परिचय — होम रूल आंदोलन क्या था?
होम रूल आंदोलन (Home Rule Movement) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण था। इसका प्रमुख उद्देश्य भारत में स्वशासन (Self-Government) की मांग को व्यापक बनाना और भारतीयों को अपने देश के शासन में अधिक अधिकार दिलाना था।
भारत में इस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने किया। दोनों ने 1916 में अलग-अलग होम रूल लीगों की स्थापना की। आंदोलन को आयरलैंड के Irish Home Rule Movement से प्रेरणा मिली।
उस समय होम रूल का अर्थ तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर भारत को स्वशासी राजनीतिक व्यवस्था दिलाना था। आंदोलन ने सभाओं, भाषणों, समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं और स्थानीय संगठनों के माध्यम से स्वशासन की मांग को लोकप्रिय बनाया।
होम रूल आंदोलन की पृष्ठभूमि
1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। 1907 के सूरत विभाजन के बाद कांग्रेस में नरमपंथी और उग्र राष्ट्रवादी नेताओं के बीच मतभेद बढ़ गए। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की एकजुटता प्रभावित हुई।
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत से सैनिकों, धन और संसाधनों की सहायता ली। भारतीय नेताओं के एक वर्ग का मानना था कि युद्ध में भारत के योगदान के बदले राजनीतिक अधिकारों और स्वशासन की दिशा में ठोस प्रगति होनी चाहिए।
- 1907 के बाद कांग्रेस के विभिन्न समूहों के बीच सहयोग बहाल करने की आवश्यकता।
- प्रथम विश्व युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर दबाव।
- भारतीयों में राजनीतिक अधिकारों और स्वशासन की बढ़ती मांग।
- राष्ट्रीय आंदोलन को संगठित करने और राजनीतिक शिक्षा फैलाने की आवश्यकता।
- आयरलैंड के होम रूल आंदोलन से प्रेरणा।
इन परिस्थितियों में होम रूल आंदोलन ने स्वशासन को एक प्रमुख राजनीतिक मांग के रूप में प्रस्तुत किया।
होम रूल का अर्थ और उद्देश्य
Home Rule का अर्थ है अपने देश का शासन स्वयं चलाना। भारतीय संदर्भ में इसका अर्थ था कि भारत के प्रशासन और राजनीतिक निर्णयों में भारतीयों की प्रभावी भूमिका हो तथा देश को व्यापक स्वशासन प्राप्त हो।
उस समय होम रूल की मांग को तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता (Complete Independence) के समान नहीं माना जाता था। आंदोलन के प्रमुख नेता ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासी व्यवस्था की मांग कर रहे थे। हालांकि, सभी राष्ट्रवादी नेताओं की अंतिम राजनीतिक आकांक्षाएँ एक जैसी नहीं थीं।
आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य थे:
- भारत में स्वशासन की मांग को व्यापक बनाना।
- भारतीयों को शासन में अधिक अधिकार दिलाना।
- राजनीतिक शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करना।
- जनसभाओं, समाचार-पत्रों और संगठनों के माध्यम से जनमत तैयार करना।
- ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक और राजनीतिक दबाव बनाना।
- राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक समूहों के सहयोग को बढ़ावा देना।
बाल गंगाधर तिलक की होम रूल लीग
बाल गंगाधर तिलक ने अप्रैल 1916 में अपनी होम रूल लीग की स्थापना की। इसका उद्देश्य स्वशासन की मांग को संगठित प्रचार और राजनीतिक शिक्षा के माध्यम से जनता तक पहुँचाना था।
तिलक की लीग का प्रमुख कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, कर्नाटक, बेरार और मध्य प्रांत थे। बॉम्बे शहर एनी बेसेंट की लीग के कार्यक्षेत्र में शामिल था।
तिलक की लीग की प्रमुख गतिविधियाँ थीं:
- जनसभाओं और सार्वजनिक भाषणों का आयोजन।
- होम रूल के पक्ष में पुस्तिकाओं और साहित्य का प्रचार।
- स्थानीय शाखाओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से संगठन का विस्तार।
