1. परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रारंभिक विकास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ। आधुनिक शिक्षा, समाचार-पत्रों, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों, परिवहन एवं संचार के विस्तार और औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभावों ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना के विकास में योगदान दिया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress—INC) की स्थापना दिसंबर 1885 में हुई। इसके शुरुआती नेताओं ने संवैधानिक सुधार, प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी और आर्थिक शोषण के अंत की मांग की। इतिहासलेखन में इस प्रारंभिक धारा को सामान्यतः उदारवादी चरण (Moderate Phase) कहा जाता है।
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में औपनिवेशिक नीतियों के प्रति असंतोष, विशेषकर 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध ने अधिक सक्रिय राष्ट्रवादी राजनीति को गति दी। स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर बल देने वाली धारा को सामान्यतः उग्रवादी चरण (Extremist Phase) कहा जाता है।
ध्यान दें: उदारवादी और उग्रवादी चरणों की तिथियाँ अध्ययन की सुविधा के लिए प्रयुक्त सामान्य विभाजन हैं। दोनों धाराओं के विचार पूरी तरह एक-दूसरे से अलग नहीं थे और इनके बीच मतभेद समय के साथ विकसित हुए।
2. उदारवादी चरण (Moderate Phase): 1885–1905
उदारवादी नेताओं का विश्वास था कि राजनीतिक अधिकारों को संवैधानिक संघर्ष, जनमत निर्माण और ब्रिटिश शासन की घोषित उदारवादी परंपराओं के आधार पर क्रमशः प्राप्त किया जा सकता है। वे तत्काल व्यापक विद्रोह के बजाय प्रतिनिधि संस्थाओं के विस्तार और प्रशासनिक सुधारों पर जोर देते थे।
उनकी राजनीति का एक प्रमुख उद्देश्य भारतीयों को शासन की समस्याओं से परिचित कराना, देश के विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षित लोगों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाना और ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों की आलोचना को प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करना था।
उदारवादी नेताओं के प्रमुख नाम
- दादाभाई नौरोजी: धन-निष्कासन सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादक; भारत की आर्थिक दरिद्रता का औपनिवेशिक शासन से संबंध स्पष्ट किया।
- गोपाल कृष्ण गोखले: संवैधानिक सुधारों, सार्वजनिक सेवा और क्रमिक राजनीतिक परिवर्तन के समर्थक; 1905 में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की।
- फिरोजशाह मेहता: बंबई की सार्वजनिक राजनीति और स्थानीय स्वशासन से जुड़े प्रमुख नेता।
- सुरेंद्रनाथ बनर्जी: राजनीतिक जागरण और अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका।
- महादेव गोविंद रानाडे: सामाजिक सुधार, आर्थिक विकास और सार्वजनिक जीवन में सुधार के समर्थक।
- व्योमेश चंद्र बनर्जी (W. C. Bonnerjee): 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष।
- बद्रुद्दीन तैयबजी: 1887 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने; प्रारंभिक राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न समुदायों की भागीदारी का महत्त्वपूर्ण उदाहरण।
3. उदारवादियों की प्रमुख मांगें
- विधान परिषदों का विस्तार और उनकी शक्तियों में वृद्धि।
- विधान परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना।
- सरकारी बजट पर चर्चा और प्रशासनिक नीतियों की आलोचना का अवसर।
- उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों को अधिक अवसर देना।
- भारतीय सिविल सेवा परीक्षा भारत और इंग्लैंड में आयोजित करने की मांग।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग करना।
- अत्यधिक सैन्य व्यय में कमी और प्रशासनिक खर्चों की समीक्षा।
- भूमि-राजस्व के बोझ को कम करना और किसानों की समस्याओं पर ध्यान देना।
- प्रेस, अभिव्यक्ति और सार्वजनिक सभा की स्वतंत्रता की रक्षा।
- भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन तथा आर्थिक नीतियों में सुधार।
