Gandhian Era

गांधी युग — असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन

परिचय — Introduction

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी युग (Gandhian Era) सामान्यतः 1915 में महात्मा गांधी के भारत लौटने से लेकर 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक के उस चरण को कहा जाता है, जिसमें गांधीजी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बने। यह कोई औपचारिक रूप से निर्धारित कालखंड नहीं, बल्कि इतिहासलेखन में प्रचलित एक सामान्य नाम है।

गांधीजी ने सत्याग्रह, अहिंसा, स्वदेशी और जनभागीदारी को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के प्रमुख साधनों के रूप में विकसित किया। उनके नेतृत्व में स्थानीय समस्याओं से जुड़े आंदोलनों से लेकर देशव्यापी जनआंदोलनों तक राष्ट्रीय राजनीति का विस्तार हुआ।

इस काल के तीन प्रमुख अखिल भारतीय आंदोलनों में असहयोग आंदोलन (1920–1922), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) शामिल हैं। इनके उद्देश्य, कार्यक्रम और परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं।

गांधीजी की प्रमुख अवधारणाएँ

  • सत्याग्रह: सत्य और नैतिक शक्ति के आधार पर अन्याय का अहिंसक प्रतिरोध।
  • अहिंसा: संघर्ष के दौरान हिंसा से बचना और विरोध को शांतिपूर्ण साधनों से आगे बढ़ाना।
  • स्वदेशी: देश में निर्मित वस्तुओं और स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित करना।
  • असहयोग: अन्यायपूर्ण शासन को जनता द्वारा दिए जाने वाले सहयोग को वापस लेना।
  • सविनय अवज्ञा: अन्यायपूर्ण कानूनों का सार्वजनिक और अहिंसक उल्लंघन करना।

ध्यान दें कि गांधीवादी विचारों के प्रभाव के बावजूद राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिकारी, समाजवादी, किसान, मजदूर तथा अन्य राजनीतिक धाराएँ भी सक्रिय थीं। स्वतंत्रता आंदोलन को केवल एक नेता या एक विचारधारा तक सीमित करके नहीं समझना चाहिए।

गांधीजी के प्रारंभिक सत्याग्रह

राष्ट्रीय स्तर पर बड़े आंदोलन शुरू करने से पहले गांधीजी ने भारत में स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए सत्याग्रह का प्रयोग किया। इन आंदोलनों से उन्हें किसानों, मजदूरों और स्थानीय समुदायों के साथ काम करने का अनुभव मिला।

आंदोलन वर्ष मुख्य समस्या महत्व
चंपारण सत्याग्रह 1917 नील की खेती से जुड़ी किसानों की समस्याएँ और तिनकठिया प्रथा गांधीजी का भारत में पहला प्रमुख सत्याग्रह
अहमदाबाद मिल हड़ताल 1918 मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच वेतन विवाद औद्योगिक श्रमिकों के विवाद में गांधीजी का हस्तक्षेप
खेड़ा सत्याग्रह 1918 फसल खराब होने पर भू-राजस्व में राहत की माँग किसानों को संगठित कर राजस्व संबंधी राहत की माँग

चंपारण सत्याग्रह, 1917

बिहार के चंपारण क्षेत्र में अनेक किसानों को नील की खेती से संबंधित शोषणकारी व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता था। तिनकठिया प्रथा के अंतर्गत किसानों को अपनी भूमि के एक निर्धारित हिस्से पर नील की खेती करने के लिए बाध्य किया जाता था। गांधीजी ने किसानों की शिकायतों की जाँच की और उनके पक्ष में आंदोलन चलाया।

अहमदाबाद मिल हड़ताल, 1918

अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच वेतन को लेकर विवाद हुआ। गांधीजी ने मजदूरों के पक्ष में हस्तक्षेप किया और सत्याग्रह तथा उपवास का सहारा लिया।

