Winds and Pressure Belts

वायुदाब की पेटियाँ, पवनों की उत्पत्ति, वैश्विक परिसंचरण, मानसून एवं जेट धाराएँ

1. वायुदाब का अर्थ एवं मापन

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वायुमंडल का भार पृथ्वी की सतह पर दाब डालता है। वायुमंडल द्वारा किसी इकाई क्षेत्रफल पर लगाया गया बल वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure) कहलाता है।

किसी स्थान का वायुदाब केवल उस स्थान के तापमान पर निर्भर नहीं करता। ऊँचाई, वायु का घनत्व, तापमान, आर्द्रता और वायुमंडलीय परिसंचरण भी इसे प्रभावित करते हैं।

  • मापन यंत्र: बैरोमीटर (Barometer)।
  • प्रमुख इकाइयाँ: हेक्टोपास्कल (hPa), मिलीबार (mb) और पास्कल (Pa)।
  • समुद्र तल पर मानक वायुदाब: 1013.25 hPa अथवा 1013.25 mb।
  • ऊँचाई का प्रभाव: सामान्यतः ऊँचाई बढ़ने के साथ वायुदाब घटता है।
  • समदाब रेखाएँ: समान वायुदाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ।

परीक्षा तथ्य: 1 मिलीबार और 1 हेक्टोपास्कल का संख्यात्मक मान समान होता है। अतः 1013.25 mb = 1013.25 hPa।

वायुदाब को प्रभावित करने वाले कारक

कारक वायुदाब पर प्रभाव व्याख्या
ऊँचाई बढ़ने पर दाब सामान्यतः घटता है ऊँचाई बढ़ने के साथ ऊपर स्थित वायु-स्तंभ का भार कम होता जाता है।
तापमान गर्म वायु में सतही निम्न दाब बनने की प्रवृत्ति हो सकती है गर्म वायु फैलती है और उसका घनत्व कम हो सकता है। वास्तविक दाब पर वायु की गति भी प्रभाव डालती है।
आर्द्रता समान तापमान और दाब पर आर्द्र वायु का घनत्व शुष्क वायु से कम होता है जलवाष्प का आणविक भार शुष्क वायु के औसत आणविक भार से कम है।
वायुमंडलीय परिसंचरण दाब का वितरण बदलता है वायु का अभिसरण, अपसरण, आरोहण और अवरोहण दाब प्रणालियों को प्रभावित करते हैं।
स्थल एवं जल का वितरण क्षेत्रीय एवं मौसमी दाब अंतर उत्पन्न होते हैं स्थल और समुद्र की गर्म होने तथा ठंडा होने की दर अलग-अलग होती है।

महत्त्वपूर्ण अंतर: गर्म वायु और निम्न दाब का संबंध एक उपयोगी सामान्य नियम है, लेकिन यह हर परिस्थिति में अनिवार्य नहीं है। ऊपरी वायुमंडलीय प्रवाह तथा वायु का अभिसरण-अभिसरण नहीं, बल्कि अभिसरण और अपसरण जैसी प्रक्रियाएँ भी सतही दाब निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण हैं।

उच्च दाब और निम्न दाब

किसी क्षेत्र का वायुदाब आसपास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक होने पर उसे उच्च दाब क्षेत्र (High Pressure Area) और कम होने पर निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) कहते हैं।

विशेषता उच्च दाब निम्न दाब
सतह के निकट वायु सामान्यतः बाहर की ओर फैलती है सामान्यतः आसपास से केंद्र की ओर आती है
ऊर्ध्वाधर गति सामान्यतः अवरोही वायु सामान्यतः आरोही वायु
बादल निर्माण अवरोहण के कारण प्रायः दबता है आरोहण और संघनन के कारण बढ़ सकता है
सामान्य मौसम अक्सर साफ और स्थिर अक्सर बादलयुक्त या परिवर्तनशील

ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, अटल नियम नहीं। उदाहरण के लिए, उच्च दाब क्षेत्र में भी कोहरा या अन्य स्थानीय मौसमी परिस्थितियाँ हो सकती हैं। इसी तरह हर निम्न दाब क्षेत्र में अनिवार्य रूप से भारी वर्षा नहीं होती।

वैश्विक वायुदाब की प्रमुख पेटियाँ

पृथ्वी पर सौर ऊर्जा का असमान वितरण और वायुमंडलीय परिसंचरण अक्षांशों के अनुसार दाब की प्रमुख पेटियों के निर्माण में योगदान करते हैं। आदर्शीकृत वैश्विक व्यवस्था में चार प्रकार की दाब पेटियाँ मानी जाती हैं।

