Prehistoric Period

प्रागैतिहासिक काल — मानव जीवन के प्रारंभिक विकास का अध्ययन

1. प्रागैतिहासिक काल का परिचय

प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period) सामान्यतः उस काल को कहा जाता है जिसके लिए पढ़ने योग्य लिखित ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध नहीं हैं। इस काल के मानव जीवन की जानकारी मुख्यतः पत्थर के औजारों, जीवाश्मों, अस्थियों, शैलचित्रों, पुरातात्त्विक अवशेषों और उत्खनन से प्राप्त सामग्री के वैज्ञानिक अध्ययन से मिलती है।

प्रागैतिहासिक काल का अध्ययन केवल औजारों के आधार पर नहीं, बल्कि मानव के पर्यावरण, भोजन, आवास, तकनीक, सामाजिक जीवन और आजीविका में हुए परिवर्तनों के आधार पर भी किया जाता है।

ध्यान दें कि पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल का विकास सभी क्षेत्रों में एक ही समय पर नहीं हुआ। इसलिए इनके लिए पूरे भारत पर लागू होने वाली एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित करना उचित नहीं है।

2. प्रागैतिहासिक, आद्य-ऐतिहासिक और ऐतिहासिक काल में अंतर

काल मुख्य विशेषता उदाहरण
प्रागैतिहासिक काल लिखित स्रोत उपलब्ध नहीं; जानकारी मुख्यतः पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलती है। पाषाण काल के विभिन्न चरण
आद्य-ऐतिहासिक काल लिपि या लेखन के प्रमाण मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ना संभव नहीं होता या लिखित साक्ष्य सीमित होते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता एक प्रमुख उदाहरण है, जिसकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
ऐतिहासिक काल पढ़े जा सकने वाले लिखित स्रोत उपलब्ध होते हैं; अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्य भी महत्त्वपूर्ण रहते हैं। प्राचीन भारत में पढ़े जा सकने वाले अभिलेखों से संबंधित काल

परीक्षा उपयोगी तथ्य: किसी सभ्यता के पास लिपि होना और उसकी लिपि का पढ़ा जा सकना दो अलग-अलग बातें हैं। सिंधु लिपि के अपठित होने के कारण सिंधु सभ्यता को सामान्यतः आद्य-ऐतिहासिक संदर्भ में रखा जाता है।

3. पाषाण काल का सामान्य कालक्रम

कालखंड मुख्य विशेषता आजीविका का सामान्य स्वरूप
पुरापाषाण काल (Palaeolithic) पत्थर के अपेक्षाकृत अपरिष्कृत औजार शिकार और खाद्य-संग्रह
मध्यपाषाण काल (Mesolithic) छोटे पत्थर के औजार, जिन्हें माइक्रोलिथ कहा जाता है शिकार, मछली पकड़ना और खाद्य-संग्रह; कुछ क्षेत्रों में पशुपालन के प्रमाण
नवपाषाण काल (Neolithic) घिसे-पॉलिश किए हुए पत्थर के औजार तथा अनेक क्षेत्रों में कृषि और पशुपालन कृषि, पशुपालन और कुछ क्षेत्रों में स्थायी बस्तियाँ
ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic) तांबे और पत्थर के औजारों का साथ-साथ प्रयोग कृषि, पशुपालन और विभिन्न शिल्प

यह वर्गीकरण अध्ययन की सुविधा के लिए है। विभिन्न क्षेत्रों में इन कालखंडों की तिथियाँ, तकनीकें और आजीविका के तरीके अलग-अलग रहे। कुछ संस्कृतियों में अलग-अलग तकनीकों का सह-अस्तित्व भी दिखाई देता है।

4. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age)

पुरापाषाण काल पाषाण युग का सबसे प्राचीन चरण है। भारतीय उपमहाद्वीप में इस काल के विभिन्न चरणों के प्रमाण अनेक पुरातात्त्विक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