ये मांगें तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के समान नहीं थीं। प्रारंभिक उदारवादी राजनीति का मुख्य जोर शासन में भारतीय भागीदारी, संवैधानिक सुधार और औपनिवेशिक प्रशासन की जवाबदेही बढ़ाने पर था।
4. उदारवादियों की कार्यपद्धति
उदारवादी राजनीति को प्रायः प्रार्थना, याचिका और विरोध (Prayer, Petition and Protest) के माध्यम से समझाया जाता है। हालांकि यह वाक्यांश उनकी पूरी राजनीतिक गतिविधियों का संपूर्ण वर्णन नहीं करता; उन्होंने प्रेस, सार्वजनिक सभाओं और आर्थिक विश्लेषण के माध्यम से भी राजनीतिक चेतना विकसित की।
- सरकार को ज्ञापन और याचिकाएँ भेजना।
- ब्रिटिश संसद तथा ब्रिटिश जनमत के सामने भारतीय समस्याएँ रखना।
- प्रतिनिधिमंडलों के माध्यम से सुधारों की मांग करना।
- समाचार-पत्रों और सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से जनमत बनाना।
- सरकारी बजट और प्रशासनिक नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करना।
- विधान परिषदों में उपलब्ध अवसरों का उपयोग करना।
5. आर्थिक राष्ट्रवाद एवं धन-निष्कासन सिद्धांत
उदारवादियों का एक महत्त्वपूर्ण योगदान औपनिवेशिक शासन की आर्थिक आलोचना था। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की गरीबी को केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं समझा जा सकता; औपनिवेशिक आर्थिक नीतियाँ, प्रशासनिक खर्च, व्यापार की संरचना और भारत से बाहर जाने वाले संसाधन भी आर्थिक संकट के महत्त्वपूर्ण कारण थे।
दादाभाई नौरोजी ने धन-निष्कासन सिद्धांत (Drain Theory) के माध्यम से बताया कि भारत में उत्पन्न आय का एक हिस्सा बिना समतुल्य आर्थिक प्रतिफल के ब्रिटेन चला जाता था। इसमें ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और पेंशन, भारत के बाहर होने वाले प्रशासनिक भुगतान तथा औपनिवेशिक शासन से संबंधित अन्य प्रेषण शामिल थे।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India 1901 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक ने औपनिवेशिक शासन के आर्थिक परिणामों पर राष्ट्रीय बहस को मजबूत किया।
रोमेश चंद्र दत्त ने भी औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों, भूमि-राजस्व और भारत की आर्थिक समस्याओं का विश्लेषण किया। इस प्रकार आर्थिक राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आंदोलन को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित न रखकर आर्थिक शोषण के प्रश्न से भी जोड़ा।
धन-निष्कासन सिद्धांत का महत्त्व
- औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभावों की व्यवस्थित आलोचना विकसित हुई।
- भारत की गरीबी और आर्थिक पिछड़ेपन के कारणों पर राष्ट्रीय बहस बढ़ी।
- स्वदेशी उत्पादन और भारतीय उद्योगों के समर्थन को वैचारिक आधार मिला।
- आर्थिक प्रश्न राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल हुए।
6. उदारवादी चरण की उपलब्धियाँ और सीमाएँ
प्रमुख उपलब्धियाँ
- अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन के विकास में योगदान।
- विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं को साझा राजनीतिक मंच प्रदान करना।
- औपनिवेशिक आर्थिक शोषण की आलोचना को प्रमाण-आधारित स्वरूप देना।
- प्रतिनिधित्व, नागरिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही के प्रश्न उठाना।
- आगे के राष्ट्रवादी आंदोलनों के लिए राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक आधार तैयार करना।
प्रमुख सीमाएँ
- कांग्रेस की शुरुआती गतिविधियों में शिक्षित शहरी मध्यम वर्ग का प्रभाव अधिक था; किसानों और श्रमिकों की व्यापक संगठित भागीदारी सीमित थी।
- ब्रिटिश संसद और उदारवादी जनमत से सुधार प्राप्त करने की उम्मीद कई बार औपनिवेशिक शासन की वास्तविक सीमाओं को कम करके आँकती थी।
- याचिकाओं और संवैधानिक उपायों से मिलने वाले परिणाम सीमित रहे।
- ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जनदबाव बनाने की क्षमता शुरुआती चरण में अपेक्षाकृत कम थी।
संतुलित मूल्यांकन: उदारवादियों की सीमाओं के बावजूद, उन्होंने राजनीतिक संगठन, आर्थिक आलोचना और राष्ट्रीय चेतना की नींव रखी। बाद के अधिक सक्रिय आंदोलनों को भी इसी प्रारंभिक राजनीतिक विकास से लाभ मिला।
