पृथ्वी की सतह पर या उसके निकट चट्टानों का अपने मूल स्थान पर टूटना, विखंडित होना अथवा रासायनिक रूप से परिवर्तित होना अपक्षय (Weathering) कहलाता है।
अपक्षय में पदार्थ का अपने मूल स्थान से परिवहन आवश्यक नहीं है। इसके विपरीत, अपरदन में पदार्थ का कटाव या निष्कासन तथा सामान्यतः उसका परिवहन शामिल होता है।
अपक्षय मृदा निर्माण, चट्टानों के विखंडन, ढालों के विकास और पृथ्वी की सतह पर विभिन्न स्थलरूपों के परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उदाहरण के लिए, चट्टान की दरारों में जल के जमने से चट्टान का टूटना अपक्षय है। यदि टूटा हुआ पदार्थ नदी द्वारा बहाकर दूर ले जाया जाता है, तो यह परिवहन अपरदनकारी प्रक्रिया का हिस्सा है।
| आधार | अपक्षय (Weathering) | अपरदन (Erosion) | निक्षेपण (Deposition) |
|---|---|---|---|
| मुख्य अर्थ | चट्टानों का टूटना या रासायनिक परिवर्तन | पदार्थ का कटाव, निष्कासन और परिवहन | परिवहित पदार्थ का जमा होना |
| स्थान परिवर्तन | आवश्यक नहीं | आमतौर पर होता है | नए स्थान पर पदार्थ जमा हो सकता है |
| मुख्य कारक | तापमान, जल, वायु, रासायनिक अभिक्रियाएँ और जीव | नदी, हिमनद, वायु, समुद्री तरंगें और गुरुत्वाकर्षण | प्रवाह की ऊर्जा में कमी, गुरुत्व और परिवहन की परिस्थितियाँ |
| उदाहरण | चट्टान का पाला क्रिया से टूटना | नदी द्वारा अवसाद बहाकर ले जाना | नदी के मुहाने पर डेल्टा का विकास |
UPSC तथ्य: अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण संबंधित प्रक्रियाएँ हैं, लेकिन एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। अपक्षय के बाद अपरदन हो सकता है, परंतु अपरदन के लिए हर स्थिति में पहले स्थानीय चट्टान का अपक्षय होना आवश्यक नहीं है।
अपक्षय को सामान्यतः तीन प्रमुख श्रेणियों में बाँटा जाता है। वास्तविक परिस्थितियों में ये प्रक्रियाएँ अक्सर एक साथ काम करती हैं।
| प्रकार | मुख्य प्रक्रिया | सामान्य उदाहरण |
|---|---|---|
| भौतिक या यांत्रिक अपक्षय | चट्टान का बिना महत्त्वपूर्ण रासायनिक परिवर्तन के टूटना | पाला क्रिया, तापीय तनाव, लवणीय क्रिस्टल वृद्धि |
| रासायनिक अपक्षय | खनिजों की रासायनिक संरचना या अवस्था में परिवर्तन | ऑक्सीकरण, कार्बोनेशन, जल अपघटन |
| जैविक अपक्षय | जीवों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष क्रियाओं से चट्टानों का टूटना या परिवर्तन | जड़ों का दरारों में बढ़ना, जैविक अम्लों की क्रिया |
जैविक अपक्षय को हमेशा भौतिक और रासायनिक अपक्षय से पूरी तरह अलग प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए, पौधों की जड़ें चट्टान को यांत्रिक रूप से तोड़ सकती हैं और उनसे उत्पन्न जैविक अम्ल रासायनिक अपक्षय को बढ़ा सकते हैं।
जब चट्टान की रासायनिक संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए बिना उसका विखंडन होता है, तो इसे भौतिक या यांत्रिक अपक्षय कहते हैं।
तापमान में परिवर्तन के कारण चट्टान के खनिज फैलते और सिकुड़ते हैं। अलग-अलग खनिजों के तापीय व्यवहार में अंतर होने से चट्टान के भीतर तनाव उत्पन्न हो सकता है। लंबे समय तक तापीय तनाव की पुनरावृत्ति चट्टान में दरारों और विखंडन को बढ़ावा दे सकती है।
