संविधान किसी राज्य की शासन-व्यवस्था का मूल विधिक ढाँचा है। यह शासन की प्रमुख संस्थाओं की संरचना, उनकी शक्तियों एवं सीमाओं, केंद्र और राज्यों के संबंधों तथा नागरिकों के अधिकारों से संबंधित मूल नियम निर्धारित करता है।
संविधान यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक सत्ता किसे प्राप्त होगी, उसका प्रयोग किस प्रक्रिया से किया जाएगा और सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-से संवैधानिक नियंत्रण उपलब्ध होंगे। भारत में संविधान सर्वोच्च विधिक आधार है और सभी राज्य संस्थाएँ अपनी शक्तियों का प्रयोग इसके अनुरूप करती हैं।
संविधान केवल शासन चलाने की नियम-पुस्तिका नहीं है। यह राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ न्याय, स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक परिवर्तन और नागरिक गरिमा से जुड़े आदर्शों को भी अभिव्यक्त करता है।
संविधान किसी राज्य की मूल शासन-व्यवस्था निर्धारित करता है, जबकि संविधानवाद का केंद्रीय विचार यह है कि सरकार की शक्ति सीमित होनी चाहिए और उसका प्रयोग संविधान, कानून तथा जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।
किसी देश में लिखित संविधान होना अपने-आप में प्रभावी संविधानवाद की गारंटी नहीं है। संविधानवाद इस बात पर भी निर्भर करता है कि शासन वास्तव में संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करता है या नहीं।
भारतीय संविधान का निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित संवैधानिक कानूनों, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभवों तथा संविधान सभा की विचार-विमर्श प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में हुआ। विभिन्न अधिनियमों ने प्रशासनिक संस्थाओं, विधायी व्यवस्था, प्रतिनिधित्व और केंद्र-प्रांत संबंधों को अलग-अलग रूपों में प्रभावित किया।
| अधिनियम | प्रमुख प्रावधान या महत्त्व |
|---|---|
| रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 | ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण बढ़ा; बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल बनाने की दिशा में कदम उठाया गया। |
| पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 | कंपनी के राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ा और नियंत्रण बोर्ड की व्यवस्था की गई। |
| चार्टर एक्ट, 1813 | भारत के व्यापार में कंपनी के एकाधिकार को व्यापक रूप से समाप्त किया गया; चाय और चीन के व्यापार से संबंधित अपवाद बने रहे। |
| चार्टर एक्ट, 1833 | बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल बनाया गया; विधायी केंद्रीकरण को बढ़ावा मिला। |
| भारत शासन अधिनियम, 1858 | कंपनी शासन समाप्त हुआ और भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया। |
| भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 | मॉर्ले-मिंटो सुधार; मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई। |
| भारत शासन अधिनियम, 1919 | प्रांतों में द्वैध शासन लागू हुआ और केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था की गई। |
| भारत शासन अधिनियम, 1935 | प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय योजना तथा प्रशासनिक प्रावधानों का विकास; भारतीय संविधान के कई प्रावधानों पर इसका प्रभाव पड़ा। |
| भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 | भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने; ब्रिटिश शासन की संवैधानिक सत्ता समाप्त हुई। |
परीक्षा उपयोगिता: भारत शासन अधिनियम, 1935 का प्रभाव भारतीय संघीय व्यवस्था, राज्यपाल के पद, लोक सेवा आयोग तथा प्रशासनिक ढाँचे जैसे विषयों के अध्ययन में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि स्वतंत्र भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा निर्मित एक स्वतंत्र संवैधानिक दस्तावेज है।
संविधान सभा का गठन 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर हुआ। इसके सदस्य प्रत्यक्ष सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से निर्वाचित नहीं हुए थे। प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों ने आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के आधार पर प्रांतीय प्रतिनिधियों का चुनाव किया। देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की अलग व्यवस्था थी।
