Constitution

संविधान

संविधान का अर्थ एवं स्वरूप

संविधान किसी राज्य की शासन-व्यवस्था का मूल विधिक ढाँचा है। यह शासन की प्रमुख संस्थाओं की संरचना, उनकी शक्तियों एवं सीमाओं, केंद्र और राज्यों के संबंधों तथा नागरिकों के अधिकारों से संबंधित मूल नियम निर्धारित करता है।

संविधान यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक सत्ता किसे प्राप्त होगी, उसका प्रयोग किस प्रक्रिया से किया जाएगा और सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-से संवैधानिक नियंत्रण उपलब्ध होंगे। भारत में संविधान सर्वोच्च विधिक आधार है और सभी राज्य संस्थाएँ अपनी शक्तियों का प्रयोग इसके अनुरूप करती हैं।

संविधान केवल शासन चलाने की नियम-पुस्तिका नहीं है। यह राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ न्याय, स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक परिवर्तन और नागरिक गरिमा से जुड़े आदर्शों को भी अभिव्यक्त करता है।

संविधान की आवश्यकता

  • शासन संस्थाओं की संरचना और उनके अधिकार निर्धारित करना।
  • सरकार की शक्तियों पर संवैधानिक सीमाएँ लगाना।
  • नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करना।
  • विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र स्पष्ट करना।
  • केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक एवं वित्तीय संबंध निर्धारित करना।
  • अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों के हितों की संवैधानिक सुरक्षा करना।
  • शासन को वैधता, स्थिरता, निरंतरता और उत्तरदायित्व प्रदान करना।
  • बहुमत के शासन और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना।
  • शांतिपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन तथा संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करना।

संविधान और संविधानवाद (Constitutionalism)

संविधान किसी राज्य की मूल शासन-व्यवस्था निर्धारित करता है, जबकि संविधानवाद का केंद्रीय विचार यह है कि सरकार की शक्ति सीमित होनी चाहिए और उसका प्रयोग संविधान, कानून तथा जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।

  • सरकार की शक्तियों पर प्रभावी संवैधानिक नियंत्रण।
  • विधि का शासन और मनमानी पर रोक।
  • मौलिक अधिकारों की सुरक्षा।
  • स्वतंत्र न्यायपालिका तथा न्यायिक समीक्षा।
  • शासन संस्थाओं के बीच नियंत्रण एवं संतुलन।
  • लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और पारदर्शिता।

किसी देश में लिखित संविधान होना अपने-आप में प्रभावी संविधानवाद की गारंटी नहीं है। संविधानवाद इस बात पर भी निर्भर करता है कि शासन वास्तव में संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करता है या नहीं।

भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान का निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित संवैधानिक कानूनों, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभवों तथा संविधान सभा की विचार-विमर्श प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में हुआ। विभिन्न अधिनियमों ने प्रशासनिक संस्थाओं, विधायी व्यवस्था, प्रतिनिधित्व और केंद्र-प्रांत संबंधों को अलग-अलग रूपों में प्रभावित किया।

अधिनियम प्रमुख प्रावधान या महत्त्व
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण बढ़ा; बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल बनाने की दिशा में कदम उठाया गया।
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 कंपनी के राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ा और नियंत्रण बोर्ड की व्यवस्था की गई।
चार्टर एक्ट, 1813 भारत के व्यापार में कंपनी के एकाधिकार को व्यापक रूप से समाप्त किया गया; चाय और चीन के व्यापार से संबंधित अपवाद बने रहे।
चार्टर एक्ट, 1833 बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल बनाया गया; विधायी केंद्रीकरण को बढ़ावा मिला।
भारत शासन अधिनियम, 1858 कंपनी शासन समाप्त हुआ और भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 मॉर्ले-मिंटो सुधार; मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई।
भारत शासन अधिनियम, 1919 प्रांतों में द्वैध शासन लागू हुआ और केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था की गई।
भारत शासन अधिनियम, 1935 प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय योजना तथा प्रशासनिक प्रावधानों का विकास; भारतीय संविधान के कई प्रावधानों पर इसका प्रभाव पड़ा।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बने; ब्रिटिश शासन की संवैधानिक सत्ता समाप्त हुई।

परीक्षा उपयोगिता: भारत शासन अधिनियम, 1935 का प्रभाव भारतीय संघीय व्यवस्था, राज्यपाल के पद, लोक सेवा आयोग तथा प्रशासनिक ढाँचे जैसे विषयों के अध्ययन में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि स्वतंत्र भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा निर्मित एक स्वतंत्र संवैधानिक दस्तावेज है।