दैनिक तापमान में अधिक अंतर वाले शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में यह प्रक्रिया हो सकती है। हालाँकि, चट्टानों के टूटने का कारण केवल दिन-रात का तापांतर ही नहीं होता; खनिजीय संरचना, नमी और पहले से मौजूद दरारें भी महत्त्वपूर्ण हैं।
चट्टान की दरारों में प्रवेश किया हुआ जल जमने पर फैलता है। बार-बार जमने और पिघलने से दरारों पर तनाव उत्पन्न हो सकता है, जिससे चट्टान का विखंडन होता है। इस प्रक्रिया को पाला अपक्षय (Frost Weathering) कहते हैं।
यह प्रक्रिया ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों तथा उन उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण हो सकती है जहाँ तापमान बार-बार हिमांक के ऊपर और नीचे जाता है।
जब ऊपर स्थित चट्टानों का अपरदन होकर भार कम होता है, तो नीचे की चट्टानों में दाब कम हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप चट्टान फैल सकती है और उसकी सतह के समानांतर दरारें विकसित हो सकती हैं। बाहरी परतों के छिलकों की तरह अलग होने की प्रक्रिया को परत-विमोचन (Exfoliation) कहा जाता है।
यह प्रक्रिया विशेष रूप से कुछ बड़े आग्नेय शैल-पिंडों में देखी जाती है। इसे केवल दैनिक तापमान के उतार-चढ़ाव का परिणाम मानना उचित नहीं है।
लवणयुक्त जल चट्टानों की दरारों या छिद्रों में प्रवेश कर सकता है। जल के वाष्पीकरण के बाद लवण के क्रिस्टल बनते हैं। क्रिस्टलों की वृद्धि और बार-बार होने वाले घुलने-जमने के चक्र चट्टान को कमजोर कर सकते हैं।
यह प्रक्रिया शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के साथ-साथ समुद्री तटों पर भी प्रभावी हो सकती है।
जब जल, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य पदार्थों के साथ रासायनिक अभिक्रियाओं के कारण चट्टानों के खनिज बदल जाते हैं, तो इसे रासायनिक अपक्षय कहते हैं।
गर्म एवं आर्द्र जलवायु में रासायनिक अपक्षय सामान्यतः अधिक सक्रिय होता है, क्योंकि वहाँ पर्याप्त जल उपलब्ध होता है और अपेक्षाकृत उच्च तापमान अनेक रासायनिक अभिक्रियाओं की दर बढ़ाता है।
कुछ खनिज जल में घुलकर विलयन का हिस्सा बन जाते हैं। घुलनशीलता खनिज की प्रकृति, जल के तापमान और जल में घुले पदार्थों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, हैलाइट जैसे लवणीय खनिज जल में आसानी से घुल सकते हैं।
वर्षा का जल वायुमंडल तथा मिट्टी से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण कर हल्का अम्लीय बन सकता है। इससे बना कार्बोनिक अम्ल चूना पत्थर में उपस्थित कैल्साइट के घुलने में सहायता करता है।
इस प्रक्रिया का विशेष महत्त्व चूना पत्थर वाले क्षेत्रों में है, जहाँ लंबे समय में कार्स्ट स्थलाकृतियाँ विकसित हो सकती हैं।
ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया होने पर कुछ खनिज रासायनिक रूप से परिवर्तित हो जाते हैं। लौहयुक्त खनिजों का ऑक्सीकरण इसका सामान्य उदाहरण है। इससे चट्टानों में लाल, पीले या भूरे रंग के लौह ऑक्साइड बन सकते हैं।
कुछ खनिज जल को अपनी संरचना में ग्रहण करते हैं। इससे उनके आयतन, संरचना या भौतिक गुणों में परिवर्तन हो सकता है।
जल के साथ रासायनिक अभिक्रिया के कारण कुछ खनिज विघटित होकर नए खनिजों में बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, फेल्डस्पार के जल अपघटन से मृत्तिका खनिज बन सकते हैं।