खेड़ा सत्याग्रह, 1918

गुजरात के खेड़ा जिले में फसल खराब होने के कारण किसानों ने भू-राजस्व वसूली में राहत की माँग की। गांधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल सहित अन्य कार्यकर्ताओं ने किसानों को संगठित किया।

परीक्षा हेतु: चंपारण का संबंध नील की खेती से, अहमदाबाद का संबंध मिल मजदूरों के वेतन विवाद से और खेड़ा का संबंध फसल खराब होने के बाद भू-राजस्व में राहत की माँग से है।

रॉलेट सत्याग्रह — Rowlatt Satyagraha, 1919

प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों पर नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से रॉलेट एक्ट, 1919 पारित किया। इस कानून ने सरकार को कुछ मामलों में बिना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के गिरफ्तारी और नजरबंदी जैसी कठोर शक्तियाँ प्रदान कीं।

गांधीजी ने इस कानून को नागरिक स्वतंत्रताओं के विरुद्ध माना और इसके विरोध में देशव्यापी सत्याग्रह का आह्वान किया। 6 अप्रैल 1919 को देश के अनेक हिस्सों में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए।

जलियांवाला बाग हत्याकांड

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में बैसाखी के अवसर पर एकत्रित लोगों पर ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर सैनिकों ने गोलीबारी की। इस घटना में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए।

इस हत्याकांड ने ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीय जनता के असंतोष को गहरा किया। रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग की घटना ने आगे चलकर असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि

असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि में कई घटनाएँ थीं। इनमें रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियाँ और खिलाफत प्रश्न प्रमुख थे।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानी साम्राज्य की स्थिति और खलीफा के भविष्य को लेकर भारतीय मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में असंतोष था। भारतीय खिलाफत आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया।

गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन के साथ सहयोग का समर्थन किया। उनका उद्देश्य औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक एकता विकसित करना था। इससे कुछ समय के लिए खिलाफत नेतृत्व और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच सहयोग मजबूत हुआ।

सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति मिली। दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को स्वीकार किया और संगठनात्मक बदलावों के माध्यम से अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास किया।

असहयोग आंदोलन — Non-Cooperation Movement, 1920–1922

असहयोग आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग समाप्त करके उसके नैतिक और प्रशासनिक आधार को कमजोर करना था। गांधीजी का तर्क था कि औपनिवेशिक शासन जनता के सहयोग के बिना प्रभावी ढंग से नहीं चल सकता।

प्रमुख कार्यक्रम

  • सरकार द्वारा दी गई उपाधियों और सम्मानों का त्याग।
  • सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार।
  • सरकारी अदालतों का बहिष्कार करने का प्रयास।
  • विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार।
  • विदेशी वस्त्रों और अन्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
  • स्वदेशी वस्तुओं और खादी को प्रोत्साहन।
  • चरखे और राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा देना।

आंदोलन के दौरान अनेक विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षण संस्थान छोड़े, कुछ वकीलों ने वकालत का त्याग किया और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के अभियान चलाए गए। किसानों तथा अन्य स्थानीय समूहों ने भी अपने क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।

आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में एक जैसा नहीं था। विभिन्न क्षेत्रों में इसकी तीव्रता, भागीदारी और कार्यक्रम स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रहे।

खिलाफत आंदोलन से संबंध

मोहम्मद अली और शौकत अली जैसे नेताओं ने खिलाफत आंदोलन को आगे बढ़ाया। गांधीजी ने खिलाफत प्रश्न और असहयोग आंदोलन को जोड़ने का समर्थन किया। इससे हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को प्रोत्साहन मिला, हालाँकि यह एकता स्थायी नहीं रही और आगे चलकर विभिन्न मतभेद उभरे।

चौरी-चौरा घटना और असहयोग आंदोलन की वापसी — 1922

4 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।

गांधीजी ने इस हिंसा को आंदोलन के अहिंसक सिद्धांत के विरुद्ध माना। उन्होंने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय किया। उनके अनुसार व्यापक जनआंदोलन चलाने से पहले सत्याग्रहियों में अनुशासन और अहिंसा के प्रति पर्याप्त प्रतिबद्धता आवश्यक थी।

