1. विजयनगर साम्राज्य का परिचय
विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagara Empire) की स्थापना 14वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में हुई। यह मध्यकालीन दक्षिण भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में से एक था। इसने दक्कन की सल्तनतों, दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय शक्तियों और समुद्री व्यापार से जुड़ी राजनीतिक परिस्थितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसकी राजधानी विजयनगर वर्तमान कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के निकट स्थित थी। आज इसके प्रमुख पुरातात्त्विक अवशेष हम्पी में मिलते हैं। हम्पी अपने मंदिरों, राजकीय परिसरों, बाजारों, जल-संरचनाओं और विशिष्ट स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है।
- स्थापना: परंपरागत रूप से लगभग 1336 ई.
- संस्थापक: हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम।
- प्रारंभिक राजवंश: संगम वंश।
- राजधानी: विजयनगर; वर्तमान में हम्पी के पुरातात्त्विक क्षेत्र से संबंधित।
- प्रमुख नदी: तुंगभद्रा।
- प्रमुख शासक: देवराय द्वितीय और कृष्णदेवराय।
- महत्त्वपूर्ण घटना: 1565 ई. का तालीकोटा का युद्ध।
विजयनगर का इतिहास केवल युद्धों तक सीमित नहीं था। कृषि, सिंचाई, व्यापार, मंदिर-संस्कृति, साहित्य और शहरी जीवन इसके अध्ययन के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं।
2. स्थापना की पृष्ठभूमि
14वीं शताब्दी में दक्षिण भारत की राजनीतिक व्यवस्था में बड़े परिवर्तन हो रहे थे। दिल्ली सल्तनत के दक्षिणी अभियानों, क्षेत्रीय राज्यों के संघर्षों और स्थानीय राजनीतिक शक्तियों के पुनर्गठन के बीच विजयनगर एक नई शक्ति के रूप में उभरा।
हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम को परंपरागत रूप से विजयनगर साम्राज्य की स्थापना से जोड़ा जाता है। इनके उदय और धार्मिक-राजनीतिक मार्गदर्शन के संबंध में विभिन्न ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं। इसलिए स्थापना की पृष्ठभूमि को किसी एक घटना या एक व्यक्ति के निर्णय से पूरी तरह समझना उचित नहीं है।
विजयनगर की भौगोलिक स्थिति भी महत्त्वपूर्ण थी। तुंगभद्रा क्षेत्र की पहाड़ियाँ और चट्टानी भू-आकृति सुरक्षा के लिए उपयोगी थीं, जबकि आसपास के कृषि क्षेत्रों और जल-संसाधनों ने राजधानी के विकास में योगदान दिया।
3. विजयनगर के चार प्रमुख राजवंश
विजयनगर साम्राज्य पर चार प्रमुख राजवंशों ने शासन किया। राजवंशों के बीच सत्ता परिवर्तन के बावजूद विजयनगर की राजनीतिक परंपरा कुछ समय तक जारी रही।
| राजवंश | सामान्यतः स्वीकृत काल | प्रमुख शासक | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| संगम वंश | लगभग 1336–1485 ई. | हरिहर प्रथम, बुक्का प्रथम, देवराय द्वितीय | साम्राज्य की स्थापना और प्रारंभिक विस्तार। |
| सालुव वंश | लगभग 1485–1505 ई. | सालुव नरसिंह | संगम वंश के बाद सत्ता परिवर्तन। |
| तुलुव वंश | लगभग 1505–1570 ई. | वीर नरसिंह, कृष्णदेवराय, अच्युतदेवराय | कृष्णदेवराय के समय साम्राज्य का उत्कर्ष। |
| अरविदु वंश | 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 17वीं शताब्दी तक | तिरुमल, वेंकट द्वितीय आदि | तालीकोटा के बाद भी विजयनगर की राजनीतिक परंपरा जारी रही। |
परीक्षा के लिए: राजवंशों के काल सामान्य ऐतिहासिक विभाजन हैं। सत्ता परिवर्तन के वर्षों और शासकों के शासनकाल में स्रोतों के अनुसार कुछ अंतर मिल सकता है।
4. हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम
हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक माने जाते हैं। वे संगम वंश से संबंधित थे। इनके शासन में तुंगभद्रा क्षेत्र में राज्य की आधारशिला मजबूत हुई और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक विस्तार हुआ।
- विजयनगर राज्य की प्रारंभिक राजनीतिक नींव रखी।
- तुंगभद्रा क्षेत्र को सत्ता के महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया।
- दक्षिण भारत की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी शक्ति का विस्तार किया।
- प्रशासन और सैन्य संगठन के विकास में योगदान दिया।
विजयनगर की स्थापना को केवल किसी एक धार्मिक उद्देश्य का परिणाम मानना उचित नहीं है। क्षेत्रीय राजनीति, सैन्य प्रतिस्पर्धा, आर्थिक संसाधनों और सत्ता-संगठन ने भी इसकी उन्नति में भूमिका निभाई।
5. देवराय द्वितीय
देवराय द्वितीय संगम वंश के प्रमुख शासकों में से एक था। उसके शासनकाल में विजयनगर की सैन्य और राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ी। विदेशी यात्री अब्दुर रज्जाक भी उसके समय विजयनगर आया था।
- सैन्य संगठन और घुड़सवार सेना पर ध्यान दिया।
- दक्कन की समकालीन शक्तियों के साथ संघर्ष और प्रतिस्पर्धा जारी रही।
- साहित्य और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को संरक्षण मिला।
- अब्दुर रज्जाक के विवरण से उस समय की राजधानी और उसकी समृद्धि के बारे में जानकारी मिलती है।
विजयनगर और बहमनी सल्तनत के बीच संघर्ष कई दशकों तक चलता रहा। इसका कारण केवल धार्मिक अंतर नहीं था; भूमि, राजस्व, रणनीतिक क्षेत्रों और राजनीतिक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा भी महत्त्वपूर्ण थी।
6. विजयनगर और बहमनी सल्तनत का संघर्ष
विजयनगर साम्राज्य और बहमनी सल्तनत दक्कन की प्रमुख शक्तियाँ थीं। दोनों के बीच कई बार युद्ध हुए। इनमें रायचूर दोआब विशेष महत्त्व रखता था।
- रायचूर दोआब: कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित क्षेत्र।
- आर्थिक महत्त्व: उपजाऊ कृषि भूमि और राजस्व के अवसर।
- रणनीतिक महत्त्व: दक्कन की शक्तियों के बीच प्रभाव और नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा।
- सैन्य महत्त्व: क्षेत्र पर नियंत्रण से दोनों राज्यों की सीमाओं और सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता था।
बहमनी सल्तनत के विघटन के बाद दक्कन में कई सल्तनतें उभरीं। इनके आपसी संबंध स्थायी नहीं थे; परिस्थितियों के अनुसार प्रतिस्पर्धा और गठबंधन दोनों बनते रहे।
7. कृष्णदेवराय — विजयनगर का प्रमुख शासक
कृष्णदेवराय (1509–1529 ई.) तुलुव वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसके शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य ने सैन्य, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।
- तुलुव वंश का प्रमुख शासक।
- दक्कन की सल्तनतों के साथ संघर्ष में सक्रिय भूमिका।
- रायचूर दोआब पर अधिकार के लिए अभियान।
- ओडिशा के गजपति शासकों के विरुद्ध अभियान।
- साहित्य, मंदिरों और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को संरक्षण।
- तेलुगु साहित्य की प्रसिद्ध रचना अमुक्तमाल्यदा से संबंधित।
कृष्णदेवराय की उपलब्धियों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि विजयनगर की शक्ति केवल उसके व्यक्तिगत नेतृत्व पर निर्भर नहीं थी। सैन्य संगठन, राजस्व व्यवस्था, स्थानीय नायक और व्यापारिक संसाधन भी राज्य की शक्ति के आधार थे।
8. कृष्णदेवराय के सैन्य अभियान
