जिन संस्थाओं की स्थापना, पद अथवा शक्तियों का आधार सीधे भारत के संविधान में दिया गया है, उन्हें संवैधानिक निकाय (Constitutional Bodies) कहा जाता है। संविधान इनके गठन, नियुक्ति, कार्यों, कार्यकाल, अधिकारों या स्वतंत्रता के संबंध में विशिष्ट प्रावधान कर सकता है।
ये निकाय शासन व्यवस्था में निष्पक्षता, वित्तीय जवाबदेही, संवैधानिक संरक्षण और केंद्र-राज्य समन्वय को मजबूत करते हैं। उदाहरण के लिए, निर्वाचन आयोग चुनावों का संचालन करता है, संघ लोक सेवा आयोग भर्ती संबंधी मामलों में भूमिका निभाता है और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सरकारी खातों का लेखा-परीक्षण करता है।
महत्वपूर्ण अंतर: प्रत्येक संवैधानिक निकाय की स्वतंत्रता, शक्तियाँ और कार्यप्रणाली समान नहीं होतीं। कुछ निकाय मुख्यतः सलाह देते हैं, कुछ नियामक या निगरानी संबंधी कार्य करते हैं और कुछ संवैधानिक संरक्षणों के क्रियान्वयन की जाँच करते हैं।
UPSC में संवैधानिक निकायों से संबंधित प्रश्नों में निकाय का नाम, संवैधानिक अनुच्छेद, नियुक्ति प्राधिकारी और प्रमुख कार्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
| संवैधानिक निकाय | प्रमुख अनुच्छेद | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| भारत निर्वाचन आयोग | 324 | संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण |
| संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग | 315–323 | लोक सेवाओं में भर्ती तथा संविधान में निर्दिष्ट विषयों पर परामर्श |
| वित्त आयोग | 280 | केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण तथा अनुदान-सहायता संबंधी सिफारिशें |
| नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) | 148–151 | संघ और राज्यों के खातों तथा निर्धारित संस्थाओं का लेखा-परीक्षण |
| भारत के महान्यायवादी | 76 | भारत सरकार के प्रमुख विधि अधिकारी के रूप में कानूनी सलाह और विधिक कार्य |
| राज्य के महाधिवक्ता | 165 | राज्य सरकार के प्रमुख विधि अधिकारी के रूप में कार्य |
| राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग | 338 | अनुसूचित जातियों के संवैधानिक एवं कानूनी संरक्षणों की निगरानी |
| राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग | 338A | अनुसूचित जनजातियों के संरक्षणों की निगरानी |
| राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग | 338B | पिछड़े वर्गों से संबंधित संवैधानिक संरक्षणों और मामलों पर कार्य |
| भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी | 350B | भाषाई अल्पसंख्यकों के संवैधानिक संरक्षणों से संबंधित विषयों की जाँच और रिपोर्ट |
| अंतरराज्यीय परिषद | 263 | राज्यों तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को बढ़ावा देना |
| राज्य निर्वाचन आयोग | 243K, 243ZA | पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण |
| राज्य वित्त आयोग | 243-I, 243-Y | पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति तथा संसाधन-वितरण पर सिफारिशें |
संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission—UPSC) संघ की लोक सेवाओं में भर्ती संबंधी एक प्रमुख संवैधानिक संस्था है। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 315 से 323 में मिलता है।
आयोग प्रतियोगी परीक्षाएँ आयोजित करता है तथा भर्ती, नियुक्ति, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों सहित संविधान में निर्दिष्ट विषयों पर सरकार को परामर्श देता है।
UPSC का अध्यक्ष या सदस्य पद ग्रहण करने की तारीख से छह वर्ष तक अथवा 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, पद पर रहता है। यह व्यवस्था अनुच्छेद 316 में दी गई है।
राज्य लोक सेवा आयोग तथा संयुक्त लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए अधिकतम आयु सीमा 62 वर्ष है। यहाँ भी छह वर्ष की अवधि अथवा निर्धारित आयु सीमा में से जो पहले हो, वही लागू होती है।