आंदोलन की वापसी से कांग्रेस के भीतर मतभेद उत्पन्न हुए। कुछ नेताओं का विचार था कि आंदोलन जारी रखा जाना चाहिए था, जबकि गांधीजी अहिंसा को संघर्ष की अनिवार्य शर्त मानते थे।

असहयोग आंदोलन का महत्व

  • कांग्रेस का जनाधार व्यापक हुआ और राष्ट्रीय राजनीति में आम लोगों की भागीदारी बढ़ी।
  • खादी और स्वदेशी को राजनीतिक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में बढ़ावा मिला।
  • विद्यार्थियों, महिलाओं, किसानों और अन्य समूहों की भागीदारी का विस्तार हुआ।
  • ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग करने की नीति को चुनौती मिली।
  • अहिंसक जन-संघर्ष की पद्धति को देशव्यापी पहचान मिली।

स्वराज पार्टी — Swaraj Party, 1923

असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस में इस प्रश्न पर मतभेद पैदा हुए कि विधान परिषदों में प्रवेश किया जाए या उनका बहिष्कार जारी रखा जाए।

चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने 1923 में स्वराज पार्टी का गठन किया। स्वराजवादी विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकारी नीतियों का विरोध करना और औपनिवेशिक शासन के कामकाज में बाधा डालना चाहते थे।

दूसरी ओर, गांधीजी के समर्थकों ने खादी, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा और अन्य रचनात्मक कार्यक्रमों पर जोर दिया। इस मतभेद के बावजूद दोनों धाराएँ औपनिवेशिक शासन का विरोध कर रही थीं।

साइमन कमीशन और पूर्ण स्वराज की ओर

ब्रिटिश सरकार ने 1927 में भारत की संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन नियुक्त किया। इसके सभी सदस्य ब्रिटिश थे और इसमें कोई भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। इसलिए भारतीय राजनीतिक दलों के बड़े हिस्से ने इसका विरोध किया।

कमीशन के विरोध में “Simon Go Back” के नारे लगाए गए। 1928 में लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय घायल हुए। कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।

दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।

पूर्ण स्वराज की घोषणा ने राष्ट्रीय आंदोलन को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन की माँग से आगे बढ़ाकर पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य से जोड़ दिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन — Civil Disobedience Movement, 1930–1934

सविनय अवज्ञा आंदोलन का उद्देश्य अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का सार्वजनिक और अहिंसक उल्लंघन करना था। असहयोग आंदोलन में मुख्यतः शासन के साथ सहयोग वापस लेने पर जोर था, जबकि सविनय अवज्ञा में कुछ कानूनों को सीधे तोड़कर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी गई।

पूर्ण स्वराज की घोषणा के बाद गांधीजी ने नमक कानून को आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बनाया। नमक दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तु था और उस पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण तथा कर व्यापक जनसमूहों को प्रभावित करता था।

दांडी मार्च — Dandi March, 1930

12 मार्च 1930 को गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी की ओर पैदल यात्रा शुरू की। लगभग 24 दिनों की यात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने नमक कानून का उल्लंघन किया।

दांडी मार्च ने नमक कानून को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। इसके बाद देश के विभिन्न भागों में नमक कानून तोड़ने और अन्य औपनिवेशिक कानूनों का विरोध करने के अभियान शुरू हुए।

प्रमुख कार्यक्रम

  • नमक कानून का उल्लंघन।
  • विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार।
  • शराब की दुकानों के सामने धरना।
  • कुछ क्षेत्रों में भू-राजस्व और अन्य करों का भुगतान रोकने के अभियान।
  • कुछ क्षेत्रों में वन कानूनों के विरुद्ध प्रतिरोध।
  • औपनिवेशिक प्रशासन की नीतियों के विरुद्ध सार्वजनिक प्रदर्शन।

