कृषि (Agriculture) भूमि, जल, मिट्टी, जलवायु और अन्य संसाधनों का उपयोग करके फसलों तथा अन्य जैविक उत्पादों का उत्पादन करने वाली आर्थिक गतिविधि है। व्यापक अर्थ में कृषि से संबंधित गतिविधियों में फसल उत्पादन, पशुपालन और कृषि वानिकी शामिल हो सकती हैं।
विश्व में कृषि का स्वरूप सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं है। कहीं कृषि मुख्यतः परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए की जाती है, तो कहीं बड़े खेतों, मशीनों और पूँजी की सहायता से बाजार के लिए उत्पादन होता है। अनेक क्षेत्रों में निर्वाह और वाणिज्यिक कृषि के बीच मिश्रित स्वरूप भी मिलता है।
विश्व कृषि को समझने के लिए प्राकृतिक और मानवीय कारकों को एक साथ देखना आवश्यक है। जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति और जल की उपलब्धता के साथ-साथ तकनीक, श्रम, पूँजी, भूमि स्वामित्व, बाजार और परिवहन भी कृषि के स्वरूप को प्रभावित करते हैं।
प्राकृतिक कारक:
मानवीय एवं आर्थिक कारक:
प्रत्येक फसल की तापमान, नमी और मिट्टी संबंधी आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं। किसी फसल की सफलता केवल वार्षिक वर्षा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वर्षा के वितरण, सिंचाई, तापमान, किस्म और फसल की वृद्धि-अवस्था पर भी निर्भर करती है।
| फसल | सामान्यतः अनुकूल परिस्थितियाँ | भौगोलिक महत्त्व |
|---|---|---|
| धान | गर्म जलवायु और पर्याप्त जल; खेतों में जल प्रबंधन आवश्यक | मानसूनी एशिया में व्यापक |
| गेहूँ | बढ़वार के दौरान अपेक्षाकृत ठंडी परिस्थितियाँ; पकते समय शुष्क मौसम प्रायः लाभदायक | समशीतोष्ण क्षेत्रों तथा उपोष्ण क्षेत्रों के शीतकालीन कृषि प्रदेशों में महत्त्वपूर्ण |
| मक्का | गर्म बढ़वार अवधि और पर्याप्त नमी | उत्तरी अमेरिका, चीन और दक्षिण अमेरिका के अनेक क्षेत्र |
| कपास | लंबी गर्म अवधि और पाला-रहित मौसम | उष्ण एवं उपोष्ण कृषि प्रदेश |
| चाय | गर्म और आर्द्र परिस्थितियाँ; अनेक क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा तथा ढालदार भूमि | एशिया और पूर्वी अफ्रीका के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र |
| कॉफी | प्रजाति के अनुसार उष्ण या उपोष्ण परिस्थितियाँ; तापमान और वर्षा महत्त्वपूर्ण | लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के उष्ण क्षेत्र |
| जैतून | गर्म, शुष्क ग्रीष्म और अपेक्षाकृत नम शीत ऋतु | भूमध्यसागरीय जलवायु वाले क्षेत्र |
महत्त्वपूर्ण तथ्य: धान का अर्थ यह नहीं है कि उसे हमेशा बहुत अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है। सिंचित क्षेत्रों में भी धान की खेती की जाती है। इसी प्रकार गेहूँ केवल यूरोप या शीतोष्ण अक्षांशों तक सीमित नहीं है; भारत जैसे देशों में भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती होती है।
कृषि का वर्गीकरण उद्देश्य, श्रम एवं पूँजी के उपयोग, भूमि के आकार, उत्पादन की प्रकृति और कृषि गतिविधियों के आधार पर किया जाता है। ये वर्गीकरण एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। एक कृषि प्रणाली एक से अधिक श्रेणियों की विशेषताएँ रख सकती है।
| कृषि प्रणाली | मुख्य विशेषता | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
| निर्वाह कृषि | मुख्यतः परिवार की आवश्यकताओं के लिए उत्पादन | एशिया और अफ्रीका के अनेक ग्रामीण क्षेत्र |
| वाणिज्यिक कृषि | बाजार में बिक्री के लिए उत्पादन | विश्व के विविध कृषि प्रदेश |
| गहन कृषि | सीमित भूमि से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए अधिक श्रम या अन्य निवेश | पूर्वी एवं दक्षिणी एशिया के अनेक क्षेत्र |