दाब पेटी लगभग अक्षांश दाब की प्रकृति प्रमुख कारण
भूमध्यरेखीय 0° के आसपास निम्न दाब तीव्र ताप, आरोही वायु और व्यापारिक पवनों का अभिसरण।
उपोष्ण 25°–35° उत्तर एवं दक्षिण उच्च दाब हैडली कोशिका की अवरोही वायु।
उपध्रुवीय लगभग 60° उत्तर एवं दक्षिण निम्न दाब मध्य अक्षांशीय परिसंचरण, वाताग्र और चक्रवाती गतिविधियाँ।
ध्रुवीय 90° के आसपास उच्च दाब अत्यधिक ठंडी, सघन वायु का अवरोहण।

इस प्रकार आदर्शीकृत मॉडल में कुल सात प्रमुख अक्षांशीय दाब पट्टियाँ होती हैं: एक भूमध्यरेखीय, दो उपोष्ण, दो उपध्रुवीय और दो ध्रुवीय।

ध्यान दें: वास्तविक दाब पट्टियाँ पूरी तरह अखंड या स्थिर नहीं होतीं। महाद्वीपों, महासागरों, ऋतुओं और मौसम प्रणालियों के कारण इनमें स्थानिक एवं मौसमी अंतर आते हैं।

भूमध्यरेखीय निम्न दाब पेटी (Equatorial Low Pressure Belt)

भूमध्य रेखा के आसपास वर्ष भर अपेक्षाकृत अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। गर्म और आर्द्र वायु के आरोहण तथा व्यापारिक पवनों के अभिसरण से निम्न दाब की एक प्रमुख पट्टी विकसित होती है।

  • इसे सामान्यतः भूमध्यरेखीय निम्न दाब पेटी कहा जाता है।
  • इसके निकट अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) विकसित होता है।
  • ITCZ वह क्षेत्र है जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनें मिलती हैं।
  • आरोही वायु के ठंडा होने और जलवाष्प के संघनन से बादल एवं वर्षा बन सकते हैं।
  • इस क्षेत्र में सतही हवाएँ कभी-कभी कमजोर और परिवर्तनशील होती हैं।

डोलड्रम्स (Doldrums): भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में कमजोर सतही पवनों वाले क्षेत्र को पारंपरिक रूप से डोलड्रम्स कहा जाता है। यह पूरी पृथ्वी पर एक ही स्थिर अक्षांश पर स्थित पट्टी नहीं है।

UPSC बिंदु: ITCZ की स्थिति सूर्य की ऋतुगत स्थिति के साथ बदलती है। इसका मौसमी स्थानांतरण दक्षिण एशियाई मानसून की व्याख्या में महत्त्वपूर्ण है।

उपोष्ण उच्च दाब पेटियाँ (Subtropical High Pressure Belts)

दोनों गोलार्धों में लगभग 25° से 35° अक्षांशों के आसपास उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्र पाए जाते हैं। हैडली कोशिका की ऊपरी वायु यहाँ नीचे उतरती है और सतह के निकट उच्च दाब की परिस्थितियों को बनाए रखने में योगदान देती है।

  • इन क्षेत्रों में अवरोही वायु सामान्यतः बादल निर्माण को दबाती है।
  • नीचे उतरती वायु संपीड़ित होकर गर्म होती है, जिससे सापेक्ष आर्द्रता कम हो सकती है।
  • विश्व के अनेक गर्म मरुस्थल इन अक्षांशों के आसपास स्थित हैं।
  • सहारा, अरब और ऑस्ट्रेलिया के अनेक शुष्क क्षेत्र इस व्यापक परिसंचरण से प्रभावित हैं।
  • इन उच्च दाब क्षेत्रों से व्यापारिक पवनें भूमध्यरेखा की ओर और पछुआ पवनें ध्रुवों की ओर बहती हैं।

हॉर्स लैटिट्यूड्स (Horse Latitudes): यह पारंपरिक नाम उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्रों के लिए प्रयुक्त होता है। इसे हर स्थान पर बिल्कुल समान अक्षांश वाली स्थिर पट्टी नहीं समझना चाहिए।

वैचारिक संबंध: उपोष्ण उच्च दाब मरुस्थलों के निर्माण का एक प्रमुख कारक है, लेकिन समुद्र से दूरी, ठंडी महासागरीय धाराएँ, पर्वतीय वर्षाछाया और स्थलाकृति भी मरुस्थलीय जलवायु को प्रभावित करती हैं।

उपध्रुवीय निम्न दाब पेटियाँ (Subpolar Low Pressure Belts)

लगभग 60° अक्षांशों के आसपास दोनों गोलार्धों में उपध्रुवीय निम्न दाब क्षेत्र पाए जाते हैं। यहाँ मध्य अक्षांशीय पछुआ पवनों और ध्रुवीय पूर्वी पवनों के बीच ध्रुवीय वाताग्र विकसित हो सकता है।

  • वाताग्र पर अलग-अलग तापमान और घनत्व वाली वायु राशियाँ मिलती हैं।
  • इस क्षेत्र में चक्रवाती परिसंचरण और मध्य अक्षांशीय चक्रवात महत्त्वपूर्ण हैं।
  • पवनों के अभिसरण और वायुमंडलीय गतिशीलता से वायु ऊपर उठ सकती है।
  • मौसम प्रायः परिवर्तनशील रहता है।