संविधान सभा का गठन

संविधान सभा का गठन 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर हुआ। इसके सदस्य प्रत्यक्ष सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से निर्वाचित नहीं हुए थे। प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों ने आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के आधार पर प्रांतीय प्रतिनिधियों का चुनाव किया। देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की अलग व्यवस्था थी।

  • पहली बैठक: 9 दिसंबर 1946।
  • अस्थायी अध्यक्ष: डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा।
  • स्थायी अध्यक्ष: डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
  • उपाध्यक्ष: एच. सी. मुखर्जी।
  • संवैधानिक सलाहकार: बी. एन. राव।
  • प्रारूप समिति के अध्यक्ष: डॉ. बी. आर. अंबेडकर।

विभाजन के बाद संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गई। संविधान निर्माण में विभिन्न समितियों, बहसों, संशोधन प्रस्तावों और सार्वजनिक हितों पर विचार-विमर्श की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

उद्देश्य प्रस्ताव (Objective Resolution)

जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। संविधान सभा ने इसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया।

उद्देश्य प्रस्ताव ने स्वतंत्र भारत की संवैधानिक दिशा को स्पष्ट किया। इसमें भारत की स्वतंत्र और संप्रभु राजनीतिक स्थिति, जनता से प्राप्त सत्ता, न्याय, समानता, स्वतंत्रता तथा अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के हितों की सुरक्षा जैसे विचार शामिल थे।

प्रस्तावना के आदर्शों और भाषा के विकास में उद्देश्य प्रस्ताव की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इसे प्रस्तावना के वैचारिक आधार के रूप में समझा जा सकता है, हालाँकि दोनों को शब्दशः समान नहीं मानना चाहिए।

संविधान निर्माण की अवधि और महत्त्वपूर्ण तिथियाँ

  • 9 दिसंबर 1946: संविधान सभा की पहली बैठक।
  • 13 दिसंबर 1946: उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।
  • 22 जनवरी 1947: उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकार किया गया।
  • 29 अगस्त 1947: प्रारूप समिति का गठन।
  • 26 नवंबर 1949: संविधान अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया।
  • 24 जनवरी 1950: संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए।
  • 26 जनवरी 1950: संविधान लागू हुआ और भारत गणराज्य बना।

संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे। संविधान के कुछ प्रावधान 26 नवंबर 1949 को ही लागू हो गए थे, जबकि संविधान का अधिकांश भाग 26 जनवरी 1950 को प्रभावी हुआ।

26 जनवरी की तिथि चुनने का संबंध 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा मनाए गए पूर्ण स्वराज्य दिवस से था। इस प्रकार संविधान लागू करने की तिथि स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी है।

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ

  • लिखित एवं विस्तृत संविधान: शासन के अनेक पहलुओं का विस्तृत संवैधानिक वर्णन।
  • संविधान की सर्वोच्चता: सभी राज्य संस्थाएँ संवैधानिक सीमाओं के अधीन।
  • संघीय व्यवस्था: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन।
  • मजबूत केंद्र: संघीय व्यवस्था में केंद्र को अपेक्षाकृत व्यापक शक्तियाँ।
  • संसदीय शासन प्रणाली: मंत्रिपरिषद का लोकसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व।
  • मौलिक अधिकार: व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा।
  • राज्य के नीति-निदेशक तत्व: सामाजिक एवं आर्थिक न्याय के लिए शासन को दिशा।
  • मौलिक कर्तव्य: नागरिकों के संवैधानिक दायित्वों का उल्लेख।
  • स्वतंत्र न्यायपालिका: संविधान की व्याख्या और अधिकारों की रक्षा।
  • न्यायिक समीक्षा: कानूनों और सरकारी कार्रवाइयों की संवैधानिकता की जाँच।
  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: निर्धारित शर्तों के अधीन 18 वर्ष या अधिक आयु के नागरिकों को मतदान का अधिकार।
  • एकल नागरिकता: भारतीय संघ में सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकता।
  • धर्मनिरपेक्षता: धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिकता का संवैधानिक संरक्षण।
  • लोकतांत्रिक गणराज्य: जनता से प्राप्त राजनीतिक सत्ता और गैर-वंशानुगत राष्ट्राध्यक्ष।
  • आपातकालीन प्रावधान: निर्धारित असाधारण परिस्थितियों में विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएँ।
  • संशोधन की मिश्रित प्रक्रिया: अलग-अलग प्रावधानों के लिए अलग संशोधन प्रक्रियाएँ।

