परिचय
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress—INC) की स्थापना दिसंबर 1885 में हुई। इसने भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक नेताओं को एक साझा अखिल भारतीय मंच प्रदान किया। आगे चलकर यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख संगठन बनी।
कांग्रेस की स्थापना किसी एक व्यक्ति के प्रयास का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे आधुनिक शिक्षा का प्रसार, समाचार-पत्रों का विकास, औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों के प्रति असंतोष, नस्लीय भेदभाव और पहले से सक्रिय राजनीतिक संगठनों की भूमिका थी।
UPSC के लिए महत्त्व: कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि, ए. ओ. ह्यूम की भूमिका, प्रथम अधिवेशन के तथ्य, प्रारंभिक राजनीतिक मांगें और राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में कांग्रेस के योगदान को समझना आवश्यक है।
कांग्रेस की स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- आधुनिक शिक्षा का प्रसार: अंग्रेजी शिक्षा से शिक्षित भारतीयों का एक ऐसा वर्ग विकसित हुआ, जिसने प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकारों, कानून के समक्ष समानता और संवैधानिक शासन जैसे विचारों से परिचय प्राप्त किया।
- समाचार-पत्रों का विकास: समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना की तथा विभिन्न क्षेत्रों के लोगों तक राजनीतिक विचार पहुँचाए।
- आर्थिक शोषण: औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों, धन के निकास, भूमि-राजस्व के दबाव और भारत के आर्थिक हितों की उपेक्षा की आलोचना बढ़ने लगी।
- नस्लीय भेदभाव: भारतीयों के साथ असमान व्यवहार ने ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता के दावों पर प्रश्न खड़े किए।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: इन आंदोलनों ने सामाजिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श, तर्कशीलता और आधुनिक चेतना के विकास में योगदान दिया।
- अखिल भारतीय संपर्क: विभिन्न प्रांतों के शिक्षित नेताओं के बीच सभाओं, संगठनों, यात्राओं और समाचार-पत्रों के माध्यम से संपर्क बढ़ा।
- राजनीतिक संगठनों का विकास: कांग्रेस से पहले बने क्षेत्रीय संगठनों ने याचिकाओं, सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक मांगों के माध्यम से संगठित गतिविधियों का अनुभव प्राप्त किया।
कांग्रेस से पहले के प्रमुख राजनीतिक संगठन
कांग्रेस की स्थापना से पहले भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक राजनीतिक संगठन सक्रिय थे। प्रारंभ में इनमें से कई संगठन स्थानीय, क्षेत्रीय या विशिष्ट सामाजिक वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। बाद के संगठनों ने अधिक व्यापक राजनीतिक मांगें उठाईं और अखिल भारतीय संगठन के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की।
| वर्ष | संगठन | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| 1838 | लैंडहोल्डर्स सोसाइटी | कलकत्ता में स्थापित; मुख्यतः जमींदारों के हितों से संबंधित। |
| 1851 | ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन | बंगाल में स्थापित; राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों की मांगों से जुड़ा संगठन। |
| 1852 | बॉम्बे एसोसिएशन | बंबई क्षेत्र का प्रारंभिक राजनीतिक संगठन। |
| 1852 | मद्रास नेटिव एसोसिएशन | मद्रास क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों का प्रारंभिक मंच। |
| 1870 | पूना सार्वजनिक सभा | महाराष्ट्र में सार्वजनिक प्रश्नों और प्रतिनिधित्व से संबंधित गतिविधियाँ। |
| 1876 | इंडियन एसोसिएशन | सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस से संबंधित प्रमुख संगठन। |
| 1884 | मद्रास महाजन सभा | दक्षिण भारत में संगठित राजनीतिक गतिविधियों के विकास में महत्त्वपूर्ण। |
| 1885 | बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन | फिरोजशाह मेहता, के. टी. तेलंग और बदरुद्दीन तैयबजी से जुड़ा संगठन। |
ध्यान दें: इन संगठनों की स्थापना की तिथियाँ और उनकी गतिविधियाँ अलग-अलग थीं। इन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती संगठन मानने के बजाय भारतीय राजनीतिक चेतना के विकास की व्यापक पृष्ठभूमि के रूप में समझना अधिक उचित है।
इल्बर्ट बिल विवाद, 1883