विभाजन के बाद संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गई। संविधान निर्माण में विभिन्न समितियों, बहसों, संशोधन प्रस्तावों और सार्वजनिक हितों पर विचार-विमर्श की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। संविधान सभा ने इसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया।
उद्देश्य प्रस्ताव ने स्वतंत्र भारत की संवैधानिक दिशा को स्पष्ट किया। इसमें भारत की स्वतंत्र और संप्रभु राजनीतिक स्थिति, जनता से प्राप्त सत्ता, न्याय, समानता, स्वतंत्रता तथा अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के हितों की सुरक्षा जैसे विचार शामिल थे।
प्रस्तावना के आदर्शों और भाषा के विकास में उद्देश्य प्रस्ताव की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इसे प्रस्तावना के वैचारिक आधार के रूप में समझा जा सकता है, हालाँकि दोनों को शब्दशः समान नहीं मानना चाहिए।
संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे। संविधान के कुछ प्रावधान 26 नवंबर 1949 को ही लागू हो गए थे, जबकि संविधान का अधिकांश भाग 26 जनवरी 1950 को प्रभावी हुआ।
26 जनवरी की तिथि चुनने का संबंध 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा मनाए गए पूर्ण स्वराज्य दिवस से था। इस प्रकार संविधान लागू करने की तिथि स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी है।
प्रस्तावना संविधान के मूल दर्शन, उद्देश्यों और राजनीतिक आदर्शों का संक्षिप्त परिचय देती है। इसकी शुरुआत “हम, भारत के लोग” शब्दों से होती है।
ये शब्द इस विचार को व्यक्त करते हैं कि संविधान की राजनीतिक वैधता का मूल स्रोत भारत की जनता है। प्रस्तावना भारत के संवैधानिक स्वरूप तथा न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों को स्पष्ट करती है।
प्रस्तावना संविधान के प्रावधानों की व्याख्या में मार्गदर्शक हो सकती है, लेकिन इसे अपने-आप में किसी स्वतंत्र सरकारी शक्ति या सीधे प्रवर्तनीय अधिकार का स्रोत नहीं माना जाता।
“समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़े गए। इससे पहले भी संविधान में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय से संबंधित अनेक प्रावधान मौजूद थे।
संप्रभुता का अर्थ है कि भारत किसी दूसरे राज्य की राजनीतिक सत्ता के अधीन नहीं है। भारत अपनी घरेलू नीतियों और विदेश नीति के संबंध में स्वतंत्र निर्णय ले सकता है।
अंतरराष्ट्रीय संधियों और संगठनों में भाग लेना संप्रभुता के स्वतः समाप्त होने का संकेत नहीं है। भारत अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को स्वीकार करते हुए भी एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य बना रहता है।
भारतीय संदर्भ में समाजवाद का संबंध सामाजिक और आर्थिक न्याय, अवसरों की समानता, असमानताओं को कम करने तथा कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा से है।
भारतीय संविधान किसी एक कठोर आर्थिक मॉडल को अनिवार्य नहीं करता। भारत में लोकतंत्र, निजी आर्थिक गतिविधियों, सार्वजनिक क्षेत्र, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित नीतियों का विकास संवैधानिक उद्देश्यों तथा राजनीतिक निर्णयों के अनुसार हुआ है।
भारतीय पंथनिरपेक्षता का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता को संवैधानिक आधार देना है। भारत में राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है।
धार्मिक स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित नहीं है। इसके प्रयोग पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य तथा अन्य मौलिक अधिकारों से संबंधित संवैधानिक सीमाएँ लागू हो सकती हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता का स्रोत जनता होती है। भारत में जनता निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। संवैधानिक लोकतंत्र में अधिकारों की रक्षा, संस्थाओं की स्वतंत्रता, जवाबदेही और कानून के अनुसार शासन भी महत्त्वपूर्ण हैं।
गणराज्य में राज्य का प्रमुख वंशानुगत राजा नहीं होता। भारत में राष्ट्रपति राज्य का संवैधानिक प्रमुख है और उसका पद वंशानुगत नहीं है।
भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होता है। इसलिए भारत की गणराज्यात्मक व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हुई है।
प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना का लक्ष्य प्रस्तुत करती है।
प्रस्तावना विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त करती है। स्वतंत्रता का अर्थ मनमाने या असीमित आचरण की अनुमति नहीं है; संवैधानिक अधिकारों पर वैध और उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।
