Advent of Europeans in India
भारत में यूरोपियों का आगमन
1. भारत में यूरोपियों का आगमन: परिचय
मध्यकाल के अंतिम चरण में भारत एशियाई और अंतरमहाद्वीपीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ से मसाले, सूती वस्त्र, रेशम, नील तथा अन्य वस्तुओं का व्यापार होता था। यूरोप में इन वस्तुओं की मांग के कारण यूरोपीय व्यापारी भारत और पूर्वी एशिया तक पहुँचने के लिए समुद्री मार्ग खोजने लगे।
1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा के कालीकट पहुँचने से यूरोप और भारत के बीच केप ऑफ गुड होप के रास्ते सीधे समुद्री संपर्क का नया चरण शुरू हुआ। इसके बाद पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, डेनिश और फ्रांसीसी व्यापारिक शक्तियाँ भारतीय तटों पर पहुँचीं।
प्रारंभ में इन कंपनियों का प्रमुख उद्देश्य व्यापार था। लेकिन व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, समुद्री नियंत्रण, स्थानीय शासकों से विशेषाधिकार प्राप्त करने और भारतीय राज्यों की राजनीति में हस्तक्षेप के कारण कुछ कंपनियाँ राजनीतिक तथा सैन्य शक्ति भी बन गईं। अंततः अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुई।
2. यूरोपियों के भारत आने के प्रमुख कारण
- वस्तुओं की मांग: यूरोप में भारतीय सूती वस्त्रों, रेशम, नील और एशियाई मसालों की भारी मांग थी।
- प्रत्यक्ष व्यापार: यूरोपीय व्यापारी एशियाई व्यापार में मध्यस्थों पर निर्भरता कम करके अधिक लाभ कमाना चाहते थे।
- समुद्री मार्ग की खोज: यूरोप से एशिया तक पहुँचने के लिए अफ्रीका के चारों ओर से जाने वाला समुद्री मार्ग खोजा गया।
- 1453 की घटना: कॉन्स्टेंटिनोपल पर ऑटोमन तुर्कों के अधिकार के बाद यूरोपीय व्यापारियों की चिंताएँ बढ़ीं। हालाँकि समुद्री मार्गों की खोज के पीछे केवल यही एक कारण नहीं था।
- तकनीकी विकास: जहाज निर्माण, नौवहन, मानचित्रण और समुद्री दिशा-निर्धारण में प्रगति हुई।
- राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय राज्यों ने व्यापार, समुद्री शक्ति और उपनिवेशों पर नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास किया।
- धार्मिक उद्देश्य: कुछ यूरोपीय अभियानों के साथ ईसाई धर्म के प्रचार का उद्देश्य भी जुड़ा हुआ था।
3. भारत के समुद्री मार्ग की खोज
- 1488: बार्थोलोम्यू डियाज़ अफ्रीका के दक्षिणी सिरे तक पहुँचा। इस क्षेत्र को बाद में केप ऑफ गुड होप कहा गया।
- 1497: वास्को द गामा पुर्तगाल से भारत की समुद्री यात्रा पर रवाना हुआ।
- 1498: वास्को द गामा अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से होते हुए कालीकट पहुँचा।
- कालीकट वर्तमान केरल के मालाबार तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाह था।
- कालीकट के शासक को जमोरिन कहा जाता था।
परीक्षा के लिए महत्त्व: 1498 में वास्को द गामा का कालीकट पहुँचना भारत और यूरोप के बीच केप ऑफ गुड होप से होकर सीधे समुद्री संपर्क की स्थापना की प्रमुख घटना है। इससे पहले भी भारत का पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र से व्यापार होता था।
4. पुर्तगाली: भारत आने वाली पहली यूरोपीय समुद्री शक्ति