इल्बर्ट बिल विवाद कांग्रेस की स्थापना से पहले भारतीय राजनीतिक चेतना के विकास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस विवाद ने कानून के समक्ष समानता और ब्रिटिश भारत में नस्लीय भेदभाव के प्रश्न को उजागर किया।
- इल्बर्ट बिल वायसराय लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में विधि सदस्य सर कर्टेन इल्बर्ट से संबंधित विधायी प्रस्ताव था।
- इसका उद्देश्य कुछ वरिष्ठ भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय ब्रिटिश प्रजाजनों से संबंधित आपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार देना था।
- भारत में यूरोपीय समुदाय के एक वर्ग ने इसका विरोध किया।
- विवाद और उसके बाद हुए समझौते ने औपनिवेशिक व्यवस्था में नस्लीय असमानता को स्पष्ट किया।
यह विवाद कांग्रेस की स्थापना का एकमात्र कारण नहीं था, लेकिन इसने भारतीयों के बीच राजनीतिक असंतोष और संगठित राजनीतिक गतिविधियों की आवश्यकता को रेखांकित किया।
ए. ओ. ह्यूम की भूमिका
एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (Allan Octavian Hume) ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी थे। उन्होंने भारतीय नेताओं के साथ संपर्क स्थापित करने और एक व्यापक राजनीतिक संगठन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका निभाई।
- ह्यूम ने शिक्षित भारतीयों को एक साझा राजनीतिक मंच पर संगठित करने के प्रयास किए।
- उन्होंने कांग्रेस के गठन के लिए भारतीय नेताओं के बीच संपर्क और संगठन-निर्माण में सहायता की।
- कांग्रेस की स्थापना में भारतीय नेताओं की सक्रिय भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी; इसे केवल ह्यूम द्वारा स्थापित संगठन के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण है।
- कांग्रेस के गठन की पृष्ठभूमि में पहले से विकसित राजनीतिक संगठन, औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष और राष्ट्रीय चेतना का विस्तार भी शामिल था।
“सेफ्टी वाल्व” सिद्धांत
सेफ्टी वाल्व सिद्धांत (Safety Valve Theory) के अनुसार, ह्यूम ने शिक्षित भारतीयों के असंतोष को संवैधानिक और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों की दिशा देने के उद्देश्य से कांग्रेस के निर्माण में सहायता की। इस व्याख्या में कांग्रेस को असंतोष व्यक्त करने का एक नियंत्रित मंच माना जाता है।
हालांकि, कांग्रेस की स्थापना को केवल इस सिद्धांत से समझना उचित नहीं है। इसके गठन में भारतीय राजनीतिक चेतना, पूर्ववर्ती संगठनों, शिक्षित भारतीय नेताओं और औपनिवेशिक शासन के प्रति बढ़ते असंतोष की भी भूमिका थी। इसलिए UPSC के उत्तर में इस सिद्धांत को एक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि कांग्रेस की स्थापना का निर्विवाद और एकमात्र कारण मानना चाहिए।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना — 1885
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन दिसंबर 1885 में बंबई (वर्तमान मुंबई) में आयोजित किया गया। प्रारंभिक योजना के अनुसार अधिवेशन पूना में होना था, लेकिन हैजा फैलने के कारण आयोजन स्थल बदलकर बंबई कर दिया गया।
- स्थापना का वर्ष: 1885।
- प्रथम अधिवेशन की तिथि: 28 से 31 दिसंबर 1885।
- स्थान: बंबई।
- आयोजन स्थल: गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज।
- प्रतिनिधियों की संख्या: 72।
- प्रथम अध्यक्ष: व्योमेश चंद्र बनर्जी।
- प्रमुख संगठनात्मक भूमिका: ए. ओ. ह्यूम।
प्रथम अधिवेशन में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों ने राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों पर विचार किया। इस आयोजन ने अलग-अलग प्रांतीय राजनीतिक गतिविधियों को एक साझा अखिल भारतीय मंच पर लाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया।
प्रथम अध्यक्ष — डब्ल्यू. सी. बनर्जी
व्योमेश चंद्र बनर्जी (W. C. Bonnerjee) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे। वे एक प्रसिद्ध विधिवेत्ता और सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेता थे।
- उन्होंने दिसंबर 1885 में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की।
- वे संवैधानिक तरीकों से राजनीतिक सुधार प्राप्त करने के पक्षधर थे।
- उनकी अध्यक्षता में विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधियों के बीच साझा राजनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ।
