भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy—DPSP) और मौलिक कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण आधार हैं। ये क्रमशः व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करते हैं, राज्य को कल्याणकारी नीतियाँ बनाने की दिशा देते हैं तथा नागरिकों के संवैधानिक दायित्वों को रेखांकित करते हैं।
मौलिक अधिकारों का उद्देश्य राज्य की शक्ति पर संवैधानिक नियंत्रण रखना है। नीति-निदेशक तत्व सामाजिक और आर्थिक न्याय पर आधारित व्यवस्था के निर्माण का मार्गदर्शन करते हैं। मौलिक कर्तव्य नागरिकों को संविधान, समाज, राष्ट्र और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार आचरण की याद दिलाते हैं।
UPSC के लिए इन तीनों के अनुच्छेद, न्यायिक प्रवर्तनीयता, प्रमुख संशोधन, महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय और इनके बीच संबंध को समझना आवश्यक है।
| आधार | मौलिक अधिकार | नीति-निदेशक तत्व | मौलिक कर्तव्य |
|---|---|---|---|
| संवैधानिक भाग | भाग III | भाग IV | भाग IVA |
| अनुच्छेद | 12–35 | 36–51 | 51A |
| मुख्य उद्देश्य | स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा | सामाजिक एवं आर्थिक न्याय को बढ़ावा | जिम्मेदार नागरिकता को प्रोत्साहन |
| न्यायिक प्रवर्तनीयता | संवैधानिक शर्तों के अधीन न्यायालय से संरक्षण प्राप्त किया जा सकता है | अनुच्छेद 37 के अनुसार सीधे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं | सामान्यतः सीधे प्रवर्तनीय नहीं; संबंधित कानून के माध्यम से कुछ कर्तव्य लागू हो सकते हैं |
| किससे संबंधित | कुछ अधिकार नागरिकों के लिए, कुछ सभी व्यक्तियों के लिए | मुख्यतः राज्य के नीति-निर्माण से संबंधित | अनुच्छेद 51A के कर्तव्य भारतीय नागरिकों के लिए |
परीक्षा तथ्य: मौलिक अधिकारों का कुछ भाग नागरिकों के लिए विशेष है, जबकि अनुच्छेद 14 और 21 जैसे अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त हैं। इसलिए सभी मौलिक अधिकारों को केवल नागरिकों तक सीमित मानना सही नहीं है।
मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक दिए गए हैं। इनका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा करना तथा राज्य की मनमानी कार्रवाई पर रोक लगाना है।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में उपयुक्त न्यायालय से संवैधानिक उपचार माँगा जा सकता है। हालांकि इन अधिकारों का प्रयोग संविधान में निर्धारित शर्तों, प्रतिबंधों और अपवादों के अधीन होता है।
मूल संविधान में मौलिक अधिकारों की सात श्रेणियाँ थीं। संपत्ति के अधिकार को 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों से हटाए जाने के बाद वर्तमान में छह प्रमुख श्रेणियाँ हैं।
अनुच्छेद 33 से 35 भी मौलिक अधिकारों से संबंधित विशेष प्रावधान रखते हैं। इसलिए मौलिक अधिकारों से संबंधित संवैधानिक भाग केवल छह श्रेणियों की सूची तक सीमित नहीं है।
अनुच्छेद 12 में भाग III के प्रयोजन के लिए 'राज्य' की परिभाषा दी गई है। इसमें भारत सरकार और संसद, राज्य सरकारें और विधानमंडल, स्थानीय प्राधिकरण तथा भारत के क्षेत्र में या भारत सरकार के नियंत्रण में आने वाले अन्य प्राधिकरण शामिल हो सकते हैं।
कोई संस्था अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य मानी जाएगी या नहीं, यह उसके गठन, नियंत्रण, कार्यों और अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर निर्भर कर सकता है। केवल किसी संस्था का सार्वजनिक हित में कार्य करना अपने-आप उसे अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य नहीं बना देता।
यदि कोई संस्था अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य है, तो उसके कार्यों की मौलिक अधिकारों के संदर्भ में न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में गैर-राज्य संस्थाओं के विरुद्ध भी विशेष मौलिक अधिकार लागू हो सकते हैं।
अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों के साथ असंगत कानूनों के प्रभाव को नियंत्रित करता है। राज्य ऐसा कानून नहीं बना सकता जो मौलिक अधिकारों को छीनता या सीमित करता हो; ऐसा कानून असंगति की सीमा तक शून्य हो सकता है।
यह प्रावधान न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संवैधानिक आधारों में महत्वपूर्ण है। न्यायालय कानून की संवैधानिकता की जाँच करते समय संबंधित मौलिक अधिकार, लागू संवैधानिक प्रावधान और न्यायिक निर्णयों पर विचार करता है।