कृष्णदेवराय ने साम्राज्य की सीमाओं और राजनीतिक प्रभुत्व को मजबूत करने के लिए विभिन्न दिशाओं में अभियान चलाए।
- रायचूर का अभियान: 1520 ई. में रायचूर के युद्ध में विजयनगर की सेना ने बीजापुर के आदिलशाही शासक इस्माइल आदिल शाह की सेना को पराजित किया।
- गजपति शासकों से संघर्ष: ओडिशा के गजपति राज्य के विरुद्ध अभियानों से पूर्वी क्षेत्रों में विजयनगर की स्थिति मजबूत हुई।
- दक्कन की राजनीति: सैन्य अभियानों का उद्देश्य क्षेत्रीय प्रभाव, रणनीतिक स्थानों और राजस्व-संसाधनों पर नियंत्रण मजबूत करना था।
रायचूर की विजय कृष्णदेवराय की सैन्य उपलब्धियों में विशेष स्थान रखती है। फिर भी विजयनगर और दक्कन की सल्तनतों के संबंधों को केवल निरंतर युद्ध के रूप में नहीं देखना चाहिए; क्षेत्रीय राजनीति में गठबंधन और कूटनीति भी महत्त्वपूर्ण थे।
9. अमुक्तमाल्यदा और तेलुगु साहित्य
कृष्णदेवराय स्वयं साहित्य में रुचि रखने वाला शासक था। उसकी प्रसिद्ध तेलुगु रचना अमुक्तमाल्यदा है। यह साहित्यिक और धार्मिक विषयों के साथ-साथ शासन से संबंधित विचारों के अध्ययन के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।
- अमुक्तमाल्यदा कृष्णदेवराय की प्रसिद्ध तेलुगु रचना है।
- विजयनगर दरबार में तेलुगु साहित्य को विशेष संरक्षण मिला।
- संस्कृत और कन्नड़ साहित्यिक परंपराएँ भी विकसित होती रहीं।
- राजकीय संरक्षण ने साहित्य और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया।
10. अष्टदिग्गज
परंपरागत साहित्यिक विवरणों में कृष्णदेवराय के दरबार से जुड़े आठ तेलुगु कवियों को अष्टदिग्गज कहा जाता है। यह अवधारणा तेलुगु साहित्य के इतिहास में प्रसिद्ध है।
- अल्लसानी पेद्दना
- नंदी तिम्मना
- धूर्जटि
- मादय्यागारि मल्लना
- अय्यलराजु रामभद्रुडु
- पिंगली सूरन्ना
- रामराजभूषणुडु
- तेनाली रामकृष्ण
परीक्षा सावधानी: अष्टदिग्गजों की सूची साहित्यिक परंपरा में प्रसिद्ध है। सभी कवियों के दरबार में एक ही समय और समान भूमिका में होने के दावे को बिना स्रोत-जाँच के निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
11. विजयनगर की राजधानी — हम्पी
विजयनगर की राजधानी वर्तमान कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के निकट विकसित हुई। आज हम्पी के पुरातात्त्विक अवशेष उस विशाल नगरीय परिसर की झलक देते हैं।
- प्राकृतिक पहाड़ियों और चट्टानी भू-आकृति का सुरक्षा में उपयोग।
- राजकीय परिसर, धार्मिक क्षेत्र और बाजारों का विकास।
- मंदिरों के आसपास व्यापारिक गतिविधियाँ।
- तालाबों, नहरों और अन्य जल-संरचनाओं का निर्माण।
- राजधानी में धार्मिक, आर्थिक और प्रशासनिक गतिविधियों का संकेंद्रण।
हम्पी को केवल धार्मिक केंद्र नहीं समझना चाहिए। यह राजकीय शक्ति, व्यापार, शिल्प, जल-प्रबंधन और शहरी जीवन का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
12. विजयनगर की स्थापत्य कला
विजयनगर स्थापत्य में विशाल मंदिर परिसर, मंडप, गोपुरम, पत्थर की नक्काशी और राजकीय भवनों की विशिष्ट विशेषताएँ दिखाई देती हैं। इस स्थापत्य में दक्षिण भारतीय मंदिर परंपराओं के साथ क्षेत्रीय कलात्मक विशेषताएँ भी दिखाई देती हैं।
- विरुपाक्ष मंदिर: शिव को समर्पित; इसकी धार्मिक परंपरा विजयनगर साम्राज्य से पहले की है और विजयनगर काल में इसका विस्तार हुआ।
- विट्ठल मंदिर: अपने विस्तृत मंदिर परिसर, नक्काशीदार मंडप और प्रसिद्ध पत्थर के रथ के लिए जाना जाता है।
- हजारा राम मंदिर: रामायण से जुड़े शिल्प और नक्काशी के लिए प्रसिद्ध।
