नागरिकता (Citizenship) व्यक्ति और राज्य के बीच स्थापित कानूनी सदस्यता का संबंध है। इसके माध्यम से व्यक्ति राज्य का नागरिक माना जाता है और उसे राजनीतिक सहभागिता सहित विभिन्न संवैधानिक तथा वैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं। नागरिकता के साथ संविधान और कानून के प्रति कुछ दायित्व भी जुड़े होते हैं।
भारतीय संविधान में नागरिकता के दो पक्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। पहला, संविधान के प्रारंभ के समय नागरिक कौन माने जाएंगे; दूसरा, संविधान लागू होने के बाद नागरिकता कैसे प्राप्त होगी और किन परिस्थितियों में समाप्त हो सकती है। पहले पक्ष का उल्लेख संविधान के भाग II में है, जबकि बाद के विषयों को संसद द्वारा बनाए गए नागरिकता अधिनियम, 1955 के माध्यम से विनियमित किया जाता है।
नागरिकता को केवल राष्ट्रीय पहचान या निवास के समान नहीं समझना चाहिए। किसी व्यक्ति का भारत में रहना अपने आप उसे भारतीय नागरिक नहीं बनाता। इसी प्रकार, भारतीय नागरिक का किसी विशेष राज्य में निवास करना अलग राज्य की नागरिकता उत्पन्न नहीं करता।
भारत में संघीय शासन व्यवस्था होने के बावजूद एकल नागरिकता (Single Citizenship) का सिद्धांत अपनाया गया है। व्यक्ति भारत का नागरिक होता है, किसी राज्य का पृथक संवैधानिक नागरिक नहीं।
उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश का भारतीय नागरिक महाराष्ट्र में जाकर बसता है, तो वह महाराष्ट्र का अलग नागरिक नहीं बन जाता। हालांकि, कुछ वैधानिक उद्देश्यों के लिए निवास, अधिवास, स्थानीय पात्रता या राज्य से संबंधित शर्तें लागू हो सकती हैं। इसलिए एकल नागरिकता का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक सरकारी योजना या पद के लिए पूरे देश में हर व्यक्ति की पात्रता की शर्तें हमेशा समान होंगी।
भारतीय संविधान के भाग II (Part II), अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता से संबंधित प्रावधान हैं। ये मुख्यतः 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय नागरिकता निर्धारित करने और संसद की कानून बनाने की शक्ति से संबंधित हैं।
| अनुच्छेद | विषय | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
| अनुच्छेद 5 | संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता | अधिवास और जन्म, माता-पिता के जन्म अथवा निवास से संबंधित निर्धारित शर्तें। |
| अनुच्छेद 6 | पाकिस्तान से भारत आए व्यक्ति | विभाजन के समय प्रवास से संबंधित विशेष प्रावधान। |
| अनुच्छेद 7 | भारत से पाकिस्तान गए व्यक्ति | निर्धारित परिस्थितियों और पुनर्वास परमिट से संबंधित प्रावधान। |
| अनुच्छेद 8 | विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्ति | निर्धारित शर्तों के अधीन भारतीय राजनयिक या वाणिज्य दूतावास में पंजीकरण। |
| अनुच्छेद 9 | विदेशी नागरिकता स्वेच्छा से ग्रहण करना | स्वेच्छा से विदेशी राज्य की नागरिकता ग्रहण करने वाले व्यक्ति पर भारतीय नागरिकता संबंधी प्रतिबंध। |
| अनुच्छेद 10 | नागरिकता अधिकारों की निरंतरता | भाग II के अधीन नागरिक माने गए व्यक्तियों की नागरिकता संसद के कानून के अधीन जारी रहती है। |
| अनुच्छेद 11 | संसद की विधायी शक्ति | नागरिकता के अर्जन, समाप्ति और संबंधित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति। |
UPSC तथ्य: संविधान के अनुच्छेद 5 से 8 मुख्यतः संविधान लागू होने के समय की नागरिकता से संबंधित ऐतिहासिक प्रावधान हैं। वर्तमान समय में नागरिकता प्राप्त करने और समाप्त होने की सामान्य प्रक्रिया के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 पढ़ना आवश्यक है।
अनुच्छेद 5 के अनुसार, संविधान के प्रारंभ के समय भारत में अधिवास (Domicile) रखने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक माना जा सकता था, यदि वह निम्नलिखित में से कोई एक शर्त पूरी करता था:
यहाँ अधिवास की शर्त महत्वपूर्ण है। केवल इनमें से किसी एक तथ्य का उल्लेख करके अनुच्छेद 5 की पूरी शर्त नहीं समझी जा सकती; भारत में अधिवास और ऊपर दी गई तीन वैकल्पिक शर्तों में से एक का पूरा होना आवश्यक था।
विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए कुछ व्यक्तियों की नागरिकता निर्धारित करने के लिए अनुच्छेद 6 में विशेष प्रावधान किए गए। इसमें व्यक्ति या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी में से किसी के अविभाजित भारत में जन्म से संबंधित शर्तें भी महत्वपूर्ण थीं।
इस अनुच्छेद में 19 जुलाई 1948 की तारीख महत्वपूर्ण है। इस तारीख से पहले भारत आए व्यक्तियों और इसके बाद भारत आए व्यक्तियों के लिए अलग-अलग शर्तें निर्धारित की गई थीं। बाद में आने वाले व्यक्तियों के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पंजीकरण आवश्यक था।
यह विभाजनकालीन संवैधानिक प्रावधान है; इसे वर्तमान समय में भारत आने वाले प्रत्येक विदेशी व्यक्ति पर लागू सामान्य नागरिकता प्रक्रिया नहीं समझना चाहिए।
अनुच्छेद 7 उन व्यक्तियों से संबंधित है जो 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चले गए थे। सामान्य नियम के अनुसार ऐसे व्यक्तियों को अनुच्छेद 5 या 6 के आधार पर भारतीय नागरिक नहीं माना जाता था।
हालांकि, पुनर्वास या स्थायी वापसी के लिए परमिट के आधार पर भारत लौटने वाले कुछ व्यक्तियों के लिए अपवाद निर्धारित किया गया था। ऐसे मामलों में नागरिकता का निर्धारण अनुच्छेद 7 की शर्तों के अनुसार किया जाता था।
अनुच्छेद 8 भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के कुछ व्यक्तियों से संबंधित है। यदि व्यक्ति, उसके माता-पिता या दादा-दादी में से कोई अविभाजित भारत में जन्मा था, तो निर्धारित शर्तें पूरी करने पर वह भारतीय राजनयिक या वाणिज्य दूतावास में पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्त कर सकता था।
इस प्रावधान को वर्तमान नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत उपलब्ध सभी पंजीकरण श्रेणियों के समान नहीं मानना चाहिए; अनुच्छेद 8 का संदर्भ संविधान के प्रारंभ के समय की नागरिकता है।
अनुच्छेद 9: यदि किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर ली, तो वह अनुच्छेद 5, 6 या 8 के आधार पर भारतीय नागरिक नहीं माना जाएगा।
अनुच्छेद 10: भाग II के अंतर्गत नागरिक माने गए व्यक्तियों की नागरिकता जारी रहने का प्रावधान करता है, लेकिन यह संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन है।
अनुच्छेद 11: संसद को नागरिकता के अर्जन, समाप्ति तथा उससे संबंधित अन्य विषयों पर कानून बनाने की शक्ति देता है। इसी संवैधानिक आधार पर नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया गया।
नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955) भारतीय नागरिकता प्राप्त करने, नागरिकता के पंजीकरण, देशीयकरण, त्याग, समाप्ति और वंचन से संबंधित प्रमुख कानून है।
इस अधिनियम में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं। इसलिए नागरिकता संबंधी प्रश्नों का उत्तर देते समय केवल 1955 के मूल कानून को नहीं, बल्कि लागू संशोधनों और नियमों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
नागरिकता प्राप्त करने के पाँच प्रमुख वैधानिक तरीके हैं:
भारत में जन्म लेना प्रत्येक परिस्थिति में भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। नागरिकता का निर्धारण जन्म की तारीख और नागरिकता अधिनियम में लागू माता-पिता संबंधी शर्तों के आधार पर किया जाता है।
| जन्म की अवधि | प्रमुख कानूनी शर्त |
|---|---|
| 26 जनवरी 1950 से 30 जून 1987 | सामान्यतः भारत में जन्म पर्याप्त था; कानून में दिए गए अपवाद लागू होते थे। |
| 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 | भारत में जन्म के साथ माता या पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना आवश्यक हुआ। |