पुर्तगाली भारत में समुद्री मार्ग से पहुँचने वाली पहली प्रमुख यूरोपीय शक्ति थे। उनका उद्देश्य हिंद महासागर के व्यापार, विशेषकर मसालों के व्यापार, पर अधिक नियंत्रण स्थापित करना था। उन्होंने समुद्री शक्ति, किलेबंद व्यापारिक केंद्रों और अनुमति-पत्रों के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार किया।
वास्को द गामा
- वह पुर्तगाल का समुद्री यात्री था।
- 1498 में वह कालीकट पहुँचा और जमोरिन से संपर्क स्थापित किया।
- 1502 में उसने दूसरी बार भारत की यात्रा की।
- उसकी यात्रा ने यूरोप और भारत के बीच सीधे समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया।
फ्रांसिस्को डी अल्मेडा
- वह 1505 में भारत में पुर्तगाली प्रशासन का पहला वायसराय नियुक्त हुआ।
- उसने पुर्तगाली व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए नौसैनिक शक्ति पर जोर दिया।
- उसकी नीति को सामान्यतः नीली जल नीति (Blue Water Policy) कहा जाता है।
- इस नीति का मुख्य जोर समुद्र में पुर्तगाली प्रभुत्व और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा पर था।
- 1509 के दीव के नौसैनिक युद्ध में पुर्तगालियों की विजय ने हिंद महासागर में उनकी स्थिति मजबूत की।
अल्फांसो डी अल्बुकर्क
- 1509 में उसने भारत में पुर्तगाली शासन का नेतृत्व संभाला।
- 1510 में उसने बीजापुर के आदिलशाही शासन से गोवा पर अधिकार किया।
- गोवा आगे चलकर भारत में पुर्तगाली सत्ता का प्रमुख केंद्र बना।
- 1511 में पुर्तगालियों ने मलक्का पर अधिकार किया।
- उसने हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और व्यापारिक केंद्रों पर पुर्तगाली नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास किया।
5. पुर्तगालियों के प्रमुख केंद्र
| केंद्र | महत्त्व |
|---|---|
| गोवा | पुर्तगाली सत्ता का प्रमुख प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र। |
| कोचीन | मालाबार तट पर मसाला व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र। |
| कन्ननोर | मालाबार तट पर पुर्तगाली व्यापारिक और सामरिक केंद्र। |
| दीव | गुजरात के तट के निकट महत्वपूर्ण समुद्री केंद्र। |
| दमन | पश्चिमी तट पर पुर्तगाली अधिकार का महत्वपूर्ण केंद्र। |
| बसीन (वसई) | पश्चिमी भारत में पुर्तगाली उपस्थिति का प्रमुख केंद्र। |
कार्टाज़ व्यवस्था (Cartaz System)
पुर्तगालियों ने हिंद महासागर में अपने समुद्री प्रभुत्व को मजबूत करने के लिए कार्टाज़ नामक समुद्री अनुमति-पत्र व्यवस्था का उपयोग किया। इसके अंतर्गत कई जहाजों को पुर्तगाली अधिकारियों से अनुमति-पत्र लेना पड़ता था। यह व्यवस्था समुद्री व्यापार पर नियंत्रण और प्रतिद्वंद्वी शक्तियों पर दबाव बनाने का एक साधन थी।
पुर्तगालियों के पतन के प्रमुख कारण
- डच और अंग्रेज जैसी अन्य यूरोपीय शक्तियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा।
- व्यापारिक संसाधनों और प्रशासनिक क्षमता की सीमाएँ।
- स्थानीय शासकों और अन्य समुद्री शक्तियों के साथ संघर्ष।
- पुर्तगाल की सीमित जनशक्ति और विशाल समुद्री साम्राज्य को बनाए रखने की कठिनाई।
- हिंद महासागर में डच और अंग्रेजी नौसैनिक तथा व्यापारिक शक्ति का विस्तार।
पुर्तगालियों का योगदान
- 1556 में गोवा में भारत का पहला मुद्रणालय स्थापित हुआ।
- तंबाकू सहित कुछ नई फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रसार में पुर्तगाली समुद्री संपर्कों की भूमिका रही।
- ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों से पश्चिमी तट के कुछ क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए।
- समुद्री व्यापार, जहाजों और किलेबंद व्यापारिक केंद्रों के माध्यम से भारतीय तटों पर यूरोपीय उपस्थिति बढ़ी।
6. डचों का भारत आगमन
डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) की स्थापना 1602 में हुई। डचों का मुख्य उद्देश्य एशिया के मसाला व्यापार पर नियंत्रण प्राप्त करना था। उनका सबसे महत्वपूर्ण साम्राज्यवादी और व्यापारिक ध्यान इंडोनेशिया तथा पूर्वी द्वीपसमूह के मसाला क्षेत्रों पर केंद्रित रहा, फिर भी उन्होंने भारत में अनेक व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।
डचों के प्रमुख व्यापारिक केंद्र
| केंद्र | क्षेत्र | व्यापारिक महत्त्व |
|---|---|---|
| मसूलीपट्टनम | आंध्र तट | पूर्वी तट पर प्रारंभिक डच व्यापारिक केंद्र। |
| पुलिकट | कोरोमंडल तट | भारत में डचों का महत्वपूर्ण प्रारंभिक केंद्र। |
| सूरत | गुजरात | पश्चिमी तट पर व्यापारिक केंद्र। |
| चिनसुरा | बंगाल | बंगाल में डच व्यापार का प्रमुख केंद्र। |
| नागपट्टनम | तमिलनाडु तट | कोरोमंडल तट पर महत्वपूर्ण डच केंद्र। |
| कोचीन | मालाबार तट | मसाला व्यापार से संबंधित केंद्र। |
डचों का भारत में प्रभाव क्यों सीमित रहा?
- उनकी प्राथमिकता इंडोनेशिया के मसाला व्यापार पर नियंत्रण थी।
- भारत में अंग्रेजों की व्यापारिक और राजनीतिक शक्ति बढ़ती गई।
- 1759 के बेदरा (बिदेरा) के युद्ध में अंग्रेजों ने बंगाल में डच चुनौती को कमजोर किया।
- समय के साथ भारत में डचों की राजनीतिक भूमिका सीमित रह गई, हालाँकि उनका व्यापारिक प्रभाव पूरी तरह तत्काल समाप्त नहीं हुआ।
7. अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी
- अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को 31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से शाही चार्टर मिला।
- कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के विशेषाधिकार प्रदान किए गए।
- प्रारंभ में कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार और लाभ कमाना था।
- बाद में कंपनी ने किलेबंद व्यापारिक केंद्र बनाए, सैनिक शक्ति विकसित की और भारतीय राज्यों की राजनीति में हस्तक्षेप किया।
- 18वीं शताब्दी में बंगाल और दक्षिण भारत में सफलताओं के बाद कंपनी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गई।
कैप्टन विलियम हॉकिन्स
- वह 1608 में सूरत पहुँचा और बाद में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में गया।
- उसका उद्देश्य अंग्रेजी कंपनी के लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करना था।
- पुर्तगालियों के प्रभाव और दरबारी परिस्थितियों के कारण उसे अपनी इच्छानुसार सभी सुविधाएँ प्राप्त नहीं हुईं।
- उसकी यात्रा अंग्रेजी कंपनी और मुगल दरबार के बीच प्रारंभिक संपर्क के इतिहास में महत्वपूर्ण है।
स्वाली का युद्ध (1612)
- स्वाली का युद्ध सूरत के निकट अंग्रेजों और पुर्तगालियों के बीच हुआ नौसैनिक संघर्ष था।
- अंग्रेजी सफलता से पश्चिमी तट पर उनकी स्थिति मजबूत हुई।
- इस सफलता ने मुगल अधिकारियों के सामने अंग्रेजों की समुद्री क्षमता को प्रदर्शित किया और सूरत में उनकी व्यापारिक स्थिति मजबूत करने में सहायता की।
सर थॉमस रो
- सर थॉमस रो 1615 में इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरबार पहुँचा।