संविधान संशोधन की वैधता का प्रश्न केवल अनुच्छेद 13 तक सीमित नहीं है। संसद की संशोधन शक्ति पर मूल संरचना सिद्धांत भी लागू होता है।
समानता का अधिकार कानून के समक्ष समानता, भेदभाव के निषेध, सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर, अस्पृश्यता के उन्मूलन और उपाधियों के उन्मूलन से संबंधित है।
अनुच्छेद 14 भारत के क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
समानता का अर्थ हर परिस्थिति में सभी व्यक्तियों के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना नहीं है। उचित उद्देश्य के लिए युक्तिसंगत वर्गीकरण किया जा सकता है, लेकिन वर्गीकरण का स्पष्ट आधार और कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध होना चाहिए। मनमाना वर्गीकरण अनुच्छेद 14 की कसौटी पर असफल हो सकता है।
अनुच्छेद 15 राज्य को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर नागरिकों के विरुद्ध भेदभाव करने से रोकता है। अनुच्छेद 15(2) सार्वजनिक उपयोग की निर्दिष्ट सुविधाओं तक पहुँच से संबंधित भेदभाव पर भी रोक लगाता है।
संविधान महिलाओं और बच्चों, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है। शिक्षा और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित विशेष प्रावधान भी संविधान के संबंधित उपबंधों के अंतर्गत आते हैं।
परीक्षा बिंदु: अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में आरक्षण तथा विशेष प्रावधानों से संबंधित उपबंधों को अलग-अलग पढ़ना चाहिए। दोनों अनुच्छेदों की शर्तें एक जैसी नहीं हैं।
अनुच्छेद 16 राज्य के अधीन रोजगार या पदों से संबंधित मामलों में नागरिकों के लिए अवसर की समानता प्रदान करता है। इसमें धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, वंश, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी आधार पर भेदभाव से संबंधित संवैधानिक प्रावधान हैं।
संविधान कुछ परिस्थितियों में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण संबंधी प्रावधानों की अनुमति देता है। इन प्रावधानों का प्रयोग संबंधित संवैधानिक शर्तों और लागू कानूनों के अधीन होता है।
निवास संबंधी कुछ आवश्यकताएँ निर्धारित करने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 16(3) के अंतर्गत संसद को दी गई है।
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है और किसी भी रूप में उसके आचरण को निषिद्ध करता है। अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यता लागू करना कानून के अनुसार दंडनीय अपराध है।
इस संवैधानिक प्रावधान को प्रभावी बनाने के लिए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 सहित संबंधित कानून महत्वपूर्ण हैं। अस्पृश्यता का निषेध सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की रक्षा से जुड़ा है।
अनुच्छेद 18 राज्य को सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता के अतिरिक्त उपाधियाँ प्रदान करने से रोकता है। भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।
राष्ट्रीय पुरस्कारों को अपने-आप निषिद्ध उपाधि नहीं माना जाता। सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण के अनुसार उनका उपयोग नाम के आगे या पीछे उपाधि के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
स्वतंत्रता का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया की रक्षा करता है।
अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित छह स्वतंत्रताएँ प्राप्त हैं:
ये स्वतंत्रताएँ निरपेक्ष नहीं हैं। अनुच्छेद 19 के अलग-अलग खंडों में निर्दिष्ट आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) में दिए गए आधारों के अनुसार प्रतिबंध संभव हैं।
महत्वपूर्ण: प्रतिबंध का आधार संबंधित संवैधानिक खंड में उपलब्ध होना चाहिए। सभी प्रतिबंधों के लिए एक ही सूची लागू नहीं होती।
अनुच्छेद 20 अपराध के संबंध में आरोपित या दोषसिद्ध व्यक्ति को तीन महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है:
अनुच्छेद 20 के संरक्षण नागरिकों के साथ-साथ विदेशियों को भी प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि इसका पाठ केवल नागरिकों तक सीमित नहीं है।
अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार वंचित किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या की है। गरिमापूर्ण जीवन, निजता, शीघ्र न्याय, कानूनी सहायता और स्वच्छ पर्यावरण से संबंधित अनेक पहलुओं को न्यायिक निर्णयों में अनुच्छेद 21 से जोड़ा गया है।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978: इस निर्णय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित प्रक्रिया की निष्पक्षता, न्यायसंगतता और उचितता को संवैधानिक महत्व दिया।
अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को संरक्षण देता है; यह केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं है।
86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया। इसके अंतर्गत राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को कानून द्वारा निर्धारित तरीके से निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करानी है।
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009) इस संवैधानिक अधिकार को लागू करने वाला प्रमुख कानून है।
शिक्षा के अधिकार से संबंधित प्रावधानों को पढ़ते समय अनुच्छेद 21A, संशोधित अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 51A(k) के बीच संबंध भी समझना चाहिए।
सामान्य गिरफ्तारी की स्थिति में व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देने और अपनी पसंद के विधि व्यवसायी से परामर्श तथा प्रतिरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
सामान्य नियम के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के लिए आवश्यक समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना होता है। मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना इस अवधि से अधिक हिरासत में रखना संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न कर सकता है।
अनुच्छेद 22 में शत्रु विदेशी और निवारक निरोध से संबंधित अपवाद तथा विशेष प्रावधान भी हैं। इसलिए इसके सभी संरक्षणों को हर प्रकार के निरोध पर समान रूप से लागू नहीं मानना चाहिए।
अनुच्छेद 23 का संरक्षण केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि निजी व्यक्तियों द्वारा किए गए निषिद्ध शोषण के विरुद्ध भी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार यह मानव गरिमा और श्रमिक संरक्षण से संबंधित व्यापक संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है।
धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है। अनुच्छेद 25 में धर्म से जुड़ी कुछ धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों के विनियमन और सामाजिक सुधार से संबंधित राज्य की शक्तियों का भी उल्लेख है।
अनुच्छेद 29 भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा से संबंधित अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 29(1) भारत के नागरिकों के ऐसे वर्ग से संबंधित है जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है।
अनुच्छेद 29(2) राज्य द्वारा संचालित या राज्य सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश से संबंधित निर्दिष्ट आधारों पर भेदभाव को रोकता है।
अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार देता है। इन अधिकारों का उद्देश्य सांस्कृतिक विविधता और अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक हितों की रक्षा करना है।
मूल संविधान में संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 के अंतर्गत मौलिक अधिकार था।
44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इसे मौलिक अधिकारों की श्रेणी से हटा दिया गया। वर्तमान में संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार है।
अनुच्छेद 300A के अनुसार किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार के बिना वंचित नहीं किया जा सकता। यह अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
अनुच्छेद 32 व्यक्ति को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। न्यायालय इस उद्देश्य से उपयुक्त निर्देश, आदेश या रिट जारी कर सकता है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में अनुच्छेद 32 को संविधान का हृदय और आत्मा कहा था। इसका महत्व इस बात में है कि मौलिक अधिकार केवल लिखित घोषणाएँ न रहें, बल्कि उनके उल्लंघन पर न्यायिक उपचार भी उपलब्ध हो।
रिट जारी करने की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। उदाहरण के लिए, परमादेश सामान्यतः निजी व्यक्ति के विरुद्ध केवल निजी दायित्व लागू करने के लिए जारी नहीं किया जाता।
| आधार | अनुच्छेद 32 | अनुच्छेद 226 |
|---|---|---|
| न्यायालय | सर्वोच्च न्यायालय | उच्च न्यायालय |
| मुख्य उद्देश्य | मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन | मौलिक अधिकारों के साथ अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिट जारी करना |