| 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद | भारत में जन्म के साथ माता-पिता की नागरिकता और अवैध प्रवासी से संबंधित अतिरिक्त शर्तें लागू होती हैं। |
3 दिसंबर 2004 या उसके बाद जन्मे व्यक्ति के मामले में सामान्यतः माता-पिता दोनों भारतीय नागरिक होने चाहिए, अथवा माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो। कानून में निर्धारित अपवाद और विशेष परिस्थितियाँ भी ध्यान देने योग्य हैं।
परीक्षा बिंदु: जन्म द्वारा नागरिकता में समय के साथ शर्तें अधिक विशिष्ट हुई हैं। इसलिए यह कथन कि भारत में जन्मा प्रत्येक व्यक्ति स्वतः भारतीय नागरिक है, सही नहीं है।
वंश द्वारा नागरिकता (Citizenship by Descent) भारत के बाहर जन्मे व्यक्ति की नागरिकता से संबंधित है। इसमें जन्म की तारीख, माता-पिता की भारतीय नागरिकता और निर्धारित मामलों में भारतीय वाणिज्य दूतावास में जन्म का पंजीकरण महत्वपूर्ण हो सकता है।
10 दिसंबर 1992 से पहले विदेश में जन्मे व्यक्ति के मामले में सामान्यतः पिता की नागरिकता से संबंधित प्रावधान लागू थे। इसके बाद कानून में माता या पिता में से किसी एक की भारतीय नागरिकता को मान्यता दी गई। 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद जन्मे व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त पंजीकरण और अन्य शर्तें लागू हो सकती हैं।
विदेश में जन्म के हर मामले में नागरिकता स्वतः मान लेना उचित नहीं है। संबंधित जन्म-तिथि पर लागू कानून और आवश्यक पंजीकरण की शर्तों की जाँच करनी चाहिए।
नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अंतर्गत निर्धारित श्रेणियों के कुछ व्यक्तियों को आवेदन, पात्रता और अन्य वैधानिक शर्तें पूरी करने पर पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त हो सकती है।
इनमें कानून के अनुसार निर्धारित श्रेणियाँ शामिल हो सकती हैं:
केवल किसी श्रेणी से संबंधित होना नागरिकता की स्वतः गारंटी नहीं है। प्रत्येक मामले में लागू धारा, निर्धारित निवास अवधि, आवेदन प्रक्रिया और अन्य कानूनी शर्तें देखना आवश्यक है।
देशीयकरण (Naturalisation) के माध्यम से कोई विदेशी व्यक्ति नागरिकता अधिनियम की धारा 6 और संबंधित अनुसूची में निर्धारित शर्तें पूरी करने पर भारतीय नागरिकता के लिए पात्र हो सकता है।
सामान्य पात्रता में निम्नलिखित विषय महत्वपूर्ण हैं:
सामान्य देशीयकरण में आवेदन से पहले के बारह महीनों का निवास और उससे पहले के चौदह वर्षों में कुल ग्यारह वर्षों की निर्धारित निवास या सरकारी सेवा संबंधी शर्त महत्वपूर्ण है। कानून में विशेष अपवाद भी हो सकते हैं।
निर्धारित शर्तें पूरी होने पर भी नागरिकता प्रदान करना कानून के अधीन केंद्र सरकार की प्रक्रिया है; इसे केवल भारत में लंबे समय तक रहने से स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं मानना चाहिए।
नागरिकता अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत, जब कोई क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है, तो केंद्र सरकार आदेश द्वारा उस क्षेत्र से संबंधित व्यक्तियों की नागरिकता निर्धारित कर सकती है।
गोवा, दमन और दीव जैसे क्षेत्रों के भारत में एकीकरण का ऐतिहासिक संदर्भ इस विषय को समझने में उपयोगी है। ऐसे मामलों में संबंधित क्षेत्र के अधिग्रहण, एकीकरण और लागू कानूनी आदेशों को ध्यान में रखना चाहिए।
नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत नागरिकता समाप्त होने के तीन प्रमुख तरीके हैं:
नागरिकता अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत कोई भारतीय नागरिक निर्धारित घोषणा और प्रक्रिया के माध्यम से अपनी नागरिकता का त्याग कर सकता है।
सामान्यतः नागरिकता के त्याग से संबंधित घोषणा स्वीकार किए जाने पर व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं रहता। संबंधित कानून में नाबालिग बच्चों की नागरिकता पर भी प्रभाव का प्रावधान है। ऐसे बच्चे निर्धारित आयु प्राप्त करने के बाद कानून में दी गई शर्तों के अधीन भारतीय नागरिकता पुनः प्राप्त करने की घोषणा कर सकते हैं।