परीक्षा में अंतर: भूमध्यरेखीय निम्न दाब मुख्यतः तीव्र ताप और अभिसरण से संबंधित है, जबकि उपध्रुवीय निम्न दाब की व्याख्या में वाताग्रीय एवं गतिशील प्रक्रियाओं का विशेष महत्त्व है।

ध्रुवीय उच्च दाब पेटियाँ (Polar High Pressure Belts)

ध्रुवीय क्षेत्रों में अत्यधिक कम तापमान के कारण वायु ठंडी और सघन हो जाती है। इससे सतह के निकट उच्च दाब विकसित होने की प्रवृत्ति होती है।

  • दोनों ध्रुवों के आसपास उच्च दाब की परिस्थितियाँ पाई जाती हैं।
  • ध्रुवीय उच्च दाब क्षेत्रों से ध्रुवीय पूर्वी पवनें निम्न अक्षांशों की ओर बहती हैं।
  • कम तापमान और सीमित जलवाष्प के कारण वर्षण सामान्यतः कम होता है।
  • ध्रुवीय क्षेत्रों में कम वर्षण होने के बावजूद हिम और बर्फ का दीर्घकालिक संचय हो सकता है।

वैश्विक दाब पेटियों का मौसमी स्थानांतरण

सूर्य की ऊर्ध्वाधर किरणों की स्थिति वर्ष भर उत्तर-दक्षिण दिशा में बदलती है। इसके साथ ही ITCZ और कई प्रमुख दाब-पवन प्रणालियाँ भी मौसमी रूप से स्थानांतरित होती हैं।

  • उत्तरी गोलार्ध की गर्मियों में ITCZ सामान्यतः उत्तर की ओर खिसकता है।
  • दक्षिणी गोलार्ध की गर्मियों में ITCZ सामान्यतः दक्षिण की ओर स्थानांतरित होता है।
  • महाद्वीपों के अधिक गर्म या ठंडा होने से क्षेत्रीय दाब प्रणालियों में बदलाव आता है।
  • ITCZ का स्थानांतरण उष्णकटिबंधीय वर्षा और मानसून को प्रभावित करता है।

सावधानी: यह कहना कि सभी दाब पेटियाँ हर ऋतु में समान दूरी से खिसकती हैं, सही नहीं है। महासागरों और महाद्वीपों की अलग-अलग तापीय प्रतिक्रिया के कारण वास्तविक स्थानांतरण में क्षेत्रीय अंतर होता है।

पवन की उत्पत्ति एवं दिशा

वायु की क्षैतिज गति को पवन (Wind) कहते हैं। पवन की गति आरंभ कराने वाला प्रमुख बल दाब प्रवणता बल है। हालांकि वास्तविक पवन की दिशा और गति पर पृथ्वी का घूर्णन, घर्षण और वक्र पथ पर चलने की स्थिति में अन्य बल भी प्रभाव डालते हैं।

पवन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख बल

बल कार्य परीक्षा में महत्त्व
दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force) वायु को उच्च दाब से निम्न दाब की ओर गति कराने की प्रवृत्ति रखता है। पवन की गति आरंभ कराने वाला प्रमुख बल।
कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect) घूर्णनशील पृथ्वी पर गतिमान वायु की दिशा को मोड़ता है। उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विचलन।
घर्षण बल (Friction) पवन की गति घटाता है और सतही पवन की दिशा को प्रभावित करता है। सतह के निकट अधिक महत्त्वपूर्ण।
अपकेंद्रीय प्रभाव (Centrifugal Effect) वक्र पथ पर चलने वाली वायु के बल-संतुलन में भूमिका निभाता है। वक्र पवन प्रवाह का अध्ययन।

दाब प्रवणता (Pressure Gradient): दो स्थानों के बीच वायुदाब में अंतर और उनके बीच की दूरी का संबंध दाब प्रवणता बताता है। सामान्यतः समान परिस्थितियों में दाब प्रवणता अधिक होने पर पवन को अधिक गति मिल सकती है।

मौसम मानचित्र पर पास-पास स्थित समदाब रेखाएँ प्रायः अधिक दाब प्रवणता और तेज पवन का संकेत देती हैं। लेकिन वास्तविक पवन की गति पर घर्षण तथा अन्य बल भी प्रभाव डालते हैं।

कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect)

पृथ्वी के घूर्णन के कारण पृथ्वी से जुड़े संदर्भ-तंत्र में गतिमान वायु की दिशा में आभासी विचलन दिखाई देता है। इसे कोरिओलिस प्रभाव कहा जाता है।