- उसका उद्देश्य अंग्रेजी कंपनी के व्यापार के लिए अधिक स्थायी सुविधाएँ प्राप्त करना था।
- उसकी कूटनीति ने मुगल साम्राज्य में अंग्रेजी व्यापारिक हितों को मजबूत करने में योगदान दिया।
8. अंग्रेजों के प्रमुख व्यापारिक केंद्र
| केंद्र | महत्वपूर्ण घटना | ऐतिहासिक महत्त्व |
|---|---|---|
| सूरत | 17वीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेजी व्यापार मजबूत हुआ। | पश्चिमी भारत में कंपनी का प्रारंभिक प्रमुख व्यापारिक केंद्र। |
| मद्रास | 1639 में क्षेत्र प्राप्त किया गया; फोर्ट सेंट जॉर्ज का विकास हुआ। | पूर्वी तट पर व्यापार और प्रशासन का प्रमुख केंद्र। |
| बंबई | 1661 में अंग्रेजी राजसत्ता को मिला; 1668 में कंपनी को पट्टे पर दिया गया। | पश्चिमी तट पर महत्वपूर्ण बंदरगाह और नौसैनिक केंद्र। |
| कलकत्ता | सुतानुटी, कालिकाता और गोविंदपुर के आसपास अंग्रेजी बस्ती विकसित हुई। | बंगाल में कंपनी की शक्ति का प्रमुख केंद्र। |
मद्रास और फोर्ट सेंट जॉर्ज
1639 में अंग्रेजी कंपनी ने चंद्रगिरि के नायक शासक के अधीन अधिकारियों से मद्रास क्षेत्र में व्यापारिक बस्ती स्थापित करने की अनुमति प्राप्त की। यहाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज विकसित हुआ। मद्रास आगे चलकर दक्षिण भारत में अंग्रेजी कंपनी का प्रमुख प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र बना।
बंबई (Bombay)
- बंबई पुर्तगाली अधिकार में थी और 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को विवाह-संबंधी दहेज के रूप में मिली।
- 1668 में चार्ल्स द्वितीय ने बंबई को अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को पट्टे पर दे दिया।
- बंबई आगे चलकर कंपनी का महत्वपूर्ण पश्चिमी बंदरगाह और नौसैनिक केंद्र बन गया।
कलकत्ता और फोर्ट विलियम
- कलकत्ता का विकास सुतानुटी, कालिकाता और गोविंदपुर गाँवों के आसपास हुआ।
- बंगाल के व्यापार और कंपनी की राजनीतिक गतिविधियों के विस्तार से इसका महत्व बढ़ा।
- फोर्ट विलियम अंग्रेजी सत्ता का प्रमुख सैन्य और प्रशासनिक केंद्र बना।
- बंगाल की आर्थिक समृद्धि ने कंपनी को आगे राजनीतिक विस्तार के लिए महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराए।
9. फर्रुखसियर का फरमान (1717)
मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने 1717 में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को महत्वपूर्ण व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान कीं। इस फरमान ने बंगाल में कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों को मजबूत किया। कंपनी ने इन सुविधाओं का व्यापक उपयोग किया, जिससे स्थानीय व्यापारियों और बंगाल के प्रशासन के साथ उसके विवाद भी बढ़े।
UPSC के लिए महत्त्व: 1717 का फरमान बंगाल में अंग्रेजी कंपनी की व्यापारिक स्थिति के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इसे बाद के राजनीतिक विस्तार की पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए।
10. डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी
- डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1616 में हुई।
- 1620 में डेनिश व्यापारियों ने ट्रांक्वेबार में अपना केंद्र स्थापित किया।
