परिचय — स्वतंत्रता और विभाजन की पृष्ठभूमि
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित वह कानून था, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र डोमिनियन में विभाजित करने तथा ब्रिटिश शासन समाप्त करने की व्यवस्था की गई। इस अधिनियम को 18 जुलाई 1947 को शाही स्वीकृति मिली।
स्वतंत्रता और विभाजन की प्रक्रिया को समझने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की कमजोर स्थिति, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद, संवैधानिक वार्ताओं तथा सांप्रदायिक तनावों को साथ-साथ समझना आवश्यक है।
स्वतंत्रता के साथ ही बड़े पैमाने पर जन-स्थानांतरण, हिंसा, शरणार्थी पुनर्वास और देशी रियासतों के एकीकरण जैसी गंभीर चुनौतियाँ सामने आईं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की स्थिति
1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध ने ब्रिटेन की आर्थिक और सैन्य क्षमता पर भारी दबाव डाला। युद्ध के बाद भारत में औपनिवेशिक शासन जारी रखना ब्रिटिश सरकार के लिए अधिक कठिन होता गया।
- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की वैधता को लगातार चुनौती दी।
- 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने व्यापक जन-असंतोष को प्रदर्शित किया।
- आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर चले मुकदमों ने राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रभावित किया।
- फरवरी 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह ब्रिटिश शासन के लिए चिंता का विषय बना।
- ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन के बाद लेबर पार्टी की सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्या के समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए।
इन घटनाओं ने सत्ता हस्तांतरण की परिस्थितियों को प्रभावित किया, लेकिन स्वतंत्रता को किसी एक घटना का परिणाम मानना सही नहीं होगा। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा राष्ट्रीय आंदोलन और अनेक राजनीतिक एवं आर्थिक कारण थे।
1945–46 के चुनाव और राजनीतिक मतभेद
1945 में केंद्रीय विधानमंडल और 1946 में प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हुए। कांग्रेस ने सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में व्यापक सफलता प्राप्त की, जबकि मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए आरक्षित अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
इन चुनावों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग की अलग-अलग राजनीतिक दावेदारी को मजबूत किया। कांग्रेस एक संयुक्त स्वतंत्र भारत की पक्षधर थी, जबकि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग पर जोर दे रही थी। दोनों के बीच सत्ता-साझेदारी और भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर सहमति बनाना कठिन होता गया।
कैबिनेट मिशन योजना — 1946
ब्रिटिश सरकार ने भारत में सत्ता हस्तांतरण और संविधान निर्माण के प्रश्न पर विचार करने के लिए मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा। इसमें तीन ब्रिटिश मंत्री शामिल थे:
- लॉर्ड पैथिक लॉरेंस — भारत सचिव
- सर स्टैफर्ड क्रिप्स
- ए. वी. अलेक्जेंडर
कैबिनेट मिशन ने एक ऐसे भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा जिसमें केंद्र के अधिकार मुख्यतः रक्षा, विदेश नीति और संचार तक सीमित होते तथा इनके लिए आवश्यक वित्तीय अधिकार भी केंद्र के पास होते। अन्य विषयों पर प्रांतों को व्यापक अधिकार देने की योजना थी।
योजना में प्रांतों को तीन समूहों में संगठित करने का प्रस्ताव भी था। इसका उद्देश्य भारत की एकता बनाए रखते हुए विभिन्न राजनीतिक हितों के बीच समझौता करना था।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच योजना की व्याख्या तथा प्रांतीय समूहों से जुड़े प्रश्नों पर मतभेद बने रहे। अंततः यह योजना स्थायी राजनीतिक समझौता स्थापित नहीं कर सकी।
अंतरिम सरकार — 1946
2 सितंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने कार्य करना शुरू किया। प्रारंभ में मुस्लिम लीग इसमें शामिल नहीं हुई, लेकिन बाद में अक्टूबर 1946 में उसके प्रतिनिधि भी सरकार में शामिल हुए।
अंतरिम सरकार का उद्देश्य संविधान निर्माण और सत्ता हस्तांतरण से पहले भारतीय नेताओं को शासन चलाने में भागीदारी देना था। हालांकि, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेदों के कारण सरकार के भीतर भी राजनीतिक तनाव बना रहा।
प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस — 16 अगस्त 1946
मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (Direct Action Day) मनाने का आह्वान किया।
कलकत्ता में इस दिन और उसके बाद बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। इसके बाद बंगाल, बिहार, नोआखाली और अन्य क्षेत्रों में भी हिंसा तथा तनाव की गंभीर घटनाएँ सामने आईं।
इन घटनाओं ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच अविश्वास को और गहरा किया। फिर भी विभाजन की प्रक्रिया को समझते समय लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मतभेदों और ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली की घोषणा — 20 फरवरी 1947
ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 20 फरवरी 1947 को घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत में सत्ता हस्तांतरण कर देगी। उन्होंने लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का अगला वायसराय नियुक्त किया।
बाद में तेजी से बिगड़ती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच सत्ता हस्तांतरण की तारीख को आगे लाने का निर्णय लिया गया। इसी प्रक्रिया में 3 जून 1947 की योजना प्रस्तुत हुई।
लॉर्ड माउंटबेटन का आगमन
लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने 24 मार्च 1947 को भारत के अंतिम वायसराय के रूप में पदभार ग्रहण किया। उनका प्रमुख कार्य सत्ता हस्तांतरण के लिए एक स्वीकार्य राजनीतिक व्यवस्था तैयार करना था।
कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधियों सहित विभिन्न पक्षों से बातचीत के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभाजन की योजना को स्वीकार करने का निर्णय लिया।
3 जून योजना — 1947
3 जून 1947 को घोषित योजना को माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan) कहा जाता है। इसने ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान नामक दो डोमिनियन में विभाजित करके सत्ता हस्तांतरण करने का मार्ग निर्धारित किया।
- भारत के विभाजन और दो डोमिनियन के गठन का प्रस्ताव।
- पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को विभाजन के प्रश्न पर निर्णय लेने की प्रक्रिया।
- पंजाब और बंगाल के विभाजन की स्थिति में सीमाएँ निर्धारित करने के लिए सीमा आयोगों की व्यवस्था।
- उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में जनमत-संग्रह।
- सिलहट जिले में जनमत-संग्रह, ताकि यह तय हो सके कि वह असम में रहेगा या पूर्वी बंगाल में शामिल होगा।
- सिंध विधानसभा को अपने भविष्य के संबंध में निर्णय लेने की प्रक्रिया।
- ब्रिटिश बलूचिस्तान के प्रतिनिधि संस्थानों के माध्यम से निर्णय की व्यवस्था।
- देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने की आगामी व्यवस्था।
उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के जनमत-संग्रह में भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के विकल्प दिए गए थे। कांग्रेस ने विभाजन की योजना स्वीकार की, जबकि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के गठन का समर्थन किया।
यह ध्यान रखना चाहिए कि माउंटबेटन योजना राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण की योजना थी, जबकि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम वह कानून था जिसने इस व्यवस्था को वैधानिक आधार प्रदान किया।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम — 1947
ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act, 1947) पारित किया और इसे 18 जुलाई 1947 को शाही स्वीकृति मिली।
अधिनियम के अनुसार 15 अगस्त 1947 से दो स्वतंत्र डोमिनियन — भारत और पाकिस्तान — स्थापित किए जाने थे। डोमिनियन उस समय स्वतंत्र संवैधानिक इकाई थी, लेकिन उसके संवैधानिक ढाँचे में ब्रिटिश सम्राट का औपचारिक स्थान बना हुआ था। इसलिए 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, पर गणराज्य 1950 में बना।
इस अधिनियम ने ब्रिटिश संसद के भारत पर विधायी अधिकार समाप्त किए, दोनों डोमिनियन की संविधान सभाओं को संविधान बनाने तथा विधायी कार्य करने का अधिकार दिया और देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त कर दी।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की प्रमुख विशेषताएँ
- 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने।
- ब्रिटिश संसद का ब्रिटिश भारत पर विधायी अधिकार समाप्त हुआ।
- दोनों डोमिनियन की संविधान सभाओं को संविधान बनाने का अधिकार मिला।
- दोनों संविधान सभाएँ अपने-अपने डोमिनियन के लिए विधायी निकाय के रूप में भी कार्य कर सकती थीं।