- कृष्ण मंदिर: कृष्ण से संबंधित धार्मिक परंपरा और विजयनगर स्थापत्य का उदाहरण।
- लोटस महल: हम्पी के राजकीय क्षेत्र में स्थित विशिष्ट स्थापत्य संरचना।
- हाथी अस्तबल: राजकीय परिसर की एक प्रसिद्ध संरचना।
विशेष तथ्य: विट्ठल मंदिर का पत्थर का रथ हम्पी के सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य प्रतीकों में से एक है। मंदिरों के विशाल गोपुरम और मंडप धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक जीवन से भी जुड़े थे।
13. कृषि और सिंचाई
विजयनगर की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि और उससे प्राप्त राजस्व था। राजधानी और अन्य बस्तियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जल-संसाधनों का विकास महत्त्वपूर्ण था।
- तालाबों और जलाशयों का निर्माण।
- नहरों और अन्य सिंचाई सुविधाओं का विकास।
- कृषि योग्य भूमि से राजस्व प्राप्त करना।
- धान, गन्ना और अन्य फसलों की खेती के प्रमाण।
- जल-संरचनाओं से कृषि और नगरीय जीवन को सहायता।
सिंचाई व्यवस्था को केवल राजा की पहल का परिणाम नहीं मानना चाहिए। स्थानीय समुदाय, अधिकारी और क्षेत्रीय शक्तियाँ भी जल-संसाधनों के विकास और रखरखाव में भूमिका निभा सकती थीं।
14. विजयनगर की अर्थव्यवस्था और व्यापार
विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था कृषि, भूमि राजस्व, शिल्प, आंतरिक व्यापार और समुद्री व्यापार पर आधारित थी। साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन और व्यापार की प्रकृति अलग-अलग थी।
- कृषि: राज्य की आय और ग्रामीण जीवन का प्रमुख आधार।
- भूमि राजस्व: शासन के लिए महत्त्वपूर्ण आय-स्रोत।
- शिल्प: वस्त्र, धातु-कर्म और अन्य हस्तशिल्प आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा थे।
- घोड़ों का आयात: घुड़सवार सेना की आवश्यकता के कारण घोड़ों का विदेशी व्यापार महत्त्वपूर्ण था।
- वस्त्र और मसाले: व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े प्रमुख उत्पादों में शामिल थे।
- समुद्री संपर्क: पश्चिमी और पूर्वी तट के बंदरगाहों तथा विदेशी व्यापारियों के साथ संबंध महत्त्वपूर्ण थे।
- मुद्रा: सोने सहित विभिन्न धातुओं के सिक्कों का प्रचलन था।
विजयनगर का व्यापार केवल विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं था। कृषि क्षेत्रों, नगरों, मंदिरों, शिल्प केंद्रों और बाजारों के बीच आंतरिक आर्थिक संबंध भी महत्त्वपूर्ण थे।
15. विदेशी व्यापार और पुर्तगालियों से संपर्क
विजयनगर साम्राज्य का अरब, फारस और अन्य समुद्री व्यापारिक नेटवर्क से संपर्क था। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों की उपस्थिति ने पश्चिमी तट के व्यापारिक संबंधों को नया आयाम दिया।
- विदेशी व्यापार में घोड़ों का आयात सैन्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था।
- मसाले, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ व्यापार का हिस्सा थीं।
- पश्चिमी तट के बंदरगाहों के माध्यम से विदेशी व्यापार होता था।
- विदेशी व्यापारियों के संपर्क से राजनीतिक और आर्थिक संबंध भी प्रभावित होते थे।
पुर्तगालियों से संबंधों को केवल व्यापार तक सीमित नहीं किया जा सकता; समुद्री मार्गों, घोड़ों की आपूर्ति और क्षेत्रीय राजनीति का भी इसमें महत्त्व था।
16. अमरनायक व्यवस्था
अमरनायक व्यवस्था (Amara-Nayaka System) विजयनगर के सैन्य-प्रशासनिक संगठन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। इसमें नायकों को कुछ क्षेत्रों से राजस्व प्राप्त करने और सैन्य बल बनाए रखने की जिम्मेदारी दी जाती थी।