नागरिकता अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त करता है, तो निर्धारित कानूनी शर्तों के अनुसार उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो सकती है।
इस प्रावधान से भारत की सामान्य दोहरी नागरिकता-विरोधी व्यवस्था स्पष्ट होती है। किसी विदेशी पासपोर्ट या विदेशी नागरिकता को स्वेच्छा से ग्रहण करने का प्रश्न उत्पन्न होने पर तथ्य और संबंधित कानून की जाँच आवश्यक है।
नागरिकता अधिनियम की धारा 10 के अंतर्गत, कानून में निर्दिष्ट परिस्थितियों में केंद्र सरकार कुछ ऐसे व्यक्तियों को भारतीय नागरिकता से वंचित कर सकती है जिन्होंने पंजीकरण या देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त की हो।
कानून में निर्धारित आधारों के उदाहरण हैं:
महत्वपूर्ण: वंचन के आधार सभी भारतीय नागरिकों पर एक समान रूप से लागू नहीं होते। कानून की धारा 10 में निर्धारित पात्र व्यक्तियों, आधारों और प्रक्रिया को ध्यान में रखना आवश्यक है।
भारतीय संविधान के भाग III में कुछ मौलिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं, जबकि कुछ अधिकार सभी व्यक्तियों को प्राप्त होते हैं। यहाँ “व्यक्ति” में सामान्यतः विदेशी भी शामिल होते हैं, यद्यपि कुछ अधिकारों के अपने विशिष्ट अपवाद हैं।
| अनुच्छेद | अधिकार का विषय | किसे प्राप्त |
|---|---|---|
| 14 | विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण | सभी व्यक्ति |
| 15 | निर्दिष्ट आधारों पर भेदभाव का निषेध | नागरिक |
| 16 | सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता | नागरिक |
| 19 | छह स्वतंत्रताएँ | नागरिक |
| 20 | अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण | सभी व्यक्ति |
| 21 | जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण | सभी व्यक्ति |
| 21A | 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा | निर्धारित आयु के बच्चे |
| 22 | गिरफ्तारी और निरोध के संबंध में संरक्षण | सामान्यतः सभी व्यक्ति; संवैधानिक अपवाद लागू |
| 23–24 | शोषण के विरुद्ध अधिकार | व्यक्तियों के लिए संवैधानिक संरक्षण |
| 25–28 | धार्मिक स्वतंत्रता | संबंधित अनुच्छेद की शर्तों के अधीन व्यक्ति या धार्मिक संप्रदाय |
| 29 | विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण; प्रवेश में निर्दिष्ट भेदभाव का निषेध | अनुच्छेद के संबंधित खंड के अनुसार नागरिकों के वर्ग |
| 30 | अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार | धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यक |
ध्यान दें: अनुच्छेद 29 और 30 को एक जैसा नहीं समझना चाहिए। अनुच्छेद 29(1) विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति वाले नागरिकों के किसी वर्ग के संरक्षण से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करता है।
अनुच्छेद 19(1) भारतीय नागरिकों को छह स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है। ये स्वतंत्रताएँ पूर्ण या असीमित नहीं हैं; संविधान के अनुच्छेद 19(2) से 19(6) के अंतर्गत संबंधित स्वतंत्रता के अनुसार युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
प्रतिबंधों के आधार सभी छह स्वतंत्रताओं के लिए समान नहीं हैं। उदाहरण के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) में संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि और अपराध के लिए उकसावे जैसे आधार दिए गए हैं।
अनुच्छेद 16 राज्य के अधीन रोजगार या पद से संबंधित मामलों में नागरिकों के लिए अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। यह सार्वजनिक रोजगार में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, वंश, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी आधार पर संविधान-विरुद्ध भेदभाव को रोकता है, जहाँ संबंधित संवैधानिक प्रावधान लागू होते हैं।
