर्वतीय क्षेत्र में होता है। यह छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होकर बहती है तथा बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
महानदी बेसिन कृषि और जल संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ओडिशा में महानदी पर हीराकुंड बाँध स्थित है, जो सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन के लिए उपयोगी है।
गोदावरी का उद्गम महाराष्ट्र में नासिक के निकट त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में पश्चिमी घाट से होता है। यह पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है। इसे दक्षिण गंगा (Dakshin Ganga) भी कहा जाता है। इसका नदी बेसिन महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में फैला है।
प्रमुख सहायक नदियाँ: प्राणहिता, इंद्रावती, मंजरा, सबरी और पूर्णा।
कृष्णा नदी का उद्गम महाराष्ट्र में महाबलेश्वर के निकट पश्चिमी घाट से होता है। यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के नदी बेसिन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। अंततः यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
प्रमुख सहायक नदियाँ: भीमा, तुंगभद्रा, घटप्रभा, मलप्रभा और मूसी।
तुंगा और भद्रा नदियाँ कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र से निकलती हैं और इनके संगम से तुंगभद्रा नदी बनती है। तुंगभद्रा आगे कृष्णा नदी में मिलती है।
कावेरी का उद्गम कर्नाटक के पश्चिमी घाट में ब्रह्मगिरि पर्वत क्षेत्र के तालकावेरी के निकट होता है। यह कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बहती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
कावेरी नदी दक्षिण भारत में सिंचाई, कृषि, पेयजल और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण है। इसके जल के बँटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु सहित संबंधित राज्यों के बीच लंबे समय से विवाद रहे हैं।
प्रमुख सहायक नदियाँ: काबिनी, हेमावती, शिम्शा और भवानी।
भारत की प्रमुख पश्चिमवाहिनी प्रायद्वीपीय नदियों में नर्मदा और तापी विशेष महत्व रखती हैं। माही और साबरमती भी पश्चिम दिशा में बहकर अरब सागर की खाड़ी में गिरती हैं।
नर्मदा का उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक पठारी क्षेत्र में होता है। यह मुख्यतः पश्चिम दिशा में बहती हुई खंभात की खाड़ी के माध्यम से अरब सागर में गिरती है।
नर्मदा नदी एक भ्रंश-निर्मित घाटी से होकर बहती है। इसके उत्तर में विंध्य और दक्षिण में सतपुड़ा पर्वतीय क्षेत्र स्थित हैं। नर्मदा घाटी का भू-आकृतिक महत्व अत्यधिक है।
तापी नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में मुलताई के निकट सतपुड़ा क्षेत्र से होता है। यह पश्चिम की ओर बहते हुए महाराष्ट्र और गुजरात के क्षेत्रों से गुजरती है तथा खंभात की खाड़ी में गिरती है।
माही नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के धार क्षेत्र में होता है। यह मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात से होकर बहती है तथा खंभात की खाड़ी में गिरती है।
महत्वपूर्ण तथ्य: माही नदी कर्क रेखा को दो बार काटती है। यह तथ्य भूगोल की प्रतियोगी परीक्षाओं में महत्वपूर्ण है।
साबरमती का उद्गम राजस्थान के अरावली क्षेत्र में होता है। यह राजस्थान और गुजरात से होकर बहती है तथा खंभात की खाड़ी में गिरती है। अहमदाबाद नगर साबरमती नदी के किनारे स्थित है।