| दायरा | मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तक सीमित | कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन सहित अधिक व्यापक |
| संवैधानिक प्रकृति | स्वयं मौलिक अधिकार है | उच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्ति है |
उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का दायरा व्यापक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मामले में उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है। दोनों की अधिकारिता और संवैधानिक भूमिका अलग-अलग हैं।
मौलिक अधिकार लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, लेकिन संविधान कुछ अधिकारों पर निर्धारित परिस्थितियों में प्रतिबंधों की अनुमति देता है। इन प्रतिबंधों का आधार संबंधित अनुच्छेद में दिया गया होना चाहिए।
उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 19 के अंतर्गत स्वतंत्रताओं पर निर्दिष्ट आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। प्रतिबंध की वैधता का मूल्यांकन करते समय उसका उद्देश्य, संवैधानिक आधार और परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण होती हैं।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन पर विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। अनुच्छेद 358 और अनुच्छेद 359 इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दोनों का प्रभाव एक जैसा नहीं है।
परीक्षा में यह अंतर याद रखें कि अनुच्छेद 358 और 359 अपने-आप सभी मौलिक अधिकारों को एक समान तरीके से समाप्त नहीं करते।
संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी संशोधन शक्ति असीमित नहीं है।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973: सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) स्थापित किया। इसके अनुसार संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
मूल संरचना में संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे तत्वों को न्यायिक निर्णयों में महत्व दिया गया है। मूल संरचना की कोई एक संपूर्ण और अंतिम सूची संविधान में अलग से नहीं दी गई है।
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967 में सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय यह दृष्टिकोण अपनाया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
बाद में 24वें संविधान संशोधन और केशवानंद भारती निर्णय के माध्यम से संवैधानिक संशोधन की शक्ति तथा उसकी सीमाओं की व्याख्या विकसित हुई। इसलिए गोलकनाथ के निर्णय को वर्तमान संवैधानिक स्थिति का अकेला आधार नहीं मानना चाहिए।
राज्य के नीति-निदेशक तत्व संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक दिए गए हैं। इनका उद्देश्य ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में राज्य का मार्गदर्शन करना है जिसमें न्याय, समान अवसर और कल्याण को महत्व मिले।
नीति-निदेशक तत्व आयरलैंड के संविधान से प्रेरित हैं। इनके माध्यम से संविधान राज्य को गरीबी कम करने, आजीविका के अवसर बढ़ाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार, शिक्षा, श्रमिक कल्याण और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित नीतियाँ बनाने की दिशा देता है।
नीति-निदेशक तत्वों के संदर्भ में अनुच्छेद 36 में 'राज्य' का वही अर्थ है जो भाग III के अनुच्छेद 12 में दिया गया है, जब तक कि संदर्भ से कोई अलग अर्थ आवश्यक न हो।
अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति-निदेशक तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं। फिर भी संविधान इन्हें देश के शासन में मूलभूत घोषित करता है और कानून निर्माण के समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य बताता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि DPSP महत्वहीन हैं। न्यायपालिका संवैधानिक व्याख्या में इनके उद्देश्यों पर विचार कर सकती है, लेकिन किसी DPSP को केवल उसके भाग IV में होने के आधार पर सीधे लागू कराने की माँग नहीं की जा सकती।
संविधान स्वयं नीति-निदेशक तत्वों को तीन औपचारिक वर्गों में विभाजित नहीं करता। अध्ययन की सुविधा के लिए विद्वान इन्हें सामान्यतः समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक सिद्धांतों के रूप में वर्गीकृत करते हैं। कुछ अनुच्छेद एक से अधिक विचारधाराओं से संबंधित हो सकते हैं।
अनुच्छेद 38 राज्य को ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित और संरक्षित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को प्रेरित करे।