संविधान सामाजिक न्याय और पर्याप्त प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से कुछ विशेष प्रावधानों तथा आरक्षण की अनुमति देता है। अनुच्छेद 16(3) के अंतर्गत संसद कानून द्वारा कुछ पदों के लिए निवास संबंधी आवश्यकताएँ निर्धारित कर सकती है।
इसलिए अवसर की समानता का अर्थ यह नहीं है कि सार्वजनिक रोजगार में सभी प्रकार के आरक्षण या विशेष संवैधानिक प्रावधान निषिद्ध हैं।
नागरिकता राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण है। मतदान, चुनाव लड़ने और कई संवैधानिक पदों के लिए पात्रता में भारतीय नागरिक होना आवश्यक है। हालांकि, नागरिक होना मात्र प्रत्येक पद के लिए पर्याप्त नहीं है; आयु, निर्वाचन क्षेत्र, मतदाता सूची में नाम और अन्य वैधानिक शर्तें भी लागू होती हैं।
संविधान का अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में वयस्क मताधिकार के सिद्धांत से संबंधित है। सामान्यतः 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का भारतीय नागरिक, यदि निर्वाचन कानून के अंतर्गत अयोग्य नहीं है और मतदाता सूची में विधिवत पंजीकृत है, तो मतदान कर सकता है।
61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 ने मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की। यह परिवर्तन 1989 में प्रभावी हुआ।
UPSC तथ्य: मतदान का अधिकार सामान्यतः मौलिक अधिकार नहीं माना जाता। यह संवैधानिक आधार और निर्वाचन संबंधी कानूनों द्वारा विनियमित अधिकार है। मतदान का वास्तविक प्रयोग मतदाता सूची में पंजीकरण और अन्य लागू शर्तों पर निर्भर करता है।
भारत सामान्य अर्थ में पूर्ण दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) की अनुमति नहीं देता। भारतीय नागरिक द्वारा स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता प्राप्त करने पर नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत भारतीय नागरिकता समाप्त होने का प्रावधान लागू हो सकता है।
विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के पात्र व्यक्तियों के लिए OCI (Overseas Citizen of India) कार्ड की व्यवस्था है। OCI कार्डधारक विदेशी नागरिक ही रहता है; उसे भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं होती।
OCI को भारतीय नागरिकता या भारत की पूर्ण दोहरी नागरिकता का पर्याय नहीं समझना चाहिए। OCI कार्ड से मिलने वाली सुविधाएँ नागरिकता अधिनियम, संबंधित नियमों और लागू सरकारी अधिसूचनाओं के अधीन होती हैं।
OCI कार्डधारक को कानून के अनुसार भारत आने और रहने से संबंधित कुछ सुविधाएँ तथा निर्धारित क्षेत्रों में कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हो सकते हैं। फिर भी वह भारतीय नागरिक के समान सभी अधिकारों का अधिकारी नहीं होता।
OCI की सुविधाओं को समझते समय किसी एक सुविधा को सभी क्षेत्रों में समान रूप से लागू नहीं मानना चाहिए। संबंधित नियम और अधिसूचनाएँ निर्णायक होती हैं।
PIO (Person of Indian Origin) भारतीय मूल के कुछ विदेशी व्यक्तियों से संबंधित पुरानी कार्ड योजना थी। सरकार ने PIO कार्ड योजना को OCI योजना में मिला दिया। वर्तमान व्यवस्था में OCI कार्ड प्रमुख योजना है।
PIO और OCI शब्दों का ऐतिहासिक संदर्भ अलग है; दोनों को भारतीय नागरिकता के समान नहीं माना जा सकता।
नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (Citizenship Amendment Act, 2019) ने नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन किया। इसके अंतर्गत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई समुदायों के कुछ व्यक्तियों के लिए नागरिकता प्राप्त करने संबंधी विशेष प्रावधान किए गए।
यह प्रावधान उन पात्र व्यक्तियों से संबंधित है जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत में प्रवेश किया था और कानून में निर्धारित अन्य शर्तें पूरी करते हैं। इन प्रावधानों का लाभ प्रत्येक विदेशी व्यक्ति या इन तीन देशों से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्वतः नहीं मिलता।