सभी कार्यक्रम हर क्षेत्र में एक साथ नहीं चलाए गए। आंदोलन का स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों, नेतृत्व और जनता की भागीदारी के अनुसार अलग-अलग रहा।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने विदेशी वस्त्रों और शराब की दुकानों के सामने धरना देने, नमक कानून तोड़ने तथा जनसभाओं और प्रदर्शनों में भाग लेने जैसे कार्य किए।

सरोजिनी नायडू इस आंदोलन की प्रमुख महिला नेताओं में थीं। अनेक अन्य महिलाओं ने भी स्थानीय स्तर पर नेतृत्व और संगठनात्मक कार्य किए। इससे महिलाओं की सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी को अधिक विस्तार मिला।

फिर भी महिलाओं की भागीदारी को सभी क्षेत्रों में समान नहीं माना जा सकता। इसकी प्रकृति स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों, संसाधनों और राजनीतिक अवसरों के अनुसार भिन्न थी।

गांधी-इरविन समझौता — Gandhi-Irwin Pact, 1931

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गांधीजी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच बातचीत हुई। इसका परिणाम 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौते के रूप में सामने आया।

समझौते के अंतर्गत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी। सरकार ने अहिंसक राजनीतिक गतिविधियों से संबंधित कुछ बंदियों को रिहा करने और कुछ प्रतिबंधों में राहत देने पर सहमति व्यक्त की।

समझौते से सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई या सभी दमनात्मक कार्रवाइयों की समाप्ति नहीं हुई। क्रांतिकारियों की फाँसी का प्रश्न भी समझौते से हल नहीं हुआ।

गोलमेज सम्मेलन — Round Table Conferences

भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा करने के लिए लंदन में 1930 से 1932 के बीच तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए गए।

सम्मेलन वर्ष कांग्रेस की स्थिति महत्वपूर्ण तथ्य
प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 कांग्रेस ने भाग नहीं लिया संवैधानिक सुधारों पर चर्चा हुई।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 1931 गांधीजी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया प्रतिनिधित्व और संवैधानिक भविष्य पर मतभेद रहे।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन 1932 कांग्रेस ने भाग नहीं लिया चर्चाएँ आगे की संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा बनीं।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से गांधीजी को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। सम्मेलन में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व तथा संवैधानिक प्रश्नों पर मतभेद बने रहे।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनः आरंभ और वापसी

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से लौटने के बाद गांधीजी ने जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस और उसके नेताओं के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई की। गिरफ्तारियाँ, प्रतिबंध और संगठनात्मक गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ा।

व्यापक सरकारी दमन और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण आंदोलन कमजोर हुआ। गांधीजी ने 1933 में आंदोलन के स्वरूप में बदलाव किया और अंततः 1934 में सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्व

  • पूर्ण स्वराज के लक्ष्य को जनसंघर्ष से जोड़ा।
  • नमक जैसे दैनिक जीवन से जुड़े विषय को राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनाया।
  • महिलाओं और ग्रामीण समुदायों की भागीदारी का विस्तार हुआ।
  • औपनिवेशिक कानूनों की वैधता और शासन की नीतियों को चुनौती मिली।
  • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक ध्यान मिला।

भारत शासन अधिनियम — Government of India Act, 1935

भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासन के अंतर्गत संवैधानिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण चरण था। इस अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता का प्रावधान किया, हालाँकि प्रांतों में ब्रिटिश गवर्नरों की महत्वपूर्ण शक्तियाँ बनी रहीं।

अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ की योजना लागू नहीं हो सकी। प्रांतीय स्वायत्तता से संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत 1937 में प्रांतीय चुनाव हुए। कांग्रेस ने कई प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाए।

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद वायसराय ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को युद्धरत घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। युद्ध में भारत की भागीदारी और स्वतंत्रता के प्रश्न पर मतभेदों के कारण कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने 1939 में इस्तीफा दे दिया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह — Individual Satyagraha, 1940–1941