- मराठी, अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में स्वशासन के विचार का प्रसार।
तिलक का मानना था कि राजनीतिक अधिकार केवल याचिकाओं से नहीं, बल्कि संगठित जनमत और निरंतर राजनीतिक दबाव से प्राप्त किए जा सकते हैं।
एनी बेसेंट की होम रूल लीग
एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 में मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में अपनी होम रूल लीग की स्थापना की। वे थियोसोफिकल आंदोलन से भी जुड़ी थीं और अपने समाचार-पत्रों तथा सार्वजनिक भाषणों के माध्यम से राजनीतिक विचारों का प्रचार करती थीं।
एनी बेसेंट की लीग का कार्यक्षेत्र तिलक की लीग से अलग रखा गया। उनका संगठन मद्रास सहित भारत के अनेक अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हुआ। इसकी शाखाओं, स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रचार गतिविधियों ने आंदोलन का विस्तार किया।
प्रचार के प्रमुख माध्यम थे:
- सार्वजनिक सभाएँ और भाषण।
- पठन-कक्ष (Reading Rooms) और अध्ययन समूह।
- राजनीतिक पुस्तिकाओं का वितरण।
- समाचार-पत्रों के माध्यम से स्वशासन की मांग का प्रचार।
- स्थानीय शाखाओं और सदस्यों के माध्यम से राजनीतिक संपर्क।
एनी बेसेंट से जुड़े New India और Commonweal जैसे प्रकाशन होम रूल विचारों के प्रचार के महत्वपूर्ण माध्यम बने।
तिलक और एनी बेसेंट की लीगों में अंतर
तिलक और एनी बेसेंट ने अलग-अलग संगठन बनाए थे। दोनों का मुख्य उद्देश्य भारत में स्वशासन की मांग को लोकप्रिय बनाना था, लेकिन उनके संगठनात्मक कार्यक्षेत्र अलग-अलग निर्धारित किए गए थे।
| आधार | तिलक की लीग | एनी बेसेंट की लीग |
|---|---|---|
| स्थापना | अप्रैल 1916 | सितंबर 1916 |
| प्रमुख केंद्र | पश्चिमी और मध्य भारत के कुछ क्षेत्र | मद्रास और अन्य ऐसे क्षेत्र जो तिलक की लीग के कार्यक्षेत्र में नहीं थे |
| प्रमुख क्षेत्र | महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, कर्नाटक, बेरार और मध्य प्रांत | मद्रास सहित अन्य प्रमुख क्षेत्र; कार्यक्षेत्र तिलक की लीग से अलग रखा गया |
| प्रचार के माध्यम | सभाएँ, भाषण, पुस्तिकाएँ और स्थानीय संगठन | सभाएँ, समाचार-पत्र, पठन-कक्ष और स्थानीय शाखाएँ |
| समान उद्देश्य | भारत में स्वशासन की मांग को व्यापक बनाना और राजनीतिक जागरूकता फैलाना। | |
दोनों लीग स्वतंत्र संगठन थे; उनका औपचारिक विलय नहीं हुआ। फिर भी उनके समान उद्देश्य और समानांतर गतिविधियों ने होम रूल की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाने में योगदान दिया।
होम रूल आंदोलन की कार्यप्रणाली
आंदोलन ने मुख्य रूप से संवैधानिक, शांतिपूर्ण और प्रचार-आधारित तरीकों से राजनीतिक जनमत तैयार करने का प्रयास किया।
- सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक भाषणों का आयोजन।
- स्वशासन के पक्ष में पुस्तिकाओं और समाचार-पत्रों का प्रकाशन।
- पठन-कक्ष और चर्चा समूहों के माध्यम से राजनीतिक शिक्षा।
- स्थानीय शाखाओं और सदस्यता अभियानों के जरिए संगठन का विस्तार।
- ब्रिटिश सरकार से संवैधानिक सुधारों की मांग।
- राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता का ध्यान आकर्षित करना।
इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसने राजनीतिक शिक्षा और जनमत निर्माण को संगठित रूप दिया। हालांकि इसकी सदस्यता और सामाजिक पहुँच पूरे देश में समान नहीं थी; शिक्षित तथा शहरी वर्गों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
लखनऊ अधिवेशन और लखनऊ समझौता — 1916
दिसंबर 1916 में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन का एक महत्वपूर्ण पक्ष कांग्रेस के नरमपंथी और उग्र राष्ट्रवादी समूहों का फिर से एक साथ आना था।
इसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (All-India Muslim League) के बीच लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) हुआ। इसमें संवैधानिक सुधारों और विधान परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने से संबंधित मांगों पर सहमति बनी।
समझौते में मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन व्यवस्था को कांग्रेस ने स्वीकार किया। इस कारण यह समझौता कांग्रेस-लीग सहयोग की महत्वपूर्ण घटना होने के साथ-साथ भारतीय प्रतिनिधित्व की सांप्रदायिक आधार पर बनी व्यवस्था के इतिहास में भी महत्वपूर्ण है।
होम रूल आंदोलन और लखनऊ समझौता एक ही घटना नहीं थे, लेकिन दोनों ने 1916 में राष्ट्रीय राजनीति में सहयोग और संवैधानिक मांगों को अधिक प्रमुख बनाने में योगदान दिया।
आंदोलन का प्रसार
होम रूल आंदोलन की गतिविधियाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैलीं। स्थानीय शाखाओं, भाषणों, पुस्तिकाओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से स्वशासन की मांग का प्रचार हुआ।
- महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्र।
- मध्य प्रांत और बेरार।
- मद्रास प्रेसीडेंसी।
- बंगाल, बिहार और अन्य क्षेत्रों के कुछ केंद्र।
- अन्य प्रमुख नगर जहाँ स्थानीय संगठन सक्रिय हुए।
आंदोलन का प्रभाव पूरे भारत में एक समान नहीं था। विभिन्न क्षेत्रों में इसकी सक्रियता स्थानीय नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती थी।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया और एनी बेसेंट की नजरबंदी
होम रूल आंदोलन की बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार चिंतित हुई। उसने आंदोलन के प्रचार और नेताओं की गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया।
1917 में मद्रास सरकार ने एनी बेसेंट, जॉर्ज अरुंडेल (George Arundale) और बी. पी. वाडिया (B. P. Wadia) को नजरबंद कर दिया। इस कार्रवाई के विरोध में विभिन्न राजनीतिक नेताओं और संगठनों ने आवाज उठाई।
नजरबंदी ने एनी बेसेंट और होम रूल आंदोलन को व्यापक राजनीतिक ध्यान दिलाया। सरकार की कार्रवाई के विरोध ने स्वशासन की मांग को और प्रमुख बनाया।
एनी बेसेंट और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
एनी बेसेंट दिसंबर 1917 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्ष बनीं। वे कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली महिला थीं।
उनका अध्यक्ष चुना जाना उस समय उनके राजनीतिक प्रभाव और स्वशासन की मांग के महत्व को दर्शाता है। हालांकि, होम रूल आंदोलन और कांग्रेस की पूरी राजनीति को एक ही संगठन या नेता तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।
मॉन्टेग्यू घोषणा — 20 अगस्त 1917
20 अगस्त 1917 को भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू (Edwin Montagu) ने ब्रिटिश सरकार की नीति की घोषणा की। इसका घोषित लक्ष्य भारत में उत्तरदायी शासन (Responsible Government) की क्रमिक स्थापना था, जिसे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहते हुए आगे बढ़ाया जाना था।
यह घोषणा तत्काल स्वशासन या पूर्ण स्वतंत्रता देने का वादा नहीं थी। इसमें उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक विकास की बात कही गई थी।
मॉन्टेग्यू घोषणा के बाद मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इन सुधारों के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित हुआ। प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) की व्यवस्था इसी अधिनियम के अंतर्गत लागू की गई।
होम रूल आंदोलन ने स्वशासन की मांग को प्रमुख बनाने में योगदान दिया, लेकिन मॉन्टेग्यू घोषणा को केवल इसी आंदोलन का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। यह युद्धकालीन परिस्थितियों, भारतीय राजनीतिक दबाव और ब्रिटिश सरकार की नीतियों से भी जुड़ी थी।
होम रूल आंदोलन कमजोर क्यों पड़ा?