7. उग्रवादी चरण (Extremist Phase): लगभग 1905–1907
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अनेक राष्ट्रवादियों को लगा कि केवल याचिकाओं और संवैधानिक अपीलों से पर्याप्त राजनीतिक परिवर्तन नहीं हो रहा है। ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक असंतोष और बंगाल विभाजन ने इस विचार को बल दिया कि राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक सक्रिय और जन-आधारित बनाना आवश्यक है।
उग्रवादी नेताओं ने स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया। उनका उद्देश्य जनता में आत्मविश्वास विकसित करना और औपनिवेशिक शासन पर अधिक प्रभावी राजनीतिक दबाव बनाना था।
महत्त्वपूर्ण अंतर: उस समय कांग्रेस के उग्रवादी और क्रांतिकारी गुप्त संगठनों की गतिविधियाँ एक ही चीज नहीं थीं। उग्रवादी धारा मुख्यतः स्वदेशी, बहिष्कार, जन-जागरण और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे कार्यक्रमों से जुड़ी थी; क्रांतिकारी संगठनों ने कुछ परिस्थितियों में गुप्त गतिविधियों और सशस्त्र कार्रवाई का रास्ता अपनाया।
8. उग्रवादियों के प्रमुख नेता: लाल-बाल-पाल
उग्रवादी राष्ट्रवादी धारा के तीन प्रसिद्ध नेताओं को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता है।
- लाला लाजपत राय: पंजाब में राष्ट्रवादी राजनीति के प्रमुख नेता; शिक्षा, जन-जागरण और स्वदेशी के समर्थक।
- बाल गंगाधर तिलक: महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी राजनीति के प्रमुख नेता; स्वराज और जन-सक्रियता पर बल दिया।
- बिपिन चंद्र पाल: बंगाल में स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रबल समर्थक।
अरविंद घोष ने भी उग्र राष्ट्रवादी विचारों और स्वदेशी आंदोलन के विकास में योगदान दिया। इन नेताओं के विचार और कार्यक्षेत्र एक जैसे नहीं थे, लेकिन वे राष्ट्रीय आंदोलन में अधिक सक्रिय प्रतिरोध और आत्मशक्ति की आवश्यकता पर जोर देते थे।
9. उग्रवादियों के प्रमुख विचार एवं कार्यक्रम
- स्वराज: भारतीयों को अपने राजनीतिक भविष्य पर अधिक नियंत्रण मिलना चाहिए।
- स्वदेशी: भारतीय वस्तुओं और देशी उद्योगों के उपयोग तथा विकास को बढ़ावा देना।
- बहिष्कार: विदेशी वस्तुओं और कुछ औपनिवेशिक संस्थाओं के विरुद्ध संगठित विरोध।
- राष्ट्रीय शिक्षा: ऐसी शिक्षा को बढ़ावा देना जो भारतीय आवश्यकताओं, राष्ट्रीय चेतना और आधुनिक ज्ञान को महत्त्व दे।
- आत्मनिर्भरता: राजनीतिक परिवर्तन के लिए समाज की अपनी संगठनात्मक और आर्थिक क्षमता बढ़ाना।
- निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance): औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध असहयोग, बहिष्कार और अन्य दबावकारी उपायों का प्रयोग।
उग्रवादी राजनीति की विशेषता केवल अधिक कठोर भाषा नहीं थी; उसने राष्ट्रीय आंदोलन में राजनीतिक सक्रियता, स्वदेशी उत्पादन और जनता की भागीदारी को अधिक महत्त्व दिया।
10. बंगाल विभाजन, 1905
लॉर्ड कर्जन की वायसराय अवधि में बंगाल का विभाजन किया गया। यह विभाजन 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ। ब्रिटिश सरकार ने प्रशासनिक सुविधा को इसका कारण बताया, लेकिन राष्ट्रवादियों ने इसे बंगाली राजनीतिक चेतना को कमजोर करने और समुदायों के बीच विभाजन बढ़ाने की औपनिवेशिक नीति के रूप में देखा।
उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी का प्रशासनिक क्षेत्र बहुत बड़ा था। विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल और असम नामक नया प्रांत बनाया गया, जिसकी राजधानी ढाका थी। पश्चिमी भाग में कलकत्ता प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बना रहा।
बंगाल विभाजन के परिणाम
- विभाजन के विरुद्ध व्यापक सार्वजनिक विरोध हुआ।
- स्वदेशी और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को गति मिली।
- छात्रों, शिक्षकों, महिलाओं और कुछ व्यापारी समूहों ने आंदोलन में भाग लिया।
- राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं और देशी उद्योगों को बढ़ावा देने के प्रयास हुए।
- राष्ट्रवादी राजनीति में जन-आधारित सक्रियता बढ़ी।