संविधान की प्रस्तावना (Preamble)

प्रस्तावना संविधान के मूल दर्शन, उद्देश्यों और राजनीतिक आदर्शों का संक्षिप्त परिचय देती है। इसकी शुरुआत “हम, भारत के लोग” शब्दों से होती है।

ये शब्द इस विचार को व्यक्त करते हैं कि संविधान की राजनीतिक वैधता का मूल स्रोत भारत की जनता है। प्रस्तावना भारत के संवैधानिक स्वरूप तथा न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों को स्पष्ट करती है।

प्रस्तावना संविधान के प्रावधानों की व्याख्या में मार्गदर्शक हो सकती है, लेकिन इसे अपने-आप में किसी स्वतंत्र सरकारी शक्ति या सीधे प्रवर्तनीय अधिकार का स्रोत नहीं माना जाता।

प्रस्तावना में भारत का संवैधानिक स्वरूप

  • संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न (Sovereign): भारत आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने वाला राज्य है।
  • समाजवादी (Socialist): सामाजिक-आर्थिक न्याय और अवसरों की समानता की दिशा में राज्य की प्रतिबद्धता।
  • पंथनिरपेक्ष (Secular): राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं; धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण।
  • लोकतांत्रिक (Democratic): राजनीतिक सत्ता का स्रोत जनता और सरकार का लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व।
  • गणराज्य (Republic): राष्ट्राध्यक्ष का पद वंशानुगत नहीं है।

“समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़े गए। इससे पहले भी संविधान में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय से संबंधित अनेक प्रावधान मौजूद थे।

संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्नता (Sovereignty)

संप्रभुता का अर्थ है कि भारत किसी दूसरे राज्य की राजनीतिक सत्ता के अधीन नहीं है। भारत अपनी घरेलू नीतियों और विदेश नीति के संबंध में स्वतंत्र निर्णय ले सकता है।

अंतरराष्ट्रीय संधियों और संगठनों में भाग लेना संप्रभुता के स्वतः समाप्त होने का संकेत नहीं है। भारत अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को स्वीकार करते हुए भी एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य बना रहता है।

समाजवाद (Socialism)

भारतीय संदर्भ में समाजवाद का संबंध सामाजिक और आर्थिक न्याय, अवसरों की समानता, असमानताओं को कम करने तथा कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा से है।

भारतीय संविधान किसी एक कठोर आर्थिक मॉडल को अनिवार्य नहीं करता। भारत में लोकतंत्र, निजी आर्थिक गतिविधियों, सार्वजनिक क्षेत्र, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित नीतियों का विकास संवैधानिक उद्देश्यों तथा राजनीतिक निर्णयों के अनुसार हुआ है।

पंथनिरपेक्षता (Secularism)

भारतीय पंथनिरपेक्षता का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता को संवैधानिक आधार देना है। भारत में राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है।

  • अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार।
  • धार्मिक संस्थाओं को संविधान के अधीन अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता।
  • धर्म के आधार पर भेदभाव पर संवैधानिक नियंत्रण।
  • सामाजिक सुधार और सार्वजनिक हित के लिए कानून बनाने की संवैधानिक गुंजाइश।

धार्मिक स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित नहीं है। इसके प्रयोग पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य तथा अन्य मौलिक अधिकारों से संबंधित संवैधानिक सीमाएँ लागू हो सकती हैं।

लोकतंत्र (Democracy)

लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता का स्रोत जनता होती है। भारत में जनता निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है।

  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार।
  • नियमित एवं प्रतिस्पर्धात्मक चुनाव।
  • बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था।
  • विपक्ष और सार्वजनिक विमर्श की भूमिका।
  • सरकार का विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व।
  • मौलिक अधिकारों तथा विधि के शासन का संरक्षण।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। संवैधानिक लोकतंत्र में अधिकारों की रक्षा, संस्थाओं की स्वतंत्रता, जवाबदेही और कानून के अनुसार शासन भी महत्त्वपूर्ण हैं।

गणराज्य (Republic)

गणराज्य में राज्य का प्रमुख वंशानुगत राजा नहीं होता। भारत में राष्ट्रपति राज्य का संवैधानिक प्रमुख है और उसका पद वंशानुगत नहीं है।

भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होता है। इसलिए भारत की गणराज्यात्मक व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हुई है।

प्रस्तावना के चार प्रमुख आदर्श

न्याय (Justice)

प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना का लक्ष्य प्रस्तुत करती है।

  • सामाजिक न्याय: जाति, लिंग और अन्य आधारों पर होने वाले अन्याय तथा भेदभाव को कम करना।
  • आर्थिक न्याय: आर्थिक अवसरों और संसाधनों के वितरण में अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की दिशा में कार्य करना।
  • राजनीतिक न्याय: राजनीतिक प्रक्रिया और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के समान अवसर उपलब्ध कराना।

स्वतंत्रता (Liberty)

प्रस्तावना विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त करती है। स्वतंत्रता का अर्थ मनमाने या असीमित आचरण की अनुमति नहीं है; संवैधानिक अधिकारों पर वैध और उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।

समानता (Equality)

समानता का उद्देश्य स्थिति और अवसर की समानता स्थापित करना है। वास्तविक समानता के लिए कभी-कभी ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों के पक्ष में विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हो सकते हैं। इसलिए समानता का अर्थ प्रत्येक परिस्थिति में बिल्कुल समान व्यवहार करना नहीं है।

बंधुता (Fraternity)

बंधुता नागरिकों में भाईचारे, पारस्परिक सम्मान और साझा राष्ट्रीय पहचान की भावना को बढ़ावा देती है। प्रस्तावना इसे व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता से जोड़ती है।

प्रस्तावना में संशोधन और न्यायिक स्थिति

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है। संसद संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है, लेकिन ऐसा संशोधन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकता।

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़े गए तथा “राष्ट्र की एकता” से संबंधित अभिव्यक्ति को “राष्ट्र की एकता और अखंडता” किया गया।

संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of Constitution)

भारतीय शासन-व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च विधिक आधार है। संसद, राज्य विधानमंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका सहित सभी राज्य संस्थाएँ संविधान से प्राप्त शक्तियों तथा निर्धारित सीमाओं के अधीन कार्य करती हैं।

यदि कोई कानून या सरकारी कार्रवाई संविधान के विरुद्ध हो, तो सक्षम न्यायालय उचित मामले में उसकी संवैधानिकता की समीक्षा कर सकता है। संविधान की सर्वोच्चता का संबंध केवल कानूनों की वैधता से नहीं, बल्कि सार्वजनिक सत्ता के संवैधानिक प्रयोग से भी है।

विधि का शासन (Rule of Law)

विधि के शासन का अर्थ है कि सरकार का संचालन कानून के अनुसार हो, न कि किसी व्यक्ति की मनमानी इच्छा के अनुसार। कोई भी सार्वजनिक प्राधिकारी अपनी कानूनी और संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कार्य नहीं कर सकता।

  • कानून की सर्वोच्चता और मनमानी पर रोक।
  • कानून के समक्ष समानता।
  • सरकारी कार्रवाई की कानूनी समीक्षा।
  • नागरिक अधिकारों का संरक्षण।
  • सार्वजनिक प्राधिकारियों की जवाबदेही।

विधि का शासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, न्यायिक समीक्षा तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों से निकटता से जुड़ा हुआ है।

शक्तियों का पृथक्करण और नियंत्रण-संतुलन

शासन की प्रमुख संस्थाओं में विधायी, कार्यकारी और न्यायिक कार्यों का विभाजन सत्ता के केंद्रीकरण को सीमित करने में सहायता करता है।

  • विधायिका: कानून बनाना और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना।
  • कार्यपालिका: कानूनों और नीतियों को लागू करना।
  • न्यायपालिका: कानून की व्याख्या, विवादों का निपटारा और संवैधानिक सीमाओं की रक्षा।

भारत में शक्तियों का कठोर और पूर्ण पृथक्करण नहीं है। संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका से घनिष्ठ रूप से जुड़ी है। इसके बावजूद न्यायिक समीक्षा, संसदीय नियंत्रण और अन्य संवैधानिक व्यवस्थाएँ संस्थागत नियंत्रण एवं संतुलन स्थापित करती हैं।

संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System)

भारत ने संसदीय शासन प्रणाली अपनाई है। संघ स्तर पर राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, जबकि प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है।

  • अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है।
  • अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
  • प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करते हैं।
  • लोकसभा में बहुमत का समर्थन सरकार के बने रहने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर मंत्रिपरिषद को पद छोड़ना पड़ता है।

संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका का विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व एक प्रमुख विशेषता है। यह राष्ट्रपति प्रणाली से महत्त्वपूर्ण अंतर है, जहाँ कार्यपालिका का गठन और कार्यकाल सामान्यतः विधायिका से अलग आधार पर निर्धारित होता है।

संघीय व्यवस्था और मजबूत केंद्र

भारतीय संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन करता है। इसी कारण भारत में संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ मौजूद हैं। दूसरी ओर, कुछ प्रावधान केंद्र को अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति प्रदान करते हैं।

संघीय विशेषताएँ:

  • केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तिविभाजन।
  • लिखित संविधान और संविधान की सर्वोच्चता।
  • संविधान की व्याख्या के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका।
  • संघीय प्रावधानों में संशोधन के लिए कुछ मामलों में राज्यों की स्वीकृति।

मजबूत केंद्र से संबंधित विशेषताएँ:

  • अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ संसद के पास।
  • आपातकालीन परिस्थितियों में केंद्र की शक्तियों का विस्तार।
  • कुछ परिस्थितियों में संसद का राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाना।
  • एकल नागरिकता और एकीकृत न्यायिक व्यवस्था।

भारत को संघीय या एकात्मक व्यवस्था के केवल एक छोर पर रखना उचित नहीं है। भारतीय संघवाद में संवैधानिक शक्तिविभाजन, सहयोग और कुछ परिस्थितियों में केंद्रीय प्रभुत्व—तीनों के तत्व मिलते हैं।

मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य

भारतीय संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में राज्य को मार्गदर्शन देता है। मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य इस संवैधानिक दृष्टि के अलग-अलग लेकिन परस्पर संबंधित भाग हैं।

आधार मौलिक अधिकार नीति-निदेशक तत्व मौलिक कर्तव्य
संवैधानिक भाग भाग III भाग IV भाग IVA
प्रमुख अनुच्छेद 12–35 36–51 51A
मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों की रक्षा सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की दिशा में राज्य का मार्गदर्शन जिम्मेदार नागरिकता और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देना
किस पर लागू अधिकार के प्रकार के अनुसार; कुछ सभी व्यक्तियों को, कुछ केवल नागरिकों को राज्य के नीति-निर्माण और शासन के लिए केवल भारत के नागरिकों पर
न्यायालय द्वारा प्रवर्तन मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर संवैधानिक उपचार उपलब्ध अनुच्छेद 37 के अनुसार सीधे न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं सामान्यतः अपने-आप सीधे प्रवर्तनीय नहीं; संबंधित कानूनों से कुछ दायित्व लागू हो सकते हैं

मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों को परस्पर विरोधी मानना सही नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में इनके बीच संतुलन और सामंजस्य को संवैधानिक व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण माना है।

सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा

भारतीय संविधान राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय से जोड़ता है। केवल मतदान का अधिकार पर्याप्त नहीं है, यदि सामाजिक भेदभाव, गरीबी, अशिक्षा और अवसरों की असमानता लोगों की वास्तविक भागीदारी को सीमित करती हो।

  • अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण।
  • अनुच्छेद 15: निर्धारित आधारों पर भेदभाव का निषेध तथा कुछ विशेष प्रावधानों की अनुमति।
  • अनुच्छेद 16: सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता।
  • अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन।
  • अनुच्छेद 21 और 21A: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार।
  • अनुच्छेद 38 और 46: सामाजिक कल्याण तथा कमजोर वर्गों के हितों को बढ़ावा देना।

सामाजिक न्याय का उद्देश्य केवल औपचारिक समानता स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वंचना और संरचनात्मक असमानताओं को कम करने के लिए संवैधानिक साधनों का उपयोग करना भी है।

न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)

न्यायिक पुनरावलोकन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत न्यायालय कानूनों और सरकारी कार्रवाइयों की संवैधानिक वैधता की जाँच करते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक सत्ता का प्रयोग संविधान के अनुरूप हो।

यदि कोई कानून संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो सक्षम न्यायालय उपयुक्त मामले में उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है। न्यायिक समीक्षा संविधान की सर्वोच्चता, मौलिक अधिकारों और संघीय संतुलन की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