| विस्तृत कृषि | बड़े क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम श्रम प्रति इकाई भूमि के साथ खेती | उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बड़े कृषि क्षेत्र |
| मिश्रित कृषि | फसल उत्पादन और पशुपालन का संयोजन | यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अनेक क्षेत्र |
| बागान कृषि | बड़े पैमाने पर प्रमुख वाणिज्यिक फसल का उत्पादन | चाय, रबर, कॉफी और कोको के उत्पादक क्षेत्र |
| स्थानांतरण कृषि | एक क्षेत्र में खेती के बाद दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरण; पुराने क्षेत्र को कुछ समय छोड़ना | उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों के कुछ पारंपरिक समुदाय |
| भूमध्यसागरीय कृषि | भूमध्यसागरीय जलवायु के अनुकूल फसलों और कृषि गतिविधियों का संयोजन | भूमध्यसागरीय बेसिन, कैलिफोर्निया और मध्य चिली |
निर्वाह कृषि में उत्पादन का मुख्य उद्देश्य किसान और उसके परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। इसमें उत्पादन का बड़ा हिस्सा परिवार द्वारा उपभोग किया जा सकता है, हालाँकि अतिरिक्त उपज बाजार में भी बेची जा सकती है।
निर्वाह कृषि का अर्थ यह नहीं है कि इसमें बाजार, तकनीक या नकद आय का बिल्कुल उपयोग नहीं होता। वास्तविक जीवन में निर्वाह और वाणिज्यिक कृषि के बीच कई मध्यवर्ती स्वरूप मिलते हैं।
स्थानांतरण कृषि में किसी क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति हटाकर भूमि पर कुछ समय के लिए खेती की जाती है। जब मिट्टी की उत्पादकता कम होने लगती है या अन्य कारणों से भूमि छोड़नी पड़ती है, तो किसान दूसरे क्षेत्र में खेती शुरू कर सकता है। पुरानी भूमि को प्राकृतिक वनस्पति पुनः विकसित होने के लिए छोड़ दिया जाता है।
इस प्रणाली की स्थिरता मुख्यतः भूमि को दोबारा उपयोग में लाने से पहले मिलने वाली विश्राम अवधि, जनसंख्या दबाव, मिट्टी और स्थानीय पर्यावरण पर निर्भर करती है। विश्राम अवधि बहुत कम होने पर मृदा क्षरण और वनावरण की हानि बढ़ सकती है।
प्रमुख स्थानीय नामों के उदाहरण:
परीक्षा में ध्यान दें: स्थानांतरण कृषि को झूम कृषि का पर्याय केवल भारतीय संदर्भ में समझना उचित है। विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में इसके स्थानीय नाम और पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं।
गहन कृषि में सीमित भूमि से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए प्रति इकाई क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक श्रम, सिंचाई, उर्वरक, बेहतर बीज या अन्य निवेश का उपयोग किया जाता है।
गहन कृषि का संबंध केवल निर्वाह उत्पादन से नहीं है। यह वाणिज्यिक भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में छोटे खेतों पर धान और गेहूँ की गहन खेती की जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सब्जियों और फूलों की उच्च निवेश वाली व्यावसायिक खेती भी गहन कृषि का रूप है।
वाणिज्यिक कृषि में उत्पादन मुख्यतः बाजार में बिक्री और आय अर्जित करने के उद्देश्य से किया जाता है। इसमें उत्पादन की मात्रा, गुणवत्ता, बाजार की माँग, परिवहन और लागत का विशेष महत्त्व होता है।
वाणिज्यिक कृषि बड़े यंत्रीकृत खेतों पर भी हो सकती है और छोटे किसानों द्वारा सब्जियाँ, फल, दूध या अन्य उत्पाद बाजार में बेचने के रूप में भी। इसलिए वाणिज्यिक कृषि को हमेशा बड़े खेतों से जोड़ना सही नहीं है।