| प्रक्रिया | मुख्य प्रभाव | उदाहरण |
|---|---|---|
| घुलन | खनिज का जल में घुलना | हैलाइट का घुलना |
| कार्बोनेशन | कार्बन डाइऑक्साइड युक्त जल द्वारा खनिजों का घुलना | चूना पत्थर का अपक्षय |
| ऑक्सीकरण | ऑक्सीजन के साथ रासायनिक परिवर्तन | लौहयुक्त खनिजों का परिवर्तन |
| जलयोजन | खनिज संरचना में जल का सम्मिलित होना | कुछ निर्जल खनिजों का जलयुक्त खनिजों में बदलना |
| जल अपघटन | जल के साथ अभिक्रिया से खनिजों का विघटन | फेल्डस्पार से मृत्तिका खनिजों का निर्माण |
चूना पत्थर और डोलोमाइट जैसी घुलनशील चट्टानों में जल द्वारा होने वाले घुलन एवं रासायनिक अपक्षय से विकसित स्थलरूपों को कार्स्ट स्थलाकृति कहा जाता है।
जल चट्टानों की दरारों से नीचे प्रवेश करता है। लंबे समय तक घुलन की प्रक्रिया से भूमिगत मार्ग, गुफाएँ और सतह पर अवसाद जैसी आकृतियाँ बन सकती हैं।
याद रखें: स्टैलेक्टाइट छत से नीचे आती है, जबकि स्टैलेग्माइट फर्श से ऊपर उठती है। इन संरचनाओं का विकास खनिजयुक्त जल से कैल्सियम कार्बोनेट के निक्षेपण द्वारा होता है।
पौधों, सूक्ष्मजीवों, जीव-जंतुओं और मनुष्यों की गतिविधियों से चट्टानों का टूटना या रासायनिक परिवर्तन जैविक अपक्षय में शामिल किया जा सकता है।
जैविक गतिविधियों का प्रभाव परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वनस्पति कुछ स्थानों पर अपक्षय बढ़ा सकती है, जबकि उसका आवरण मृदा को जल और वायु के अपरदन से बचाने में भी मदद करता है।
| कारक | प्रभाव | उदाहरण |
|---|---|---|
| जलवायु | तापमान और नमी अपक्षय की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं | गर्म एवं आर्द्र क्षेत्रों में प्रायः तीव्र रासायनिक अपक्षय |
| चट्टान की संरचना | खनिज, कठोरता, घुलनशीलता और दरारें अपक्षय की संवेदनशीलता बदलती हैं | चूना पत्थर का कार्बोनेशन द्वारा घुलना |
| स्थलाकृति | ढाल, जल निकासी और सतही जल के ठहराव को प्रभावित करती है | तीव्र ढाल पर अपक्षयित पदार्थ का शीघ्र हटना |
| जीव-जंतु एवं वनस्पति | जड़ों, जैविक अम्लों और जीवों की गतिविधियों से परिवर्तन | जड़ों द्वारा दरारों का चौड़ा होना |
| समय | लंबे समय में परिवर्तन और विखंडन बढ़ सकता है | चूना पत्थर में गुफाओं का विकास |
गर्म एवं आर्द्र क्षेत्रों में जल की उपलब्धता और तापमान के कारण रासायनिक अपक्षय प्रायः अधिक सक्रिय होता है। शुष्क क्षेत्रों में जल की कमी रासायनिक अपक्षय को सीमित कर सकती है, जबकि तापीय तनाव और लवणीय क्रियाएँ महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं।
ठंडे क्षेत्रों में पाला क्रिया प्रभावी हो सकती है, विशेषकर जहाँ तापमान हिमांक के आसपास बार-बार बदलता है। फिर भी किसी क्षेत्र में अपक्षय का प्रकार केवल जलवायु से तय नहीं होता; चट्टान और स्थानीय परिस्थितियाँ भी निर्णायक होती हैं।
पृथ्वी की सतह से पदार्थ का कटाव या निष्कासन तथा उसका एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवहन अपरदन की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इसके प्रमुख कारकों में बहता जल, हिमनद, वायु और समुद्री तरंगें शामिल हैं। गुरुत्वाकर्षण ढाल पर पदार्थ के संचलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अपरदन की दर जल या वायु की गति, ढाल, चट्टान की प्रकृति, वनस्पति आवरण और उपलब्ध अवसाद पर निर्भर करती है।