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस ने भारत को स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकार दिए बिना युद्ध में शामिल करने का विरोध किया। तत्काल व्यापक जनआंदोलन शुरू करने के बजाय गांधीजी ने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह का मार्ग अपनाया।

इस सत्याग्रह का उद्देश्य युद्ध में भारतीयों की अनैच्छिक भागीदारी का विरोध करना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर जोर देना था। विनोबा भावे पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही बने। उनके बाद जवाहरलाल नेहरू सहित अन्य नेताओं ने भी इसमें भाग लिया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से अलग था। यह सीमित और चयनित सत्याग्रहियों के माध्यम से चलाया गया आंदोलन था।

क्रिप्स मिशन — Cripps Mission, 1942

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेनाओं की प्रगति और युद्ध में भारतीय सहयोग की आवश्यकता के बीच ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को मार्च 1942 में भारत भेजा। उनका उद्देश्य भारतीय नेताओं के सामने संवैधानिक प्रस्ताव रखना था।

क्रिप्स प्रस्तावों में युद्ध के बाद भारत के लिए नया संवैधानिक ढाँचा तैयार करने और संविधान निर्माण की प्रक्रिया का प्रस्ताव था। प्रस्तावों में प्रांतों को भावी संघ से अलग रहने का विकल्प भी दिया गया था।

कांग्रेस और अन्य प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ प्रस्तावों से संतुष्ट नहीं हुईं। तत्काल सत्ता हस्तांतरण की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव तथा अन्य संवैधानिक प्रश्न इसकी अस्वीकृति के महत्वपूर्ण कारण थे। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की माँग तेज हुई।

भारत छोड़ो आंदोलन — Quit India Movement, 1942

भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक निर्णायक चरण था। इसके तत्काल कारणों में द्वितीय विश्व युद्ध, क्रिप्स मिशन की विफलता और ब्रिटिश शासन से तत्काल स्वतंत्रता की माँग शामिल थीं।

14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा में भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया। इसके बाद 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने प्रस्ताव पारित किया।

इसी अवसर पर गांधीजी ने “करो या मरो (Do or Die)” का आह्वान किया। इस नारे का आशय स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निर्णायक संघर्ष करने की प्रतिबद्धता से था।

9 अगस्त 1942 — नेताओं की गिरफ्तारी

भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस के अनेक अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। गांधीजी को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद रखा गया।

शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन अनेक क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं, विद्यार्थियों, युवाओं और भूमिगत कार्यकर्ताओं के माध्यम से आगे बढ़ा। कई स्थानों पर स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुए और ब्रिटिश सरकार ने व्यापक दमन किया।

भूमिगत आंदोलन

  • जयप्रकाश नारायण: भूमिगत गतिविधियों और आंदोलन को पुनर्गठित करने के प्रयासों से जुड़े।
  • राम मनोहर लोहिया: भूमिगत प्रतिरोध और संचार गतिविधियों में सक्रिय रहे।
  • अरुणा आसफ अली: 9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराने के लिए प्रसिद्ध।
  • उषा मेहता: भूमिगत कांग्रेस रेडियो के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भूमिगत कार्यकर्ताओं ने गुप्त संदेश, पर्चे, संचार नेटवर्क और रेडियो प्रसारण के माध्यम से आंदोलन की गतिविधियों को जारी रखने का प्रयास किया।

समानांतर सरकारें — Parallel Governments

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ क्षेत्रों में औपनिवेशिक प्रशासन को चुनौती देते हुए समानांतर प्रशासनिक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं। इनका स्वरूप और अवधि अलग-अलग थी।