- दोनों डोमिनियन के लिए गवर्नर-जनरल की व्यवस्था की गई।
- भारत सचिव के पद से जुड़ी पुरानी संवैधानिक व्यवस्था समाप्त हुई।
- देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त हुई।
- रियासतों के साथ ब्रिटिश क्राउन के संधि-संबंध समाप्त हुए; रियासतों का भविष्य भारत या पाकिस्तान के साथ उनके विलय के निर्णयों से जुड़ा।
- भारत सरकार अधिनियम 1935 की व्यवस्था को आवश्यक परिवर्तनों के साथ तब तक जारी रखने का प्रावधान था, जब तक संबंधित डोमिनियन अपनी नई संवैधानिक व्यवस्था नहीं बना लेते।
एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि स्वतंत्रता अधिनियम ने रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प देने वाली परिस्थिति बनाई, लेकिन उसने प्रत्येक रियासत को आधुनिक अर्थ में पूर्ण संप्रभु राज्य के रूप में स्थायी स्वतंत्रता की गारंटी नहीं दी। रियासतों का एकीकरण आगे राजनीतिक वार्ताओं और विलय की प्रक्रियाओं के माध्यम से हुआ।
भारत और पाकिस्तान — स्वतंत्रता की संवैधानिक स्थिति
| विषय | भारत | पाकिस्तान |
|---|---|---|
| डोमिनियन के रूप में स्थापना | 15 अगस्त 1947 | 14 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता समारोह; अधिनियम में डोमिनियन की स्थापना की तारीख 15 अगस्त 1947 निर्धारित थी |
| प्रथम गवर्नर-जनरल | लॉर्ड माउंटबेटन | मोहम्मद अली जिन्ना |
| प्रथम प्रधानमंत्री | जवाहरलाल नेहरू | लियाकत अली खान |
| संविधान निर्माण | संविधान सभा | संविधान सभा |
परीक्षा संबंधी सावधानी: पाकिस्तान में 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम में दोनों डोमिनियन की स्थापना की तारीख 15 अगस्त 1947 निर्धारित थी। इसलिए समारोह की तारीख और अधिनियम की कानूनी भाषा के अंतर को समझना उपयोगी है।
भारत का विभाजन — पंजाब और बंगाल
विभाजन के समय पंजाब और बंगाल ऐसे प्रमुख प्रांत थे जिनका विभाजन किया गया। इन प्रांतों में मिश्रित आबादी, धार्मिक विविधता, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और परिवहन के साझा नेटवर्क के कारण सीमा निर्धारण अत्यंत जटिल था।
पंजाब का पश्चिमी भाग पाकिस्तान में और पूर्वी भाग भारत में शामिल हुआ। बंगाल का पश्चिमी भाग भारत में तथा पूर्वी भाग पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से के रूप में शामिल हुआ, जिसे बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहा गया। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र होकर बांग्लादेश बना।
विभाजन केवल राजनीतिक सीमा-परिवर्तन नहीं था। इससे परिवार, कृषि भूमि, व्यापार, रेलवे, नहरों और सामाजिक संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
रैडक्लिफ रेखा — Radcliffe Line
पंजाब और बंगाल के विभाजन के बाद दोनों क्षेत्रों में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारित करने के लिए अलग-अलग सीमा आयोग बनाए गए। इनकी अध्यक्षता ब्रिटिश न्यायविद् सर सिरिल रैडक्लिफ ने की।
सीमा निर्धारण के लिए जनसंख्या की धार्मिक संरचना के साथ-साथ अन्य प्रशासनिक और भौगोलिक पहलुओं पर विचार किया गया, हालांकि अंतिम सीमा के निर्णय अनेक क्षेत्रों में विवादास्पद रहे।
रैडक्लिफ सीमा पुरस्कार (Radcliffe Award) 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया गया, अर्थात भारत की स्वतंत्रता के दो दिन बाद। इस कारण स्वतंत्रता के समय कई लोगों को सीमा की सटीक स्थिति स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं थी।
जनमत-संग्रह और विभाजन से संबंधित प्रमुख क्षेत्र
| क्षेत्र | प्रक्रिया | परिणाम / महत्व |
|---|---|---|
| उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत | जुलाई 1947 में जनमत-संग्रह | मतदाताओं ने पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में निर्णय दिया; खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व वाले खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने इस प्रक्रिया का बहिष्कार किया। |
| सिलहट जिला | जुलाई 1947 में जनमत-संग्रह | बहुमत ने पूर्वी बंगाल में शामिल होने का समर्थन किया; कुछ सीमावर्ती क्षेत्र असम में बने रहे। |
| सिंध | सिंध विधानसभा में निर्णय | विधानसभा ने पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में निर्णय लिया। |
| पंजाब और बंगाल | विधानसभाओं में विभाजन पर मतदान; इसके बाद सीमा आयोग | दोनों प्रांत विभाजित हुए और नई सीमाएँ निर्धारित की गईं। |
| ब्रिटिश बलूचिस्तान | प्रतिनिधि संस्थानों के माध्यम से निर्णय | पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया गया। |