  • उत्तरी गोलार्ध में गतिमान वायु अपनी गति की दिशा के दाईं ओर विचलित होती है।
  • दक्षिणी गोलार्ध में गतिमान वायु अपनी गति की दिशा के बाईं ओर विचलित होती है।
  • भूमध्य रेखा पर कोरिओलिस प्रभाव शून्य होता है।
  • इसका प्रभाव ध्रुवों की ओर बढ़ता है।
  • यह स्वयं पवन उत्पन्न नहीं करता; यह गतिमान वायु की दिशा को प्रभावित करता है।

UPSC तथ्य: कोरिओलिस प्रभाव पवन की दिशा को मोड़ता है, लेकिन आदर्श स्थिति में यह पवन की गति की दिशा के लंबवत कार्य करता है और सीधे उसकी गति नहीं बढ़ाता।

स्थायी या ग्रहीय पवनें (Planetary Winds)

वैश्विक दाब पेटियों और पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित व्यापक परिसंचरण के कारण वर्ष के अधिकांश समय अपेक्षाकृत नियमित दिशा में बहने वाली पवनों को स्थायी या ग्रहीय पवनें कहते हैं।

पवन सामान्य प्रवाह प्रमुख क्षेत्र
व्यापारिक पवनें (Trade Winds) उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर उष्णकटिबंधीय क्षेत्र
पछुआ पवनें (Westerlies) उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर मध्य अक्षांश
ध्रुवीय पूर्वी पवनें (Polar Easterlies) ध्रुवीय उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर उच्च अक्षांश

व्यापारिक पवनें (Trade Winds)

उपोष्ण उच्च दाब पेटियों से भूमध्यरेखीय निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहने वाली पवनों को व्यापारिक पवनें कहा जाता है।

  • उत्तरी गोलार्ध में ये सामान्यतः उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हैं।
  • दक्षिणी गोलार्ध में ये सामान्यतः दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर बहती हैं।
  • कोरिओलिस प्रभाव इनके प्रवाह को पश्चिम की ओर मोड़ता है।
  • ये उष्णकटिबंधीय महासागरों में सतही समुद्री धाराओं को प्रभावित करती हैं।
  • ऐतिहासिक रूप से इनका समुद्री नौवहन और वैश्विक व्यापार में महत्त्व रहा है।

स्मरण सूत्र: व्यापारिक पवनें पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली प्रमुख उष्णकटिबंधीय पवनें हैं, लेकिन उनकी सटीक दिशा और तीव्रता मौसम तथा क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है।

पछुआ पवनें (Westerlies)

उपोष्ण उच्च दाब पेटियों से उपध्रुवीय निम्न दाब क्षेत्रों की ओर बहने वाली पवनों को पछुआ पवनें कहते हैं। इनका सामान्य प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होता है।

  • ये मध्य अक्षांशों के वैश्विक परिसंचरण का प्रमुख भाग हैं।
  • उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों और पर्वतों के कारण इनकी दिशा एवं गति में अधिक परिवर्तनशीलता हो सकती है।
  • दक्षिणी गोलार्ध के मध्य अक्षांशों में विस्तृत महासागरीय क्षेत्र इनके प्रवाह को अधिक निरंतर बनाते हैं।
  • दक्षिणी गोलार्ध के उच्च मध्य अक्षांशों में पछुआ पवनें विशेष रूप से शक्तिशाली हो सकती हैं।

दक्षिणी गोलार्ध में लगभग 40°, 50° और 60° दक्षिणी अक्षांशों के आसपास की शक्तिशाली पछुआ पवनों के लिए क्रमशः Roaring Forties, Furious Fifties और Screaming Sixties नामों का पारंपरिक प्रयोग किया जाता है। ये सटीक सीमाओं वाले वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं हैं।

ध्रुवीय पूर्वी पवनें (Polar Easterlies)

ध्रुवीय उच्च दाब क्षेत्रों से उपध्रुवीय निम्न दाब क्षेत्रों की ओर बहने वाली ठंडी पवनों को ध्रुवीय पूर्वी पवनें कहा जाता है।

  • इनका सामान्य प्रवाह पूर्व से पश्चिम की ओर होता है।
  • ये सामान्यतः ठंडी और शुष्क होती हैं।
  • लगभग 60° अक्षांशों के आसपास इनका पछुआ पवनों से अभिसरण हो सकता है।
  • इस अभिसरण क्षेत्र में ध्रुवीय वाताग्र और मध्य अक्षांशीय मौसम प्रणालियाँ विकसित हो सकती हैं।

त्रि-कोशिकीय परिसंचरण मॉडल (Three-Cell Circulation Model)

वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को समझाने के लिए प्रत्येक गोलार्ध में तीन प्रमुख परिसंचरण कोशिकाओं का आदर्शीकृत मॉडल उपयोग किया जाता है। ये कोशिकाएँ वैश्विक पवनों और दाब पेटियों के बीच संबंध स्पष्ट करती हैं।