44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 38 में असमानताओं को कम करने से संबंधित उपबंध जोड़ा गया। इसमें आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने की दिशा में राज्य की भूमिका को महत्व दिया गया है।
अनुच्छेद 39 राज्य को ऐसी नीति अपनाने की दिशा देता है जिससे आजीविका, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और श्रमिकों तथा बच्चों के संरक्षण को बढ़ावा मिले।
अनुच्छेद 39A को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया। इसका उद्देश्य न्याय व्यवस्था को समान अवसर पर आधारित बनाना तथा आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित होने से बचाना है।
निःशुल्क कानूनी सहायता और विधिक सेवा संस्थाएँ इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों का संगठन करने तथा उन्हें ऐसी शक्तियाँ और अधिकार देने का निर्देश देता है जिससे वे स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें।
यह प्रावधान स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक अवधारणा से जुड़ा है। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अनुच्छेद 43A को 42वें संशोधन और अनुच्छेद 43B को 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 के माध्यम से जोड़ा गया।
अनुच्छेद 44 राज्य को भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
यह नीति-निदेशक तत्व है, सीधे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार नहीं। इससे संबंधित चर्चा में समानता, लैंगिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानूनों और विधायी प्रक्रिया के संवैधानिक पहलुओं को समझना आवश्यक है।
86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के बाद अनुच्छेद 45 का विषय परिवर्तित हुआ। वर्तमान में यह राज्य को छह वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
इसे अनुच्छेद 21A से अलग समझना चाहिए: अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा से संबंधित मौलिक अधिकार है, जबकि वर्तमान अनुच्छेद 45 छह वर्ष से कम आयु के बच्चों पर केंद्रित है।
अनुच्छेद 46 राज्य को समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक तथा आर्थिक हितों को विशेष सावधानी से बढ़ावा देने और उन्हें सामाजिक अन्याय तथा शोषण से बचाने का निर्देश देता है।
अनुच्छेद 47 पोषण स्तर, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य के प्रमुख कर्तव्यों में रखता है। यह स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित सार्वजनिक नीतियों के संवैधानिक आधारों में महत्वपूर्ण है।
अनुच्छेद 48 राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक तथा वैज्ञानिक आधार पर संगठित करने और पशुधन की नस्लों में सुधार तथा संरक्षण की दिशा देता है।
अनुच्छेद 48A को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया। यह राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार तथा वन और वन्यजीवों की सुरक्षा का प्रयास करने का निर्देश देता है।
पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक अध्ययन में अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) को साथ पढ़ना उपयोगी है। इनमें क्रमशः जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राज्य की पर्यावरण संबंधी जिम्मेदारी तथा नागरिक के पर्यावरण संबंधी कर्तव्य से जुड़े पहलू शामिल हैं।
अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्व के घोषित स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं को विनाश, क्षति, हटाए जाने, नष्ट किए जाने या निर्यात से बचाने से संबंधित है।
अनुच्छेद 50 राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने का निर्देश देता है। यह न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत है।
यह अनुच्छेद भारत की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान से संबंधित संवैधानिक दिशा प्रदान करता है।
मौलिक कर्तव्य नागरिकों के उन संवैधानिक दायित्वों को व्यक्त करते हैं जिनका उद्देश्य संविधान, राष्ट्रीय प्रतीकों, स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदार आचरण को प्रोत्साहित करना है।
इन्हें संविधान के भाग IVA में अनुच्छेद 51A के अंतर्गत रखा गया है। मौलिक कर्तव्य नागरिकों से संबंधित हैं और जिम्मेदार नागरिकता की संवैधानिक अवधारणा को मजबूत करते हैं।