विस्तृत कृषि में बड़े क्षेत्रफल पर खेती की जाती है और प्रति इकाई भूमि अपेक्षाकृत कम श्रम लगाया जाता है। बड़े खेतों में मशीनों का उपयोग उत्पादन को अधिक कुशल बना सकता है।
यह प्रणाली उन क्षेत्रों में विकसित होने की अधिक संभावना रखती है जहाँ भूमि अपेक्षाकृत प्रचुर है, जनसंख्या घनत्व कम है और बड़े खेतों के संचालन के लिए उपयुक्त तकनीक उपलब्ध है।
उत्तरी अमेरिका के ग्रेट प्लेन्स और ऑस्ट्रेलिया के बड़े कृषि क्षेत्रों में विस्तृत वाणिज्यिक अनाज कृषि के उदाहरण मिलते हैं।
मिश्रित कृषि में फसल उत्पादन और पशुपालन दोनों महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ होती हैं। फसल अवशेष पशुओं के चारे के रूप में काम आ सकते हैं और पशुओं का गोबर मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में सहायक हो सकता है।
मिश्रित कृषि और मिश्रित फसल में अंतर: मिश्रित कृषि में फसल उत्पादन के साथ पशुपालन किया जाता है, जबकि मिश्रित फसल में एक ही खेत में दो या अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं।
बागान कृषि में सामान्यतः बड़े भू-भाग पर एक प्रमुख वाणिज्यिक फसल का संगठित उत्पादन किया जाता है। इसमें श्रम, पूँजी, प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था का महत्त्व होता है।
प्रमुख फसलें:
बागान कृषि का विकास उष्ण एवं आर्द्र क्षेत्रों में विशेष रूप से हुआ। कई देशों में इसका इतिहास औपनिवेशिक शासन, श्रम व्यवस्था और वैश्विक व्यापार से जुड़ा रहा है। हालांकि, सभी बागानों की संरचना और श्रम व्यवस्था समान नहीं होती।
भूमध्यसागरीय जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ गर्म एवं शुष्क ग्रीष्म और अपेक्षाकृत नम शीत ऋतु हैं। इस जलवायु के अनुकूल फसलों तथा सिंचाई आधारित गतिविधियों का मिश्रण यहाँ की कृषि को विशिष्ट बनाता है।
प्रमुख कृषि उत्पाद:
प्रमुख क्षेत्र:
UPSC तथ्य: भूमध्यसागरीय कृषि केवल भूमध्य सागर के तटीय देशों तक सीमित नहीं है। समान प्रकार की जलवायु वाले अन्य महाद्वीपीय क्षेत्रों में भी इसकी विशेषताएँ मिलती हैं।
पशुपालन का स्वरूप जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, जल की उपलब्धता, बाजार और पशुओं के प्रकार पर निर्भर करता है।
घुमंतू पशुपालन शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा है। व्यावसायिक पशुपालन के प्रमुख उदाहरण ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों में मिलते हैं।
किसी फसल का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र उसकी जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, कृषि तकनीक, घरेलू माँग और बाजार से प्रभावित होता है। इसलिए किसी फसल का वितरण केवल एक जलवायु प्रदेश से निर्धारित नहीं होता।
| फसल | प्रमुख वैश्विक क्षेत्र | मुख्य उपयोग या विशेषता |
|---|---|---|
| धान | चीन, भारत, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, वियतनाम, थाईलैंड | मुख्य खाद्यान्न; मानसूनी एशिया में व्यापक |
| गेहूँ | चीन, भारत, यूरोप, रूस, यूक्रेन, उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया | समशीतोष्ण और शीतकालीन कृषि प्रदेशों की प्रमुख खाद्यान्न फसल |
| मक्का | संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, ब्राजील, अर्जेंटीना | मानव भोजन, पशु आहार और औद्योगिक उपयोग |
| सोयाबीन | ब्राजील, संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, चीन | खाद्य तेल और प्रोटीन-समृद्ध पशु आहार |
| कॉफी | ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया, इथियोपिया | महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक पेय फसल |