कोशिका लगभग अक्षांश मुख्य विशेषता सतही पवन से संबंध
हैडली कोशिका (Hadley Cell) 0°–30° भूमध्यरेखा पर आरोहण और उपोष्ण क्षेत्रों में अवरोहण। व्यापारिक पवनें।
फेरेल कोशिका (Ferrel Cell) 30°–60° मध्य अक्षांशों की मौसम प्रणालियों से जुड़ी गतिशील कोशिका। पछुआ पवनें।
ध्रुवीय कोशिका (Polar Cell) 60°–90° ध्रुवों पर अवरोहण और उपध्रुवीय क्षेत्रों में आरोहण की प्रवृत्ति। ध्रुवीय पूर्वी पवनें।

महत्त्वपूर्ण अवधारणा: यह वास्तविक वायुमंडल का सरल मॉडल है। वायुमंडल तीन स्थिर कोशिकाओं में पूरी तरह विभाजित नहीं है; ऋतु, महासागरों, महाद्वीपों और चक्रवातों के कारण परिसंचरण में परिवर्तन होता रहता है।

हैडली कोशिका (Hadley Cell)

भूमध्यरेखीय क्षेत्र में गर्म वायु ऊपर उठती है और ऊपरी वायुमंडल में उपोष्ण अक्षांशों की ओर प्रवाहित होती है। लगभग 30° अक्षांशों के आसपास वायु नीचे उतरती है। सतह के निकट इसका एक भाग पुनः भूमध्यरेखा की ओर लौटता है।

  • भूमध्यरेखीय आरोही वायु से बादल और वर्षा विकसित हो सकती है।
  • उपोष्ण अक्षांशों में अवरोही वायु उच्च दाब और शुष्क परिस्थितियों को बढ़ावा देती है।
  • सतही व्यापारिक पवनें हैडली कोशिका से संबंधित हैं।
  • उष्णकटिबंधीय वर्षा और कई उपोष्ण मरुस्थलों के वितरण को समझने में यह उपयोगी है।

फेरेल कोशिका (Ferrel Cell)

लगभग 30° से 60° अक्षांशों के बीच स्थित फेरेल कोशिका मध्य अक्षांशीय परिसंचरण की अवधारणा है। हैडली और ध्रुवीय कोशिकाओं के विपरीत इसे केवल प्रत्यक्ष तापीय परिसंचरण से नहीं समझाया जा सकता।

  • मध्य अक्षांशीय चक्रवातों और प्रतिचक्रवातों का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।
  • सतह के निकट पछुआ पवनों से इसका संबंध है।
  • यह मध्य अक्षांशों के मौसम और ऊष्मा परिवहन को समझने में उपयोगी है।

ध्रुवीय कोशिका (Polar Cell)

ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी वायु नीचे उतरती है और सतह के निकट निम्न अक्षांशों की ओर प्रवाहित होती है। लगभग 60° अक्षांशों के आसपास वायु के ऊपर उठने की प्रवृत्ति होती है।

  • ध्रुवीय उच्च दाब और ध्रुवीय पूर्वी पवनों से इसका संबंध है।
  • उपध्रुवीय क्षेत्रों में पछुआ पवनों के साथ इसका परिसंचरण जुड़ता है।
  • ध्रुवीय और मध्य अक्षांशीय वायु राशियों के बीच वाताग्रीय गतिविधियाँ विकसित हो सकती हैं।

मानसूनी पवनें (Monsoon Winds)

मानसून ऐसी मौसमी पवन प्रणाली है जिसमें वर्ष के अलग-अलग समय पर पवनों की प्रचलित दिशा में व्यापक परिवर्तन होता है। भारतीय मानसून केवल स्थल और समुद्र के तापीय अंतर का परिणाम नहीं है।

मानसून को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं:

  • स्थल और समुद्र के तापमान तथा दाब में मौसमी अंतर।
  • ITCZ का उत्तर-दक्षिण स्थानांतरण।
  • भूमि और महासागरों पर विकसित होने वाली क्षेत्रीय दाब प्रणालियाँ।
  • ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण और जेट धाराएँ।
  • तिब्बती पठार का तापीय प्रभाव तथा हिमालय की भौगोलिक स्थिति।
  • हिंद महासागर की समुद्री परिस्थितियाँ और विभिन्न महासागरीय-वायुमंडलीय अंतःक्रियाएँ।

भारतीय मानसून का मूल तंत्र

  • ग्रीष्मकाल: भारतीय उपमहाद्वीप के गर्म होने और क्षेत्रीय परिसंचरण में बदलाव से समुद्र से आर्द्र वायु का प्रवाह बढ़ता है।
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून: भारत में वर्षा का प्रमुख मानसूनी मौसम, जिसमें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की शाखाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
  • शीतकाल: स्थल के ठंडा होने और दाब वितरण बदलने के साथ उत्तरी भारत में पवनों का सामान्य प्रवाह बदलता है।
  • उत्तर-पूर्वी मानसून: अक्टूबर से दिसंबर के दौरान तमिलनाडु सहित दक्षिण-पूर्वी भारत के कुछ भागों में वर्षा का महत्त्वपूर्ण स्रोत।

