Revolutionary Movement & Subhas Chandra Bose

क्रांतिकारी आंदोलन और सुभाष चंद्र बोस — भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का अध्ययन।

क्रांतिकारी आंदोलन — परिचय और स्वरूप

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी धारा उन प्रयासों से संबंधित थी जिनमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने के लिए गुप्त संगठन, सशस्त्र कार्रवाई, राजनीतिक प्रचार और कुछ परिस्थितियों में सैनिक विद्रोह की योजना का सहारा लिया गया। इस धारा में शामिल सभी व्यक्तियों और संगठनों के विचार एक जैसे नहीं थे।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में महाराष्ट्र और बंगाल में इसकी प्रारंभिक गतिविधियाँ दिखाई दीं। 1905 के बंगाल विभाजन के बाद यह धारा अधिक सक्रिय हुई। आगे चलकर विदेशों में बसे भारतीयों, पंजाब के प्रवासी समुदायों और उत्तर भारत के युवाओं ने भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1920 के दशक में भगत सिंह और उनके साथियों के बीच क्रांतिकारी राजनीति का एक नया रूप उभरा, जिसमें केवल औपनिवेशिक अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई ही नहीं, बल्कि समाजवाद, श्रमिक-किसान हितों और साम्राज्यवाद के विरोध पर भी बल दिया गया।

क्रांतिकारी आंदोलन के उदय के कारण

  • औपनिवेशिक दमन: ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों, नस्लीय भेदभाव और राजनीतिक अधिकारों पर प्रतिबंधों से असंतोष बढ़ा।
  • प्रारंभिक कांग्रेस की सीमाएँ: कुछ युवाओं को याचिकाओं और संवैधानिक सुधारों पर आधारित राजनीति से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
  • बंगाल विभाजन, 1905: इसने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को गति दी तथा उग्र राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार में योगदान दिया।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रेरणा: 1905 में रूस-जापान युद्ध में जापान की विजय ने एशियाई राष्ट्रवादी आंदोलनों को प्रेरित किया।
  • यूरोपीय क्रांतिकारी परंपराएँ: आयरलैंड और अन्य देशों के स्वतंत्रता संघर्षों से कुछ भारतीय क्रांतिकारी प्रभावित हुए।
  • युवाओं में राष्ट्रवादी चेतना: राष्ट्रीय गौरव, राजनीतिक स्वतंत्रता और औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष ने युवाओं को सक्रिय किया।
  • प्रथम विश्व युद्ध: युद्ध के दौरान ब्रिटेन की कठिनाइयों को कुछ क्रांतिकारियों ने विद्रोह के अवसर के रूप में देखा।

प्रारंभिक क्रांतिकारी संगठन

प्रारंभिक क्रांतिकारी संगठन प्रायः गुप्त रूप से काम करते थे। इनमें युवाओं को संगठित करना, राजनीतिक साहित्य का प्रसार, हथियार जुटाना और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्रवाई की योजना बनाना शामिल था।

  • मित्र मेला: विनायक दामोदर सावरकर और उनके सहयोगियों से जुड़ा संगठन, जो आगे चलकर अभिनव भारत के विकास से संबंधित हुआ।
  • अनुशीलन समिति: बंगाल में विकसित क्रांतिकारी संगठनात्मक परंपरा से संबंधित। इसकी विभिन्न शाखाएँ और संबद्ध समूह सक्रिय थे।
  • युगांतर: बंगाल का क्रांतिकारी समूह, जो क्रांतिकारी साहित्य और सशस्त्र प्रतिरोध से जुड़ा था।
  • अभिनव भारत: 1904 में मित्र मेला से विकसित संगठन, जिसका संबंध विनायक दामोदर सावरकर और गणेश सावरकर से था।

ध्यान दें: अनुशीलन समिति और युगांतर को पूरी तरह एक ही संगठन नहीं समझना चाहिए। बंगाल में कई संबंधित लेकिन अलग-अलग संगठन, शाखाएँ और क्रांतिकारी नेटवर्क सक्रिय थे।

बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन

बंगाल विभाजन के बाद बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बन गया। यहाँ राजनीतिक सभाओं, स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रवादी साहित्य के साथ-साथ गुप्त क्रांतिकारी संगठनों का भी विकास हुआ।