बंगाल विभाजन 1911 में रद्द कर दिया गया। उसी वर्ष ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा भी हुई।
11. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन
स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य भारतीय वस्तुओं का उपयोग बढ़ाना, देशी उद्योगों को प्रोत्साहित करना और औपनिवेशिक आर्थिक निर्भरता को चुनौती देना था। इसका विस्तार बंगाल से आगे भी हुआ, हालांकि आंदोलन की तीव्रता और स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न थे।
स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख रूप
- भारतीय निर्मित वस्तुओं का उपयोग और प्रचार।
- विदेशी कपड़ों तथा अन्य वस्तुओं के बहिष्कार की अपील।
- स्वदेशी दुकानों और भारतीय उद्यमों को समर्थन।
- राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और समर्थन।
- सभाओं, जुलूसों, गीतों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से जन-जागरण।
बहिष्कार आंदोलन औपनिवेशिक शासन और विदेशी व्यापार के विरुद्ध राजनीतिक दबाव का एक माध्यम था। हालांकि सभी क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में इसकी भागीदारी समान नहीं थी।
परीक्षा उपयोगिता: स्वदेशी और बहिष्कार को अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़े कार्यक्रमों के रूप में समझें। स्वदेशी का सकारात्मक पक्ष भारतीय वस्तुओं और संस्थाओं को प्रोत्साहित करना था, जबकि बहिष्कार का नकारात्मक पक्ष विदेशी वस्तुओं या औपनिवेशिक संस्थाओं से दूरी बनाना था।
12. राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन
स्वदेशी आंदोलन के दौरान शिक्षा को राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भरता से जोड़ने के प्रयास हुए। अनेक राष्ट्रवादियों का मानना था कि शिक्षा केवल औपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; उसमें भारतीय समाज, इतिहास, विज्ञान और राष्ट्रीय आवश्यकताओं को भी स्थान मिलना चाहिए।
बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education) की स्थापना 1906 में हुई। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा को प्रोत्साहित करना था। राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर भी जोर दिया गया।
राष्ट्रीय शिक्षा की पहलें एक जैसी नहीं थीं। विभिन्न संस्थाओं के पाठ्यक्रम, संसाधन और उद्देश्य अलग-अलग थे, लेकिन उनका व्यापक संबंध स्वदेशी आंदोलन और औपनिवेशिक शिक्षा के विकल्प तलाशने की कोशिश से था।
13. तिलक और जन-राजनीति
बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक उत्सवों, समाचार-पत्रों और राजनीतिक सभाओं के माध्यम से लोगों तक राष्ट्रवादी विचार पहुँचाने का प्रयास किया। उन्होंने 1890 के दशक में सार्वजनिक गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव को राजनीतिक-सामाजिक जागरण से जोड़ा।
इन आयोजनों ने लोगों को एकत्र करने और सार्वजनिक राजनीतिक अभिव्यक्ति के अवसर बढ़ाने में भूमिका निभाई। हालांकि इनके सामाजिक प्रभाव सभी समुदायों और क्षेत्रों में एक जैसे नहीं थे।
तिलक का प्रसिद्ध कथन “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति में व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुआ।
14. कांग्रेस में मतभेद और सूरत विभाजन, 1907
कांग्रेस में उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच मतभेद आंदोलन की गति, कार्यक्रमों, नेतृत्व और राजनीतिक रणनीति को लेकर बढ़े। बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी और बहिष्कार जैसे कार्यक्रमों के विस्तार ने इन मतभेदों को और तीव्र किया।
1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी अध्यक्ष थे। इस अधिवेशन में स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे मुद्दे महत्त्वपूर्ण बने। हालांकि स्वराज की उस समय की व्याख्या को 1929 में कांग्रेस द्वारा घोषित पूर्ण स्वराज के समान नहीं मानना चाहिए।
1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के भीतर संघर्ष चरम पर पहुँचा। अधिवेशन में नेतृत्व और कार्यक्रमों को लेकर विवाद हुआ और उदारवादी तथा उग्रवादी गुट अलग हो गए। इसे सूरत विभाजन (Surat Split) कहा जाता है।