- नायकों को निर्धारित क्षेत्र या राजस्व-संसाधनों से आय प्राप्त होती थी।
- वे सैनिकों को बनाए रखने और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता देने के लिए उत्तरदायी होते थे।
- वे स्थानीय स्तर पर प्रशासन और संसाधनों के प्रबंधन में भूमिका निभाते थे।
- केंद्रीय सत्ता और स्थानीय सैन्य अभिजात वर्ग के बीच संबंध इस व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण पक्ष था।
विश्लेषण: अमरनायक व्यवस्था ने बड़े साम्राज्य के सैन्य संगठन और क्षेत्रीय प्रशासन में सहायता की। हालांकि नायकों की स्थानीय शक्ति बढ़ने से केंद्रीय सत्ता और क्षेत्रीय सरदारों के बीच तनाव भी उत्पन्न हो सकता था।
इस व्यवस्था की तुलना यूरोपीय सामंतवाद से करते समय सावधानी आवश्यक है। दोनों व्यवस्थाओं में कुछ सतही समानताएँ हो सकती हैं, लेकिन उनके अधिकारों, राजस्व संबंधों और ऐतिहासिक परिस्थितियों को पूरी तरह समान नहीं माना जा सकता।
17. प्रशासनिक व्यवस्था
विजयनगर का शासन राजा के नेतृत्व में चलता था। साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय अधिकारी, सैन्य नायक और अन्य प्रशासनिक समूह शासन-संबंधी कार्यों में भूमिका निभाते थे।
- सम्राट: सर्वोच्च राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व।
- प्रांतीय प्रशासन: विभिन्न क्षेत्रों का संचालन अधिकारियों और स्थानीय शक्तियों की सहायता से।
- नायक: सैन्य और राजस्व संबंधी दायित्वों वाले क्षेत्रीय शक्तिशाली व्यक्ति।
- राजस्व: भूमि और अन्य आर्थिक गतिविधियों से प्राप्त आय शासन के लिए महत्त्वपूर्ण थी।
- स्थानीय व्यवस्था: ग्रामीण समुदायों और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती थी।
विजयनगर प्रशासन को पूरी तरह केंद्रीकृत या पूरी तरह विकेंद्रीकृत कहना उचित नहीं है। इसमें राजकीय सत्ता और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच परस्पर निर्भरता के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं।
18. मुद्रा व्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य में सोने, चाँदी और ताँबे सहित विभिन्न धातुओं के सिक्कों का उपयोग होता था। वराह या पगोडा नाम से पहचानी जाने वाली स्वर्ण मुद्रा विशेष रूप से प्रसिद्ध थी।
- सोने के सिक्के उच्च मूल्य के लेन-देन में महत्त्वपूर्ण थे।
- सिक्कों पर विभिन्न देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों के चित्र मिलते हैं।
- मुद्रा व्यवस्था व्यापार, राजस्व और राजनीतिक सत्ता के अध्ययन में उपयोगी स्रोत है।
19. समाज और महिलाओं की स्थिति
विजयनगर समाज में किसान, व्यापारी, शिल्पकार, सैनिक, धार्मिक वर्ग, स्थानीय अभिजात और नायक जैसे विभिन्न समूह मौजूद थे। उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति समान नहीं थी।
- कृषि ग्रामीण जीवन और उत्पादन का महत्त्वपूर्ण आधार थी।
- व्यापारी और शिल्पकार नगरीय अर्थव्यवस्था से जुड़े थे।
- मंदिर धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक जीवन में भी भूमिका निभाते थे।
- विदेशी यात्रियों के विवरणों से महिलाओं की कुछ सामाजिक, सांस्कृतिक और राजकीय भूमिकाओं की जानकारी मिलती है।
- महिलाओं की स्थिति को एक जैसा मानना उचित नहीं; यह वर्ग, पेशे, परिवार और सामाजिक परिस्थिति के अनुसार बदल सकती थी।
यात्रियों के विवरणों को सावधानी से पढ़ना चाहिए। वे प्रायः अपने अनुभवों, सामाजिक दृष्टिकोण और यात्रा के उद्देश्यों से प्रभावित होते थे। इसलिए उनके वर्णनों को अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर समझना अधिक विश्वसनीय है।