  • अरविंद घोष: प्रारंभिक उग्र राष्ट्रवादी राजनीति और बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े प्रमुख विचारक।
  • बारिंद्र कुमार घोष: बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों और अनुशीलन से संबंधित नेटवर्क में सक्रिय।
  • जतिंद्रनाथ मुखर्जी: बाघा जतिन के नाम से प्रसिद्ध; बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रमुख व्यक्तित्व।
  • खुदीराम बोस: मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद गिरफ्तार हुए और 1908 में फाँसी दी गई।
  • प्रफुल्ल चाकी: मुजफ्फरपुर की घटना में खुदीराम बोस के सहयोगी।
  • रासबिहारी बोस: 1912 के दिल्ली षड्यंत्र और 1915 के प्रस्तावित सैनिक विद्रोह से जुड़े; बाद में जापान में भारतीय स्वतंत्रता के प्रयासों में सक्रिय रहे।

मुजफ्फरपुर बम कांड — 1908

30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने का प्रयास किया। किंग्सफोर्ड इससे पहले कलकत्ता में क्रांतिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के लिए चर्चित था।

जिस गाड़ी पर बम फेंका गया, उसमें किंग्सफोर्ड नहीं था। इस घटना में दो ब्रिटिश महिलाओं, प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी, की मृत्यु हुई। इसलिए इसे केवल लक्ष्य चूकने की घटना कहना पर्याप्त नहीं है; इसमें निर्दोष नागरिकों की जान भी गई थी।

प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं को गोली मार ली। खुदीराम बोस गिरफ्तार हुए और मुकदमे के बाद 11 अगस्त 1908 को फाँसी दी गई।

अलीपुर षड्यंत्र केस — 1908

मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के क्रांतिकारी नेटवर्क के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई की। इसके परिणामस्वरूप अलीपुर बम केस या अलीपुर षड्यंत्र केस चला।

  • बारिंद्र कुमार घोष प्रमुख आरोपियों में शामिल थे।
  • अरविंद घोष पर भी मुकदमा चला, लेकिन उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया।
  • मुकदमे ने बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों को व्यापक सार्वजनिक ध्यान दिलाया।
  • बाद के वर्षों में अरविंद घोष सक्रिय राजनीतिक जीवन से अलग होकर पांडिचेरी में आध्यात्मिक और दार्शनिक कार्यों में संलग्न हुए।

विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

ब्रिटिश निगरानी और दमन के कारण कई भारतीय राष्ट्रवादी विदेशों में सक्रिय हुए। उन्होंने प्रवासी भारतीयों को संगठित किया, स्वतंत्रता के पक्ष में प्रचार किया और अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।

  • श्यामजी कृष्ण वर्मा: लंदन में भारतीय राष्ट्रवादियों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इंडिया हाउस: लंदन में भारतीय विद्यार्थियों और राष्ट्रवादियों का केंद्र; यह क्रांतिकारी विचारों के प्रसार से जुड़ा था।
  • मैडम भीकाजी कामा: यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में प्रचार किया और 1907 में स्टुटगार्ट में भारतीय ध्वज के एक प्रारंभिक रूप को प्रदर्शित किया।
  • लाला हरदयाल: उत्तर अमेरिका में गदर आंदोलन के संगठन और प्रचार से जुड़े प्रमुख नेता।
  • रासबिहारी बोस: बाद में जापान में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय संगठन में सक्रिय रहे।

गदर आंदोलन — 1913

गदर आंदोलन का विकास मुख्यतः उत्तर अमेरिका में बसे भारतीय प्रवासियों के बीच हुआ। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से समाप्त करना था।

  • गदर पार्टी: 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में स्थापित हुई।
  • लाला हरदयाल: आंदोलन के प्रमुख वैचारिक और संगठनात्मक नेताओं में शामिल।
  • सोहन सिंह भकना: गदर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष।
  • गदर समाचार पत्र: आंदोलन के विचारों और ब्रिटिश-विरोधी संदेश के प्रसार का महत्त्वपूर्ण माध्यम।
  • मुख्य आधार: प्रवासी भारतीय, विशेषकर पंजाब से आए श्रमिक और अन्य समुदाय।

प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर गदर कार्यकर्ताओं ने भारत लौटकर सैनिकों और जनता को विद्रोह के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया। लेकिन ब्रिटिश खुफिया तंत्र, गिरफ्तारियों और संगठनात्मक कठिनाइयों के कारण व्यापक विद्रोह सफल नहीं हो सका।