संशोधन में निर्दिष्ट समुदायों के पात्र व्यक्तियों को अवैध प्रवासी संबंधी परिभाषा से विशेष छूट तथा नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में कुछ बदलाव दिए गए। अधिनियम में निर्दिष्ट क्षेत्रों से संबंधित अपवाद भी हैं।
10 मार्च 2024 को नागरिकता संशोधन नियम, 2024 अधिसूचित किए गए। CAA का अध्ययन करते समय अधिनियम के प्रावधानों, नियमों और पात्रता शर्तों में अंतर करना आवश्यक है।
परीक्षा दृष्टिकोण: CAA, 2019 को नागरिकता अधिनियम में किया गया संशोधन समझना चाहिए। इसे भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के पाँच पारंपरिक तरीकों से अलग किसी छठे सामान्य तरीके के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
नागरिकता अधिनियम, 1955 में अवैध प्रवासी की अवधारणा महत्वपूर्ण है। सामान्यतः ऐसा विदेशी व्यक्ति जो वैध पासपोर्ट या अन्य निर्धारित यात्रा दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवेश करता है, अथवा वैध दस्तावेजों के साथ प्रवेश करने के बाद अनुमत अवधि से अधिक भारत में रहता है, कानून में निर्धारित शर्तों के अनुसार अवैध प्रवासी की श्रेणी में आ सकता है।
अवैध प्रवासी की स्थिति का प्रभाव नागरिकता के कुछ मार्गों पर पड़ सकता है। हालांकि, CAA में निर्दिष्ट पात्र व्यक्तियों के लिए विशेष वैधानिक प्रावधान किए गए हैं। इसलिए सामान्य नियम और विशेष अपवादों को अलग-अलग समझना चाहिए।
नागरिकता और अधिवास संबंधित लेकिन अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं। नागरिकता राज्य की कानूनी सदस्यता को दर्शाती है, जबकि अधिवास सामान्यतः उस स्थान से संबंधित कानूनी संबंध है जिसे व्यक्ति अपना स्थायी घर मानता है और जहाँ लौटने की स्थायी मंशा रखता है।
राष्ट्रीयता (Nationality) और नागरिकता को सामान्य बातचीत में कई बार समान अर्थ में प्रयोग किया जाता है। हालांकि, कानूनी संदर्भ में राष्ट्रीयता किसी व्यक्ति और राष्ट्र के बीच व्यापक संबंध को व्यक्त कर सकती है, जबकि नागरिकता राज्य की औपचारिक कानूनी सदस्यता और उससे जुड़े अधिकारों तथा दायित्वों पर अधिक केंद्रित होती है।
भारतीय संविधान और नागरिकता अधिनियम के प्रश्नों में मुख्यतः नागरिकता की संवैधानिक तथा वैधानिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
नागरिकता केवल अधिकारों तक सीमित नहीं है। संविधान के भाग IVA, अनुच्छेद 51A में भारतीय नागरिकों के मौलिक कर्तव्य दिए गए हैं। इन्हें 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था। मूल रूप से दस कर्तव्य थे; 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा ग्यारहवाँ कर्तव्य जोड़ा गया।
मौलिक कर्तव्य सामान्यतः अपने आप न्यायालय में सीधे लागू नहीं कराए जा सकते, लेकिन संसद या राज्य विधानमंडल इनके अनुरूप कानून बना सकते हैं। न्यायालय भी कानून की व्याख्या करते समय परिस्थितियों के अनुसार मौलिक कर्तव्यों को ध्यान में रख सकते हैं।
नागरिकता लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति और राज्य के बीच कानूनी संबंध की आधारभूत संस्था है। यह राजनीतिक सहभागिता, संवैधानिक अधिकारों और राज्य के प्रति दायित्वों को समझने में सहायता करती है।
भारतीय संदर्भ में नागरिकता का समग्र अध्ययन करने के लिए संविधान के भाग II, नागरिकता अधिनियम, 1955, मौलिक अधिकारों, निर्वाचन संबंधी प्रावधानों तथा OCI और CAA जैसे विषयों को परस्पर संबंधित रूप में समझना चाहिए।
UPSC में इस विषय से सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के साथ-साथ कथन-आधारित प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं। विशेष रूप से नागरिकता प्राप्ति की तारीख-आधारित शर्तें, नागरिकता समाप्ति की तीन प्रक्रियाएँ, नागरिक और विदेशी के अधिकारों में अंतर, तथा OCI और भारतीय नागरिकता के बीच अंतर का पुनरावर्तन उपयोगी है।