समानता का उद्देश्य स्थिति और अवसर की समानता स्थापित करना है। वास्तविक समानता के लिए कभी-कभी ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों के पक्ष में विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हो सकते हैं। इसलिए समानता का अर्थ प्रत्येक परिस्थिति में बिल्कुल समान व्यवहार करना नहीं है।
बंधुता नागरिकों में भाईचारे, पारस्परिक सम्मान और साझा राष्ट्रीय पहचान की भावना को बढ़ावा देती है। प्रस्तावना इसे व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता से जोड़ती है।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है। संसद संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है, लेकिन ऐसा संशोधन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकता।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़े गए तथा “राष्ट्र की एकता” से संबंधित अभिव्यक्ति को “राष्ट्र की एकता और अखंडता” किया गया।
भारतीय शासन-व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च विधिक आधार है। संसद, राज्य विधानमंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका सहित सभी राज्य संस्थाएँ संविधान से प्राप्त शक्तियों तथा निर्धारित सीमाओं के अधीन कार्य करती हैं।
यदि कोई कानून या सरकारी कार्रवाई संविधान के विरुद्ध हो, तो सक्षम न्यायालय उचित मामले में उसकी संवैधानिकता की समीक्षा कर सकता है। संविधान की सर्वोच्चता का संबंध केवल कानूनों की वैधता से नहीं, बल्कि सार्वजनिक सत्ता के संवैधानिक प्रयोग से भी है।
विधि के शासन का अर्थ है कि सरकार का संचालन कानून के अनुसार हो, न कि किसी व्यक्ति की मनमानी इच्छा के अनुसार। कोई भी सार्वजनिक प्राधिकारी अपनी कानूनी और संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कार्य नहीं कर सकता।
विधि का शासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, न्यायिक समीक्षा तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों से निकटता से जुड़ा हुआ है।
शासन की प्रमुख संस्थाओं में विधायी, कार्यकारी और न्यायिक कार्यों का विभाजन सत्ता के केंद्रीकरण को सीमित करने में सहायता करता है।
भारत में शक्तियों का कठोर और पूर्ण पृथक्करण नहीं है। संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका से घनिष्ठ रूप से जुड़ी है। इसके बावजूद न्यायिक समीक्षा, संसदीय नियंत्रण और अन्य संवैधानिक व्यवस्थाएँ संस्थागत नियंत्रण एवं संतुलन स्थापित करती हैं।
भारत ने संसदीय शासन प्रणाली अपनाई है। संघ स्तर पर राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, जबकि प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है।
संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका का विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व एक प्रमुख विशेषता है। यह राष्ट्रपति प्रणाली से महत्त्वपूर्ण अंतर है, जहाँ कार्यपालिका का गठन और कार्यकाल सामान्यतः विधायिका से अलग आधार पर निर्धारित होता है।
भारतीय संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन करता है। इसी कारण भारत में संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ मौजूद हैं। दूसरी ओर, कुछ प्रावधान केंद्र को अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति प्रदान करते हैं।
संघीय विशेषताएँ:
मजबूत केंद्र से संबंधित विशेषताएँ:
भारत को संघीय या एकात्मक व्यवस्था के केवल एक छोर पर रखना उचित नहीं है। भारतीय संघवाद में संवैधानिक शक्तिविभाजन, सहयोग और कुछ परिस्थितियों में केंद्रीय प्रभुत्व—तीनों के तत्व मिलते हैं।
भारतीय संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में राज्य को मार्गदर्शन देता है। मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य इस संवैधानिक दृष्टि के अलग-अलग लेकिन परस्पर संबंधित भाग हैं।
| आधार | मौलिक अधिकार | नीति-निदेशक तत्व | मौलिक कर्तव्य |
|---|---|---|---|
| संवैधानिक भाग | भाग III | भाग IV | भाग IVA |
| प्रमुख अनुच्छेद | 12–35 | 36–51 | 51A |
| मुख्य उद्देश्य | स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों की रक्षा | सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की दिशा में राज्य का मार्गदर्शन | जिम्मेदार नागरिकता और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देना |
| किस पर लागू | अधिकार के प्रकार के अनुसार; कुछ सभी व्यक्तियों को, कुछ केवल नागरिकों को | राज्य के नीति-निर्माण और शासन के लिए | केवल भारत के नागरिकों पर |