20. धार्मिक जीवन
विजयनगर के शासकों ने मंदिरों और विभिन्न हिंदू धार्मिक परंपराओं को संरक्षण दिया। शैव और वैष्णव परंपराओं का विशेष प्रभाव दिखाई देता है।
- मंदिर धार्मिक उपासना के प्रमुख केंद्र थे।
- मंदिरों का संबंध भूमि, दान, उत्सव और आर्थिक गतिविधियों से भी था।
- शासकीय संरक्षण से मंदिर स्थापत्य और धार्मिक साहित्य को बढ़ावा मिला।
- विजयनगर के व्यापक क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक समुदायों के अस्तित्व और संपर्क के प्रमाण मिलते हैं।
विजयनगर की धार्मिक नीति को समझते समय राजनीतिक हितों, क्षेत्रीय परिस्थितियों और अलग-अलग शासकों के व्यवहार को ध्यान में रखना चाहिए।
21. विदेशी यात्री और उनके विवरण
विदेशी यात्रियों के विवरण विजयनगर की राजधानी, बाजार, सेना, सामाजिक जीवन और राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन में उपयोगी स्रोत हैं।
| यात्री | मूल क्षेत्र | संबंधित शासक या समय | ऐतिहासिक उपयोगिता |
|---|---|---|---|
| निकोलो कॉन्टी | इटली | 15वीं शताब्दी का प्रारंभिक चरण | दक्षिण भारत और विजयनगर से संबंधित यात्रा-विवरण। |
| अब्दुर रज्जाक | फारस | देवराय द्वितीय का शासनकाल | राजधानी की विशालता, बाजार और समृद्धि का वर्णन। |
| डोमिंगो पायस | पुर्तगाल | कृष्णदेवराय का शासनकाल | राजधानी, सैन्य शक्ति और राजकीय जीवन का विवरण। |
| फर्नाओ नूनीज | पुर्तगाल | 16वीं शताब्दी का मध्य | विजयनगर के इतिहास और राजनीतिक घटनाओं के बारे में विवरण। |
स्रोत संबंधी सावधानी: यात्रियों के विवरण प्रत्यक्ष अवलोकन, सुनी-सुनाई जानकारी और उनके अपने दृष्टिकोण का मिश्रण हो सकते हैं। अतः किसी एक विवरण को बिना तुलना के पूर्णतः निष्पक्ष और संपूर्ण चित्र नहीं मानना चाहिए।
22. तालीकोटा का युद्ध — 1565 ई.
1565 ई. का तालीकोटा का युद्ध विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इस युद्ध में विजयनगर की सेना का सामना दक्कन की कई सल्तनतों के गठबंधन से हुआ। विजयनगर की पराजय के बाद राजधानी हम्पी को भारी विनाश का सामना करना पड़ा।
- वर्ष: 1565 ई.
- विजयनगर का नेतृत्व: अलीया राम राय विजयनगर की राजनीति और युद्ध में प्रमुख भूमिका में था।
- विरोधी पक्ष: दक्कन की सल्तनतों का गठबंधन।
- परिणाम: विजयनगर की सैन्य-राजनीतिक शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा।
- राजधानी: हम्पी को व्यापक विनाश का सामना करना पड़ा।
तालीकोटा के युद्ध को विजयनगर साम्राज्य के तत्काल पूर्ण अंत के रूप में नहीं देखना चाहिए। युद्ध के बाद भी साम्राज्य की सत्ता अन्य केंद्रों से जारी रही, लेकिन उसकी राजधानी और केंद्रीय राजनीतिक शक्ति पहले जैसी नहीं रही।
23. तालीकोटा के बाद विजयनगर
तालीकोटा के बाद विजयनगर की राजनीतिक सत्ता का केंद्र बदलता गया। अरविदु वंश ने साम्राज्य की राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाया। पेनुकोंडा और चंद्रगिरि जैसे केंद्र बाद के चरणों में महत्त्वपूर्ण रहे।
- हम्पी का राजनीतिक और आर्थिक महत्त्व बहुत कम हो गया।
- राजकीय सत्ता अन्य केंद्रों से संचालित होने लगी।
- क्षेत्रीय नायकों और स्थानीय शक्तियों की स्वायत्तता बढ़ी।
- विजयनगर की सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत दक्षिण भारत में बनी रही।
साम्राज्य के पतन को केवल एक युद्ध से नहीं समझा जा सकता। सैन्य पराजय के साथ सत्ता-संघर्ष, क्षेत्रीय शक्तियों का उभार और केंद्रीय नियंत्रण की कठिनाइयाँ भी महत्त्वपूर्ण थीं।