| चाय | चीन, भारत, केन्या, श्रीलंका, वियतनाम | गर्म एवं आर्द्र परिस्थितियों वाले प्रमुख क्षेत्र |
| कोको | कोट द'ईवोआर, घाना और अन्य पश्चिमी अफ्रीकी देश | चॉकलेट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल |
| प्राकृतिक रबर | थाईलैंड, इंडोनेशिया, वियतनाम और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र | गर्म एवं आर्द्र जलवायु में व्यापक |
| गन्ना | ब्राजील, भारत, चीन और अन्य उष्ण-उपोष्ण देश | चीनी, एथेनॉल और अन्य उत्पादों का कच्चा माल |
| कपास | चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील, पाकिस्तान | वस्त्र उद्योग के लिए रेशा |
| जैतून | स्पेन, इटली, ग्रीस और अन्य भूमध्यसागरीय क्षेत्र | भूमध्यसागरीय कृषि की प्रमुख फसल |
सावधानी: उपर्युक्त सूची प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों के उदाहरण देती है, कोई स्थायी वैश्विक उत्पादन-रैंकिंग नहीं। उत्पादन में देशों का क्रम वर्ष, मौसम और संबंधित आँकड़ा-स्रोत के अनुसार बदल सकता है।
गेहूँ विश्व की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है। इसका उत्पादन समशीतोष्ण क्षेत्रों के साथ-साथ ऐसे उपोष्ण क्षेत्रों में भी होता है जहाँ सर्दियों में इसकी खेती की जाती है।
प्रमुख क्षेत्र:
मक्का एक बहुउपयोगी फसल है। इसका उपयोग मानव भोजन, पशु आहार और औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका का Corn Belt मक्का कृषि का प्रसिद्ध क्षेत्र है। इसके अतिरिक्त चीन, ब्राजील और अर्जेंटीना में भी मक्का का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है।
धान का प्रमुख वैश्विक क्षेत्र एशिया है। पर्याप्त जल, गर्म तापमान, सिंचाई और श्रम की उपलब्धता ने अनेक एशियाई क्षेत्रों में धान की कृषि को विकसित किया है।
भारत, चीन, बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों के उदाहरण हैं। हालांकि, धान की खेती एशिया तक सीमित नहीं है।
ज्वार, बाजरा और अन्य सूखा-सहिष्णु फसलें कम या अनिश्चित वर्षा वाले क्षेत्रों में खाद्य एवं चारा सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। अफ्रीका के साहेल क्षेत्र और भारत के शुष्क-अर्धशुष्क भागों में इन फसलों का विशेष महत्त्व है।
कॉफी, चाय और कोको महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलें हैं, लेकिन उनकी जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ समान नहीं हैं।
प्राकृतिक रबर और तेल ताड़ दोनों गर्म एवं आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलें हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया इनकी खेती का प्रमुख क्षेत्र है।
इन फसलों के विस्तार से रोजगार और निर्यात आय प्राप्त हो सकती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बागानों के विस्तार से वनों की कटाई, आवास विखंडन और जैव विविधता पर दबाव भी पड़ सकता है।
घासभूमियाँ उन क्षेत्रों में विकसित होती हैं जहाँ जलवायु, वर्षा, मिट्टी और आग जैसी पारिस्थितिक प्रक्रियाएँ वृक्षों की तुलना में घासों को अधिक अनुकूल बनाती हैं। इन क्षेत्रों का उपयोग पशुपालन, अनाज उत्पादन और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए किया जाता है।
| घासभूमि | भौगोलिक क्षेत्र | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| प्रेयरी (Prairies) | उत्तरी अमेरिका | समशीतोष्ण घासभूमि; अनेक भागों में गेहूँ और मक्का की खेती |
| पम्पास (Pampas) | अर्जेंटीना और उरुग्वे के प्रमुख भाग | उपजाऊ मैदान; अनाज उत्पादन और पशुपालन |
| स्टेपी (Steppes) | यूरेशिया | महाद्वीपीय जलवायु से प्रभावित विशाल घासभूमियाँ |