  • पत्थर के औजारों में हस्तकुठार, विदारणी और खंडक जैसे प्रकार शामिल थे।
  • आजीविका मुख्यतः शिकार और जंगली वनस्पतियों से भोजन एकत्र करने पर आधारित थी।
  • मानव समूह पर्यावरण और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार स्थान बदलते थे।
  • औजार बनाने की तकनीक समय के साथ बदलती और अधिक विविध होती गई।
  • जीवन-शैली के बारे में जानकारी औजारों, अस्थियों और अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलती है।

महत्त्वपूर्ण सावधानी: आग के उपयोग का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन किसी विशिष्ट भारतीय पुरातात्त्विक स्थल पर आग के नियंत्रित उपयोग को प्रमाणित करने के लिए साक्ष्यों की तिथि और विश्वसनीयता की जाँच आवश्यक है। इसलिए इसे पूरे पुरापाषाण काल की हर अवस्था की निश्चित विशेषता नहीं मानना चाहिए।

5. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)

मध्यपाषाण काल को सामान्यतः पुरापाषाण और नवपाषाण के बीच का सांस्कृतिक चरण माना जाता है। इस काल में पर्यावरणीय परिवर्तनों के साथ मानव की भोजन प्राप्त करने की गतिविधियों और औजारों में विविधता दिखाई देती है।

  • छोटे आकार के पत्थर के औजारों को माइक्रोलिथ (Microliths) कहा जाता है।
  • इन औजारों का उपयोग अकेले या लकड़ी अथवा हड्डी के उपकरणों में जोड़कर किया जा सकता था।
  • शिकार, मछली पकड़ना और जंगली खाद्य पदार्थों का संग्रह महत्त्वपूर्ण रहे।
  • कुछ स्थलों पर पशुओं की हड्डियों और मानव गतिविधियों के अन्य प्रमाण मिलते हैं।
  • शैलचित्रों से शिकार, पशुओं और सामूहिक गतिविधियों के बारे में जानकारी मिलती है।
  • कुछ क्षेत्रों में मौसमी शिविरों और बार-बार उपयोग किए गए निवास स्थलों के प्रमाण मिलते हैं।

परीक्षा तथ्य: माइक्रोलिथ मध्यपाषाण काल की प्रमुख पहचान हैं, लेकिन छोटे पत्थर के औजारों का उपयोग केवल इसी काल तक सीमित नहीं था।

6. नवपाषाण काल (Neolithic Age)

नवपाषाण काल में अनेक क्षेत्रों में कृषि, पशुपालन और अपेक्षाकृत स्थायी बस्तियों का विकास हुआ। इसे मानव जीवन में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन माना जाता है, हालांकि कृषि का विकास अलग-अलग क्षेत्रों में अलग समय पर हुआ।

  • कई क्षेत्रों में खेती और पशुपालन आजीविका के प्रमुख आधार बने।
  • घिसे और पॉलिश किए हुए पत्थर के औजारों का उपयोग बढ़ा।
  • कुछ क्षेत्रों में स्थायी या अर्ध-स्थायी बस्तियों का विकास हुआ।
  • अनाज के प्रसंस्करण और भंडारण के प्रमाण कुछ स्थलों पर मिले हैं।
  • मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग कुछ नवपाषाण समुदायों में हुआ; यह सभी प्रारंभिक नवपाषाण समुदायों की समान विशेषता नहीं थी।
  • पशुओं के पालन और पौधों की खेती ने भोजन प्राप्त करने के तरीकों में परिवर्तन किया।

ध्यान दें: कृषि के विकास का अर्थ यह नहीं है कि शिकार और खाद्य-संग्रह तुरंत समाप्त हो गए। अनेक समुदायों में विभिन्न आजीविका गतिविधियाँ लंबे समय तक साथ-साथ चलती रहीं।

7. ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age)

ताम्रपाषाण काल में पत्थर के औजारों के साथ तांबे के औजारों का भी प्रयोग किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में इस काल से जुड़ी विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियों की अपनी विशेषताएँ थीं।