UPSC के लिए: मानसून की व्याख्या करते समय केवल स्थल-समुद्र तापीय अंतर न लिखें। ITCZ, जेट धाराएँ, तिब्बती पठार, महासागरीय परिस्थितियाँ और वायुमंडलीय परिसंचरण भी शामिल करें।

स्थानीय पवनें और आवधिक पवनें

स्थानीय पवनें सीमित क्षेत्र में तापमान, दाब, स्थलाकृति या क्षेत्रीय मौसम परिस्थितियों के कारण विकसित होती हैं। आवधिक पवनों की दिशा या तीव्रता दिन-रात अथवा ऋतु के अनुसार बदल सकती है।

स्थल समीर और समुद्री समीर

पवन समय सामान्य दिशा कारण
समुद्री समीर (Sea Breeze) दिन में समुद्र से स्थल की ओर स्थल अपेक्षाकृत तेजी से गर्म होकर सतही निम्न दाब विकसित करता है।
स्थल समीर (Land Breeze) रात में स्थल से समुद्र की ओर स्थल अपेक्षाकृत तेजी से ठंडा होकर सतही उच्च दाब विकसित करता है।

पर्वत समीर और घाटी समीर

पवन समय सामान्य गति कारण
घाटी समीर (Valley Breeze) दिन में ढालों पर ऊपर की ओर सूर्य के ताप से पर्वतीय ढालें गर्म होती हैं।
पर्वत समीर (Mountain Breeze) रात में ढालों से नीचे घाटी की ओर ढालों पर ठंडी हुई सघन हवा नीचे की ओर बहती है।

प्रमुख स्थानीय पवनें: UPSC तथ्य

पवन क्षेत्र प्रमुख विशेषता
लू (Loo) उत्तर-पश्चिमी एवं उत्तरी भारत के कुछ भाग गर्मियों में चलने वाली अत्यधिक गर्म और शुष्क हवा।
चिनूक (Chinook) रॉकी पर्वतों की पूर्वी ढाल और आसपास पर्वत से नीचे उतरते समय गर्म और शुष्क होने वाली पवन।
फॉन (Foehn) आल्प्स के निकट पर्वत की दूसरी ओर उतरती गर्म और शुष्क पवन।
मिस्ट्रल (Mistral) फ्रांस की रोन घाटी और भूमध्यसागरीय तट के आसपास ठंडी और तेज पवन।
बोरा (Bora) एड्रियाटिक सागर का तटीय क्षेत्र ठंडी, प्रायः तेज और झोंकेदार पवन।
सिरॉको (Sirocco) सहारा से भूमध्यसागर की ओर गर्म हवा; समुद्र पार करने पर इसमें नमी बढ़ सकती है।
हरमट्टन (Harmattan) पश्चिमी अफ्रीका सहारा से आने वाली शुष्क, प्रायः धूलयुक्त हवा।
ब्रिकफील्डर (Brickfielder) ऑस्ट्रेलिया ऑस्ट्रेलियाई मौसम-विज्ञान में गर्म और शुष्क परिस्थितियों से जुड़ा पारंपरिक स्थानीय पवन-नाम।

चिनूक और फॉन का कारण: पर्वत के पवनाभिमुख भाग पर ऊपर उठती वायु ठंडी हो सकती है। पर्वत पार करने के बाद नीचे उतरती वायु संपीड़न के कारण गर्म होती है। इस प्रक्रिया से दूसरी ओर गर्म और शुष्क पवन विकसित हो सकती है।

जेट धाराएँ (Jet Streams)

ऊपरी क्षोभमंडल और कभी-कभी क्षोभसीमा के आसपास तेज गति से बहने वाली संकरी, लंबी वायु धाराओं को जेट धाराएँ कहा जाता है। ये सामान्यतः तापमान प्रवणता और पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण बनती हैं।

  • जेट धाराएँ सामान्यतः ऊपरी क्षोभमंडल में पाई जाती हैं।
  • इनकी ऊँचाई अक्सर लगभग 9–16 किमी के आसपास हो सकती है, लेकिन यह अक्षांश और मौसम के अनुसार बदलती है।
  • इनकी गति बहुत तेज हो सकती है।
  • इनका प्रवाह सामान्यतः पश्चिम से पूर्व की ओर होता है, हालांकि उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट इसका महत्त्वपूर्ण अपवाद है।
  • ये चक्रवातों, मौसम प्रणालियों और वर्षा के वितरण को प्रभावित करती हैं।

जेट धाराओं के प्रमुख प्रकार

जेट धारा सामान्य स्थिति महत्त्व
ध्रुवीय जेट (Polar Jet) मध्य से उच्च अक्षांशों के बीच मध्य अक्षांशीय मौसम प्रणालियों से संबंधित।
उपोष्ण जेट (Subtropical Jet) लगभग 25°–35° अक्षांशों के आसपास उपोष्ण और मध्य अक्षांशीय परिसंचरण से संबंधित।
उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट (Tropical Easterly Jet) दक्षिण एशियाई ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान ऊपरी वायुमंडल में भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून से जुड़ी महत्त्वपूर्ण ऊपरी वायु धारा।