प्रथम विश्व युद्ध और क्रांतिकारी प्रयास

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद कुछ क्रांतिकारियों ने ब्रिटेन की युद्धकालीन कठिनाइयों का लाभ उठाने की योजना बनाई। गदर आंदोलन के कार्यकर्ता भारत लौटे और सेना में विद्रोह कराने का प्रयास किया।

  • रासबिहारी बोस और सचिंद्रनाथ सान्याल 1915 के प्रस्तावित सैनिक विद्रोह से जुड़े थे।
  • विद्रोह की योजना फरवरी 1915 में बनाई गई थी, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों को इसकी जानकारी मिल गई।
  • गिरफ्तारियों और सैन्य निगरानी के कारण योजना विफल हो गई।
  • रासबिहारी बोस बाद में जापान पहुँचे और वहाँ से भारतीय स्वतंत्रता के लिए सक्रिय रहे।

विश्लेषण: इस प्रयास से स्पष्ट होता है कि क्रांतिकारियों का एक वर्ग केवल व्यक्तिगत कार्रवाइयों तक सीमित नहीं था, बल्कि सेना, प्रवासी समुदायों और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को जोड़कर व्यापक विद्रोह की योजना भी बना रहा था।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन — HRA

1924 में उत्तर भारत के क्रांतिकारियों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का गठन किया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त कर भारत में एक स्वतंत्र गणराज्य की स्थापना करना था।

  • राम प्रसाद बिस्मिल
  • सचिंद्रनाथ सान्याल
  • जोगेश चंद्र चटर्जी
  • अशफाक उल्ला खाँ

HRA ने क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने और संगठन को मजबूत करने का प्रयास किया। इसके विचारों और कार्यक्रम को समझने के लिए 1925 का क्रांतिकारी घोषणापत्र ‘द रिवोल्यूशनरी’ भी महत्त्वपूर्ण है, जिसे संगठन की वैचारिक दिशा से जोड़ा जाता है।

काकोरी कांड — 1925

9 अगस्त 1925 को HRA से जुड़े क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी में चलती ट्रेन से सरकारी खजाना लूट लिया। इस कार्रवाई का उद्देश्य संगठन के लिए धन जुटाना था।

  • राम प्रसाद बिस्मिल
  • अशफाक उल्ला खाँ
  • राजेंद्रनाथ लाहिड़ी
  • रोशन सिंह
  • चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतिकारी भी इस प्रकरण से जुड़े थे; वे गिरफ्तार नहीं हुए।

मुकदमे के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मृत्युदंड दिया गया। राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 और अन्य तीन को 19 दिसंबर 1927 को फाँसी दी गई।

महत्त्व: काकोरी कांड ने क्रांतिकारी संगठन को बड़ा झटका दिया, लेकिन इसके अभियुक्तों के साहस और बलिदान ने युवाओं के बीच क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की लोकप्रियता बढ़ाई।

HSRA और भगत सिंह

1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में क्रांतिकारियों की बैठक के बाद HRA को समाजवादी दिशा देने के उद्देश्य से हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) नाम अपनाया गया। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उनके साथियों की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

  • भगत सिंह
  • चंद्रशेखर आजाद
  • सुखदेव
  • शिवराम राजगुरु
  • भगवती चरण वोहरा
  • यशपाल सहित अन्य क्रांतिकारी

HSRA की विचारधारा में साम्राज्यवाद-विरोध के साथ समाजवादी परिवर्तन का लक्ष्य अधिक स्पष्ट हुआ। भगत सिंह और उनके साथियों ने स्वतंत्रता को केवल ब्रिटिश शासन के अंत तक सीमित न रखकर शोषण-मुक्त समाज की स्थापना से भी जोड़ा।

सॉन्डर्स की हत्या — 1928

30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। कुछ सप्ताह बाद 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। क्रांतिकारियों ने इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई।

पहचान की गलती के कारण 17 दिसंबर 1928 को सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स की हत्या हो गई। इस कार्रवाई में भगत सिंह और राजगुरु शामिल थे; चंद्रशेखर आजाद ने भी योजना और घटनाक्रम में भूमिका निभाई।