- बंगाल में सेरामपुर डेनिश उपस्थिति का प्रमुख केंद्र बना।
- भारत में डेनिश राजनीतिक और सैन्य प्रभाव सीमित रहा।
- 1845 में डेनमार्क ने अपनी भारतीय बस्तियाँ अंग्रेजों को बेच दीं।
प्रमुख केंद्र: ट्रांक्वेबार (वर्तमान तमिलनाडु में थारंगमबाड़ी) और सेरामपुर (वर्तमान पश्चिम बंगाल)।
11. फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी
- फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1664 में फ्रांस के वित्त मंत्री जीन-बैप्टिस्ट कोलबेयर के प्रयासों से हुई।
- इसका उद्देश्य एशियाई व्यापार में फ्रांस की स्थिति मजबूत करना था।
- पांडिचेरी फ्रांसीसियों का सबसे महत्वपूर्ण भारतीय केंद्र बना।
- फ्रांसीसियों ने व्यापार के साथ-साथ स्थानीय शासकों के उत्तराधिकार विवादों में हस्तक्षेप करके राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की।
फ्रांसीसियों के प्रमुख केंद्र
- पांडिचेरी
- चंद्रनगर
- माहे
- कराईकल
- यानम
- सूरत
- मसूलीपट्टनम
डुप्ले
- जोसेफ फ्रांस्वा डुप्ले फ्रांसीसी भारत का प्रमुख अधिकारी था।
- वह 1742 में पांडिचेरी का गवर्नर बना।
- उसने भारतीय राज्यों के उत्तराधिकार विवादों में हस्तक्षेप करके फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया।
- उसकी नीतियों ने दक्षिण भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के संघर्ष को तीव्र किया।
12. कर्नाटक के युद्ध (1746–1763)
कर्नाटक के युद्ध दक्षिण भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच व्यापारिक तथा राजनीतिक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। इन युद्धों का संबंध यूरोप में दोनों शक्तियों के बीच चल रहे संघर्षों और भारत के स्थानीय उत्तराधिकार विवादों से भी था।
| युद्ध | अवधि | मुख्य विशेषता | परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1746–1748 | ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध के व्यापक संदर्भ में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों का संघर्ष। | 1748 की ऐक्स-ला-शापेल संधि के बाद संघर्ष समाप्त हुआ; मद्रास अंग्रेजों को वापस मिला। |
| द्वितीय कर्नाटक युद्ध | 1749–1754 | हैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकार विवादों में दोनों शक्तियों का हस्तक्षेप। | फ्रांसीसी राजनीतिक योजनाओं को अपेक्षित सफलता नहीं मिली; डुप्ले को वापस बुला लिया गया। |
| तृतीय कर्नाटक युद्ध | 1756–1763 | सात वर्षीय युद्ध के संदर्भ में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों का निर्णायक संघर्ष। | अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई; 1763 की पेरिस संधि ने युद्धोत्तर व्यवस्था तय की। |
वांडीवाश का युद्ध (1760)
- यह युद्ध 1760 में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच हुआ।
- अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयर कूट ने किया।
- अंग्रेजों ने फ्रांसीसी सेना को निर्णायक पराजय दी।
- इस पराजय ने भारत में फ्रांसीसियों की राजनीतिक और सैन्य महत्वाकांक्षाओं को गंभीर रूप से कमजोर किया।
- 1763 की पेरिस संधि के बाद फ्रांसीसियों को भारत में कुछ व्यापारिक केंद्र रखने की अनुमति रही, लेकिन वे अंग्रेजों जैसी स्वतंत्र राजनीतिक-सैन्य शक्ति नहीं बन सके।
13. अंग्रेज फ्रांसीसियों से अधिक सफल क्यों हुए?