भारतीय मानसून और जेट धाराएँ

  • उपोष्ण पश्चिमी जेट का मौसमी स्थानांतरण भारतीय उपमहाद्वीप के मौसम को प्रभावित करता है।
  • ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट विकसित हो सकती है।
  • जेट धाराएँ अकेले मानसून उत्पन्न नहीं करतीं; वे व्यापक वायुमंडलीय परिसंचरण का हिस्सा हैं।

वायुदाब पेटियाँ, वर्षा और मरुस्थल

दाब पेटी वायु की सामान्य गति वर्षा की प्रवृत्ति
भूमध्यरेखीय निम्न दाब आरोही अक्सर अधिक संवहनीय वर्षा।
उपोष्ण उच्च दाब अवरोही सामान्यतः शुष्क परिस्थितियाँ; कई गर्म मरुस्थलों का विकास।
उपध्रुवीय निम्न दाब वाताग्रीय क्षेत्रों में आरोहण चक्रवातों और वाताग्रीय गतिविधियों से वर्षण।
ध्रुवीय उच्च दाब अवरोही बहुत ठंडी और सामान्यतः कम वर्षण वाली परिस्थितियाँ।

उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्रों में अवरोही वायु बादलों के विकास को दबाती है। इस कारण अनेक गर्म मरुस्थल लगभग 20°–30° अक्षांशों के आसपास पाए जाते हैं। हालांकि हर मरुस्थल का कारण केवल वैश्विक दाब पेटियाँ नहीं हैं।

उदाहरण के लिए, अटाकामा मरुस्थल की अत्यधिक शुष्कता में उपोष्ण उच्च दाब के साथ ठंडी हम्बोल्ट महासागरीय धारा और एंडीज पर्वत की वर्षाछाया भी योगदान करती है।

वैश्विक पवनें और महासागरीय धाराएँ

वैश्विक पवनें महासागरों की सतही धाराओं को गति देने वाले प्रमुख कारकों में से एक हैं। पवन और समुद्री धाराएँ मिलकर पृथ्वी पर ऊष्मा के पुनर्वितरण में योगदान करती हैं।

  • व्यापारिक पवनें उष्णकटिबंधीय महासागरों की सतही धाराओं को प्रभावित करती हैं।
  • पछुआ पवनें मध्य अक्षांशों में महासागरीय प्रवाह को प्रभावित करती हैं।
  • पृथ्वी का घूर्णन, महाद्वीपों की स्थिति और महासागरीय बेसिन भी धाराओं की दिशा निर्धारित करते हैं।
  • समुद्री धाराएँ तटीय तापमान, आर्द्रता और वर्षा को प्रभावित कर सकती हैं।

उदाहरण: ठंडी महासागरीय धाराएँ कुछ पश्चिमी महाद्वीपीय तटों पर शुष्कता बढ़ाने में योगदान करती हैं, जबकि गर्म धाराएँ आसपास के वायुमंडल को अपेक्षाकृत गर्म और आर्द्र बना सकती हैं।

समदाब रेखाएँ (Isobars) और मौसम मानचित्र

समान वायुदाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ समदाब रेखाएँ कहलाती हैं। मौसम मानचित्रों पर इनकी सहायता से उच्च और निम्न दाब प्रणालियों तथा दाब प्रवणता का अध्ययन किया जाता है।

  • पास-पास स्थित समदाब रेखाएँ सामान्यतः अधिक दाब प्रवणता दर्शाती हैं।
  • दूर-दूर स्थित समदाब रेखाएँ सामान्यतः कम दाब प्रवणता का संकेत देती हैं।
  • समदाब रेखाओं के विन्यास से चक्रवातीय और प्रतिचक्रवातीय प्रणालियों की पहचान में सहायता मिलती है।
  • पवन की वास्तविक दिशा और गति पर कोरिओलिस प्रभाव तथा घर्षण भी निर्भर करते हैं।

परीक्षा में सावधानी: समदाब रेखाओं की निकटता तेज पवन की संभावना का संकेत देती है, लेकिन केवल इस आधार पर किसी स्थान की वास्तविक पवन गति का निश्चित मान नहीं निकाला जा सकता।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात का परिसंचरण

चक्रवात और प्रतिचक्रवात दाब प्रणालियाँ हैं जिनमें वायु का परिसंचरण अलग-अलग होता है। उनकी सतही पवन दिशा गोलार्ध के अनुसार बदलती है।

प्रणाली सतही वायु का सामान्य व्यवहार उत्तरी गोलार्ध दक्षिणी गोलार्ध
चक्रवात (Cyclone) केंद्र की ओर अभिसरण; सामान्यतः ऊपर उठती वायु वामावर्त दक्षिणावर्त
प्रतिचक्रवात (Anticyclone) केंद्र से बाहर की ओर अपसरण; सामान्यतः अवरोही वायु दक्षिणावर्त वामावर्त