परीक्षा में अंतर: डब्ल्यू. सी. बनर्जी कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे, जबकि ए. ओ. ह्यूम उसके गठन में महत्त्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे।
प्रथम अधिवेशन के प्रमुख नेता
- डब्ल्यू. सी. बनर्जी: प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष।
- दादाभाई नौरोजी: प्रारंभिक राष्ट्रवादी नेतृत्व और आर्थिक राष्ट्रवाद के प्रमुख विचारक।
- फिरोजशाह मेहता: बंबई के प्रमुख राजनीतिक नेता और संवैधानिक सुधारों के समर्थक।
- के. टी. तेलंग: बंबई की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े प्रमुख नेता।
- दिनशॉ वाचा: प्रारंभिक कांग्रेस नेतृत्व से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व।
- सुरेंद्रनाथ बनर्जी: प्रारंभिक राष्ट्रवादी राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक।
ध्यान रहे कि प्रारंभिक राष्ट्रवादी नेतृत्व के सभी प्रमुख व्यक्तियों की उपस्थिति प्रत्येक अधिवेशन में समान रूप से नहीं थी। किसी नेता का कांग्रेस के प्रारंभिक विकास में महत्त्वपूर्ण होना और उसका प्रथम अधिवेशन में उपस्थित होना दो अलग बातें हैं।
कांग्रेस के प्रारंभिक उद्देश्य
- भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क और सहयोग बढ़ाना।
- राष्ट्रीय महत्त्व के प्रश्नों पर विचार-विमर्श के लिए साझा मंच उपलब्ध कराना।
- भारतीयों में राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक चेतना को विकसित करना।
- भारतीय जनता की राजनीतिक तथा प्रशासनिक मांगों को सरकार के सामने संगठित रूप से प्रस्तुत करना।
- विधायी परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग करना।
- प्रशासनिक व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास करना।
- औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों की आलोचना करना और आवश्यक सुधारों की मांग उठाना।
प्रारंभिक कांग्रेस का उद्देश्य तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था। उसके शुरुआती नेतृत्व की प्रमुख मांगें संवैधानिक सुधार, अधिक प्रतिनिधित्व और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी के विस्तार पर केंद्रित थीं।
कांग्रेस की प्रारंभिक मांगें
- विधायी सुधार: विधायी परिषदों का विस्तार और उनमें भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना।
- भारतीय सिविल सेवा: भारतीय सिविल सेवा परीक्षा भारत में भी आयोजित करने तथा भारतीयों के लिए अवसर बढ़ाने की मांग।
- प्रशासनिक सुधार: प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना और सरकारी कार्यों को अधिक उत्तरदायी बनाना।
- वित्तीय सुधार: सैन्य व्यय की आलोचना तथा सरकारी खर्च में भारतीय हितों को ध्यान में रखने की मांग।
- भूमि-राजस्व: भूमि-राजस्व से संबंधित कठिनाइयों और किसानों पर पड़ने वाले आर्थिक दबावों के प्रति चिंता व्यक्त करना।
- न्यायिक सुधार: न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण की मांग।
- नागरिक अधिकार: प्रशासन में समान व्यवहार और भारतीयों के अधिकारों की रक्षा पर बल देना।
प्रारंभिक कांग्रेस और उदारवादी चरण
कांग्रेस के प्रारंभिक चरण में उदारवादी (Moderates) नेताओं का प्रभाव प्रमुख था। लगभग 1885 से 1905 तक की अवधि को सामान्यतः कांग्रेस के उदारवादी चरण के रूप में पढ़ाया जाता है। यह एक सुविधाजनक ऐतिहासिक विभाजन है; राजनीतिक विचारों में परिवर्तन धीरे-धीरे हुआ था।
- प्रमुख नेता: दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी।
- मुख्य पद्धति: याचिका, प्रार्थना-पत्र, प्रस्ताव, सार्वजनिक सभाएँ और संवैधानिक विरोध।
- इन तरीकों को सामान्यतः Prayer, Petition and Protest अर्थात प्रार्थना, निवेदन और विरोध के रूप में व्यक्त किया जाता है।
- उदारवादी नेताओं को आशा थी कि जनमत, तर्क और संवैधानिक तरीकों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से राजनीतिक सुधार प्राप्त किए जा सकते हैं।
- उन्होंने औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों की आलोचना करके राष्ट्रवाद को वैचारिक आधार प्रदान किया।
उदारवादी तरीकों की सीमाएँ भी थीं। उनका जनाधार मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग और शहरी समूहों तक सीमित था। बाद में उग्रवादी राजनीति तथा जन-आंदोलनों के विकास के साथ कांग्रेस की कार्यशैली में बदलाव आया।
दादाभाई नौरोजी और आर्थिक राष्ट्रवाद
दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का विश्लेषण करते हुए यह तर्क दिया कि भारत की संपदा का एक हिस्सा विभिन्न औपनिवेशिक व्यवस्थाओं के माध्यम से ब्रिटेन चला जाता था। इसे धन-निकासी सिद्धांत (Drain Theory) कहा जाता है।
- नौरोजी ने भारत की गरीबी और औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभावों के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास किया।
- उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India 1901 में प्रकाशित हुई।
- उनके विचारों ने औपनिवेशिक शासन की आर्थिक आलोचना को मजबूत आधार दिया।
- आर्थिक राष्ट्रवाद ने भारतीयों के बीच यह समझ विकसित करने में योगदान दिया कि राजनीतिक अधीनता और आर्थिक शोषण परस्पर संबंधित थे।
कांग्रेस की स्थापना और राष्ट्रीय एकता
- कांग्रेस ने विभिन्न प्रांतों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को साझा मंच उपलब्ध कराया।
- इसने स्थानीय और प्रांतीय प्रश्नों को अखिल भारतीय राजनीतिक मुद्दों से जोड़ने में सहायता की।
- अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं के बीच नियमित संपर्क और विचार-विमर्श की परंपरा विकसित हुई।
- साझा राजनीतिक मांगों के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान की भावना को मजबूत करने में योगदान मिला।
- कांग्रेस ने आगे चलकर व्यापक जन-आंदोलनों के आयोजन के लिए संगठनात्मक आधार प्रदान किया।
हालांकि, 1885 में कांग्रेस का सामाजिक आधार सीमित था। किसानों, मजदूरों, महिलाओं और समाज के अन्य वर्गों की भागीदारी बाद के दशकों में अलग-अलग स्तरों पर विकसित हुई। इसलिए स्थापना के समय कांग्रेस को पूरे भारतीय समाज का पूर्ण प्रतिनिधि संगठन मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
कांग्रेस की स्थापना का ऐतिहासिक महत्व
- भारत में एक स्थायी अखिल भारतीय राजनीतिक मंच के विकास को प्रोत्साहन मिला।
- राजनीतिक मांगों को संगठित और नियमित रूप से प्रस्तुत करने की प्रक्रिया मजबूत हुई।
- विभिन्न प्रांतों के नेताओं के बीच सहयोग और राष्ट्रीय मुद्दों पर संवाद बढ़ा।
- औपनिवेशिक शासन की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की आलोचना को संगठित स्वर मिला।
- कांग्रेस ने आगे चलकर उदारवादी, उग्रवादी और गांधीवादी जैसी विभिन्न राजनीतिक धाराओं के विकास के लिए मंच प्रदान किया।
- बाद के जन-आंदोलनों में कांग्रेस की भूमिका बढ़ी और वह स्वतंत्रता संघर्ष का प्रमुख संगठन बनी।
महत्त्वपूर्ण घटनाएँ और तथ्य — त्वरित पुनरावृत्ति
| तथ्य / घटना | विवरण |
|---|---|
| कांग्रेस की स्थापना | 1885 |
| प्रथम अधिवेशन | 28–31 दिसंबर 1885 |
| प्रथम अधिवेशन का स्थान | बंबई |
| आयोजन स्थल | गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज |
| प्रथम अधिवेशन के प्रतिनिधि | 72 |
| प्रथम अध्यक्ष | डब्ल्यू. सी. बनर्जी |
| प्रमुख संगठनात्मक भूमिका | ए. ओ. ह्यूम |
| इल्बर्ट बिल विवाद | 1883 |
| पूना सार्वजनिक सभा | 1870 |
| इंडियन एसोसिएशन | 1876; सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस से संबंधित |
| मद्रास महाजन सभा | 1884 |
| बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन | 1885 |
| धन-निकासी सिद्धांत | दादाभाई नौरोजी से संबंधित |
| प्रारंभिक कांग्रेस की प्रमुख पद्धति | संवैधानिक आंदोलन, याचिकाएँ और सार्वजनिक सभाएँ |
UPSC के लिए अवधारणात्मक स्पष्टता
- कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष और संगठनकर्ता में अंतर: डब्ल्यू. सी. बनर्जी प्रथम अध्यक्ष थे; ए. ओ. ह्यूम ने संगठन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- कांग्रेस की स्थापना और पूर्ण स्वतंत्रता: 1885 में कांग्रेस की स्थापना का अर्थ यह नहीं है कि उस समय कांग्रेस की प्रमुख मांग पूर्ण स्वतंत्रता थी। प्रारंभिक मांगें मुख्यतः राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित थीं।
- सेफ्टी वाल्व सिद्धांत: यह कांग्रेस की स्थापना की एक व्याख्या है; इसे एकमात्र और निर्विवाद कारण नहीं मानना चाहिए।
- प्रारंभिक कांग्रेस का जनाधार: स्थापना के समय इसका आधार मुख्यतः शिक्षित और शहरी वर्गों में था। बाद में इसकी सामाजिक पहुँच और जन-भागीदारी का विस्तार हुआ।
- पूर्ववर्ती राजनीतिक संगठन: इन संगठनों ने राजनीतिक चेतना और संगठनात्मक अनुभव के विकास में योगदान दिया, लेकिन सभी संगठन सीधे कांग्रेस में विलीन नहीं हुए थे।