| नदी | उद्गम क्षेत्र | प्रवाह की दिशा | अंतिम निकास | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| सिंधु | तिब्बती पठार | मुख्यतः उत्तर-पश्चिम और दक्षिण की ओर | अरब सागर | पाँच प्रमुख सहायक नदियों वाला नदी तंत्र। |
| गंगा | भागीरथी-अलकनंदा संगम, देवप्रयाग | मुख्यतः पूर्व की ओर | बंगाल की खाड़ी | उत्तरी मैदान की प्रमुख नदी प्रणाली। |
| ब्रह्मपुत्र | तिब्बती पठार | पूर्व से दक्षिण और फिर पश्चिम-दक्षिण की ओर | गंगा प्रणाली के साथ बंगाल की खाड़ी | असम में बाढ़ और विशाल नदी द्वीपों के लिए प्रसिद्ध। |
| महानदी | सिहावा क्षेत्र, छत्तीसगढ़ | मुख्यतः पूर्व की ओर | बंगाल की खाड़ी | हीराकुंड बाँध इसी नदी पर स्थित है। |
| गोदावरी | त्र्यंबकेश्वर, महाराष्ट्र | पूर्व की ओर | बंगाल की खाड़ी | प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी। |
| कृष्णा | महाबलेश्वर, पश्चिमी घाट | मुख्यतः पूर्व की ओर | बंगाल की खाड़ी | भीमा और तुंगभद्रा प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। |
| कावेरी | तालकावेरी, कर्नाटक | मुख्यतः दक्षिण-पूर्व की ओर | बंगाल की खाड़ी | दक्षिण भारत की महत्वपूर्ण सिंचाई नदी। |
| नर्मदा | अमरकंटक, मध्य प्रदेश | पश्चिम की ओर | खंभात की खाड़ी | भ्रंश-निर्मित घाटी से होकर बहती है। |
| तापी | मुलताई, मध्य प्रदेश | पश्चिम की ओर | खंभात की खाड़ी | सतपुड़ा क्षेत्र से निकलती है। |
| माही | मध्य प्रदेश | पश्चिम की ओर | खंभात की खाड़ी | कर्क रेखा को दो बार काटती है। |
| साबरमती | अरावली क्षेत्र, राजस्थान | दक्षिण-पश्चिम की ओर | खंभात की खाड़ी | अहमदाबाद इसके किनारे स्थित है। |
किसी नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा जल निकासी किए जाने वाले पूरे क्षेत्र को अपवाह बेसिन (Drainage Basin) कहा जाता है। इस क्षेत्र में गिरने वाला जल सामान्यतः संबंधित नदी प्रणाली की ओर प्रवाहित होता है।
दो अपवाह बेसिनों को अलग करने वाली ऊँची भूमि या पर्वतीय सीमा को जल विभाजक (Water Divide) कहते हैं। यह किसी पहाड़ी, पर्वत श्रेणी या पठारी उच्चभूमि के रूप में हो सकता है।
जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area) शब्द का प्रयोग किसी नदी, जलाशय या अन्य जल निकाय में जल पहुँचाने वाले क्षेत्र के लिए किया जाता है। इसका उपयोग कई संदर्भों में अपवाह बेसिन के समान अर्थ में भी होता है।
नदी के प्रवाह को अध्ययन की सुविधा के लिए सामान्यतः ऊपरी, मध्य और निचले भागों में समझा जाता है। वास्तविक नदियों में इन भागों की सीमाएँ हमेशा स्पष्ट नहीं होतीं।
| नदी का भाग | प्रमुख प्रक्रिया | सामान्य स्थलरूप |
|---|---|---|
| ऊपरी भाग | ऊर्ध्वाधर अपरदन अधिक प्रभावी | V-आकार की घाटी, गॉर्ज, जलप्रपात |
| मध्य भाग | पार्श्व अपरदन और परिवहन | विसर्प, चौड़ी घाटी, बाढ़ मैदान का विकास |
| निचला भाग | अवसाद निक्षेपण अधिक प्रभावी हो सकता है | बाढ़ मैदान, प्राकृतिक तटबंध, वितरिकाएँ, डेल्टा |
जब नदी अपने मुहाने के निकट अवसाद जमा करती है और नदी की मुख्य धारा कई छोटी धाराओं या वितरिकाओं में विभाजित हो जाती है, तो डेल्टा का निर्माण हो सकता है।
मुहाना (Estuary) नदी का वह चौड़ा, अक्सर कीप के आकार का समुद्री प्रवेश क्षेत्र है, जहाँ नदी का मीठा जल समुद्री जल से मिलता है। ऐसे क्षेत्रों में ज्वार-भाटा का प्रभाव महत्वपूर्ण होता है।
किसी नदी का डेल्टा या मुहाना बनना केवल उसकी प्रवाह दिशा पर निर्भर नहीं करता। अवसाद की मात्रा, समुद्री तरंगें, ज्वार-भाटा, तटीय ढाल और समुद्र की स्थिति भी इसे प्रभावित करती हैं।