UPSC मुख्यतः एक परामर्शदात्री संस्था है। उसकी सलाह सामान्यतः सरकार पर बाध्यकारी नहीं होती। संविधान के अनुच्छेद 323 के अनुसार, आयोग की रिपोर्ट राष्ट्रपति या संबंधित राज्यपाल को प्रस्तुत की जाती है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है। रिपोर्ट के साथ उन मामलों का विवरण भी दिया जाता है जिनमें आयोग की सलाह स्वीकार नहीं की गई, तथा जहाँ आवश्यक हो वहाँ अस्वीकृति के कारण भी प्रस्तुत किए जाते हैं।
अनुच्छेद 317 के अनुसार, UPSC के अध्यक्ष या सदस्य को राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत हटाया जा सकता है। कदाचार के आधार पर हटाने के मामले में राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय से जाँच कराने का निर्देश देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद राष्ट्रपति उसके प्रतिवेदन के आधार पर आगे की कार्रवाई करते हैं।
कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में, जैसे दिवालिया घोषित होना, पद के कर्तव्यों से बाहर किसी सवेतन रोजगार में संलग्न होना या राष्ट्रपति की राय में मानसिक अथवा शारीरिक अक्षमता, संविधान में अलग आधार निर्धारित हैं। इसलिए प्रत्येक हटाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की जाँच अनिवार्य मानना सही नहीं है।
राज्य लोक सेवा आयोग राज्य की लोक सेवाओं में भर्ती संबंधी संवैधानिक संस्था है। इसका आधार भी अनुच्छेद 315 से 323 में मिलता है।
दो या अधिक राज्य विधानमंडलों द्वारा प्रस्ताव पारित करके संयुक्त लोक सेवा आयोग के गठन का अनुरोध कर सकते हैं। इसके बाद संसद कानून बनाकर संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना कर सकती है।
इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 315 में है। संयुक्त लोक सेवा आयोग को केवल इसलिए सामान्य वैधानिक निकाय नहीं मानना चाहिए कि इसके गठन में संसद का कानून शामिल होता है; इसकी व्यवस्था स्वयं संविधान में निर्दिष्ट है।
वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण से संबंधित सिफारिशें करने वाला संवैधानिक निकाय है। इसका आधार अनुच्छेद 280 है।
राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर या उससे पहले, यदि आवश्यक समझें, वित्त आयोग का गठन करते हैं।
वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं। सदस्यों की योग्यताओं का निर्धारण संसद द्वारा बनाए गए कानून के माध्यम से किया जाता है।
ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Devolution) का संबंध केंद्र और सभी राज्यों के बीच विभाज्य कर-राजस्व के बँटवारे से है। यह निर्धारित करता है कि कुल विभाज्य कर-पूल में राज्यों का कितना हिस्सा होगा।
क्षैतिज वितरण (Horizontal Devolution) का संबंध राज्यों के बीच राज्यों के लिए निर्धारित हिस्से के बँटवारे से है। इसमें जनसंख्या, क्षेत्रफल, आय-दूरी, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन और अन्य निर्धारित मानदंडों का उपयोग आयोग की सिफारिशों के अनुसार किया जा सकता है।
वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जबकि नीति आयोग केंद्र सरकार द्वारा स्थापित कार्यपालिका निकाय है। नीति आयोग ने 2015 में योजना आयोग का स्थान लिया।
वित्त आयोग का मुख्य कार्य अनुच्छेद 280 के अंतर्गत केंद्र-राज्य वित्तीय वितरण पर सिफारिशें करना है। नीति आयोग का व्यापक उद्देश्य नीति निर्माण में सहयोग, सहकारी संघवाद और विकास संबंधी रणनीतियों को बढ़ावा देना है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India—CAG) सार्वजनिक वित्त के लेखा-परीक्षण से जुड़ा एक प्रमुख संवैधानिक प्राधिकारी है। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 148 से 151 में है।
CAG सरकारी धन के उपयोग, सरकारी खातों और निर्धारित सार्वजनिक संस्थाओं के लेखा-परीक्षण के माध्यम से वित्तीय जवाबदेही तथा विधायिका के नियंत्रण को मजबूत करता है।
संघ से संबंधित CAG की रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत की जाती है। राष्ट्रपति उसे संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाते हैं। राज्य से संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को दी जाती है, जो उसे राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं।