मौलिक कर्तव्यों को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया। इस संबंध में स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशें महत्वपूर्ण थीं।
प्रारंभ में दस मौलिक कर्तव्य थे। 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 51A में खंड (k) जोड़कर एक और कर्तव्य शामिल किया गया। इस प्रकार वर्तमान में कुल 11 मौलिक कर्तव्य हैं।
ध्यान दें: ग्यारहवाँ कर्तव्य माता-पिता या अभिभावक से संबंधित है। इसे राज्य द्वारा शिक्षा उपलब्ध कराने के दायित्व वाले अनुच्छेद 21A के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए।
ये तीनों व्यवस्थाएँ संविधान की व्यापक दृष्टि को सामने रखती हैं। मौलिक अधिकार व्यक्ति को स्वतंत्रता और समानता का संरक्षण देते हैं। DPSP राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का मार्गदर्शन करते हैं। मौलिक कर्तव्य नागरिकों को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप आचरण करने की प्रेरणा देते हैं।
किसी संवैधानिक प्रश्न में इन तीनों के बीच संबंध का मूल्यांकन करते समय संबंधित अनुच्छेद, न्यायिक निर्णय और संवैधानिक संशोधन को ध्यान में रखना चाहिए।
मौलिक अधिकार और DPSP को पूरी तरह विरोधी व्यवस्थाएँ मानना सही नहीं है। संवैधानिक व्याख्या में इनके बीच सामंजस्य और संतुलन को महत्व दिया गया है।
संविधान के प्रारंभिक वर्षों में यह प्रश्न उठा कि मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच टकराव होने पर किसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों और संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से इस संबंध की व्याख्या विकसित हुई।
वर्तमान संवैधानिक दृष्टिकोण में दोनों को परस्पर पूरक माना जाता है। मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करते हैं, जबकि DPSP सामाजिक और आर्थिक न्याय के लक्ष्य की ओर राज्य को मार्गदर्शन देते हैं।
Minerva Mills v. Union of India, 1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन को संवैधानिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना।
निर्णय का प्रमुख संदेश यह है कि संविधान के भाग III और भाग IV के बीच सामंजस्य आवश्यक है। किसी एक को दूसरे पर पूर्णतः हावी करने वाली व्याख्या संविधान की मूल संरचना से संबंधित प्रश्न उत्पन्न कर सकती है।
42वाँ संविधान संशोधन व्यापक संशोधनों में से एक था। मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य के अध्ययन में इसके निम्नलिखित प्रावधान महत्वपूर्ण हैं:
44वें संविधान संशोधन ने आपातकालीन अनुभवों के बाद संवैधानिक सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता से संबंधित कई महत्वपूर्ण बदलाव किए।
ये प्रावधान पर्यावरणीय शासन में अलग-अलग भूमिका निभाते हैं। अनुच्छेद 48A राज्य से संबंधित नीति-निदेशक तत्व है, जबकि अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों का मौलिक कर्तव्य है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित संरक्षण न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित हुआ है।
नीति-निदेशक तत्व भारत को ऐसे कल्याणकारी राज्य की दिशा में आगे बढ़ाने का संवैधानिक मार्गदर्शन देते हैं जिसमें केवल राजनीतिक लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय भी महत्वपूर्ण हो।
गरीबी कम करना, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, श्रमिक कल्याण, समान अवसर, कमजोर वर्गों का संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा जैसे उद्देश्य DPSP की व्यापक भावना से जुड़े हैं।
नीति-निदेशक तत्व स्वयं सीधे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन इनके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए संसद और राज्य विधानमंडल कानून बना सकते हैं तथा सरकारें योजनाएँ और नीतियाँ लागू कर सकती हैं।
भारतीय संविधान की संवैधानिक दर्शन को समझने के लिए इन तीनों व्यवस्थाओं का संयुक्त अध्ययन उपयोगी है। मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करते हैं, DPSP सामाजिक तथा आर्थिक न्याय के लक्ष्य की दिशा में राज्य का मार्गदर्शन करते हैं और मौलिक कर्तव्य नागरिकों को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप आचरण करने की प्रेरणा देते हैं।
UPSC के उत्तर लेखन में केवल अनुच्छेदों की सूची देना पर्याप्त नहीं है। किसी प्रश्न के अनुसार संवैधानिक उद्देश्य, संबंधित अनुच्छेद, संशोधन, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक उदाहरण को जोड़ना उत्तर को अधिक विश्लेषणात्मक और प्रभावी बनाता है।