इस विभाजन से कांग्रेस की तत्कालीन एकता कमजोर हुई, लेकिन दोनों धाराओं के बीच राजनीतिक मतभेदों और सहयोग की संभावनाएँ आगे भी बनी रहीं। 1916 के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी गुटों का पुनर्मिलन हुआ।
15. लखनऊ अधिवेशन और लखनऊ समझौता, 1916
1916 का लखनऊ अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में महत्त्वपूर्ण था। इसी अधिवेशन में उदारवादी और उग्रवादी गुटों के बीच पुनर्मिलन हुआ। इससे कांग्रेस के भीतर पहले से मौजूद मतभेदों को कम करने और राजनीतिक सहयोग बढ़ाने का अवसर मिला।
इसी वर्ष कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) हुआ। दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों की मांगों पर सहमति बनाई। समझौते में प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर पृथक निर्वाचक मंडलों को स्वीकार किया गया, जो भारतीय राष्ट्रवाद और प्रतिनिधित्व की राजनीति के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण लेकिन विवादास्पद पहलू है।
अंतर याद रखें: कांग्रेस का पुनर्मिलन और कांग्रेस-मुस्लिम लीग का समझौता, 1916 की दो संबंधित लेकिन अलग घटनाएँ थीं।
16. उदारवादी और उग्रवादी चरण: तुलनात्मक अध्ययन
| आधार | उदारवादी | उग्रवादी |
|---|---|---|
| प्रमुख काल | मुख्यतः 1885–1905 | विशेष रूप से 1905 के बाद; 1907 में मतभेद चरम पर |
| प्रमुख नेता | दादाभाई नौरोजी, गोखले, फिरोजशाह मेहता | तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष |
| राजनीतिक दृष्टिकोण | क्रमिक संवैधानिक सुधार और प्रतिनिधित्व | अधिक सक्रिय प्रतिरोध, स्वराज और आत्मशक्ति |
| प्रमुख तरीके | याचिका, ज्ञापन, प्रतिनिधिमंडल, जनमत निर्माण | स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, निष्क्रिय प्रतिरोध |
| आर्थिक दृष्टिकोण | औपनिवेशिक आर्थिक शोषण का विश्लेषण और सुधार की मांग | स्वदेशी उत्पादन और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर |
| जनभागीदारी | शुरुआती दौर में शिक्षित वर्ग का प्रभाव अधिक | व्यापक जन-जागरण और सक्रिय भागीदारी पर अधिक जोर |
| ऐतिहासिक योगदान | राजनीतिक संगठन और आर्थिक आलोचना की नींव | राष्ट्रवादी आंदोलन में सक्रियता और स्वदेशी कार्यक्रमों का विस्तार |
विश्लेषण: दोनों धाराओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान दिया। उदारवादियों ने राजनीतिक चेतना और औपनिवेशिक आर्थिक आलोचना को विकसित किया, जबकि उग्रवादियों ने अधिक सक्रिय प्रतिरोध और आत्मनिर्भरता को प्रमुख बनाया।
17. इस काल के प्रमुख अधिनियम और घटनाएँ
| वर्ष | अधिनियम या घटना | मुख्य महत्त्व |
|---|---|---|
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना | अखिल भारतीय राजनीतिक मंच के विकास की शुरुआत |
| 1892 | भारतीय परिषद अधिनियम | विधान परिषदों का विस्तार; बजट पर चर्चा और प्रश्न पूछने की सीमित सुविधा |
| 1905 | बंगाल विभाजन | स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को व्यापक गति |
| 1906 | कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन | स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा पर जोर |
| 1906 | राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल | राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा को बढ़ावा |
| 1907 | सूरत विभाजन | कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी गुटों में अलगाव |
| 1909 | भारतीय परिषद अधिनियम, मॉर्ले-मिंटो सुधार | विधान परिषदों में विस्तार और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था |
| 1911 | बंगाल विभाजन रद्द | विभाजन-विरोधी आंदोलन की एक प्रमुख राजनीतिक उपलब्धि |
| 1916 | लखनऊ अधिवेशन और लखनऊ समझौता | कांग्रेस के गुटों का पुनर्मिलन और कांग्रेस-मुस्लिम लीग के बीच समझौता |