24. विजयनगर साम्राज्य का ऐतिहासिक महत्त्व
- दक्षिण भारत में एक शक्तिशाली क्षेत्रीय साम्राज्य का विकास।
- कृषि, सिंचाई और राजस्व व्यवस्था का विस्तार।
- हम्पी जैसे विशाल नगरीय केंद्र का विकास।
- मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला और पत्थर की नक्काशी का उत्कर्ष।
- तेलुगु, कन्नड़ और संस्कृत साहित्य को संरक्षण।
- समुद्री व्यापार और विदेशी व्यापारिक नेटवर्क से संपर्क।
- अमरनायक व्यवस्था के माध्यम से सैन्य और क्षेत्रीय प्रशासन का संगठन।
विजयनगर का अध्ययन मध्यकालीन भारत में राज्य-निर्माण, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, सैन्य संगठन, मंदिरों की भूमिका और सांस्कृतिक संरक्षण को समझने का अवसर देता है।
25. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य
- विजयनगर साम्राज्य की स्थापना परंपरागत रूप से 1336 ई. मानी जाती है।
- हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम इसके संस्थापक माने जाते हैं।
- संगम, सालुव, तुलुव और अरविदु इसके चार प्रमुख राजवंश थे।
- कृष्णदेवराय तुलुव वंश का प्रमुख शासक था।
- कृष्णदेवराय की प्रसिद्ध तेलुगु रचना अमुक्तमाल्यदा है।
- अमरनायक व्यवस्था सैन्य और राजस्व संबंधी दायित्वों से जुड़ी थी।
- रायचूर दोआब कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित है।
- अब्दुर रज्जाक देवराय द्वितीय के समय विजयनगर आया था।
- डोमिंगो पायस का विवरण कृष्णदेवराय के शासनकाल से संबंधित है।
- हम्पी में विरुपाक्ष मंदिर और विट्ठल मंदिर प्रसिद्ध हैं।
- तालीकोटा का युद्ध 1565 ई. में हुआ।
- तालीकोटा के बाद भी विजयनगर की राजनीतिक परंपरा जारी रही।
26. मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषण
विजयनगर साम्राज्य की सफलता को केवल सैन्य शक्ति या धार्मिक संरक्षण से नहीं समझा जा सकता। कृषि से प्राप्त राजस्व, जल-संसाधनों का विकास, स्थानीय नायकों की सैन्य भूमिका, व्यापारिक संपर्क और शहरी केंद्रों का विकास इसकी शक्ति के परस्पर जुड़े आधार थे।
दूसरी ओर, क्षेत्रीय सैन्य शक्तियों पर निर्भरता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने केंद्रीय सत्ता के सामने चुनौतियाँ भी पैदा कीं। 1565 ई. का तालीकोटा युद्ध इन चुनौतियों के बीच निर्णायक घटना बना, लेकिन साम्राज्य की राजनीतिक परंपरा तुरंत समाप्त नहीं हुई।
मुख्य परीक्षा में उत्तर लिखते समय स्थापना, राजवंशों, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, स्थापत्य और पतन को अलग-अलग तथ्यों की सूची के रूप में रखने के बजाय उनके बीच संबंध स्पष्ट करें। उदाहरण के लिए, अमरनायक व्यवस्था को सैन्य संगठन, राजस्व और क्षेत्रीय सत्ता के संबंध में समझाना अधिक विश्लेषणात्मक होगा।
27. त्वरित पुनरावृत्ति
- 1336 ई. — विजयनगर साम्राज्य की परंपरागत स्थापना-तिथि।
- हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम — संस्थापक।
- संगम वंश — प्रारंभिक राजवंश।
- देवराय द्वितीय — संगम वंश का प्रमुख शासक।
- कृष्णदेवराय — तुलुव वंश का प्रसिद्ध शासक।
- अमुक्तमाल्यदा — कृष्णदेवराय की तेलुगु रचना।
- अमरनायक व्यवस्था — सैन्य-प्रशासनिक व्यवस्था।
- रायचूर दोआब — कृष्णा और तुंगभद्रा के बीच का रणनीतिक क्षेत्र।
- अब्दुर रज्जाक — देवराय द्वितीय के समय का फारसी यात्री।
- डोमिंगो पायस — कृष्णदेवराय के समय से संबंधित पुर्तगाली यात्री।
- 1565 ई. — तालीकोटा का युद्ध।
- अरविदु वंश — तालीकोटा के बाद विजयनगर की राजनीतिक परंपरा से संबंधित राजवंश।