| न्यायालय द्वारा प्रवर्तन | मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर संवैधानिक उपचार उपलब्ध | अनुच्छेद 37 के अनुसार सीधे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं | सामान्यतः अपने-आप सीधे प्रवर्तनीय नहीं; संबंधित कानूनों से कुछ दायित्व लागू हो सकते हैं |
मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों को परस्पर विरोधी मानना सही नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में इनके बीच संतुलन और सामंजस्य को संवैधानिक व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण माना है।
भारतीय संविधान राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय से जोड़ता है। केवल मतदान का अधिकार पर्याप्त नहीं है, यदि सामाजिक भेदभाव, गरीबी, अशिक्षा और अवसरों की असमानता लोगों की वास्तविक भागीदारी को सीमित करती हो।
सामाजिक न्याय का उद्देश्य केवल औपचारिक समानता स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वंचना और संरचनात्मक असमानताओं को कम करने के लिए संवैधानिक साधनों का उपयोग करना भी है।
न्यायिक पुनरावलोकन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत न्यायालय कानूनों और सरकारी कार्रवाइयों की संवैधानिक वैधता की जाँच करते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक सत्ता का प्रयोग संविधान के अनुरूप हो।
यदि कोई कानून संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो सक्षम न्यायालय उपयुक्त मामले में उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है। न्यायिक समीक्षा संविधान की सर्वोच्चता, मौलिक अधिकारों और संघीय संतुलन की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।
अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जबकि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का दायरा अधिक व्यापक है। दोनों की शक्तियाँ और लागू होने की परिस्थितियाँ समान नहीं हैं।
संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की शक्ति प्राप्त है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत प्रतिपादित किया।
इस सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। संविधान में मूल संरचना की कोई एक संपूर्ण और अंतिम सूची नहीं दी गई है; न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में इसके तत्वों की पहचान की है।
मूल संरचना के रूप में विभिन्न निर्णयों में मान्यता प्राप्त प्रमुख तत्वों में शामिल हैं:
भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी बनाई गई है कि संविधान बदलती परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हो सके, लेकिन उसके मूल प्रावधानों की स्थिरता भी बनी रहे।
संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसे पारित करने के लिए दोनों सदनों की अलग-अलग स्वीकृति आवश्यक होती है; इस प्रक्रिया में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति दी जाती है।
भारत में सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकता की व्यवस्था है। अमेरिका जैसे कुछ संघीय देशों के विपरीत भारत में अलग-अलग राज्यों की स्वतंत्र राज्य नागरिकता नहीं है।
एकल नागरिकता का उद्देश्य पूरे देश में साझा नागरिक पहचान को बढ़ावा देना है। हालाँकि निवास, स्थानीय पात्रता और अन्य वैधानिक शर्तें कुछ विशेष अधिकारों या अवसरों को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था है। अनुच्छेद 326 के अनुसार निर्धारित कानूनी शर्तों को पूरा करने वाले 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के भारतीय नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकते हैं।
61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के माध्यम से मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई। यह परिवर्तन 1989 में प्रभावी हुआ।
लोकतांत्रिक शासन में चुनावों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को प्रदान करता है।
निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका के साथ-साथ चुनावी कानूनों, मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया और संबंधित संस्थागत व्यवस्थाओं का पालन भी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए आवश्यक है।
स्वतंत्र न्यायपालिका का अर्थ है कि न्यायालय अपने न्यायिक निर्णय संवैधानिक और विधिक आधार पर लें तथा उन पर अनुचित बाहरी दबाव न हो।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायाधीशों का कानून से ऊपर होना नहीं है। न्यायिक संस्थाओं को भी संविधान, विधि और निर्धारित जवाबदेही संबंधी व्यवस्थाओं के अंतर्गत कार्य करना होता है।