| आधार | डेल्टा | मुहाना |
|---|---|---|
| निर्माण | मुहाने पर अवसाद के पर्याप्त निक्षेपण से | नदी के समुद्र में प्रवेश करने वाले चौड़े क्षेत्र में |
| आकार | त्रिकोणाकार या पंखे जैसा हो सकता है | अक्सर कीप जैसा चौड़ा प्रवेश क्षेत्र |
| नदी की धाराएँ | अनेक वितरिकाएँ बन सकती हैं | मुख्य धारा का चौड़ा प्रवेश क्षेत्र अधिक प्रमुख होता है |
| समुद्री प्रभाव | तरंगों और ज्वार की शक्ति के सापेक्ष निक्षेपण महत्वपूर्ण | ज्वार-भाटा और समुद्री जल का मिश्रण महत्वपूर्ण |
| उदाहरण | गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी | नर्मदा और तापी के मुहाने के क्षेत्र |
अंतर्देशीय अपवाह उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुँचतीं। ऐसी नदियाँ झीलों, दलदली क्षेत्रों, अस्थायी जलाशयों या रेतीले मैदानों में समाप्त हो सकती हैं। यह व्यवस्था शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
राजस्थान के कुछ भाग अंतर्देशीय अपवाह के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। घग्गर नदी को भी इस संदर्भ में पढ़ा जाता है। हालांकि, घग्गर के ऐतिहासिक प्रवाह, प्राचीन नदी प्रणालियों से संबंध और उसके पुराने मार्गों की व्याख्या में अलग-अलग शोध निष्कर्ष मिलते हैं।
जलविद्युत उत्पादन के लिए जल के प्रवाह और ऊँचाई के अंतर का उपयोग किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में तीव्र ढाल और ऊँचाई का अंतर कई स्थानों पर जलविद्युत परियोजनाओं के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करता है।
बाँधों और जलाशयों से सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, बाढ़ प्रबंधन और बिजली उत्पादन में सहायता मिल सकती है। हालांकि, इनके कारण नदी के प्राकृतिक प्रवाह, अवसाद परिवहन, मछलियों के आवागमन, स्थानीय समुदायों और नदी पारिस्थितिकी पर प्रभाव भी पड़ सकते हैं।
भारत की प्राचीन सभ्यताओं और नगरों का विकास कई नदी घाटियों के आसपास हुआ। सिंधु घाटी सभ्यता, गंगा घाटी में नगरीकरण और दक्षिण भारत की नदी घाटियों का ऐतिहासिक महत्व इसका उदाहरण है।
नदियों ने कृषि, व्यापार, परिवहन, धार्मिक परंपराओं और बस्तियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी अनेक भारतीय नगरों और औद्योगिक क्षेत्रों की जल आवश्यकताएँ नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं।
घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपवाह, प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरा नदियों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। अनुपचारित अपशिष्ट से जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घट सकती है और जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नदी संरक्षण के प्रमुख उपाय:
भारत की अनेक नदियाँ एक से अधिक राज्यों से होकर बहती हैं। इसलिए सिंचाई, पेयजल, जलविद्युत, बाँध संचालन और जल के वितरण को लेकर राज्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नदी विवाद:
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित प्रावधान करता है। संसद इस विषय पर कानून बना सकती है। अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 भी इस विषय में महत्वपूर्ण है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अपवाह (Drainage) | किसी क्षेत्र से जल के बहकर निकलने की व्यवस्था। |