परिवहन करने वाले कारक की ऊर्जा कम होने पर अवसाद जमा हो सकते हैं। इस प्रक्रिया से नदी के मैदान, डेल्टा, बालू के टीले और अन्य निक्षेपण स्थलरूप विकसित होते हैं।
बहता हुआ नदी जल अपने तल और किनारों का कटाव कर सकता है। नदी द्वारा वहन किए जाने वाले रेत, कंकड़ और अन्य अवसाद भी चट्टानों से टकराकर घर्षण द्वारा अपरदन करते हैं।
नदी अपरदन की प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं:
नदी के ऊपरी प्रवाह में सामान्यतः अधिक ढाल होने के कारण ऊर्ध्वाधर अपरदन और घाटी की गहराई बढ़ाने का महत्त्व अधिक हो सकता है। मध्य प्रवाह में पार्श्व अपरदन और विसर्पों का विकास महत्त्वपूर्ण होता है। निचले प्रवाह में निक्षेपण का महत्त्व प्रायः बढ़ जाता है।
यह एक सामान्य प्रवृत्ति है, कोई कठोर नियम नहीं। नदी की भूगर्भीय संरचना, जल की मात्रा, बाढ़ और मानव निर्मित अवरोध इस क्रम को बदल सकते हैं।
| स्थलरूप | प्रमुख विशेषता | निर्माण की प्रक्रिया |
|---|---|---|
| V-आकार की घाटी | अंग्रेजी अक्षर V जैसी घाटी | ऊर्ध्वाधर नदी अपरदन और ढाल से नीचे पदार्थ के संचलन का संयुक्त प्रभाव |
| गॉर्ज (Gorge) | गहरी और संकरी घाटी | तीव्र घाटी कटाव, उत्थान या अन्य भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ |
| कैन्यन (Canyon) | गहरी घाटी और प्रायः खड़ी दीवारें | दीर्घकालीन नदी कटाव; शुष्क क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है |
| जलप्रपात (Waterfall) | नदी के तल में अचानक ऊँचाई का अंतर | कठोर एवं नरम चट्टानों का असमान अपरदन, भ्रंश या अन्य कारण |
| गर्त (Pothole) | नदी तल में गोलाकार गड्ढे | घूमते हुए कंकड़ों और जल के घर्षण से |
| विसर्प (Meander) | नदी के घुमावदार मोड़ | नदी के बाहरी किनारे पर अधिक कटाव और भीतरी किनारे पर निक्षेपण |
| बाढ़ मैदान (Floodplain) | नदी के दोनों ओर अपेक्षाकृत समतल क्षेत्र | बाढ़ के दौरान महीन अवसादों का निक्षेपण और नदी की पार्श्व गतिविधियाँ |
| डेल्टा (Delta) | नदी के मुहाने पर विकसित निक्षेपण क्षेत्र | जब नदी अवसाद जमा करती है और समुद्री या झील की परिस्थितियाँ इसकी अनुमति देती हैं |
परीक्षा उपयोगी तथ्य: नदी के विसर्प में सामान्यतः बाहरी किनारे पर कटाव तथा भीतरी किनारे पर निक्षेपण होता है। इसलिए नदी के मोड़ का बाहरी भाग प्रायः अधिक गहरा हो सकता है।
हिमनद गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से धीरे-धीरे गतिशील होने वाला बर्फ का विशाल पिंड है। गतिशील हिमनद अपने तल और किनारों पर स्थित चट्टानों का अपरदन कर सकता है तथा अपने साथ चट्टानी पदार्थों का परिवहन करता है।
हिमनदीय अपरदन की प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं:
UPSC अंतर: नदीय घाटी प्रायः V-आकार की और हिमनदीय घाटी प्रायः U-आकार की होती है। यह सामान्य विशेषता है; सभी घाटियों का आकार केवल एक प्रक्रिया से निर्धारित नहीं होता।
वायु द्वारा मिट्टी, धूल और रेत का हटना तथा परिवहन वायु अपरदन का हिस्सा है। यह शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो सकता है, जहाँ वनस्पति आवरण कम और ढीले कण उपलब्ध होते हैं।