ऐतिहासिक सावधानी: लाला लाजपत राय की मृत्यु और सॉन्डर्स की हत्या के बीच संबंध को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि क्रांतिकारियों ने स्कॉट को निशाना बनाना चाहा था, लेकिन सॉन्डर्स की हत्या हुई।

केंद्रीय विधान सभा बम कांड — 1929

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके। इस कार्रवाई का उद्देश्य औपनिवेशिक सरकार के दमनकारी विधायी कदमों के विरुद्ध विरोध दर्ज कराना और अपने राजनीतिक विचारों को व्यापक स्तर पर पहुँचाना था।

दोनों ने घटनास्थल से भागने के बजाय गिरफ्तारी दी। उन्होंने अदालत और जेल को अपने विचारों के प्रचार के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। उनके नारों और वक्तव्यों ने औपनिवेशिक शासन, साम्राज्यवाद और क्रांतिकारी राजनीति पर सार्वजनिक बहस को प्रभावित किया।

इस घटना को सॉन्डर्स की हत्या से अलग समझना चाहिए। विधान सभा बम कांड में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का उद्देश्य राजनीतिक संदेश देना था, जबकि सॉन्डर्स की हत्या एक अलग कार्रवाई थी।

भगत सिंह के विचार और योगदान

  • साम्राज्यवाद-विरोध: भगत सिंह ने ब्रिटिश शासन को राजनीतिक और आर्थिक शोषण की व्यवस्था के रूप में देखा।
  • समाजवाद: वे ऐसी सामाजिक व्यवस्था के समर्थक थे जिसमें आर्थिक शोषण और वर्गीय असमानता समाप्त हो।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: अपने लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ में उन्होंने तर्क, आत्मचिंतन और आलोचनात्मक दृष्टि पर बल दिया।
  • धर्म और राजनीति पर विचार: वे सांप्रदायिक विभाजन के विरोधी थे और स्वतंत्रता आंदोलन में धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक चेतना के समर्थक थे।
  • जन-संगठन: नौजवान भारत सभा जैसी गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को संगठित करने का प्रयास किया गया।
  • राजनीतिक मुकदमों का उपयोग: उन्होंने अदालत और जेल के माध्यम से औपनिवेशिक शासन तथा अपने राजनीतिक विचारों पर ध्यान आकर्षित किया।

भगत सिंह का योगदान केवल सॉन्डर्स की हत्या या विधान सभा बम कांड तक सीमित नहीं था। उनके लेखन और राजनीतिक विचारों ने क्रांतिकारी आंदोलन को वैचारिक गहराई प्रदान की।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव — 1931

भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र केस में मृत्युदंड दिया गया। उन्हें 23 मार्च 1931 को फाँसी दी गई।

उनकी फाँसी ने देश के अनेक हिस्सों में तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की। युवाओं के बीच इन तीनों की लोकप्रियता बढ़ी और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनभावना को बल मिला।

भारत में 23 मार्च को सामान्यतः शहीद दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में अलग-अलग अवसरों पर शहीद दिवस मनाया जाता है; 23 मार्च विशेष रूप से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत से जुड़ा है।

चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद HRA और बाद में HSRA के प्रमुख नेताओं में थे। काकोरी कांड के बाद संगठन के पुनर्गठन और क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से मुठभेड़ के दौरान उनकी मृत्यु हुई। बाद में इस पार्क का नाम चंद्रशेखर आजाद पार्क रखा गया।

आजाद को केवल एक साहसी क्रांतिकारी के रूप में ही नहीं, बल्कि संगठन के पुनर्गठन और साथियों को जोड़ने वाले नेता के रूप में भी समझना चाहिए।

सुभाष चंद्र बोस — परिचय

सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं में से एक थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए संगठित राजनीतिक संघर्ष के साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और आवश्यकतानुसार सैन्य शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।

  • जन्म: 23 जनवरी 1897, कटक, ओडिशा।
  • शिक्षा: कलकत्ता में उच्च शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए।
  • ICS: भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा में सफल हुए, लेकिन औपनिवेशिक शासन के अधीन सेवा जारी नहीं रखी।
  • त्यागपत्र: 1921 में भारतीय सिविल सेवा से त्यागपत्र देकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए।
  • राजनीतिक मार्गदर्शन: चित्तरंजन दास से उन्हें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रेरणा मिली।