| अपवाह बेसिन (Drainage Basin) | वह क्षेत्र जहाँ का जल किसी नदी और उसकी सहायक नदियों में पहुँचता है। |
| जल विभाजक (Water Divide) | दो अपवाह बेसिनों को अलग करने वाली ऊँची भूमि। |
| सहायक नदी (Tributary) | वह नदी जो किसी दूसरी नदी में मिलती है। |
| वितरिका (Distributary) | मुख्य नदी से अलग होकर बहने वाली धारा, विशेषकर डेल्टा क्षेत्रों में। |
| बारहमासी नदी (Perennial River) | ऐसी नदी जिसमें सामान्यतः पूरे वर्ष प्रवाह बना रहता है। |
| जलोढ़ (Alluvium) | नदी द्वारा परिवहित और जमा की गई मिट्टी, बालू, गाद तथा अन्य अवसाद। |
| विसर्प (Meander) | मैदानी क्षेत्रों में नदी के मार्ग का घुमावदार होना। |
| डेल्टा (Delta) | नदी के मुहाने पर अवसाद निक्षेपण से निर्मित स्थलरूप। |
| मुहाना (Estuary) | नदी का समुद्र में प्रवेश करने वाला चौड़ा क्षेत्र, जहाँ मीठे और खारे जल का मिश्रण हो सकता है। |
| पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow) | नदी पारिस्थितिकी और उससे जुड़ी आवश्यकताओं को बनाए रखने के लिए जरूरी नदी प्रवाह। |
भारत की नदी प्रणालियों को समझने के लिए केवल नदियों के नाम, उद्गम और अंतिम निकास याद करना पर्याप्त नहीं है। नदी की भौतिक संरचना, जल उपलब्धता, सहायक नदियाँ, अपवाह बेसिन, अवसाद परिवहन और मानव उपयोग के बीच संबंध को समझना आवश्यक है।
हिमालयी नदियाँ उत्तरी मैदानों के निर्माण और जल संसाधनों में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ पठारी भू-भाग, मानसूनी वर्षा, सिंचाई और जलविद्युत से गहराई से जुड़ी हैं। दोनों प्रणालियाँ बाढ़, सूखा, प्रदूषण, पारिस्थितिक परिवर्तन और जल वितरण जैसी चुनौतियों का सामना करती हैं।
प्रभावी नदी प्रबंधन के लिए केवल राज्य की सीमाओं को ध्यान में रखना पर्याप्त नहीं है। नदी के पूरे बेसिन, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, आर्द्रभूमियों, पर्यावरणीय प्रवाह और नदी पर निर्भर समुदायों को साथ लेकर योजना बनाना आवश्यक है।
| विषय | याद रखने योग्य तथ्य |
|---|---|
| हिमालयी नदियाँ | सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र प्रमुख नदी प्रणालियाँ हैं। |
| पंचनद | झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। |
| देवप्रयाग | भागीरथी + अलकनंदा = गंगा। |
| यमुना | यमुनोत्री क्षेत्र से निकलती है और प्रयागराज में गंगा से मिलती है। |
| दक्षिण गंगा | गोदावरी। |
| पूर्ववाहिनी नदियाँ | महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी। |
| पश्चिमवाहिनी नदियाँ | नर्मदा, तापी, माही और साबरमती। |
| भ्रंश-निर्मित घाटी | नर्मदा और तापी के नदी मार्ग से संबंधित महत्वपूर्ण विशेषता। |
| कर्क रेखा | माही नदी इसे दो बार काटती है। |
| डेल्टा | गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के मुहाने पर। |
| अंतर्देशीय अपवाह | राजस्थान के शुष्क क्षेत्र और घग्गर नदी महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। |
भारत की नदियाँ देश की भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना का महत्वपूर्ण आधार हैं। हिमालयी नदियों की बारहमासी प्रकृति, प्रायद्वीपीय नदियों की विशिष्ट भू-आकृति और दोनों प्रणालियों के विस्तृत अपवाह बेसिन भारत के जल संसाधनों को विविध स्वरूप प्रदान करते हैं।
UPSC की तैयारी के लिए नदियों के उद्गम, सहायक नदियों, प्रवाह की दिशा, बेसिन, डेल्टा और मुहाने के साथ-साथ बाढ़, प्रदूषण, जलविद्युत, अंतर-राज्यीय विवाद और नदी संरक्षण को भी समझना आवश्यक है।