संवैधानिक उपचार और रिट अधिकारिता

अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं।

डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): अवैध निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराने के लिए।
  • परमादेश (Mandamus): सार्वजनिक कर्तव्य के पालन के लिए सक्षम प्राधिकारी को निर्देश देने हेतु।
  • प्रतिषेध (Prohibition): अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को अधिकारिता से बाहर की कार्यवाही आगे बढ़ाने से रोकने हेतु।
  • उत्प्रेषण (Certiorari): निर्धारित परिस्थितियों में अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण के आदेश को निरस्त करने हेतु।
  • अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto): यह जाँचने के लिए कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद किस अधिकार से धारण कर रहा है।

अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जबकि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का दायरा अधिक व्यापक है। दोनों की शक्तियाँ और लागू होने की परिस्थितियाँ समान नहीं हैं।

मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की शक्ति प्राप्त है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत प्रतिपादित किया।

इस सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। संविधान में मूल संरचना की कोई एक संपूर्ण और अंतिम सूची नहीं दी गई है; न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में इसके तत्वों की पहचान की है।

मूल संरचना के रूप में विभिन्न निर्णयों में मान्यता प्राप्त प्रमुख तत्वों में शामिल हैं:

  • संविधान की सर्वोच्चता।
  • लोकतांत्रिक और गणराज्यात्मक शासन।
  • धर्मनिरपेक्षता।
  • संघीय व्यवस्था।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता।
  • न्यायिक समीक्षा।
  • विधि का शासन।
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव।
  • संसदीय लोकतंत्र के मूल तत्व।
  • संविधान संशोधन की शक्ति पर संवैधानिक सीमाएँ।

संविधान संशोधन (Constitutional Amendment)

भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी बनाई गई है कि संविधान बदलती परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हो सके, लेकिन उसके मूल प्रावधानों की स्थिरता भी बनी रहे।

  • साधारण बहुमत: कुछ परिवर्तन संसद की सामान्य विधायी प्रक्रिया से किए जा सकते हैं और अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं माने जाते।
  • विशेष बहुमत: अनुच्छेद 368 के अंतर्गत अधिकांश संवैधानिक संशोधनों के लिए प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है।
  • विशेष बहुमत और राज्यों की स्वीकृति: संघीय ढाँचे से संबंधित निर्धारित विषयों में संसद के विशेष बहुमत के साथ कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति आवश्यक है।

संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसे पारित करने के लिए दोनों सदनों की अलग-अलग स्वीकृति आवश्यक होती है; इस प्रक्रिया में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति दी जाती है।

एकल नागरिकता (Single Citizenship)

भारत में सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकता की व्यवस्था है। अमेरिका जैसे कुछ संघीय देशों के विपरीत भारत में अलग-अलग राज्यों की स्वतंत्र राज्य नागरिकता नहीं है।

एकल नागरिकता का उद्देश्य पूरे देश में साझा नागरिक पहचान को बढ़ावा देना है। हालाँकि निवास, स्थानीय पात्रता और अन्य वैधानिक शर्तें कुछ विशेष अधिकारों या अवसरों को प्रभावित कर सकती हैं।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार

भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था है। अनुच्छेद 326 के अनुसार निर्धारित कानूनी शर्तों को पूरा करने वाले 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के भारतीय नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकते हैं।

61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के माध्यम से मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई। यह परिवर्तन 1989 में प्रभावी हुआ।

स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव

लोकतांत्रिक शासन में चुनावों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को प्रदान करता है।

निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका के साथ-साथ चुनावी कानूनों, मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया और संबंधित संस्थागत व्यवस्थाओं का पालन भी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए आवश्यक है।

स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)

स्वतंत्र न्यायपालिका का अर्थ है कि न्यायालय अपने न्यायिक निर्णय संवैधानिक और विधिक आधार पर लें तथा उन पर अनुचित बाहरी दबाव न हो।

  • मौलिक अधिकारों की रक्षा।
  • संविधान की व्याख्या और न्यायिक समीक्षा।
  • केंद्र तथा राज्यों के बीच संवैधानिक विवादों का निपटारा।
  • कानूनों और सरकारी कार्रवाइयों की वैधता की जाँच।
  • न्यायिक प्रक्रिया और विधि के शासन की रक्षा।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायाधीशों का कानून से ऊपर होना नहीं है। न्यायिक संस्थाओं को भी संविधान, विधि और निर्धारित जवाबदेही संबंधी व्यवस्थाओं के अंतर्गत कार्य करना होता है।

आपातकालीन प्रावधान

भारतीय संविधान असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए तीन प्रकार की आपातकालीन व्यवस्थाएँ प्रदान करता है।