इन प्रक्रियाओं को देशी रियासतों के विलय से अलग समझना चाहिए। रियासतों की संवैधानिक स्थिति ब्रिटिश सर्वोच्चता के समाप्त होने और उनके शासकों द्वारा भारत या पाकिस्तान के साथ विलय के निर्णयों से संबंधित थी।
देशी रियासतें और स्वतंत्रता अधिनियम
स्वतंत्रता अधिनियम के लागू होने पर देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो गई। ब्रिटिश क्राउन के साथ उनके पुराने संधि-संबंध भी समाप्त हो गए।
रियासतों का भारत या पाकिस्तान के साथ एकीकरण तत्काल एक ही प्रक्रिया में पूरा नहीं हुआ। भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, शासक की इच्छा, राजनीतिक परिस्थितियों और सुरक्षा जैसे प्रश्नों ने कई मामलों को जटिल बनाया।
सरदार पटेल और रियासतों का एकीकरण
स्वतंत्र भारत में देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पटेल स्वतंत्र भारत की सरकार में गृह विभाग और रियासतों से संबंधित कार्यों के प्रमुख नेताओं में थे, जबकि वी. पी. मेनन ने प्रशासनिक और वार्तागत प्रक्रिया में अहम योगदान दिया।
अनेक रियासतों ने विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करके भारत के साथ संवैधानिक संबंध स्वीकार किए। कुछ मामलों में विलय और पूर्ण एकीकरण के लिए अतिरिक्त समझौते तथा राजनीतिक कार्रवाई आवश्यक हुई।
हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर जैसे मामलों की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सभी रियासतों का विलय एक ही तरीके से हुआ।
विभाजन के मानवीय परिणाम
1947 का विभाजन आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े और सबसे हिंसक जन-स्थानांतरणों में से एक था। भारत और पाकिस्तान के बीच बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। विस्थापन और हिंसा की सीमा का सटीक आकलन स्रोतों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
- बड़े पैमाने पर सीमा-पार जन-स्थानांतरण।
- पंजाब, बंगाल और अन्य क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा।
- परिवारों का बिछड़ना और लोगों का लापता होना।
- महिलाओं और बच्चों सहित आम नागरिकों पर गंभीर अत्याचार।
- खेती, व्यापार, संपत्ति और आजीविका का नुकसान।
- प्रशासन, कानून-व्यवस्था और राहत व्यवस्था पर भारी दबाव।
विभाजन का प्रभाव केवल तत्कालीन हिंसा तक सीमित नहीं रहा। इसने भारत और पाकिस्तान के सामाजिक संबंधों, राष्ट्रीय पहचान, राजनीति और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी लंबे समय तक प्रभावित किया।
शरणार्थी और पुनर्वास की समस्या
स्वतंत्रता के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों को विस्थापित लोगों के पुनर्वास की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। भारत में सरकार को राहत शिविरों, भोजन, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और संपत्ति संबंधी दावों की व्यवस्था करनी पड़ी।
शरणार्थियों के पुनर्वास में केंद्र और प्रांतीय सरकारों के साथ स्थानीय प्रशासन तथा सामाजिक संगठनों ने भी भूमिका निभाई। इसके बावजूद अनेक लोगों को लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक असुरक्षा का सामना करना पड़ा।
विभाजन के राजनीतिक परिणाम
- ब्रिटिश भारत के विभाजन से भारत और पाकिस्तान नामक दो डोमिनियन बने।
- दक्षिण एशिया का राजनीतिक और भौगोलिक स्वरूप बदल गया।
- कश्मीर सहित कुछ क्षेत्रों से जुड़े विवाद आगे भारत-पाकिस्तान संबंधों का महत्वपूर्ण विषय बने।
- भारत के सामने संविधान निर्माण, राष्ट्रीय एकीकरण और शरणार्थी पुनर्वास की चुनौतियाँ थीं।
- पाकिस्तान को प्रशासनिक संस्थाओं, संसाधनों और राज्य-निर्माण से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
- विभाजन ने दोनों देशों की राजनीति और सुरक्षा संबंधी नीतियों पर दीर्घकालीन प्रभाव डाला।
स्वतंत्रता और विभाजन — महत्वपूर्ण तिथियाँ
| तिथि / वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1945–46 | केंद्रीय और प्रांतीय चुनाव | कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट हुई। |
| मार्च 1946 | कैबिनेट मिशन भारत आया | संवैधानिक समझौते और सत्ता हस्तांतरण का प्रयास। |
| 16 अगस्त 1946 | प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस | कलकत्ता में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। |
| 2 सितंबर 1946 | अंतरिम सरकार ने कार्य करना शुरू किया | जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सरकार का गठन। |
| 20 फरवरी 1947 | एटली की घोषणा | जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की योजना घोषित हुई। |