ये दिशाएँ सामान्य सतही परिसंचरण को दर्शाती हैं। स्थानीय परिस्थितियों, घर्षण, स्थलाकृति और मौसम प्रणाली की संरचना के कारण वास्तविक पवनों में अंतर हो सकता है।

मुख्य अंतर: चक्रवात सामान्यतः निम्न दाब से संबंधित होता है, जबकि प्रतिचक्रवात उच्च दाब से संबंधित होता है। उष्णकटिबंधीय चक्रवात और मध्य अक्षांशीय चक्रवात अलग-अलग प्रकार की मौसम प्रणालियाँ हैं।

UPSC के लिए प्रमुख तुलनात्मक तथ्य

आधार भूमध्यरेखीय निम्न दाब उपोष्ण उच्च दाब
मुख्य अक्षांश 0° के आसपास लगभग 30° के आसपास
वायु की सामान्य गति आरोही अवरोही
सतही परिसंचरण व्यापारिक पवनों का अभिसरण व्यापारिक और पछुआ पवनों की उत्पत्ति का क्षेत्र
जलवायु संबंध अक्सर अधिक वर्षा अक्सर शुष्क जलवायु

परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियाँ

  • यह मानना कि सभी दाब पेटियाँ वर्ष भर एक ही अक्षांश पर रहती हैं।
  • यह मानना कि पवन केवल दाब अंतर से निर्धारित होती है और पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव नहीं पड़ता।
  • मानसून को केवल स्थल और समुद्र के तापीय अंतर से समझाना।
  • यह मानना कि सभी निम्न दाब क्षेत्रों में भारी वर्षा और सभी उच्च दाब क्षेत्रों में हमेशा साफ मौसम होता है।
  • फेरेल कोशिका को हैडली कोशिका की तरह केवल प्रत्यक्ष तापीय परिसंचरण मान लेना।
  • जेट धाराओं को केवल सतही पवन मानना; ये ऊपरी वायुमंडल की तेज वायु धाराएँ हैं।
  • यह मानना कि उपोष्ण उच्च दाब ही हर मरुस्थल के निर्माण का एकमात्र कारण है।

त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)

  • मानक समुद्र-तलीय वायुदाब: 1013.25 hPa।
  • वायुदाब मापन यंत्र: बैरोमीटर।
  • भूमध्यरेखीय पेटी: निम्न दाब और आरोही वायु।
  • उपोष्ण पेटियाँ: उच्च दाब और अवरोही वायु।
  • उपध्रुवीय पेटियाँ: निम्न दाब तथा मध्य अक्षांशीय चक्रवातों से संबंध।
  • ध्रुवीय पेटियाँ: उच्च दाब और ठंडी अवरोही वायु।
  • व्यापारिक पवनें: उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर।
  • पछुआ पवनें: उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर।
  • ध्रुवीय पूर्वी पवनें: ध्रुवीय उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर।
  • कोरिओलिस प्रभाव: उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर, दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विचलन।
  • हैडली कोशिका: लगभग 0°–30° अक्षांश।
  • फेरेल कोशिका: लगभग 30°–60° अक्षांश।
  • ध्रुवीय कोशिका: लगभग 60°–90° अक्षांश।
  • ITCZ: व्यापारिक पवनों के अभिसरण से संबंधित क्षेत्र।
  • समुद्री समीर: दिन में समुद्र से स्थल की ओर।
  • स्थल समीर: रात में स्थल से समुद्र की ओर।
  • जेट धाराएँ: ऊपरी क्षोभमंडल के निकट तेज गति वाली संकरी वायु धाराएँ।
  • उपोष्ण उच्च दाब: अनेक गर्म मरुस्थलों की शुष्कता से संबंधित।

निष्कर्ष

वैश्विक वायुदाब पेटियाँ और पवनें पृथ्वी पर असमान सौर ताप, वायुमंडलीय परिसंचरण तथा पृथ्वी के घूर्णन की संयुक्त प्रक्रिया से विकसित होती हैं। भूमध्यरेखीय निम्न दाब, उपोष्ण उच्च दाब, उपध्रुवीय निम्न दाब और ध्रुवीय उच्च दाब वैश्विक परिसंचरण को समझने का आधार हैं।

व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें और ध्रुवीय पूर्वी पवनें इन दाब पेटियों से जुड़ी हैं। वहीं ITCZ, स्थानीय पवनें, मानसून और जेट धाराएँ क्षेत्रीय जलवायु तथा मौसम को प्रभावित करती हैं। इन प्रक्रियाओं को एक साथ समझने से वर्षा वितरण, मरुस्थलों, महासागरीय धाराओं और भारतीय मानसून की बेहतर व्याख्या की जा सकती है।