  • बलिया, उत्तर प्रदेश: चित्तू पांडे के नेतृत्व में अगस्त 1942 में कुछ समय के लिए समानांतर प्रशासन स्थापित हुआ।
  • तमलुक, बंगाल: तम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार का गठन 1942 में हुआ। इसने स्थानीय प्रशासन और राहत संबंधी गतिविधियों सहित विभिन्न कार्य किए।
  • सतारा, महाराष्ट्र: प्रति सरकार का विकास हुआ। इसका प्रभाव 1940 के दशक के मध्य तक जारी रहा।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि भारत छोड़ो आंदोलन केवल शहरों के प्रदर्शनों तक सीमित नहीं था। कुछ क्षेत्रों में इसने स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का रूप भी लिया।

भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

1942 के आंदोलन में महिलाओं ने प्रदर्शनों, भूमिगत गतिविधियों, संदेश प्रसारण और संगठनात्मक कार्यों में भाग लिया।

  • अरुणा आसफ अली: भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख प्रतीकात्मक नेताओं में से एक।
  • उषा मेहता: भूमिगत कांग्रेस रेडियो के संचालन से जुड़ीं।
  • सुचेता कृपलानी: स्वतंत्रता आंदोलन और भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय रहीं।
  • अन्य महिला कार्यकर्ता: अनेक क्षेत्रों में प्रदर्शन, संगठन और संचार नेटवर्क में भागीदारी की।

महिला भागीदारी केवल प्रमुख नेताओं तक सीमित नहीं थी। स्थानीय स्तर पर अनेक महिलाओं ने आंदोलन को संगठित करने और जारी रखने में योगदान दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन की विशेषताएँ

  • प्रमुख कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन अनेक क्षेत्रों में जारी रहा।
  • विद्यार्थियों, युवाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई।
  • भूमिगत गतिविधियों और गुप्त संचार नेटवर्क का विकास हुआ।
  • बलिया, तमलुक और सतारा जैसे क्षेत्रों में समानांतर प्रशासनिक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं।
  • कुछ स्थानों पर रेलवे और संचार व्यवस्था को निशाना बनाया गया।
  • ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारियों, प्रतिबंधों और बल प्रयोग के माध्यम से आंदोलन को दबाने का प्रयास किया।

भारत छोड़ो आंदोलन को गांधीजी के नेतृत्व में शुरू किया गया आंदोलन माना जाता है, लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद इसके अनेक स्थानीय रूप विकसित हुए। कुछ स्थानों पर विरोध हिंसक भी हुआ, इसलिए आंदोलन के प्रत्येक चरण को पूर्णतः अहिंसक बताना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।

गांधीजी की रिहाई और स्वतंत्रता का अंतिम चरण

गांधीजी को स्वास्थ्य संबंधी कारणों से 6 मई 1944 को नजरबंदी से रिहा किया गया। इसके बाद भी भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न निर्णायक बना रहा।

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ और ब्रिटेन में नई सरकार बनी। इसके बाद भारतीय स्वतंत्रता, सत्ता हस्तांतरण और संविधान निर्माण से संबंधित राजनीतिक वार्ताएँ तेज हुईं।

1945–1946 के चुनाव, कैबिनेट मिशन, अंतरिम सरकार, सांप्रदायिक तनाव और सत्ता हस्तांतरण की बातचीत ने अंतिम घटनाक्रम को प्रभावित किया। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन स्वतंत्रता के साथ देश का विभाजन भी हुआ।

तीन प्रमुख गांधीवादी आंदोलनों की तुलना

आधार असहयोग आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन भारत छोड़ो आंदोलन
अवधि 1920–1922 1930–1934 1942
प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग समाप्त करना अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की माँग
प्रमुख प्रतीक या कार्यक्रम बहिष्कार, खादी और स्वदेशी नमक सत्याग्रह और कानूनों का उल्लंघन करो या मरो का आह्वान
महत्वपूर्ण घटना चौरी-चौरा घटना दांडी मार्च और गांधी-इरविन समझौता 9 अगस्त 1942 को नेताओं की गिरफ्तारी
अंत या प्रमुख मोड़ 1922 में वापस लिया गया 1934 में सामूहिक आंदोलन वापस लिया गया दमन के बावजूद स्थानीय और भूमिगत प्रतिरोध जारी रहा