बोस का राष्ट्रवाद पूर्ण स्वतंत्रता, राजनीतिक अनुशासन और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष पर आधारित था। उनकी रणनीति कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर विकसित हुई।

सुभाष चंद्र बोस और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के भीतर उभरते हुए प्रमुख नेताओं में थे। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक सक्रिय और समयबद्ध संघर्ष के समर्थक थे। आर्थिक नियोजन और औद्योगिक विकास को भी वे स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण मानते थे।

  • 1938: हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
  • 1938: राष्ट्रीय योजना समिति के गठन की पहल उनके अध्यक्षीय कार्यकाल से जुड़ी थी; इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बने।
  • 1939: त्रिपुरी अधिवेशन में दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
  • 1939: कांग्रेस नेतृत्व के साथ रणनीतिक मतभेदों के कारण अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
  • 1939: फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।

बोस और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेदों को केवल व्यक्तिगत विवाद के रूप में नहीं देखना चाहिए। इनके पीछे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष की गति, रणनीति और संगठनात्मक नेतृत्व से जुड़े प्रश्न भी थे।

फॉरवर्ड ब्लॉक — 1939

सुभाष चंद्र बोस ने 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इसका उद्देश्य कांग्रेस के भीतर और बाहर अधिक सक्रिय राष्ट्रवादी तथा वामपंथी प्रवृत्तियों को संगठित करना और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष को तेज करना था।

द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ के बाद बोस ने युद्ध को ब्रिटिश शासन की कमजोरियों का लाभ उठाने का अवसर माना। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नजरबंद किया, लेकिन वे 1941 में गुप्त रूप से भारत से निकलने में सफल हुए।

सुभाष चंद्र बोस का विदेश प्रस्थान

जनवरी 1941 में बोस ब्रिटिश निगरानी से बचकर भारत से निकले। वे अफगानिस्तान के रास्ते सोवियत संघ और फिर जर्मनी पहुँचे। उनका उद्देश्य ब्रिटेन के विरोधी देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए सहायता प्राप्त करना था।

जर्मनी में उन्होंने फ्री इंडिया सेंटर (Free India Centre) और आजाद हिंद रेडियो (Azad Hind Radio) के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता का प्रचार किया। जर्मनी में भारतीय युद्धबंदियों को संगठित कर एक सैन्य इकाई बनाने का प्रयास भी हुआ।

यूरोप में बोस के प्रयासों की सीमाएँ थीं, इसलिए उन्होंने बाद में दक्षिण-पूर्व एशिया जाने का निर्णय लिया, जहाँ जापानी सेना के हाथों बंदी बने भारतीय सैनिकों और प्रवासी भारतीयों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन के लिए बड़ा आधार उपलब्ध था।

आजाद हिंद फौज — INA का प्रारंभिक गठन

आजाद हिंद फौज या इंडियन नेशनल आर्मी (INA) का प्रारंभिक गठन 1942 में दक्षिण-पूर्व एशिया में हुआ। इसमें जापान के हाथों युद्धबंदी बने भारतीय सैनिकों को संगठित किया गया।

  • कैप्टन मोहन सिंह: INA के प्रारंभिक गठन और संगठन में प्रमुख भूमिका।
  • रासबिहारी बोस: दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान।
  • इंडियन इंडिपेंडेंस लीग: दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदायों को स्वतंत्रता के उद्देश्य से जोड़ने वाला संगठनात्मक मंच।

प्रारंभिक INA को नेतृत्व, जापानी सैन्य अधिकारियों के साथ संबंधों और संगठनात्मक मतभेदों जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसलिए इसके इतिहास को सीधे 1943 में बोस के नेतृत्व से शुरू नहीं मानना चाहिए।

सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज

सुभाष चंद्र बोस 1943 में दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचे और INA का नेतृत्व संभाला। उनके नेतृत्व में सेना का पुनर्गठन किया गया, सैनिकों और प्रवासी भारतीयों को स्वतंत्रता के उद्देश्य से संगठित करने का प्रयास हुआ तथा आजाद हिंद सरकार की स्थापना की गई।