वायु अपरदन की प्रमुख प्रक्रियाएँ:
वायु द्वारा महीन कणों का निलंबन, छोटे कणों का उछलकर आगे बढ़ना और बड़े कणों का सतह पर लुढ़कना या सरकना—ये रेत और धूल के परिवहन के प्रमुख तरीके हैं।
समुद्री तरंगें तटीय चट्टानों पर प्रहार करती हैं। तरंगों के साथ मौजूद रेत, कंकड़ और अन्य पदार्थ भी चट्टानों को घिस सकते हैं। तटीय अपरदन तरंगों की ऊर्जा, चट्टानों की संरचना, दरारों, समुद्र-स्तर और तट की आकृति से प्रभावित होता है।
सामान्य क्रम में गुफा से मेहराब और फिर स्तंभ विकसित हो सकता है, लेकिन यह हर तट पर होने वाला अनिवार्य क्रम नहीं है।
गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से मिट्टी, चट्टान या मलबे का ढाल के नीचे की ओर संचलन सामूहिक संचलन (Mass Movement) कहलाता है। इसमें पदार्थ का संचलन जल, वायु या हिमनद द्वारा ले जाए जाने से अलग भी हो सकता है।
तीव्र ढाल, चट्टानों की दरारें, भारी वर्षा, भूकंप, ढाल के आधार की कटाई, वनस्पति का हटना और अनियोजित निर्माण भूस्खलन के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
महत्त्वपूर्ण अंतर: भूस्खलन में गुरुत्वाकर्षण प्रमुख प्रेरक बल है। भारी वर्षा इसे शुरू कर सकती है या बढ़ा सकती है, लेकिन हर भूस्खलन का कारण केवल वर्षा नहीं होता।
चट्टानों के अपक्षय से प्राप्त खनिज पदार्थ मृदा निर्माण के लिए आधार प्रदान करते हैं। लेकिन मृदा केवल चट्टानों के टूटने से नहीं बनती। इसमें जैविक पदार्थों का संचय, जीवों की गतिविधियाँ, जलवायु, स्थलाकृति और समय भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मृदा के निर्माण में मूल पदार्थ (Parent Material), जलवायु, जीव-जंतु एवं वनस्पति, स्थलाकृति और समय प्रमुख कारक हैं। कई आधुनिक मृदा-अध्ययनों में मानवीय गतिविधियों को भी मृदा विकास और गुणों को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक माना जाता है।
अत्यधिक अपरदन होने पर मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत हट सकती है। इससे पोषक तत्त्वों की हानि, कृषि उत्पादकता में कमी और जलाशयों में अवसाद का जमाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
जल, वायु या अन्य कारकों द्वारा मृदा के कणों का अलग होकर हटना मृदा अपरदन कहलाता है। प्राकृतिक परिस्थितियों में भी मृदा अपरदन होता है, लेकिन अनुचित भूमि उपयोग से इसकी दर बहुत बढ़ सकती है।
| प्रकार | विशेषता | मुख्य कारण |
|---|---|---|
| परत अपरदन (Sheet Erosion) | मृदा की पतली परत का व्यापक क्षेत्र से हटना | सतही बहाव द्वारा मृदा का समान रूप से बह जाना |
| रिल अपरदन (Rill Erosion) | छोटी और अपेक्षाकृत उथली नालियों का बनना | बहते जल का छोटे मार्गों में केंद्रित होना |
| गली अपरदन (Gully Erosion) | गहरी और चौड़ी नालियों का विकास | केंद्रित जल प्रवाह द्वारा मृदा का तीव्र कटाव |
| वायु अपरदन | महीन मृदा कणों का उड़कर हटना | तेज वायु, सूखी मृदा और कम वनस्पति आवरण |
| उपाय | कैसे कार्य करता है? | उपयोगिता |
|---|---|---|
| समोच्च जुताई (Contour Ploughing) | ढाल के समोच्च के समानांतर जुताई से जल का बहाव धीमा करना | ढाल वाले कृषि क्षेत्रों में जल अपरदन कम करना |
| सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) | ढाल को सीढ़ीनुमा समतल भागों में बदलना | पर्वतीय क्षेत्रों में बहाव और मृदा हानि कम करना |
| पट्टीदार खेती (Strip Cropping) | विभिन्न फसलों की पट्टियों से जल और वायु की गति का प्रभाव कम करना | कृषि भूमि का संरक्षण |
| वृक्षारोपण एवं वनस्पति आवरण | जड़ें मृदा को बाँधती हैं और वनस्पति वर्षा की बूंदों के प्रभाव को कम करती है | ढाल स्थिरता तथा मृदा संरक्षण |
| पवनरोधक पट्टियाँ (Shelter Belts) | पेड़ों की पट्टियों से सतह के पास वायु की गति कम करना | शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन कम करना |
| चेक डैम (Check Dams) | छोटे जलमार्गों में जल के प्रवाह को धीमा करना | अवसाद के बहाव को कम करने और जल रोकने में सहायता |
| आवरण फसलें (Cover Crops) | मृदा को खाली छोड़ने के बजाय वनस्पति से ढकना | वर्षा के प्रभाव और सतही बहाव को कम करना |
मृदा संरक्षण का सर्वोत्तम उपाय स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, ढाल वाले कृषि क्षेत्र में समोच्च जुताई और सीढ़ीदार खेती उपयोगी हो सकती है, जबकि खुले शुष्क क्षेत्र में वनस्पति आवरण और पवनरोधक पट्टियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं।
भारत की विविध जलवायु, चट्टानी संरचना और स्थलाकृति के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अपक्षय और अपरदन की अलग-अलग प्रक्रियाएँ प्रभावी होती हैं।
विश्लेषणात्मक बिंदु: भारत में अपरदन की समस्या केवल प्राकृतिक दशाओं का परिणाम नहीं है। भूमि उपयोग, वनस्पति आवरण, कृषि पद्धति, निर्माण गतिविधियाँ और संरक्षण उपाय भी इसके प्रभाव को निर्धारित करते हैं।
तापमान और वर्षा में बदलाव अपक्षय, नदी प्रवाह, हिमनदों की स्थिति तथा ढालों की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। इन परिवर्तनों का प्रभाव हर क्षेत्र में समान नहीं होता।
जलवायु परिवर्तन को प्रत्येक भूस्खलन या अपरदन की घटना का एकमात्र कारण नहीं माना जाना चाहिए। किसी घटना को समझने के लिए स्थानीय भूगर्भ, ढाल, वर्षा, भूमि उपयोग और मानवीय हस्तक्षेप का संयुक्त विश्लेषण आवश्यक है।
अपक्षय और अपरदन पृथ्वी की सतह को बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। इनके प्रभाव सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी। परिणाम उनकी तीव्रता, स्थान और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।
| तुलना | पहला पक्ष | दूसरा पक्ष |
|---|---|---|
| अपक्षय बनाम अपरदन | अपने स्थान पर विखंडन या परिवर्तन | पदार्थ का कटाव, निष्कासन और परिवहन |
| भौतिक बनाम रासायनिक अपक्षय | मुख्यतः चट्टान का यांत्रिक विखंडन | खनिजों की रासायनिक संरचना या अवस्था में परिवर्तन |
| V-आकार बनाम U-आकार की घाटी | नदी अपरदन से सामान्यतः V-आकार | हिमनदीय अपरदन से सामान्यतः U-आकार |
| यार्डांग बनाम बालू का टीला | मुख्यतः वायु अपरदन से निर्मित | मुख्यतः रेत के निक्षेपण से निर्मित |
| स्टैलेक्टाइट बनाम स्टैलेग्माइट | गुफा की छत से नीचे की ओर बढ़ती है | गुफा के फर्श से ऊपर की ओर बढ़ती है |
| रिल बनाम गली अपरदन | छोटी और उथली नालियाँ | गहरी तथा चौड़ी अपरदनी नालियाँ |
| अपरदन बनाम निक्षेपण | पदार्थ का हटना और परिवहन | पदार्थ का जमा होना |