| वेल्ड (Veld) | दक्षिणी अफ्रीका | घासभूमियाँ; पशुपालन और कुछ क्षेत्रों में वाणिज्यिक खेती |
| डाउन्स (Downs) | ऑस्ट्रेलिया के घासभूमि क्षेत्र | पशुपालन और कुछ क्षेत्रों में अनाज उत्पादन |
| सवाना (Savanna) | उष्णकटिबंधीय अफ्रीका तथा अन्य उष्ण क्षेत्र | घासों के साथ बिखरे हुए वृक्ष; वर्षा का मौसमी वितरण महत्त्वपूर्ण |
परीक्षा में अंतर: प्रेयरी, पम्पास और स्टेपी मुख्यतः समशीतोष्ण घासभूमियों के उदाहरण हैं। सवाना उष्णकटिबंधीय घासभूमि है, जहाँ घासों के साथ बिखरे हुए वृक्ष भी मिलते हैं।
| आधार | गहन कृषि | विस्तृत कृषि |
|---|---|---|
| भूमि | प्रति किसान या खेत अपेक्षाकृत सीमित हो सकती है | बड़े क्षेत्रफल पर खेती सामान्य है |
| श्रम | प्रति इकाई भूमि अधिक हो सकता है | प्रति इकाई भूमि अपेक्षाकृत कम होता है |
| निवेश | श्रम, सिंचाई और अन्य कृषि निवेश अधिक हो सकते हैं | मशीनीकरण और बड़े पैमाने के संचालन का महत्त्व अधिक हो सकता है |
| उत्पादन | प्रति इकाई भूमि अधिक उत्पादन का लक्ष्य | कुल उत्पादन बड़े क्षेत्र और संचालन की दक्षता पर निर्भर |
| उदाहरण | एशिया के अनेक छोटे खेत; उच्च निवेश वाली सब्जी खेती | उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बड़े अनाज फार्म |
ध्यान रहे कि गहन और विस्तृत कृषि का अंतर केवल उत्पादन की कुल मात्रा से निर्धारित नहीं होता। इनके बीच मूल अंतर भूमि की प्रति इकाई पर श्रम और अन्य संसाधनों के उपयोग के स्तर में है।
आधुनिक कृषि में तकनीक का उपयोग उत्पादन, दक्षता और संसाधन प्रबंधन बेहतर करने के लिए किया जाता है। इसका स्तर देशों और क्षेत्रों के बीच अलग-अलग है।
तकनीक की उपलब्धता अपने आप में अधिक उत्पादकता की गारंटी नहीं है। उसके प्रभाव के लिए प्रशिक्षण, वित्त, बिजली, रखरखाव, बाजार और स्थानीय परिस्थितियों का अनुकूल होना भी आवश्यक है।
जैविक कृषि (Organic Farming) एक ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें अनुमत जैविक और प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर जोर दिया जाता है तथा सिंथेटिक रासायनिक इनपुट का उपयोग संबंधित मानकों के अनुसार सीमित या प्रतिबंधित होता है।
जैविक कृषि का अर्थ यह नहीं है कि इसमें हर प्रकार के कीट नियंत्रण या पोषण प्रबंधन का उपयोग निषिद्ध है। इसके लिए संबंधित जैविक प्रमाणन मानकों का पालन करना आवश्यक होता है।
सतत कृषि (Sustainable Agriculture) का उद्देश्य वर्तमान खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करते हुए मिट्टी, जल, जैव विविधता और भविष्य की उत्पादन क्षमता की रक्षा करना है।
प्रमुख उपाय:
कृषि उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार देशों को खाद्यान्न, पशु आहार, खाद्य तेल, पेय फसलें और औद्योगिक कच्चा माल उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
किसी देश की निर्यात क्षमता केवल उसकी जलवायु से निर्धारित नहीं होती। उत्पादन लागत, उत्पादकता, परिवहन, बंदरगाह, भंडारण, प्रसंस्करण, व्यापार नीतियाँ और अंतरराष्ट्रीय माँग भी महत्त्वपूर्ण हैं।
कृषि व्यापार से आय और रोजगार मिल सकते हैं, लेकिन निर्यात पर अत्यधिक निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापार प्रतिबंध और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
खाद्य सुरक्षा (Food Security) का अर्थ केवल पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन नहीं है। इसके लिए भोजन की उपलब्धता, लोगों की भोजन तक आर्थिक एवं भौतिक पहुँच, भोजन का उचित उपयोग तथा समय के साथ इन स्थितियों की स्थिरता भी महत्त्वपूर्ण है।