  • प्रसिद्ध नारा: “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।”
  • प्रमुख अभिवादन: “जय हिंद”।
  • लोकप्रिय संबोधन: “नेताजी”।
  • राजनीतिक सरकार: आजाद हिंद की अस्थायी सरकार।
  • सरकार की घोषणा: 21 अक्टूबर 1943।
  • प्रमुख केंद्र: सिंगापुर।

INA का उद्देश्य भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करना था। बोस ने सैन्य संगठन के साथ प्रचार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और प्रवासी भारतीयों से आर्थिक तथा सामाजिक सहयोग जुटाने पर भी ध्यान दिया।

आजाद हिंद सरकार और अंडमान-निकोबार

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की घोषणा की। इस सरकार को जापान सहित कुछ धुरी शक्तियों से मान्यता मिली। इसे स्वतंत्र भारत की संप्रभु सरकार के दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया।

जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीपों का नाममात्र प्रशासन आजाद हिंद सरकार को सौंपा, लेकिन वास्तविक सैन्य नियंत्रण जापानी अधिकारियों के हाथों में ही रहा।

  • अंडमान का नाम शहीद रखा गया।
  • निकोबार का नाम स्वराज रखा गया।

महत्त्वपूर्ण अंतर: नाम बदलना और प्रशासन सौंपने की औपचारिक घोषणा, इन द्वीपों पर पूर्ण वास्तविक नियंत्रण के समान नहीं थी।

INA का सैन्य अभियान — इम्फाल और कोहिमा

1944 में INA ने जापानी सेना के साथ मिलकर भारत की पूर्वोत्तर सीमा की ओर सैन्य अभियान चलाया। इसका प्रमुख लक्ष्य ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्रों में प्रवेश करना और भारतीय सैनिकों तथा जनता को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रेरित करना था।

  • इम्फाल अभियान: मणिपुर में ब्रिटिश और मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के विरुद्ध जापानी-INA अभियान का महत्त्वपूर्ण भाग।
  • कोहिमा: नागालैंड के क्षेत्र में निर्णायक संघर्ष हुआ, जिसमें जापानी सेना और उसके सहयोगियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
  • मोइरांग: मणिपुर के मोइरांग में अप्रैल 1944 में INA का ध्वज फहराया गया।

आपूर्ति की कमी, कठिन भूगोल, मानसून, बीमारियों और मित्र राष्ट्रों की सैन्य प्रतिक्रिया के कारण अभियान विफल हुआ। जापान की पराजय के बाद INA की सैन्य स्थिति भी कमजोर हो गई।

रानी झाँसी रेजिमेंट

सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में INA के अंतर्गत रानी झाँसी रेजिमेंट का गठन किया गया। यह महिलाओं की एक सैन्य इकाई थी, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन, जिन्हें बाद में लक्ष्मी सहगल के नाम से जाना गया, ने संभाली।

इस रेजिमेंट का महत्त्व केवल सैन्य संगठन तक सीमित नहीं था। इसने स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी, नेतृत्व और सैन्य प्रशिक्षण की संभावनाओं को सार्वजनिक रूप से सामने रखा। हालांकि, इसे INA की सभी महिलाओं की भूमिका का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं मानना चाहिए।

INA Trials — लाल किला मुकदमे

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने INA के अधिकारियों पर मुकदमे चलाए। पहला प्रमुख मुकदमा 1945 में दिल्ली के लाल किले में शुरू हुआ। अभियुक्तों पर ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी रहते हुए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध करने जैसे आरोप लगाए गए।

  • शाहनवाज खान
  • प्रेम कुमार सहगल
  • गुरबख्श सिंह ढिल्लों

इन मुकदमों ने देशव्यापी राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा की। अनेक राजनीतिक समूहों और आम लोगों ने अभियुक्तों के समर्थन में आवाज उठाई। कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक धाराओं के नेताओं ने भी उनके पक्ष में जनमत तैयार करने में भूमिका निभाई।

ऐतिहासिक महत्त्व: INA मुकदमों ने ब्रिटिश शासन की वैधता पर प्रश्न उठाए और भारतीय सशस्त्र बलों की निष्ठा तथा औपनिवेशिक शासन को बनाए रखने की क्षमता से संबंधित चिंताओं को बढ़ाया। फिर भी भारत की स्वतंत्रता को किसी एक घटना का परिणाम मानना उचित नहीं; जन-आंदोलन, युद्धोत्तर परिस्थितियाँ, आर्थिक दबाव और अन्य राजनीतिक घटनाएँ भी महत्त्वपूर्ण थीं।