- नौसैनिक शक्ति: अंग्रेजों की समुद्री शक्ति ने सैनिकों और संसाधनों की आवाजाही में सहायता की।
- आर्थिक संसाधन: बंगाल में राजनीतिक सफलता के बाद कंपनी को बड़े आर्थिक संसाधन प्राप्त हुए।
- राजनीतिक रणनीति: अंग्रेजों ने स्थानीय शासकों के बीच मतभेदों और उत्तराधिकार विवादों का उपयोग किया।
- संगठन और वित्त: अंग्रेजी कंपनी ने समय के साथ व्यापारिक आय, सैन्य संगठन और प्रशासनिक संरचना को मजबूत किया।
- फ्रांसीसी सीमाएँ: फ्रांसीसी कंपनी को वित्तीय समस्याओं और फ्रांसीसी सरकार के समर्थन की सीमाओं का सामना करना पड़ा।
- वांडीवाश का परिणाम: 1760 की अंग्रेजी विजय ने दक्षिण भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक चुनौती को कमजोर कर दिया।
अंग्रेजों की सफलता को केवल एक युद्ध या एक कारण से नहीं समझा जा सकता। आर्थिक संसाधन, समुद्री शक्ति, राजनीतिक अवसर, सैन्य संगठन और स्थानीय परिस्थितियों ने मिलकर उनकी स्थिति मजबूत की।
14. यूरोपीय शक्तियों की तुलना
| यूरोपीय शक्ति | कंपनी की स्थापना | प्रमुख केंद्र | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|---|
| पुर्तगाली | भारत आगमन: 1498 | गोवा, कोचीन, दीव | भारत पहुँचने वाली पहली प्रमुख यूरोपीय समुद्री शक्ति। |
| अंग्रेज | 1600 | सूरत, मद्रास, बंबई, कलकत्ता | आगे चलकर भारत में प्रमुख राजनीतिक शक्ति बने। |
| डच | 1602 | पुलिकट, चिनसुरा, नागपट्टनम | इंडोनेशिया और मसाला व्यापार पर विशेष ध्यान। |
| डेनिश | 1616 | ट्रांक्वेबार, सेरामपुर | भारत में सीमित व्यापारिक उपस्थिति। |
| फ्रांसीसी | 1664 | पांडिचेरी, चंद्रनगर, माहे | दक्षिण भारत में अंग्रेजों के प्रमुख यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी। |
ध्यान दें: पुर्तगालियों के लिए 1498 भारत आगमन की प्रमुख तिथि है, जबकि अन्य प्रविष्टियों में संबंधित ईस्ट इंडिया कंपनियों की स्थापना के वर्ष दिए गए हैं। इसलिए इन तिथियों का अर्थ एक जैसा नहीं है।
15. व्यापार से राजनीतिक सत्ता तक
यूरोपीय कंपनियों ने भारत में व्यापारिक बस्तियों और कारखानों के माध्यम से अपनी उपस्थिति स्थापित की। व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए उन्होंने किले बनाए, सैनिक रखे और स्थानीय शासकों से विशेषाधिकार प्राप्त किए। जैसे-जैसे यूरोपीय प्रतिस्पर्धा बढ़ी, कंपनियों ने भारतीय राज्यों के उत्तराधिकार और क्षेत्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप करना शुरू किया।
18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति कमजोर होने, क्षेत्रीय राज्यों के उभार और यूरोपीय कंपनियों के आर्थिक-सैन्य विस्तार ने नई राजनीतिक परिस्थितियाँ पैदा कीं। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर बंगाल और दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत की। इस प्रकार एक व्यापारिक कंपनी धीरे-धीरे क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति और अंततः औपनिवेशिक शासक बनी।
16. महत्वपूर्ण कालक्रम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1488 | बार्थोलोम्यू डियाज़ अफ्रीका के दक्षिणी सिरे तक पहुँचा। |
| 1498 | वास्को द गामा कालीकट पहुँचा। |
| 1505 | फ्रांसिस्को डी अल्मेडा भारत में पुर्तगाली वायसराय बना। |
| 1509 | दीव का नौसैनिक युद्ध। |
| 1510 | अल्बुकर्क ने गोवा पर अधिकार किया। |
| 1556 | गोवा में भारत का पहला मुद्रणालय स्थापित हुआ। |
| 1600 | अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को शाही चार्टर मिला। |