  • पत्थर और तांबे के औजार साथ-साथ उपयोग किए जाते थे।
  • कृषि और पशुपालन कई समुदायों की आजीविका के प्रमुख आधार थे।
  • मिट्टी के बर्तनों की विभिन्न क्षेत्रीय शैलियाँ विकसित हुईं।
  • कुछ बस्तियों में घरों, भंडारण और शिल्प उत्पादन के प्रमाण मिलते हैं।
  • आहड़-बनास, मालवा और जोरवे जैसी संस्कृतियाँ ताम्रपाषाण परंपराओं से संबंधित हैं।

ताम्रपाषाण संस्कृति का अर्थ यह नहीं है कि उस समय लोहे का व्यापक उपयोग हो चुका था। तांबा और पत्थर इसके नाम तथा तकनीकी पहचान के प्रमुख आधार हैं।

8. भारत के प्रमुख प्रागैतिहासिक एवं नवपाषाण स्थल

स्थल वर्तमान क्षेत्र मुख्य विशेषता
भीमबेटका मध्य प्रदेश शैलाश्रय, शैलचित्र और विभिन्न प्रागैतिहासिक कालों से संबंधित पुरातात्त्विक साक्ष्य।
बेलन घाटी उत्तर प्रदेश पुरापाषाण से नवपाषाण तक की सांस्कृतिक अवस्थाओं से संबंधित साक्ष्य।
बुर्जहोम कश्मीर नवपाषाण संस्कृति, जमीन में खोदे गए आवासों और विशिष्ट दफन प्रथाओं के प्रमाण।
चिरांद बिहार नवपाषाण संस्कृति, कृषि-पशुपालन और अस्थि तथा पत्थर के औजारों से संबंधित साक्ष्य।
कोल्डिहवा उत्तर प्रदेश नवपाषाण संस्कृति और चावल के अवशेषों से संबंधित पुरातात्त्विक चर्चा के लिए प्रसिद्ध।
महागरा उत्तर प्रदेश नवपाषाण बस्ती तथा कृषि-पशुपालन से संबंधित साक्ष्य।
मेहरगढ़ वर्तमान पाकिस्तान, बलूचिस्तान प्रारंभिक कृषि और पशुपालन के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य; भारतीय उपमहाद्वीप के नवपाषाण अध्ययन में प्रमुख स्थल।
हल्लूर कर्नाटक दक्षिण भारत की नवपाषाण-ताम्रपाषाण तथा बाद की सांस्कृतिक अवस्थाओं के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण।

तथ्यात्मक सावधानी: कोल्डिहवा से प्राप्त चावल के अवशेषों की तिथि और उनके आधार पर कृषि के प्रारंभिक इतिहास के बारे में विद्वानों में चर्चा रही है। इसलिए किसी एक तिथि को निर्विवाद मानकर याद करने के बजाय प्रश्न में दिए गए स्रोत और संदर्भ पर ध्यान दें।

9. शैलचित्र (Rock Paintings)

शैलचित्र प्रागैतिहासिक और अन्य प्राचीन समुदायों के जीवन तथा सांस्कृतिक गतिविधियों को समझने में सहायता करते हैं। इनमें पशुओं, शिकार, मानव आकृतियों, नृत्य और समूह गतिविधियों जैसे विषय दिखाई दे सकते हैं।

  • भीमबेटका भारत का प्रसिद्ध शैलाश्रय और शैलचित्र स्थल है।
  • शैलचित्रों में प्रयुक्त रंग, शैली और विषयों में विविधता मिलती है।
  • चित्रों का अर्थ निकालते समय उनके पुरातात्त्विक संदर्भ और तिथि का ध्यान रखना आवश्यक है।
  • किसी चित्र को केवल उसके विषय के आधार पर निश्चित काल का मान लेना उचित नहीं है।

UPSC उपयोगिता: भीमबेटका को उसके स्थान, शैलाश्रयों और शैलचित्रों के महत्त्व के साथ याद रखें।

10. आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में परिवर्तन

पहलू प्रारंभिक पाषाण समुदाय कृषि विकसित करने वाले समुदाय
आजीविका शिकार और खाद्य-संग्रह प्रमुख कृषि और पशुपालन का बढ़ता महत्त्व; शिकार-संग्रह भी जारी रह सकता था
आवास चलायमान शिविरों और प्राकृतिक आश्रयों का उपयोग कुछ क्षेत्रों में स्थायी या अर्ध-स्थायी बस्तियाँ
भोजन प्राकृतिक रूप से उपलब्ध खाद्य संसाधनों पर निर्भरता कुछ क्षेत्रों में अनाज उत्पादन, पशुपालन और खाद्य भंडारण
औजार पत्थर के विभिन्न प्रकार के औजार पत्थर के औजारों के साथ कुछ क्षेत्रों में अन्य तकनीकों का विकास
सामाजिक जीवन समूहों में रहना और संसाधनों के लिए सहयोग बस्तियों, उत्पादन और संसाधन प्रबंधन से जुड़े नए सामाजिक संबंध

ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, सभी समुदायों के लिए एक समान नियम नहीं। अलग-अलग क्षेत्रों में पर्यावरण, संसाधनों और तकनीक के अनुसार जीवन-शैली में अंतर था।

11. प्रागैतिहासिक काल के प्रमुख स्रोत

  • पत्थर के औजार: तकनीक, निर्माण कौशल और गतिविधियों को समझने में सहायक।
  • जीवाश्म और अस्थियाँ: मानव तथा अन्य जीवों के अस्तित्व और पर्यावरण से संबंधित जानकारी।
  • पशु-अस्थियाँ: भोजन और पशुओं के उपयोग से संबंधित संकेत।
  • वनस्पति अवशेष: बीज, अनाज और अन्य अवशेष कृषि तथा पर्यावरण के अध्ययन में सहायक।
  • शैलचित्र: दृश्य अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक गतिविधियों के संभावित संकेत।
  • आवास और बस्तियाँ: निवास, निर्माण तकनीक और सामाजिक जीवन को समझने में सहायक।
  • दफन स्थल: मृत्यु-संस्कार और कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं के अध्ययन में उपयोगी।

पुरातात्त्विक साक्ष्यों की व्याख्या वैज्ञानिक परीक्षण, उत्खनन के संदर्भ और अन्य उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर की जाती है। केवल एक अवशेष से पूरे समाज के जीवन के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

12. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • प्रागैतिहासिक काल की जानकारी मुख्यतः पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलती है।
  • माइक्रोलिथ छोटे आकार के पत्थर के औजार हैं और मध्यपाषाण काल से विशेष रूप से जुड़े हैं।
  • नवपाषाण काल की प्रमुख प्रवृत्तियों में अनेक क्षेत्रों में कृषि, पशुपालन और स्थायी बस्तियों का विकास शामिल है।
  • ताम्रपाषाण काल में तांबे और पत्थर के औजारों का साथ-साथ प्रयोग हुआ।
  • भीमबेटका मध्य प्रदेश में स्थित प्रसिद्ध शैलाश्रय स्थल है।
  • बुर्जहोम कश्मीर में स्थित नवपाषाण स्थल है, जहाँ जमीन में खोदे गए आवासों के प्रमाण मिले हैं।
  • चिरांद बिहार का महत्त्वपूर्ण नवपाषाण स्थल है।
  • बेलन घाटी उत्तर प्रदेश में है और यहाँ विभिन्न प्रागैतिहासिक कालों से संबंधित साक्ष्य मिले हैं।
  • मेहरगढ़ वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित है और प्रारंभिक कृषि-पशुपालन के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण है।
  • पाषाण काल के सभी चरणों का विकास भारत के प्रत्येक क्षेत्र में एक ही समय पर नहीं हुआ।

13. त्वरित पुनरावृत्ति

प्रश्न / संकेत उत्तर
छोटे पत्थर के औजार माइक्रोलिथ
प्रसिद्ध शैलाश्रय एवं शैलचित्र स्थल भीमबेटका, मध्य प्रदेश
जमीन में खोदे गए आवासों वाला नवपाषाण स्थल बुर्जहोम, कश्मीर
बिहार का प्रमुख नवपाषाण स्थल चिरांद
तांबे और पत्थर के औजारों का साथ-साथ प्रयोग ताम्रपाषाण काल
प्रारंभिक कृषि-पशुपालन का महत्त्वपूर्ण स्थल मेहरगढ़, वर्तमान पाकिस्तान