प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ — कालक्रम सारणी

प्रीलिम्स में संगठन, घटना और वर्ष को सही क्रम में पहचानना महत्त्वपूर्ण है। नीचे दी गई सारणी प्रमुख पड़ावों का संक्षिप्त पुनरावलोकन प्रस्तुत करती है।

वर्ष घटना / संगठन महत्त्व
1904 अभिनव भारत से संबंधित संगठनात्मक विकास सावरकर बंधुओं से जुड़ी क्रांतिकारी गतिविधियाँ
1905 बंगाल विभाजन स्वदेशी आंदोलन और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को गति
1908 मुजफ्फरपुर बम कांड और अलीपुर केस बंगाल के क्रांतिकारी नेटवर्क पर सरकारी कार्रवाई
1913 गदर पार्टी प्रवासी भारतीयों के बीच ब्रिटिश-विरोधी संगठन
1915 प्रस्तावित सैनिक विद्रोह गदर आंदोलन और क्रांतिकारियों का विद्रोह प्रयास
1924 HRA उत्तर भारत में क्रांतिकारी संगठन का गठन
1925 काकोरी कांड सरकारी खजाने को लूटकर संगठन के लिए धन जुटाने का प्रयास
1928 HSRA का गठन / सॉन्डर्स की हत्या समाजवादी दिशा और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध कार्रवाई
1929 केंद्रीय विधान सभा बम कांड राजनीतिक विचारों के प्रचार के लिए अदालत में गिरफ्तारी और मुकदमा
1931 भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी क्रांतिकारी राष्ट्रवाद पर व्यापक जनप्रतिक्रिया
1938 हरिपुरा कांग्रेस सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष बने
1939 त्रिपुरी अधिवेशन और फॉरवर्ड ब्लॉक कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद और अलग संगठनात्मक पहल
1942 INA का प्रारंभिक गठन दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय युद्धबंदियों का संगठन
1943 आजाद हिंद सरकार 21 अक्टूबर को अस्थायी सरकार की घोषणा
1944 इम्फाल-कोहिमा अभियान और मोइरांग भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर INA-जापानी सैन्य अभियान
1945 INA के प्रमुख मुकदमे लाल किले में मुकदमों से व्यापक राजनीतिक प्रतिक्रिया

क्रांतिकारी आंदोलन और गांधीवादी आंदोलन — अंतर

आधार क्रांतिकारी धारा गांधीवादी धारा
मुख्य रणनीति गुप्त संगठन, सशस्त्र कार्रवाई और कुछ मामलों में सैनिक विद्रोह सत्याग्रह, अहिंसा और व्यापक जन-आंदोलन
संगठन का स्वरूप अनेक संगठनों में गोपनीयता और सीमित सदस्यता जनसहभागिता पर आधारित व्यापक संगठन और अभियान
प्रमुख साधन क्रांतिकारी प्रचार, सशस्त्र कार्रवाई और औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती असहयोग, बहिष्कार, सविनय अवज्ञा और शांतिपूर्ण प्रतिरोध
सामाजिक आधार कई क्षेत्रों में विद्यार्थी, युवा, प्रवासी भारतीय और कुछ सैनिक नेटवर्क विभिन्न क्षेत्रों में किसान, श्रमिक, महिलाएँ, विद्यार्थी और अन्य सामाजिक समूह
सीमाएँ दमन, संसाधनों की कमी और व्यापक जनाधार बनाने की कठिनाई औपनिवेशिक दमन, आंदोलन की गति और रणनीति को लेकर मतभेद

दोनों धाराओं की रणनीति और साधन अलग थे। क्रांतिकारी आंदोलन ने औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी और अनेक युवाओं को प्रेरित किया, जबकि गांधीवादी आंदोलन ने बड़े पैमाने पर जनसहभागिता और अहिंसक प्रतिरोध को संगठित किया। भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में दोनों का अध्ययन उनके अपने संदर्भ में करना चाहिए।

क्रांतिकारी आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व और सीमाएँ

प्रमुख योगदान:

  • युवाओं में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना को बल दिया।
  • विदेशों में बसे भारतीयों को स्वतंत्रता के उद्देश्य से संगठित करने में योगदान दिया।
  • भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में समाजवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांप्रदायिकता-विरोध के प्रश्नों को अधिक स्पष्टता से उठाया।
  • INA और उसके मुकदमों ने ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सदस्यों की निष्ठा तथा औपनिवेशिक शासन की स्थिरता से जुड़े प्रश्नों को प्रमुख बनाया।
  • क्रांतिकारियों के लेखन, मुकदमों और बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित किया।

सीमाएँ और आलोचनात्मक पक्ष:

  • गुप्त संगठनों के लिए व्यापक जनाधार बनाना और लंबे समय तक संगठन चलाना कठिन था।
  • ब्रिटिश खुफिया तंत्र, गिरफ्तारियों और कठोर दंड ने कई संगठनों को कमजोर किया।
  • कुछ सशस्त्र कार्रवाइयों में निर्दोष लोगों की मृत्यु हुई, इसलिए उनके तरीकों का ऐतिहासिक मूल्यांकन आलोचनात्मक दृष्टि से भी होना चाहिए।
  • सैन्य संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर निर्भर प्रयासों को कई व्यावहारिक सीमाओं का सामना करना पड़ा।

UPSC के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • मित्र मेला से अभिनव भारत के विकास का संबंध था।
  • अनुशीलन समिति और युगांतर बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे।
  • मुजफ्फरपुर बम कांड — 1908; खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी इससे जुड़े थे।
  • गदर पार्टी की स्थापना — 1913, सैन फ्रांसिस्को।
  • HRA — 1924; काकोरी कांड — 9 अगस्त 1925।
  • HSRA ने 1928 में समाजवादी दिशा को अधिक स्पष्ट रूप से अपनाया।
  • सॉन्डर्स की हत्या — 17 दिसंबर 1928।
  • केंद्रीय विधान सभा बम कांड — 8 अप्रैल 1929।
  • भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को — 23 मार्च 1931 को फाँसी दी गई।
  • सुभाष चंद्र बोस — हरिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष, 1938; त्रिपुरी कांग्रेस अध्यक्ष, 1939।
  • फॉरवर्ड ब्लॉक — 1939।
  • INA का प्रारंभिक गठन — 1942; सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में नेतृत्व संभाला।
  • आजाद हिंद सरकार की घोषणा — 21 अक्टूबर 1943।
  • मोइरांग में INA का ध्वज — अप्रैल 1944।
  • INA के प्रमुख मुकदमे — 1945 में लाल किले, दिल्ली में।

परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियाँ

  • HRA और HSRA: दोनों के नाम और वर्ष को एक न समझें। HRA का गठन 1924 में हुआ; 1928 में HSRA नाम अपनाया गया।
  • काकोरी कांड: यह 1925 की घटना है, 1924 की नहीं।
  • सॉन्डर्स और स्कॉट: क्रांतिकारी स्कॉट को निशाना बनाना चाहते थे, लेकिन जॉन सॉन्डर्स की हत्या हुई।
  • INA का गठन: INA का प्रारंभिक गठन 1942 में हुआ; सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में इसका नेतृत्व संभाला।
  • आजाद हिंद सरकार: इसकी घोषणा 21 अक्टूबर 1943 को हुई।
  • INA और स्वतंत्रता: INA मुकदमों का प्रभाव महत्त्वपूर्ण था, लेकिन स्वतंत्रता को केवल INA या किसी एक घटना का परिणाम मानना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।
  • क्रांतिकारी और गांधीवादी धाराएँ: इनके साधन अलग थे, लेकिन दोनों का अध्ययन व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की एक महत्त्वपूर्ण धारा थी। इसने औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी, युवाओं को प्रेरित किया और कुछ चरणों में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तथा सैनिक विद्रोह की संभावनाओं का उपयोग करने का प्रयास किया। भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांतिकारी राजनीति को समाजवादी और वैचारिक दिशा दी, जबकि सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, आजाद हिंद सरकार और INA के माध्यम से एक अलग सैन्य-राजनीतिक रणनीति अपनाई।

UPSC के दृष्टिकोण से इस विषय का संतुलित मूल्यांकन करते समय घटनाओं और संगठनों के कालक्रम के साथ उनके उद्देश्यों, सामाजिक आधार, रणनीतियों, सीमाओं और व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन पर पड़े प्रभाव को भी समझना आवश्यक है।