Constitutional Amendment

संविधान संशोधन

संविधान संशोधन का अर्थ

संविधान संशोधन का अर्थ संविधान के किसी प्रावधान में परिवर्तन, नया प्रावधान जोड़ने अथवा किसी प्रावधान को हटाने से है। इसका उद्देश्य संविधान को बदलती सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए रखना है।

भारतीय संविधान को न तो पूर्णतः कठोर और न ही पूर्णतः लचीला माना जाता है। कुछ परिवर्तन संसद साधारण बहुमत से कर सकती है, जबकि अधिकांश औपचारिक संवैधानिक संशोधनों के लिए विशेष बहुमत और कुछ मामलों में राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

परीक्षा हेतु ध्यान दें: संविधान में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत नहीं आता। कुछ परिवर्तन संविधान द्वारा निर्धारित सामान्य विधायी प्रक्रिया से किए जाते हैं।

संविधान संशोधन की आवश्यकता

  • बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप संवैधानिक व्यवस्था में सुधार करना।
  • नई संस्थाओं और अधिकारों को संवैधानिक आधार प्रदान करना।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना।
  • संघ और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण में आवश्यक परिवर्तन करना।
  • न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखना।
  • संविधान के अनुभवजन्य परीक्षण के आधार पर उसकी कमियों को दूर करना।

संविधान संशोधन में परिवर्तन की आवश्यकता और संवैधानिक स्थिरता के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है। बहुत कठिन प्रक्रिया आवश्यक सुधारों को बाधित कर सकती है, जबकि अत्यधिक सरल प्रक्रिया संविधान की स्थिरता और नागरिक अधिकारों को कमजोर कर सकती है।

अनुच्छेद 368 — संविधान संशोधन की मुख्य व्यवस्था

भारतीय संविधान के भाग XX में संविधान संशोधन से संबंधित प्रावधान हैं। इसका मुख्य अनुच्छेद अनुच्छेद 368 है।

यह अनुच्छेद संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति और निर्धारित प्रक्रिया प्रदान करता है। हालांकि, संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है। वह संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। सामान्यतः इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं होती।

संविधान संशोधन के तीन प्रमुख तरीके

भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को व्यापक रूप से तीन श्रेणियों में समझा जा सकता है।

  • साधारण बहुमत: संविधान के कुछ प्रावधानों में सामान्य विधायी प्रक्रिया से परिवर्तन।
  • विशेष बहुमत: अनुच्छेद 368 के अंतर्गत अधिकांश संवैधानिक संशोधनों के लिए आवश्यक बहुमत।
  • विशेष बहुमत और राज्यों की स्वीकृति: संघीय व्यवस्था से संबंधित निर्धारित विषयों में संशोधन के लिए आवश्यक प्रक्रिया।

इन तीनों प्रक्रियाओं में अंतर समझना आवश्यक है। साधारण बहुमत से किए जाने वाले कुछ परिवर्तन तकनीकी रूप से अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन नहीं माने जाते।

साधारण बहुमत से होने वाले परिवर्तन

कुछ संवैधानिक विषयों में संसद सामान्य कानून पारित करने के लिए निर्धारित बहुमत से परिवर्तन कर सकती है। ऐसे परिवर्तन अनुच्छेद 368 की विशेष संशोधन प्रक्रिया के अंतर्गत नहीं आते।

  • अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर्गत नए राज्यों का प्रवेश, गठन तथा राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन से संबंधित कानून।
  • अनुच्छेद 169 के अंतर्गत राज्य में विधान परिषद का गठन या उसका उन्मूलन।
  • अनुच्छेद 239A के अंतर्गत कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विधायिका या मंत्रिपरिषद की व्यवस्था से संबंधित कानून।
  • संविधान के कुछ ऐसे प्रावधानों में परिवर्तन जिनके लिए संविधान स्वयं सामान्य कानून की प्रक्रिया निर्धारित करता है।

राज्य की सीमाओं या नाम में परिवर्तन: संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रपति प्रभावित राज्य के विधानमंडल से निर्धारित अवधि के भीतर उसके विचार माँगता है। राज्य के विचार संसद पर बाध्यकारी नहीं होते।

महत्वपूर्ण अंतर: किसी राज्य के विचार माँगना और राज्य विधानमंडल की संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

विशेष बहुमत (Special Majority)

अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन के लिए संसद के प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत आवश्यक है। इसमें दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए:

  • उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।
  • उस सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई का बहुमत।

उदाहरण के लिए, यदि किसी सदन की कुल सदस्य संख्या 500 है, तो पहली शर्त के लिए कम-से-कम 251 सदस्यों का समर्थन चाहिए। इसके अतिरिक्त उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम-से-कम दो-तिहाई का समर्थन भी आवश्यक होगा।

यह केवल समझाने के लिए काल्पनिक उदाहरण है। वास्तविक मतदान में आवश्यक समर्थन संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या पर निर्भर करेगा।

ध्यान दें: दोनों सदनों को विधेयक अलग-अलग पारित करना होता है। एक सदन में आवश्यक बहुमत प्राप्त होना दूसरे सदन के लिए पर्याप्त नहीं है।

विशेष बहुमत और राज्यों की स्वीकृति

संविधान के संघीय स्वरूप से संबंधित कुछ विषयों में संशोधन के लिए संसद के विशेष बहुमत के अतिरिक्त कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

राज्यों की स्वीकृति संसद के दोनों सदनों द्वारा संशोधन विधेयक पारित किए जाने के बाद और राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किए जाने से पहले प्राप्त की जाती है।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संघ और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों के वितरण को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण परिवर्तन केवल संसद की इच्छा से न किए जाएँ।

राज्यों की स्वीकृति किन विषयों में आवश्यक है?

अनुच्छेद 368 के परंतुक के अनुसार निम्नलिखित विषयों में संशोधन के लिए कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति आवश्यक है:

  • राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित प्रावधान, जिनमें अनुच्छेद 54 और 55 शामिल हैं।
  • संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों से संबंधित निर्धारित प्रावधान।
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों से संबंधित निर्धारित संवैधानिक प्रावधान।
  • संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण।
  • सातवीं अनुसूची की संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।
  • संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान।
  • अनुच्छेद 368 स्वयं।

परीक्षा में सामान्य भ्रम: प्रत्येक संविधान संशोधन के लिए राज्यों की स्वीकृति आवश्यक नहीं है। यह आवश्यकता केवल अनुच्छेद 368 में निर्दिष्ट विषयों पर लागू होती है।

संविधान संशोधन विधेयक की प्रक्रिया

  • संविधान संशोधन विधेयक संसद के लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • इसे मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य प्रस्तुत कर सकता है।
  • विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति सामान्यतः आवश्यक नहीं है।
  • प्रत्येक सदन में निर्धारित बहुमत से अलग-अलग पारित होना आवश्यक है।
  • जहाँ आवश्यक हो, कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति प्राप्त की जाती है।
  • इसके बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।
  • राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद संविधान में संशोधन प्रभावी होता है, विधेयक में निर्धारित लागू होने की व्यवस्था के अधीन।

संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में संसद के दोनों सदनों के बीच मतभेद होने पर संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। इसलिए दोनों सदनों में अलग-अलग आवश्यक बहुमत प्राप्त करना अनिवार्य है।

संविधान संशोधन में राष्ट्रपति की भूमिका

संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से पारित होने और जहाँ आवश्यक हो, राज्यों की स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 ने अनुच्छेद 368 में परिवर्तन करके राष्ट्रपति के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देना अनिवार्य किया।

राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक को सामान्य विधेयक की तरह पुनर्विचार के लिए संसद को वापस नहीं भेज सकता।

संविधान संशोधन और संयुक्त बैठक

सामान्य विधेयक के कुछ मामलों में लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध होने पर अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।

लेकिन संविधान संशोधन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। यदि दोनों सदन आवश्यक बहुमत पर सहमत नहीं होते, तो विधेयक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पारित नहीं माना जा सकता।

संविधान की कठोरता और लचीलापन

भारतीय संविधान में कठोरता और लचीलेपन दोनों के तत्व हैं। अलग-अलग प्रावधानों के लिए अलग-अलग संशोधन प्रक्रियाएँ निर्धारित करना इसी मिश्रित प्रकृति को दर्शाता है।

  • कुछ परिवर्तन साधारण बहुमत से किए जा सकते हैं।
  • अधिकांश औपचारिक संवैधानिक संशोधनों के लिए विशेष बहुमत आवश्यक है।
  • कुछ संघीय प्रावधानों के लिए विशेष बहुमत के साथ राज्यों की स्वीकृति भी आवश्यक है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य संविधान में आवश्यक बदलाव की गुंजाइश बनाए रखते हुए उसकी मूल संस्थागत संरचना को स्थिर रखना है।

मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

मूल संरचना सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती।

इस सिद्धांत को सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 के ऐतिहासिक निर्णय में स्थापित किया।

संविधान में मूल संरचना की कोई एक अंतिम और पूर्ण सूची नहीं दी गई है। न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में संविधान की मूल पहचान से संबंधित अलग-अलग तत्वों को मान्यता दी है।

केशवानंद भारती मामला, 1973

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने संसद की संविधान संशोधन शक्ति की सीमा पर विचार किया। निर्णय 7:6 के बहुमत से दिया गया।

न्यायालय ने माना कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं, लेकिन वह संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

इस निर्णय ने संसद की संशोधन शक्ति और न्यायिक समीक्षा के बीच संवैधानिक संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मूल संरचना के प्रमुख तत्व

सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग निर्णयों में निम्नलिखित तत्वों को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना है। यह सूची उदाहरणात्मक है, संपूर्ण और अंतिम सूची नहीं।

  • संविधान की सर्वोच्चता।
  • संविधान की मूल पहचान और संवैधानिक शासन।
  • लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक शासन व्यवस्था।
  • धर्मनिरपेक्षता।
  • संघीय व्यवस्था।
  • विधि का शासन।
  • न्यायिक समीक्षा।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता।
  • शक्तियों का विभाजन।
  • मुक्त और निष्पक्ष चुनाव।
  • संसदीय शासन व्यवस्था।
  • न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संवैधानिक सीमाओं का संरक्षण।
  • मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन।

महत्वपूर्ण: किसी तत्व को मूल संरचना मानना संबंधित संवैधानिक संदर्भ और न्यायिक निर्णय पर निर्भर करता है।

संविधान संशोधन से संबंधित प्रमुख न्यायिक निर्णय

मामला और वर्ष मुख्य निर्णय परीक्षा हेतु महत्व
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, 1951 सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है। संशोधन शक्ति पर प्रारंभिक न्यायिक दृष्टिकोण।
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, 1965 न्यायालय ने संसद की संशोधन शक्ति के व्यापक दृष्टिकोण को बरकरार रखा। मौलिक अधिकारों में संशोधन की बहस का महत्वपूर्ण चरण।
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967 बहुमत ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। 24वें संशोधन और केशवानंद भारती मामले की पृष्ठभूमि।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 संसद संशोधन कर सकती है, लेकिन मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। मूल संरचना सिद्धांत की स्थापना।
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980 संसद की सीमित संशोधन शक्ति और मौलिक अधिकारों तथा नीति-निर्देशक तत्वों के संतुलन को महत्व दिया गया। संशोधन शक्ति पर संवैधानिक सीमा।
वामन राव बनाम भारत संघ, 1981 नौवीं अनुसूची के कानूनों और मूल संरचना सिद्धांत के संबंध पर विचार किया गया। 24 अप्रैल 1973 की तारीख का महत्व।
आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य, 2007 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल कानून मूल संरचना को प्रभावित करने पर न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकते हैं। नौवीं अनुसूची भी पूर्ण न्यायिक प्रतिरक्षा प्रदान नहीं करती।

शंकरी प्रसाद मामला, 1951

शंकरी प्रसाद मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की संविधान संशोधन शक्ति को स्वीकार किया और माना कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किया गया संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ में सामान्य कानून के समान नहीं है।

इस निर्णय ने मौलिक अधिकारों में संशोधन की संसद की शक्ति से संबंधित प्रारंभिक न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट किया।

सज्जन सिंह मामला, 1965

सज्जन सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने शंकरी प्रसाद के दृष्टिकोण का अनुसरण किया और संसद की संशोधन शक्ति को व्यापक रूप से स्वीकार किया।

हालांकि, इस मामले में कुछ न्यायाधीशों ने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और संशोधन शक्ति की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए, जिन्होंने आगे की न्यायिक बहस को प्रभावित किया।

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967

गोलकनाथ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों को सीमित करने के लिए संविधान संशोधन नहीं कर सकती। इस निर्णय ने पहले के न्यायिक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव किया।

इसके बाद संसद ने अपनी संशोधन शक्ति को स्पष्ट करने के लिए 24वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 पारित किया। बाद में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत के माध्यम से इस प्रश्न पर व्यापक संवैधानिक स्थिति स्पष्ट की।

24वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971

  • अनुच्छेद 13 और 368 में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।
  • अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद की संविधान संशोधन शक्ति को स्पष्ट किया गया।
  • अनुच्छेद 13 के संदर्भ में संविधान संशोधन की स्थिति स्पष्ट की गई।
  • राष्ट्रपति के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देना अनिवार्य किया गया।

यह संशोधन गोलकनाथ निर्णय के बाद संसद और न्यायपालिका के बीच संशोधन शक्ति को लेकर हुए संवैधानिक विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

मिनर्वा मिल्स मामला, 1980

मिनर्वा मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद की संशोधन शक्ति सीमित है और इस शक्ति की सीमित प्रकृति स्वयं संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण तत्व है। किसी एक को पूरी तरह दूसरे पर हावी करने का प्रयास संवैधानिक समस्या उत्पन्न कर सकता है।

वामन राव मामला, 1981

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों और मूल संरचना सिद्धांत के संबंध पर विचार किया।

न्यायालय ने 24 अप्रैल 1973 को महत्वपूर्ण सीमा-तिथि के रूप में रेखांकित किया। यह तारीख केशवानंद भारती निर्णय की तारीख है।

आई. आर. कोएल्हो मामला, 2007

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में जोड़े गए कानूनों को केवल नौवीं अनुसूची में शामिल होने के कारण न्यायिक समीक्षा से पूर्ण संरक्षण नहीं मिलता।

यदि ऐसा कानून मौलिक अधिकारों से संबंधित उन संवैधानिक सिद्धांतों को प्रभावित करता है जो मूल संरचना का हिस्सा हैं, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951

  • अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, जिसने सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधानों का संवैधानिक आधार प्रदान किया।
  • नौवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें भूमि सुधार संबंधी कुछ कानूनों को संरक्षण देने का उद्देश्य था।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंधों से संबंधित प्रावधानों में परिवर्तन किया गया।

ध्यान दें: नौवीं अनुसूची में शामिल होने मात्र से प्रत्येक कानून को सभी प्रकार की न्यायिक समीक्षा से पूर्ण छूट नहीं मिलती।

सातवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1956

  • राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित संवैधानिक परिवर्तनों को लागू किया गया।
  • भाग A, B, C और D वाले राज्यों के पुराने वर्गीकरण को समाप्त किया गया।
  • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की संवैधानिक व्यवस्था में परिवर्तन किए गए।
  • उच्च न्यायालयों तथा अन्य संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में परिवर्तन किए गए।

यह संशोधन राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 से संबंधित व्यापक संवैधानिक बदलावों का महत्वपूर्ण भाग था।

42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976

42वें संविधान संशोधन को व्यापक परिवर्तनों के कारण सामान्यतः “लघु संविधान” या “मिनी संविधान” कहा जाता है।

  • प्रस्तावना में “समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द जोड़े गए।
  • भाग IVA के अंतर्गत मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
  • राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों से संबंधित अनेक परिवर्तन किए गए।
  • न्यायिक समीक्षा और न्यायपालिका की भूमिका को प्रभावित करने वाले प्रावधान जोड़े गए।
  • केंद्र और राज्यों के संबंधों से जुड़े कई प्रावधानों में परिवर्तन किए गए।

इस संशोधन के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया या उनके प्रभाव को सीमित किया।

44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978

  • आपातकालीन प्रावधानों में महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय किए गए।
  • संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाया गया।
  • संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार बना।
  • राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा से संबंधित सुरक्षा उपाय मजबूत किए गए।
  • अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों को आपातकाल के दौरान निलंबित न किए जा सकने वाला संरक्षण प्रदान किया गया।

संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन राज्य कानून के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं कर सकता।

52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985

इस संशोधन द्वारा संविधान में दलबदल विरोधी कानून जोड़ा गया और दसवीं अनुसूची शामिल की गई।

इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा दल बदलने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करना तथा सरकारों की स्थिरता को मजबूत करना था।

दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति द्वारा किया जाता है। यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकता है।

61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988

इस संशोधन द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।

इसके लिए अनुच्छेद 326 में परिवर्तन किया गया। इस संशोधन ने अधिक युवाओं को निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर प्रदान किया।

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

इस संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इसके प्रमुख प्रावधान 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुए।