1917 के बाद होम रूल आंदोलन की सक्रियता धीरे-धीरे कम हुई। इसके पीछे कई राजनीतिक और संगठनात्मक कारण थे।
- एनी बेसेंट और उनके सहयोगियों की नजरबंदी के बाद आंदोलन की रणनीति में बदलाव आया।
- मॉन्टेग्यू घोषणा के बाद संवैधानिक सुधारों को लेकर राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं।
- दोनों लीगों के संगठन और प्रभाव की सीमाएँ थीं; आंदोलन पूरे देश में समान रूप से मजबूत नहीं था।
- नेताओं और राजनीतिक समूहों की रणनीतियों में अंतर बना रहा।
- महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्याग्रह और जन-आधारित राजनीति का प्रभाव बढ़ने लगा।
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों और 1919 के राजनीतिक घटनाक्रम ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी।
आंदोलन अचानक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसकी प्रमुखता कम हुई और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा। 1919 के रॉलेट सत्याग्रह और 1920 में शुरू हुए असहयोग आंदोलन ने व्यापक जन-आंदोलन की राजनीति को आगे बढ़ाया।
गांधीजी और होम रूल आंदोलन
महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। 1916–1917 के दौरान वे भारतीय राजनीति में अपनी भूमिका विकसित कर रहे थे और चंपारण सत्याग्रह (1917), अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918) तथा खेड़ा सत्याग्रह (1918) जैसे संघर्षों के माध्यम से उनकी जन-आधारित राजनीति उभरने लगी।
होम रूल आंदोलन ने राजनीतिक शिक्षा, संगठन और स्वशासन की मांग को प्रमुख बनाने में योगदान दिया। इन गतिविधियों ने व्यापक राष्ट्रीय राजनीति के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया, लेकिन गांधीजी के बाद के आंदोलनों को केवल होम रूल आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं माना जा सकता।
होम रूल आंदोलन का महत्व
- स्वशासन की मांग को भारतीय राजनीति में प्रमुख स्थान दिलाया।
- राष्ट्रीय आंदोलन में राजनीतिक शिक्षा और जनमत निर्माण को बढ़ावा दिया।
- कांग्रेस के नरमपंथी और उग्र राष्ट्रवादी समूहों के पुनः सहयोग की पृष्ठभूमि मजबूत हुई।
- 1916 के लखनऊ समझौते के समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सहयोग के वातावरण को बल मिला।
- समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं और स्थानीय शाखाओं के माध्यम से राजनीतिक प्रचार का विस्तार हुआ।
- दक्षिण भारत सहित विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजनीतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला।
- आगे विकसित हुई जन-आधारित राष्ट्रीय राजनीति के लिए स्वशासन की मांग को मजबूत किया।
इसकी सीमाएँ भी थीं। आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में समान नहीं था और इसकी सामाजिक पहुँच सीमित रही। फिर भी इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वशासन को प्रमुख राजनीतिक प्रश्न बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख नेता और प्रचार माध्यम
प्रमुख नेता और सहयोगी:
- बाल गंगाधर तिलक: तिलक की होम रूल लीग के प्रमुख नेता।
- एनी बेसेंट: होम रूल आंदोलन की प्रमुख नेता और 1917 में कांग्रेस अध्यक्ष।
- जॉर्ज अरुंडेल: एनी बेसेंट के सहयोगी और होम रूल गतिविधियों से जुड़े कार्यकर्ता।
- बी. पी. वाडिया: होम रूल गतिविधियों से जुड़े प्रमुख सहयोगी।
समाचार-पत्र और प्रचार माध्यम:
- New India: एनी बेसेंट से संबंधित प्रमुख समाचार-पत्र।