भारतीय संविधान असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए तीन प्रकार की आपातकालीन व्यवस्थाएँ प्रदान करता है।
आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग संविधान में निर्धारित शर्तों और नियंत्रणों के अधीन है। भारत में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तथा उसके अनुमोदन के लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है।
संविधान निर्माताओं ने अनेक देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। उनसे प्राप्त विचारों को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया गया। इसलिए भारतीय संविधान को केवल विदेशी प्रावधानों की नकल मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।
| स्रोत | प्रमुख रूप से संबंधित प्रावधान या विचार |
|---|---|
| ब्रिटेन | संसदीय शासन प्रणाली, मंत्रिमंडलीय व्यवस्था, विधि का शासन और एकल नागरिकता की अवधारणा। |
| संयुक्त राज्य अमेरिका | मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा और राष्ट्रपति के महाभियोग जैसी व्यवस्थाओं पर प्रभाव। |
| आयरलैंड | राज्य के नीति-निदेशक तत्व। |
| कनाडा | मजबूत केंद्र वाली संघीय व्यवस्था तथा अवशिष्ट शक्तियों से संबंधित दृष्टिकोण। |
| ऑस्ट्रेलिया | समवर्ती सूची, व्यापार-वाणिज्य से संबंधित कुछ प्रावधान और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की व्यवस्था। |
| जर्मनी का वाइमर संविधान | आपातकालीन परिस्थितियों में अधिकारों पर प्रभाव डालने वाली कुछ संवैधानिक अवधारणाओं से संबंधित प्रभाव। |
| दक्षिण अफ्रीका | संविधान संशोधन की कुछ प्रक्रियाएँ और राज्यसभा के सदस्यों के निर्वाचन की पद्धति से संबंधित प्रभाव। |
| पूर्व सोवियत संघ | मौलिक कर्तव्यों और सामाजिक-आर्थिक न्याय की अवधारणाओं पर प्रभाव। |
| फ्रांस | गणराज्य और स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के आदर्शों से संबंधित प्रभाव। |
| जापान | कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया से संबंधित अवधारणा। |
ध्यान दें: किसी प्रावधान का विदेशी स्रोत बताने से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भारतीय संविधान में उसका स्वरूप बिल्कुल वैसा ही है। भारतीय संविधान में इन विचारों को स्थानीय ऐतिहासिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुरूप ढाला गया है।
भारतीय संविधान शासन संस्थाओं की स्थापना के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। यह भेदभाव को चुनौती देने, नागरिकों की गरिमा की रक्षा करने और लोकतांत्रिक भागीदारी का विस्तार करने के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
संविधान को बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होना चाहिए। लेकिन संशोधन की शक्ति का प्रयोग संविधान की मूल पहचान को समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 368 संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करता है, जबकि मूल संरचना सिद्धांत संशोधन की संवैधानिक सीमा को स्पष्ट करता है। दोनों को साथ समझना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की प्रकृति को समझने के लिए आवश्यक है।
ये निर्णय बताते हैं कि भारतीय संविधान की व्याख्या समय के साथ विकसित हुई है। संवैधानिक सिद्धांतों को समझने के लिए निर्णय के वर्ष के साथ-साथ उसका वास्तविक कानूनी निष्कर्ष भी याद रखना चाहिए।
भारतीय संविधान शासन संस्थाओं की संरचना और शक्तियों को निर्धारित करने के साथ-साथ नागरिक अधिकारों, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
इसकी प्रस्तावना भारत के संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य के स्वरूप और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के आदर्शों को व्यक्त करती है।
संघीय व्यवस्था, संसदीय शासन, मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व, मौलिक कर्तव्य, स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक समीक्षा भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख घटक हैं। संविधान संशोधन की प्रक्रिया इसे समय के साथ विकसित होने देती है, जबकि मूल संरचना सिद्धांत इसकी मूल पहचान की रक्षा करता है।
UPSC की तैयारी में केवल तथ्यों और तिथियों को याद करना पर्याप्त नहीं है। संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य, उनके बीच संबंध, न्यायिक व्याख्या और व्यावहारिक प्रशासन में उनका महत्त्व समझना भी आवश्यक है।