| 1602 | डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) की स्थापना। |
| 1608 | विलियम हॉकिन्स भारत पहुँचा और जहाँगीर के दरबार गया। |
| 1612 | स्वाली का युद्ध। |
| 1615 | सर थॉमस रो जहाँगीर के दरबार पहुँचा। |
| 1616 | डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना। |
| 1639 | मद्रास में अंग्रेजी व्यापारिक बस्ती स्थापित करने की अनुमति मिली। |
| 1661 | बंबई इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को मिली। |
| 1664 | फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना। |
| 1668 | बंबई अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को पट्टे पर दी गई। |
| 1717 | मुगल सम्राट फर्रुखसियर का फरमान। |
| 1746–1748 | प्रथम कर्नाटक युद्ध। |
| 1749–1754 | द्वितीय कर्नाटक युद्ध। |
| 1756–1763 | तृतीय कर्नाटक युद्ध का व्यापक काल। |
| 1759 | बेदरा का युद्ध: बंगाल में अंग्रेजों ने डच चुनौती को कमजोर किया। |
| 1760 | वांडीवाश का युद्ध। |
| 1763 | पेरिस की संधि; तृतीय कर्नाटक युद्ध के बाद की व्यवस्था। |
| 1845 | डेनमार्क ने अपनी भारतीय बस्तियाँ अंग्रेजों को बेच दीं। |
17. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत में सीधे समुद्री मार्ग से पहुँचने वाली पहली प्रमुख यूरोपीय शक्ति — पुर्तगाली।
- वास्को द गामा भारत पहुँचा — 1498 में।
- वास्को द गामा का आगमन स्थल — कालीकट।
- कालीकट का शासक — जमोरिन।
- भारत में पहला पुर्तगाली वायसराय — फ्रांसिस्को डी अल्मेडा।
- नीली जल नीति — फ्रांसिस्को डी अल्मेडा।
- गोवा पर पुर्तगाली अधिकार — 1510, अल्बुकर्क के नेतृत्व में।
- अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी — 1600।
- डच ईस्ट इंडिया कंपनी — 1602।
- डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी — 1616।
- फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी — 1664।
- स्वाली का युद्ध — 1612; अंग्रेज और पुर्तगाली।
- मद्रास — फोर्ट सेंट जॉर्ज।
- बंबई — 1661 में अंग्रेजी राजसत्ता को मिली; 1668 में कंपनी को पट्टे पर दी गई।
- कलकत्ता — सुतानुटी, कालिकाता और गोविंदपुर के आसपास विकसित हुआ।
- 1717 का फरमान — मुगल सम्राट फर्रुखसियर।
- डेनिश केंद्र — ट्रांक्वेबार और सेरामपुर।
- फ्रांसीसी केंद्र — पांडिचेरी, चंद्रनगर, माहे, कराईकल और यानम।
- वांडीवाश का युद्ध — 1760; अंग्रेजों की फ्रांसीसियों पर विजय।
- पेरिस की संधि — 1763।
18. परीक्षा के लिए अवधारणात्मक निष्कर्ष
भारत में यूरोपियों के आगमन को केवल समुद्री यात्राओं और व्यापारिक केंद्रों की सूची के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। इसे तीन चरणों में समझना अधिक उपयोगी है:
- समुद्री संपर्क और व्यापार: पुर्तगालियों के आगमन के बाद यूरोपीय कंपनियों ने भारतीय तटों पर व्यापारिक उपस्थिति बढ़ाई।
- व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और सैन्य संघर्ष: कंपनियों ने किले बनाए, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बढ़ाया और एक-दूसरे के व्यापार को चुनौती दी।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रभुत्व: विशेषकर 18वीं शताब्दी में अंग्रेजी कंपनी ने स्थानीय राजनीतिक संघर्षों और अपने आर्थिक-सैन्य संसाधनों का उपयोग करके सत्ता का विस्तार किया।
मुख्य निष्कर्ष: यूरोपीय कंपनियों में भारत में सबसे पहले पुर्तगाली समुद्री मार्ग से पहुँचे, लेकिन अंततः अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनी। इन दोनों तथ्यों को अलग-अलग समझना आवश्यक है।