- Commonweal: एनी बेसेंट से संबंधित पत्रिका, जिसके माध्यम से राजनीतिक विचारों का प्रचार हुआ।
- Kesari: तिलक से संबंधित प्रमुख मराठी समाचार-पत्र, जिसका उपयोग राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार के लिए किया गया।
इन प्रकाशनों और प्रचार माध्यमों ने स्वशासन, राजनीतिक अधिकारों और राष्ट्रीय प्रश्नों पर चर्चा को बढ़ावा दिया।
महत्वपूर्ण कालक्रम — Important Timeline
| तिथि / वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1914 | प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ | युद्धकालीन परिस्थितियों ने भारतीय स्वशासन की मांग को प्रभावित किया। |
| जनवरी 1915 | गांधीजी भारत लौटे | आगे के जन-आधारित आंदोलनों की पृष्ठभूमि विकसित हुई। |
| अप्रैल 1916 | तिलक की होम रूल लीग | स्वशासन की मांग के लिए संगठित प्रचार। |
| सितंबर 1916 | एनी बेसेंट की होम रूल लीग | आंदोलन का संगठनात्मक विस्तार। |
| दिसंबर 1916 | लखनऊ अधिवेशन और लखनऊ समझौता | कांग्रेस के समूहों में पुनः सहयोग और कांग्रेस-लीग समझौता। |
| 1917 | एनी बेसेंट और सहयोगियों की नजरबंदी | सरकारी कार्रवाई के विरोध में राजनीतिक प्रतिक्रिया। |
| 20 अगस्त 1917 | मॉन्टेग्यू घोषणा | भारत में उत्तरदायी शासन के क्रमिक विकास की नीति घोषित हुई। |
| दिसंबर 1917 | एनी बेसेंट कांग्रेस अध्यक्ष बनीं | कांग्रेस के नेतृत्व में एक महिला का ऐतिहासिक स्थान। |
| 1918 | होम रूल आंदोलन की सक्रियता में गिरावट | राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीति नए चरण की ओर बढ़ी। |
| 1919 | भारत सरकार अधिनियम और रॉलेट सत्याग्रह का दौर | संवैधानिक सुधारों और जन-आंदोलन की राजनीति ने नया रूप लिया। |
UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत में होम रूल आंदोलन के दो प्रमुख नेता — बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट।
- तिलक की होम रूल लीग — अप्रैल 1916।
- एनी बेसेंट की होम रूल लीग — सितंबर 1916।
- होम रूल का तत्कालीन प्रमुख लक्ष्य — ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन।
- लखनऊ समझौता — 1916; कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता।
- मॉन्टेग्यू घोषणा — 20 अगस्त 1917।
- एनी बेसेंट — दिसंबर 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं।
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 — मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से संबंधित।
- प्रांतों में द्वैध शासन — भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत लागू।
- होम रूल आंदोलन की सक्रियता 1917 के बाद घटने लगी और 1919–1920 के दौरान राष्ट्रीय आंदोलन ने नया रूप लिया।
निष्कर्ष
होम रूल आंदोलन ने 1916–1918 के दौरान भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वशासन की मांग को व्यापक राजनीतिक महत्व दिलाया। बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने अलग-अलग लीगों के माध्यम से राजनीतिक शिक्षा, समाचार-पत्रों, भाषणों और स्थानीय संगठनों का उपयोग किया।
यह आंदोलन अपने मूल स्वरूप में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहा, लेकिन इसने स्वशासन की मांग को मजबूत करने, राजनीतिक जनमत तैयार करने और राष्ट्रीय आंदोलन के अगले चरण की पृष्ठभूमि बनाने में योगदान दिया। इसकी उपलब्धियों के साथ इसकी संगठनात्मक और सामाजिक सीमाओं को समझना भी आवश्यक है।