| 24 मार्च 1947 | माउंटबेटन ने वायसराय का पद संभाला | सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया तेज हुई। |
| 3 जून 1947 | माउंटबेटन योजना घोषित | विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा। |
| 18 जुलाई 1947 | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को शाही स्वीकृति | दो डोमिनियन के गठन का कानूनी आधार। |
| 14 अगस्त 1947 | पाकिस्तान का स्वतंत्रता समारोह | पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस इसी तारीख को मनाया जाता है। |
| 15 अगस्त 1947 | भारत स्वतंत्र हुआ | भारत स्वतंत्र डोमिनियन बना। |
| 17 अगस्त 1947 | रैडक्लिफ सीमा पुरस्कार सार्वजनिक हुआ | पंजाब और बंगाल में सीमा निर्धारण स्पष्ट हुआ। |
| 26 नवंबर 1949 | भारतीय संविधान अंगीकृत | संविधान सभा ने संविधान को अपनाया। |
| 26 जनवरी 1950 | भारतीय संविधान लागू | भारत संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना। |
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम और भारत सरकार अधिनियम 1935 में अंतर
| आधार | भारत सरकार अधिनियम, 1935 | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | ब्रिटिश शासन के अंतर्गत संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था का पुनर्गठन। | ब्रिटिश शासन समाप्त करना और दो स्वतंत्र डोमिनियन स्थापित करना। |
| सत्ता की स्थिति | भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। | भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र डोमिनियन बने। |
| संविधान निर्माण | स्वतंत्र संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण की व्यवस्था नहीं थी। | दोनों डोमिनियन की संविधान सभाओं को संविधान बनाने का अधिकार मिला। |
| देशी रियासतें | ब्रिटिश सर्वोच्चता बनी रही। | ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हुई। |
| ऐतिहासिक महत्व | औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत संवैधानिक सुधारों का प्रमुख आधार। | स्वतंत्रता और विभाजन की कानूनी व्यवस्था का आधार। |
स्वतंत्रता अधिनियम के बाद भारत ने अपनी संविधान सभा के माध्यम से संविधान बनाया। संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
संविधान निर्माण से संबंध
भारतीय संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर हुआ था और उसने दिसंबर 1946 में कार्य प्रारंभ किया। स्वतंत्रता अधिनियम के बाद संविधान सभा को स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाने के साथ-साथ केंद्रीय विधायी निकाय के रूप में भी कार्य करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकृत किया गया। इसके कुछ प्रावधान उसी दिन लागू हो गए, जबकि संविधान का अधिकांश भाग 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। इसी दिन भारत डोमिनियन से गणराज्य बना।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को 18 जुलाई 1947 को शाही स्वीकृति मिली।
- अधिनियम के अंतर्गत भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने।
- 3 जून 1947 की योजना को माउंटबेटन योजना कहा जाता है।
- लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
- लियाकत अली खान पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
- पंजाब और बंगाल के विभाजन की सीमाओं के निर्धारण के लिए रैडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग बनाए गए।
- रैडक्लिफ सीमा पुरस्कार 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक हुआ।
- स्वतंत्रता अधिनियम के साथ देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हुई।
- भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र डोमिनियन बना और 26 जनवरी 1950 को गणराज्य बना।
निष्कर्ष
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने ब्रिटिश शासन की समाप्ति और भारत तथा पाकिस्तान के स्वतंत्र डोमिनियन के गठन को कानूनी आधार प्रदान किया। यह अधिनियम लंबे राष्ट्रीय आंदोलन, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों, संवैधानिक वार्ताओं और गहरे राजनीतिक मतभेदों की पृष्ठभूमि में आया।
स्वतंत्रता के साथ विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा, जन-स्थानांतरण, शरणार्थी पुनर्वास और देशी रियासतों के एकीकरण जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी सामने आईं। इसलिए 1947 को केवल सत्ता हस्तांतरण के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय इतिहास में निर्णायक परिवर्तन के रूप में समझना चाहिए।