  • संविधान में भाग IX जोड़ा गया।
  • ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें 29 विषय शामिल हैं।
  • पंचायतों के नियमित चुनावों की व्यवस्था की गई।
  • अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।
  • पंचायतों के चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई।
  • राज्य वित्त आयोग से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था निर्धारित की गई।

पंचायतों के वास्तविक कार्य, शक्तियाँ और वित्तीय अधिकार राज्य कानूनों तथा संविधान के संबंधित प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होते हैं।

74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

इस संशोधन ने नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इसके प्रमुख प्रावधान 1 जून 1993 से प्रभावी हुए।

  • संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया।
  • बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें 18 विषय शामिल हैं।
  • नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद और नगर निगम जैसी संस्थाओं की संवैधानिक व्यवस्था की गई।
  • नगरपालिकाओं के नियमित चुनावों और आरक्षण का प्रावधान किया गया।
  • नगरपालिकाओं के चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई।

अंतर याद रखें: 73वाँ संशोधन ग्रामीण स्थानीय स्वशासन अर्थात पंचायतों से संबंधित है, जबकि 74वाँ संशोधन नगरीय स्थानीय स्वशासन से संबंधित है।

86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002

इस संशोधन ने 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को अनुच्छेद 21A के अंतर्गत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया।

  • अनुच्छेद 21A जोड़ा गया।
  • अनुच्छेद 45 में प्रारंभिक बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा से संबंधित परिवर्तन किया गया।
  • अनुच्छेद 51A में माता-पिता या अभिभावकों के उस कर्तव्य को जोड़ा गया जिसके अंतर्गत वे 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें।

शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए बाद में निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 भी महत्वपूर्ण बना।

91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003

  • केंद्र और राज्यों में मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित किया गया।
  • केंद्र में मंत्रिपरिषद, प्रधानमंत्री सहित, लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।
  • राज्यों में मंत्रिपरिषद, मुख्यमंत्री सहित, विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती; न्यूनतम संख्या से संबंधित संवैधानिक अपवाद लागू होता है।
  • दलबदल के आधार पर अयोग्य घोषित सदस्य के मंत्री बनने पर रोक से संबंधित प्रावधान मजबूत किए गए।
  • दलबदल कानून में विभाजन से संबंधित पुराने अपवाद को समाप्त किया गया।

97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011

इस संशोधन ने सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों को मजबूत करने का प्रयास किया।

  • अनुच्छेद 19(1)(c) में सहकारी समितियाँ बनाने के अधिकार का उल्लेख जोड़ा गया।
  • अनुच्छेद 43B जोड़ा गया।
  • भाग IX-B में सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान शामिल किए गए।

न्यायिक निर्णय: 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य की सहकारी समितियों से संबंधित भाग IX-B के उन प्रावधानों को, जिनके लिए राज्यों की स्वीकृति आवश्यक थी लेकिन प्राप्त नहीं की गई थी, असंवैधानिक माना। बहु-राज्य सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधानों पर इसका प्रभाव अलग है।

101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016

इस संशोधन ने वस्तु एवं सेवा कर अर्थात GST (Goods and Services Tax) के लिए संवैधानिक आधार तैयार किया।

  • अनुच्छेद 246A जोड़ा गया, जो GST के संबंध में संसद और राज्य विधानमंडलों की विधायी शक्तियों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 269A जोड़ा गया, जो अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य में GST के अधिरोपण और संग्रह से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 279A के अंतर्गत GST परिषद की व्यवस्था की गई।
  • केंद्र और राज्यों के अप्रत्यक्ष कर ढाँचे में व्यापक परिवर्तन का संवैधानिक आधार बना।

102वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2018

इस संशोधन ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।

  • अनुच्छेद 338B जोड़ा गया।
  • सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची से संबंधित अनुच्छेद 342A जोड़ा गया।
  • पिछड़े वर्गों से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था में परिवर्तन किए गए।

इसके बाद राज्यों की अपनी पिछड़े वर्गों की सूची निर्धारित करने की शक्ति को लेकर संवैधानिक प्रश्न उठा, जिसे 105वें संशोधन द्वारा स्पष्ट किया गया।

103वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019

इस संशोधन द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक आधार प्रदान किया गया।