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892: इसने विधान परिषदों का विस्तार किया और बजट पर चर्चा तथा कुछ प्रश्न पूछने की सीमित सुविधा दी। इसे आधुनिक अर्थ में पूर्ण निर्वाचन या उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं समझना चाहिए।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909: इसे मॉर्ले-मिंटो सुधार भी कहा जाता है। इसने विधान परिषदों का विस्तार किया और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था की। इससे प्रतिनिधित्व की राजनीति में समुदाय-आधारित निर्वाचन की औपचारिक भूमिका बढ़ी।
18. घटनाक्रम को समझने के लिए कालक्रम
| वर्ष | घटना | याद रखने योग्य संबंध |
|---|---|---|
| 1885 | कांग्रेस की स्थापना | प्रारंभिक राष्ट्रीय राजनीति |
| 1885–1905 | उदारवादी राजनीति का प्रमुख दौर | संवैधानिक सुधार और आर्थिक आलोचना |
| 1905 | बंगाल विभाजन | स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन |
| 1906 | कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन | स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा |
| 1907 | सूरत विभाजन | कांग्रेस के भीतर गुटीय विभाजन |
| 1909 | मॉर्ले-मिंटो सुधार | पृथक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था |
| 1911 | बंगाल विभाजन रद्द | स्वदेशी आंदोलन की पृष्ठभूमि से संबंधित |
| 1916 | लखनऊ अधिवेशन और समझौता | कांग्रेस का पुनर्मिलन तथा कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौता |
19. परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियाँ
- गलती: उदारवादी और उग्रवादी नेताओं को पूरी तरह असंबद्ध मानना। सही समझ: दोनों औपनिवेशिक शासन का विरोध करते थे, लेकिन उनकी कार्यपद्धति और राजनीतिक प्राथमिकताएँ अलग थीं।
- गलती: उग्रवादियों को सभी क्रांतिकारी गुप्त संगठनों के समान मानना। सही समझ: दोनों धाराओं में अंतर था; उग्रवादी राजनीति में स्वदेशी, बहिष्कार और निष्क्रिय प्रतिरोध प्रमुख थे।
- गलती: 1906 में स्वराज की मांग को 1929 के पूर्ण स्वराज प्रस्ताव के बिल्कुल समान मानना। सही समझ: स्वराज की व्याख्या और राजनीतिक संदर्भ समय के साथ बदले।
- गलती: 1909 के सुधारों को पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था मानना। सही समझ: प्रतिनिधित्व का विस्तार सीमित था और औपनिवेशिक शासन कायम रहा।
- गलती: लखनऊ समझौते और कांग्रेस के पुनर्मिलन को एक ही घटना मानना। सही समझ: दोनों 1916 से संबंधित, लेकिन अलग घटनाएँ थीं।
- गलती: स्वदेशी आंदोलन को केवल विदेशी कपड़ों के बहिष्कार तक सीमित करना। सही समझ: इसमें राष्ट्रीय शिक्षा, देशी उद्योग, राजनीतिक जागरण और आत्मनिर्भरता भी शामिल थे।
20. त्वरित पुनरावृत्ति
- 1885: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना।
- दादाभाई नौरोजी: धन-निष्कासन सिद्धांत और आर्थिक राष्ट्रवाद।
- उदारवादी: संवैधानिक सुधार, याचिकाएँ और आर्थिक आलोचना।
- 1905: बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन का विस्तार।
- लाल-बाल-पाल: लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल।
- 1906: कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन और राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल।
- 1907: सूरत विभाजन।
- 1909: मॉर्ले-मिंटो सुधार और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल।
- 1911: बंगाल विभाजन रद्द।
- 1916: कांग्रेस का पुनर्मिलन और कांग्रेस-मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता।
21. निष्कर्ष
उदारवादी और उग्रवादी चरण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में परस्पर संबंधित महत्त्वपूर्ण चरण थे। उदारवादियों ने अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन, संवैधानिक अधिकारों की मांग और औपनिवेशिक आर्थिक शोषण की आलोचना को मजबूत किया। उग्रवादियों ने स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और सक्रिय जन-जागरण पर अधिक जोर दिया।
इन दोनों धाराओं के अनुभवों ने आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए राजनीतिक विचार, संगठन और जन-सक्रियता का आधार तैयार किया। इसलिए इस काल को केवल कांग्रेस के आंतरिक मतभेदों के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के विस्तार और रणनीति में बदलाव के दौर के रूप में समझना चाहिए।