किसी देश में कुल खाद्य उत्पादन पर्याप्त होने के बावजूद गरीबी, असमानता, परिवहन की समस्या, युद्ध या वितरण की कमी के कारण कुछ लोगों को भोजन उपलब्ध नहीं हो सकता।
इसलिए खाद्य सुरक्षा की नीति में उत्पादन के साथ आय, पोषण, भंडारण, वितरण, बाजार और सामाजिक सुरक्षा को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन तापमान, वर्षा के वितरण, सूखे, बाढ़, लू, कीटों और फसल रोगों में परिवर्तन के माध्यम से कृषि को प्रभावित कर सकता है। प्रभाव फसल, क्षेत्र, जल उपलब्धता और किसानों की अनुकूलन क्षमता के अनुसार अलग-अलग होते हैं।
कुछ ठंडे क्षेत्रों में बढ़ते तापमान से फसल उगाने की अवधि लंबी हो सकती है, जबकि गर्म क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान, जल की कमी और कीटों का दबाव उत्पादन को नुकसान पहुँचा सकता है।
अनुकूलन के प्रमुख उपाय:
कृषि में जल का उपयोग सिंचाई, पशुपालन और प्रसंस्करण के लिए किया जाता है। जल का अत्यधिक दोहन या अनुचित प्रबंधन भूजल स्तर में गिरावट, जलभराव और मिट्टी में लवणों के जमाव जैसी समस्याएँ पैदा कर सकता है।
इसी तरह वनों की कटाई, अतिचराई, अनुचित जुताई और ढालदार भूमि पर अपर्याप्त संरक्षण के कारण मृदा अपरदन बढ़ सकता है। लंबे समय तक अनुचित भूमि प्रबंधन से पोषक तत्त्वों की कमी और भूमि क्षरण भी हो सकता है।
प्रमुख समाधान:
विश्व कृषि का स्वरूप प्राकृतिक पर्यावरण और मानवीय गतिविधियों की अंतःक्रिया से विकसित हुआ है। जलवायु, मिट्टी और जल कृषि की संभावनाएँ निर्धारित करते हैं, जबकि तकनीक, सिंचाई, परिवहन, बाजार, पूँजी और नीतियाँ उन संभावनाओं के वास्तविक उपयोग को प्रभावित करती हैं।
आधुनिक कृषि ने कई क्षेत्रों में उत्पादन और श्रम उत्पादकता बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ जल संकट, मृदा क्षरण, जैव विविधता की हानि और कृषि लागत जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं।
इसलिए भविष्य की कृषि का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय, संसाधन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।
| अवधारणा | एक पंक्ति में अर्थ |
|---|---|
| निर्वाह कृषि | मुख्यतः परिवार की आवश्यकताओं के लिए उत्पादन |
| वाणिज्यिक कृषि | बाजार में बिक्री के लिए उत्पादन |
| गहन कृषि | प्रति इकाई भूमि अधिक श्रम या निवेश |
| विस्तृत कृषि | बड़े क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम श्रम प्रति इकाई भूमि |
| मिश्रित कृषि | फसल उत्पादन और पशुपालन साथ-साथ |
| बागान कृषि | बड़े पैमाने पर प्रमुख वाणिज्यिक फसल |
| भूमध्यसागरीय कृषि | अंगूर, जैतून और अन्य फल; गर्म शुष्क ग्रीष्म वाली जलवायु |
| कॉर्न बेल्ट | संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रसिद्ध मक्का कृषि क्षेत्र |
| प्रेयरी | उत्तरी अमेरिका की समशीतोष्ण घासभूमि |
| पम्पास | अर्जेंटीना और उरुग्वे के प्रमुख भागों की घासभूमि |
| स्टेपी | यूरेशिया की विशाल घासभूमियाँ |
| वेल्ड | दक्षिणी अफ्रीका की घासभूमि |
| सवाना | उष्णकटिबंधीय घासभूमि, जिसमें बिखरे वृक्ष भी मिलते हैं |
विश्व कृषि का वितरण प्राकृतिक परिस्थितियों, तकनीक, श्रम, बाजार और ऐतिहासिक विकास से प्रभावित होता है। किसी कृषि प्रणाली को समझने के लिए उसके उद्देश्य, भूमि के उपयोग, निवेश, फसलों, पशुपालन और भौगोलिक परिस्थितियों का संयुक्त अध्ययन करना चाहिए।
UPSC की तैयारी के लिए इस विषय को कृषि के कारक → कृषि प्रणालियाँ → प्रमुख फसलें → विश्व के कृषि प्रदेश → घासभूमियाँ → वैश्विक व्यापार → खाद्य सुरक्षा एवं सतत कृषि के क्रम में पढ़ना उपयोगी रहेगा।