तीनों आंदोलनों में जनभागीदारी और औपनिवेशिक शासन का विरोध महत्वपूर्ण थे, लेकिन उनके तत्काल उद्देश्य, राजनीतिक परिस्थितियाँ और अपनाए गए कार्यक्रम एक-दूसरे से अलग थे।

गांधी युग के प्रमुख नेता

  • महात्मा गांधी: सत्याग्रह और अहिंसक जनआंदोलनों के प्रमुख नेता।
  • जवाहरलाल नेहरू: पूर्ण स्वराज की माँग और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेता।
  • सरदार वल्लभभाई पटेल: किसान आंदोलनों और कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • मौलाना अबुल कलाम आजाद: राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस नेतृत्व के प्रमुख नेता।
  • राजेंद्र प्रसाद: चंपारण और बिहार के राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • चित्तरंजन दास: स्वराज पार्टी के प्रमुख संस्थापकों में से एक।
  • मोतीलाल नेहरू: स्वराज पार्टी और संवैधानिक राजनीति के प्रमुख नेता।
  • सरोजिनी नायडू: महिला नेतृत्व और राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका।
  • सुभाष चंद्र बोस: कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता; बाद में आजाद हिंद आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • अरुणा आसफ अली: भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख महिला कार्यकर्ता।
  • उषा मेहता: भूमिगत कांग्रेस रेडियो से जुड़ीं।
  • विनोबा भावे: पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही।

महत्वपूर्ण कालक्रम — Important Timeline

वर्ष / तिथि घटना
1915गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।
1917चंपारण सत्याग्रह।
1918अहमदाबाद मिल हड़ताल और खेड़ा सत्याग्रह।
1919रॉलेट एक्ट, रॉलेट सत्याग्रह और जलियांवाला बाग हत्याकांड।
सितंबर 1920कलकत्ता विशेष अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति।
दिसंबर 1920नागपुर अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम स्वीकार।
4 फरवरी 1922चौरी-चौरा घटना।
फरवरी 1922असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय।
1923स्वराज पार्टी का गठन।
1927साइमन कमीशन की नियुक्ति।
1928साइमन कमीशन का देशव्यापी विरोध।
दिसंबर 1929लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को लक्ष्य घोषित किया गया।
26 जनवरी 1930स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
12 मार्च 1930दांडी मार्च प्रारंभ।
6 अप्रैल 1930दांडी में नमक कानून का उल्लंघन।
1930प्रथम गोलमेज सम्मेलन।
5 मार्च 1931गांधी-इरविन समझौता।
1931द्वितीय गोलमेज सम्मेलन।
1932तृतीय गोलमेज सम्मेलन; सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनः आरंभ।
1934सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लिया गया।
1935भारत शासन अधिनियम।
1937प्रांतीय चुनाव और कई प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडल।
1939द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे।
1940व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ; विनोबा भावे पहले सत्याग्रही बने।
मार्च 1942क्रिप्स मिशन भारत आया।
14 जुलाई 1942कांग्रेस कार्यसमिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया।
8 अगस्त 1942बंबई में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित; करो या मरो का आह्वान।
9 अगस्त 1942गांधीजी और अन्य प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी।
6 मई 1944गांधीजी को नजरबंदी से रिहा किया गया।
15 अगस्त 1947भारत स्वतंत्र हुआ; देश का विभाजन भी हुआ।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • गांधीजी भारत लौटे — 1915।
  • चंपारण सत्याग्रह — 1917; नील की खेती और तिनकठिया प्रथा।
  • अहमदाबाद मिल हड़ताल — 1918; मजदूरों का वेतन विवाद।
  • खेड़ा सत्याग्रह — 1918; फसल खराब होने पर भू-राजस्व में राहत की माँग।
  • रॉलेट सत्याग्रह — 1919।
  • जलियांवाला बाग हत्याकांड — 13 अप्रैल 1919।
  • असहयोग आंदोलन — 1920–1922।
  • चौरी-चौरा घटना — 4 फरवरी 1922।
  • स्वराज पार्टी — 1923; चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू।
  • पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव — लाहौर अधिवेशन, 1929।
  • दांडी मार्च प्रारंभ — 12 मार्च 1930।
  • नमक कानून का उल्लंघन — 6 अप्रैल 1930।
  • गांधी-इरविन समझौता — 5 मार्च 1931।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व — गांधीजी।
  • सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन की वापसी — 1934।
  • पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही — विनोबा भावे, 1940।
  • भारत छोड़ो प्रस्ताव — 8 अगस्त 1942।
  • करो या मरो — गांधीजी, 1942।
  • भूमिगत कांग्रेस रेडियो — उषा मेहता से संबंधित।
  • बलिया की समानांतर सरकार — चित्तू पांडे से संबंधित।
  • सतारा — प्रति सरकार।
  • तमलुक — तम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार।

मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषण के बिंदु

गांधी युग का अध्ययन केवल घटनाओं और तिथियों को याद करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। मुख्य परीक्षा में आंदोलनों के कारण, कार्यक्रम, जनभागीदारी, सीमाएँ और दीर्घकालीन प्रभावों का विश्लेषण महत्वपूर्ण है।

1. राष्ट्रीय आंदोलन का जनाधार

गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों और व्यापक राजनीतिक माँगों को जोड़ने का प्रयास किया। किसानों, मजदूरों, महिलाओं, विद्यार्थियों और व्यापारियों की भागीदारी ने राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक व्यापक बनाया। हालाँकि भागीदारी का स्तर सभी वर्गों और क्षेत्रों में समान नहीं था।

2. अहिंसा और जन-अनुशासन

गांधीजी के लिए अहिंसा केवल एक साधन नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष का नैतिक आधार भी थी। चौरी-चौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय इस प्राथमिकता को दर्शाता है। दूसरी ओर, इस निर्णय ने आंदोलन की रणनीति और जन-आंदोलन के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस के भीतर मतभेद भी उजागर किए।

3. आंदोलनों की सीमाएँ

आंदोलनों की भागीदारी और सफलता क्षेत्र, वर्ग तथा स्थानीय नेतृत्व के अनुसार अलग-अलग रही। सभी सामाजिक समूहों के हित हमेशा समान नहीं थे। आंदोलन वापस लेने और दमन के कारण कई चरणों में राजनीतिक सक्रियता कमजोर भी हुई।

4. स्वतंत्रता की प्रक्रिया में योगदान

गांधीवादी आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन की वैधता को चुनौती दी, जनभागीदारी का विस्तार किया और स्वतंत्रता की माँग को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बनाए रखा। फिर भी स्वतंत्रता की प्राप्ति को केवल एक आंदोलन का परिणाम नहीं माना जा सकता। इसमें अनेक राजनीतिक धाराओं, सामाजिक समूहों, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, द्वितीय विश्व युद्ध और ब्रिटेन की बदलती राजनीतिक स्थिति की भी भूमिका थी।

निष्कर्ष

गांधी युग ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को महत्वपूर्ण रूप से बदला। सत्याग्रह, अहिंसा, स्वदेशी और जनभागीदारी के माध्यम से औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी गई। असहयोग आंदोलन ने शासन के साथ सहयोग समाप्त करने पर जोर दिया, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन ने अन्यायपूर्ण कानूनों का प्रत्यक्ष उल्लंघन किया।

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष का एक निर्णायक चरण था। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद कई क्षेत्रों में स्थानीय और भूमिगत प्रतिरोध जारी रहा। गांधी युग ने भारतीय राजनीति में व्यापक जनभागीदारी और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संगठित संघर्ष की परंपरा को मजबूत किया। भारत की स्वतंत्रता अनेक धाराओं के संघर्ष और बदलती ऐतिहासिक परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव से प्राप्त हुई।