  • राष्ट्रीय आपातकाल — अनुच्छेद 352: युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर संवैधानिक शर्तों के अनुसार घोषित किया जा सकता है।
  • राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता — अनुच्छेद 356: निर्धारित संवैधानिक परिस्थितियों में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।
  • वित्तीय आपातकाल — अनुच्छेद 360: भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरा होने की स्थिति में संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार घोषित किया जा सकता है।

आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग संविधान में निर्धारित शर्तों और नियंत्रणों के अधीन है। भारत में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तथा उसके अनुमोदन के लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है।

विदेशी संविधानों से लिए गए प्रमुख प्रावधान

संविधान निर्माताओं ने अनेक देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। उनसे प्राप्त विचारों को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया गया। इसलिए भारतीय संविधान को केवल विदेशी प्रावधानों की नकल मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।

स्रोत प्रमुख रूप से संबंधित प्रावधान या विचार
ब्रिटेन संसदीय शासन प्रणाली, मंत्रिमंडलीय व्यवस्था, विधि का शासन और एकल नागरिकता की अवधारणा।
संयुक्त राज्य अमेरिका मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा और राष्ट्रपति के महाभियोग जैसी व्यवस्थाओं पर प्रभाव।
आयरलैंड राज्य के नीति-निदेशक तत्व।
कनाडा मजबूत केंद्र वाली संघीय व्यवस्था तथा अवशिष्ट शक्तियों से संबंधित दृष्टिकोण।
ऑस्ट्रेलिया समवर्ती सूची, व्यापार-वाणिज्य से संबंधित कुछ प्रावधान और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की व्यवस्था।
जर्मनी का वाइमर संविधान आपातकालीन परिस्थितियों में अधिकारों पर प्रभाव डालने वाली कुछ संवैधानिक अवधारणाओं से संबंधित प्रभाव।
दक्षिण अफ्रीका संविधान संशोधन की कुछ प्रक्रियाएँ और राज्यसभा के सदस्यों के निर्वाचन की पद्धति से संबंधित प्रभाव।
पूर्व सोवियत संघ मौलिक कर्तव्यों और सामाजिक-आर्थिक न्याय की अवधारणाओं पर प्रभाव।
फ्रांस गणराज्य और स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के आदर्शों से संबंधित प्रभाव।
जापान कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया से संबंधित अवधारणा।

ध्यान दें: किसी प्रावधान का विदेशी स्रोत बताने से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भारतीय संविधान में उसका स्वरूप बिल्कुल वैसा ही है। भारतीय संविधान में इन विचारों को स्थानीय ऐतिहासिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुरूप ढाला गया है।

संविधान और सामाजिक परिवर्तन

भारतीय संविधान शासन संस्थाओं की स्थापना के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। यह भेदभाव को चुनौती देने, नागरिकों की गरिमा की रक्षा करने और लोकतांत्रिक भागीदारी का विस्तार करने के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

  • अनुच्छेद 17 के माध्यम से अस्पृश्यता का उन्मूलन।
  • समानता और भेदभाव-विरोधी संवैधानिक सुरक्षा।
  • शिक्षा और सार्वजनिक अवसरों तक पहुँच का विस्तार।
  • महिलाओं तथा सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधान।
  • नीति-निदेशक तत्वों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक कल्याण की दिशा।
  • पंचायती राज और नगरीय स्थानीय निकायों के माध्यम से लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण।

संविधान संशोधन और मूल संरचना का संतुलन

संविधान को बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होना चाहिए। लेकिन संशोधन की शक्ति का प्रयोग संविधान की मूल पहचान को समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 368 संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करता है, जबकि मूल संरचना सिद्धांत संशोधन की संवैधानिक सीमा को स्पष्ट करता है। दोनों को साथ समझना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की प्रकृति को समझने के लिए आवश्यक है।

संविधान से संबंधित प्रमुख न्यायिक निर्णय

  • शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, 1951: संसद की संविधान संशोधन शक्ति के संबंध में प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण निर्णय।
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967: सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय की व्याख्या में संसद की मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति पर सीमा लगाई; बाद में संवैधानिक संशोधनों और केशवानंद भारती निर्णय से स्थिति विकसित हुई।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973: संसद की संशोधन शक्ति पर मूल संरचना की सीमा स्थापित हुई; प्रस्तावना को संविधान का हिस्सा माना गया।
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980: मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन तथा सीमित संशोधन शक्ति के महत्त्व पर बल दिया गया।
  • एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994: संघवाद और धर्मनिरपेक्षता से संबंधित संवैधानिक सिद्धांतों को महत्त्वपूर्ण न्यायिक संरक्षण मिला; राष्ट्रपति शासन की न्यायिक समीक्षा पर भी विचार किया गया।
  • के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ, 2017: सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।