  • अनुच्छेद 15(6) जोड़ा गया, जो शैक्षणिक संस्थानों में EWS के लिए विशेष प्रावधानों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 16(6) जोड़ा गया, जो सार्वजनिक रोजगार में EWS आरक्षण से संबंधित है।
  • इस व्यवस्था में अनुच्छेद 15(4) और 15(5) के अंतर्गत आने वाले वर्गों को EWS आरक्षण के लिए अलग श्रेणी के रूप में शामिल नहीं किया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में बहुमत से 103वें संविधान संशोधन को वैध ठहराया।

104वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019

इस संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की अवधि को आगे बढ़ाया।

  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC तथा ST के लिए आरक्षण की अवधि 2030 तक बढ़ाई गई।
  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामांकन की व्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया गया।

ध्यान दें: SC/ST सीट आरक्षण की अवधि और एंग्लो-इंडियन नामांकन की व्यवस्था दो अलग-अलग संवैधानिक विषय हैं।

105वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2021

इस संशोधन ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की अपनी सूची निर्धारित करने की शक्ति को स्पष्ट किया।

यह संशोधन 102वें संशोधन और सर्वोच्च न्यायालय के 2021 के निर्णय के बाद राज्यों की सूची निर्धारण संबंधी संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण था।

106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023

इस संशोधन को सामान्यतः नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाना है।

  • लोकसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया।
  • राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया।
  • दिल्ली विधानसभा में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।
  • आरक्षण के क्रियान्वयन को अधिनियम में निर्दिष्ट जनगणना के आँकड़ों के प्रकाशन के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण: संशोधन पारित हो जाना और आरक्षण का वास्तविक क्रियान्वयन शुरू हो जाना एक ही बात नहीं है। क्रियान्वयन अधिनियम में निर्धारित संवैधानिक शर्तों और प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

प्रमुख संविधान संशोधनों का त्वरित सार

संशोधन वर्ष मुख्य विषय
प्रथम 1951 अनुच्छेद 15(4), नौवीं अनुसूची और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित परिवर्तन।
सातवाँ 1956 राज्यों का पुनर्गठन और राज्यों की संवैधानिक श्रेणियों में परिवर्तन।
24वाँ 1971 संसद की संशोधन शक्ति और राष्ट्रपति की स्वीकृति से संबंधित प्रावधान।
42वाँ 1976 प्रस्तावना में परिवर्तन, मौलिक कर्तव्य और व्यापक संवैधानिक बदलाव।
44वाँ 1978 आपातकालीन सुरक्षा उपाय और संपत्ति के अधिकार की स्थिति में परिवर्तन।
52वाँ 1985 दलबदल विरोधी कानून और दसवीं अनुसूची।
61वाँ 1988 मतदान की न्यूनतम आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष।
73वाँ 1992 पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा।
74वाँ 1992 नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा।
86वाँ 2002 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार।
91वाँ 2003 मंत्रिपरिषद के आकार की सीमा और दलबदल संबंधी प्रावधान।
97वाँ 2011 सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान।
101वाँ 2016 वस्तु एवं सेवा कर (GST)।
102वाँ 2018 राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा।
103वाँ 2019 आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण।
104वाँ 2019 SC/ST सीट आरक्षण की अवधि में विस्तार और एंग्लो-इंडियन नामांकन की समाप्ति।
105वाँ 2021 राज्यों की पिछड़े वर्गों की सूची निर्धारित करने की शक्ति।
106वाँ 2023 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का प्रावधान।

संविधान संशोधन और न्यायिक समीक्षा

न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय संवैधानिक सीमाओं के अनुरूप कानूनों तथा सरकारी कार्रवाइयों की वैधता की जाँच कर सकते हैं।

संविधान संशोधन के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय यह जाँच सकता है कि संसद ने अपनी संशोधन शक्ति का उपयोग करते हुए संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन तो नहीं किया है।

इस प्रकार संसद की संविधान संशोधन शक्ति और न्यायपालिका की समीक्षा शक्ति भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में एक-दूसरे के साथ संतुलन स्थापित करती हैं।

संविधान संशोधन और सामान्य कानून में अंतर

  • सामान्य कानून: सामान्यतः संबंधित विधायी प्रक्रिया और लागू बहुमत के आधार पर पारित किया जाता है।
  • संविधान संशोधन: विषय के अनुसार साधारण बहुमत, विशेष बहुमत या विशेष बहुमत के साथ राज्यों की स्वीकृति की आवश्यकता हो सकती है।
  • संयुक्त बैठक: संविधान संशोधन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
  • राष्ट्रपति की भूमिका: संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी होती है।
  • न्यायिक नियंत्रण: संविधान संशोधन भी मूल संरचना सिद्धांत के अधीन है।

अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

  • संविधान संशोधन — भाग XX।
  • मुख्य अनुच्छेद — 368।
  • संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा या राज्यसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • संविधान संशोधन विधेयक पर संसद की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
  • विशेष बहुमत में सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई का बहुमत शामिल है।
  • कुछ संवैधानिक प्रावधानों के लिए कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति आवश्यक है।
  • मूल संरचना सिद्धांत — केशवानंद भारती मामला, 1973।
  • गोलकनाथ मामला, 1967 — मौलिक अधिकारों में संशोधन की संसद की शक्ति पर महत्वपूर्ण निर्णय।
  • 24वाँ संशोधन, 1971 — संसद की संशोधन शक्ति और राष्ट्रपति की स्वीकृति से संबंधित महत्वपूर्ण परिवर्तन।
  • 42वाँ संशोधन, 1976 — “मिनी संविधान” के रूप में प्रसिद्ध।
  • 44वाँ संशोधन, 1978 — आपातकालीन सुरक्षा उपायों और संपत्ति के अधिकार की स्थिति में परिवर्तन।
  • 52वाँ संशोधन, 1985 — दलबदल विरोधी कानून।
  • 61वाँ संशोधन, 1988 — मतदान की आयु 21 से 18 वर्ष।
  • 73वाँ संशोधन — पंचायतें; 74वाँ संशोधन — नगरपालिकाएँ।
  • 86वाँ संशोधन — शिक्षा का अधिकार।
  • 101वाँ संशोधन — GST।
  • 103वाँ संशोधन — EWS आरक्षण।
  • 106वाँ संशोधन — महिलाओं के लिए विधायी निकायों में आरक्षण का प्रावधान।

परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियाँ

  • गलत: प्रत्येक संविधान संशोधन के लिए राज्यों की स्वीकृति आवश्यक है।
    सही: राज्यों की स्वीकृति केवल अनुच्छेद 368 में निर्दिष्ट कुछ विषयों में आवश्यक है।
  • गलत: विशेष बहुमत का अर्थ केवल उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन है।
    सही: सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई का समर्थन, दोनों आवश्यक हैं।
  • गलत: संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
    सही: संविधान संशोधन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
  • गलत: राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
    सही: राष्ट्रपति को संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देनी होती है।
  • गलत: संसद संविधान के किसी भी हिस्से में बिना किसी सीमा के संशोधन कर सकती है।
    सही: संसद की संशोधन शक्ति मूल संरचना सिद्धांत के अधीन है।
  • गलत: मूल संरचना की पूरी सूची संविधान में लिखी हुई है।
    सही: मूल संरचना के तत्व सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित हुए हैं।
  • गलत: 73वाँ संशोधन नगरपालिकाओं और 74वाँ संशोधन पंचायतों से संबंधित है।
    सही: 73वाँ पंचायतों और 74वाँ नगरपालिकाओं से संबंधित है।
  • गलत: 106वें संशोधन के पारित होते ही महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण तत्काल लागू हो गया।
    सही: इसके क्रियान्वयन को संबंधित जनगणना और परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़ा गया है।

त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)

भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया मिश्रित प्रकृति की है। कुछ परिवर्तन साधारण बहुमत से किए जा सकते हैं, अधिकांश औपचारिक संवैधानिक संशोधनों के लिए विशेष बहुमत आवश्यक है और कुछ संघीय प्रावधानों में कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति भी चाहिए।

अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की मुख्य व्यवस्था है। संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। दोनों सदनों को इसे अलग-अलग आवश्यक बहुमत से पारित करना होता है।

संविधान संशोधन की सीमा को समझने के लिए शंकरी प्रसाद, सज्जन सिंह, गोलकनाथ, केशवानंद भारती और मिनर्वा मिल्स के निर्णय महत्वपूर्ण हैं। इनमें केशवानंद भारती मामला, 1973 मूल संरचना सिद्धांत की स्थापना के कारण विशेष महत्व रखता है।

यूपीएससी की तैयारी में केवल संशोधन संख्या और वर्ष याद करना पर्याप्त नहीं है। संशोधन का उद्देश्य, संबंधित अनुच्छेद, संवैधानिक प्रभाव और प्रमुख न्यायिक निर्णयों के बीच संबंध को समझना आवश्यक है।