ये निर्णय बताते हैं कि भारतीय संविधान की व्याख्या समय के साथ विकसित हुई है। संवैधानिक सिद्धांतों को समझने के लिए निर्णय के वर्ष के साथ-साथ उसका वास्तविक कानूनी निष्कर्ष भी याद रखना चाहिए।

अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य: त्वरित पुनरावृत्ति

  • संविधान सभा की पहली बैठक — 9 दिसंबर 1946।
  • संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष — डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
  • प्रारूप समिति के अध्यक्ष — डॉ. बी. आर. अंबेडकर।
  • संवैधानिक सलाहकार — बी. एन. राव।
  • उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत — 13 दिसंबर 1946।
  • उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकार — 22 जनवरी 1947।
  • संविधान अंगीकृत — 26 नवंबर 1949।
  • संविधान पर हस्ताक्षर — 24 जनवरी 1950।
  • संविधान लागू — 26 जनवरी 1950।
  • मौलिक अधिकार — भाग III, अनुच्छेद 12–35।
  • राज्य के नीति-निदेशक तत्व — भाग IV, अनुच्छेद 36–51।
  • मौलिक कर्तव्य — भाग IVA, अनुच्छेद 51A।
  • मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सर्वोच्च न्यायालय — अनुच्छेद 32।
  • उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता — अनुच्छेद 226।
  • संविधान संशोधन — अनुच्छेद 368।
  • राष्ट्रीय आपातकाल — अनुच्छेद 352।
  • राज्य में राष्ट्रपति शासन — अनुच्छेद 356।
  • वित्तीय आपातकाल — अनुच्छेद 360।
  • निर्वाचन आयोग — अनुच्छेद 324।
  • मतदान की न्यूनतम आयु 21 से 18 वर्ष — 61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988।
  • प्रस्तावना और मूल संरचना सिद्धांत — केशवानंद भारती मामला, 1973।
  • “समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” और “अखंडता” से संबंधित संशोधन — 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976।

विशेष रूप से समझने योग्य अवधारणाएँ

  • संविधान बनाम संविधानवाद: संविधान शासन का मूल कानूनी ढाँचा है; संविधानवाद सीमित, उत्तरदायी और संवैधानिक शासन पर बल देता है।
  • संप्रभुता बनाम लोकतंत्र: संप्रभुता राज्य की स्वतंत्र सर्वोच्च सत्ता से संबंधित है, जबकि लोकतंत्र राजनीतिक सत्ता के स्रोत के रूप में जनता को महत्त्व देता है।
  • समानता बनाम समान व्यवहार: वास्तविक समानता के लिए ऐतिहासिक या सामाजिक रूप से वंचित समूहों के पक्ष में विशेष प्रावधान आवश्यक हो सकते हैं।
  • संघवाद बनाम एकात्मकता: भारत में केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तिविभाजन है, लेकिन कुछ प्रावधान केंद्र को मजबूत बनाते हैं।
  • मौलिक अधिकार बनाम नीति-निदेशक तत्व: मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय अधिकार प्रदान करते हैं; नीति-निदेशक तत्व शासन और नीति-निर्माण को दिशा देते हैं।
  • संविधान संशोधन बनाम मूल संरचना: संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

सारांश

भारतीय संविधान शासन संस्थाओं की संरचना और शक्तियों को निर्धारित करने के साथ-साथ नागरिक अधिकारों, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

इसकी प्रस्तावना भारत के संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य के स्वरूप और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के आदर्शों को व्यक्त करती है।

संघीय व्यवस्था, संसदीय शासन, मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व, मौलिक कर्तव्य, स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक समीक्षा भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख घटक हैं। संविधान संशोधन की प्रक्रिया इसे समय के साथ विकसित होने देती है, जबकि मूल संरचना सिद्धांत इसकी मूल पहचान की रक्षा करता है।

UPSC की तैयारी में केवल तथ्यों और तिथियों को याद करना पर्याप्त नहीं है। संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य, उनके बीच संबंध, न्यायिक व्याख्या और व्यावहारिक प्रशासन में उनका महत्त्व समझना भी आवश्यक है।