संसद और राज्य विधानमंडल की लोक लेखा समितियाँ (Public Accounts Committees—PAC) CAG की रिपोर्टों की जाँच करके वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ध्यान दें: CAG स्वयं दंड देने वाली जाँच एजेंसी नहीं है। उसका प्रमुख कार्य लेखा-परीक्षण और निष्कर्षों को संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से विधायिका के सामने लाना है।
भारत के महान्यायवादी केंद्र सरकार के सर्वोच्च विधि अधिकारी हैं। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 76 है।
महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। नियुक्त व्यक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने की योग्यता होनी चाहिए। इसमें संविधान के अनुच्छेद 124(3) में निर्धारित योग्यताएँ प्रासंगिक हैं।
महान्यायवादी का कोई निश्चित संवैधानिक कार्यकाल निर्धारित नहीं है। वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और उसका पारिश्रमिक राष्ट्रपति निर्धारित करते हैं।
अनुच्छेद 88 के अंतर्गत महान्यायवादी को संसद के किसी भी सदन, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक और उस संसदीय समिति की कार्यवाही में, जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो, बोलने तथा भाग लेने का अधिकार है। लेकिन उसे मतदान का अधिकार नहीं है।
महान्यायवादी का पद संविधान द्वारा निर्मित है और वह केंद्र सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। प्रत्येक सरकारी वकील या सरकारी अधिवक्ता इस संवैधानिक पद पर नियुक्त नहीं होता।
राज्य का महाधिवक्ता राज्य सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 165 है।
परीक्षा में अंतर: महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है और उसका आधार अनुच्छेद 76 है; महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल करता है और उसका आधार अनुच्छेद 165 है।
राज्य निर्वाचन आयोग पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों से संबंधित संवैधानिक संस्था है। यह भारत निर्वाचन आयोग से अलग है।
संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भारत निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। पंचायत और नगरपालिका चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है।
राज्य वित्त आयोग स्थानीय स्वशासन संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है। इसका उद्देश्य पंचायतों और नगरपालिकाओं को संसाधनों के वितरण तथा स्थानीय वित्तीय क्षमता को बेहतर बनाने के लिए सिफारिशें देना है।
भ्रम से बचें: केंद्रीय वित्त आयोग का आधार अनुच्छेद 280 है, जबकि राज्य वित्त आयोग का आधार अनुच्छेद 243-I और नगरपालिकाओं के संबंध में अनुच्छेद 243-Y है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 338 है। यह अनुसूचित जातियों के लिए संविधान, कानूनों और सरकारी आदेशों के अंतर्गत उपलब्ध संरक्षणों की निगरानी करता है।
आयोग को जाँच के कुछ मामलों में सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह प्रत्येक मामले में नियमित न्यायालय की तरह अंतिम न्यायिक निर्णय देता है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 338A है। इसे 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से अलग संवैधानिक आयोग के रूप में स्थापित किया गया।
इसके प्रमुख कार्य अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक और कानूनी संरक्षणों की निगरानी, अधिकारों से संबंधित शिकायतों की जाँच, विकास योजनाओं पर सलाह और राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना हैं।
परीक्षा तथ्य: NCSC का अनुच्छेद 338 है, जबकि NCST का अनुच्छेद 338A है।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को 102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा संवैधानिक दर्जा दिया गया। इसका आधार अनुच्छेद 338B है।
आयोग सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए उपलब्ध संवैधानिक एवं कानूनी संरक्षणों से संबंधित मामलों की जाँच करता है और उनके विकास के संबंध में सलाह देता है।
अनुच्छेद 342A सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सूचियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। आयोग के अनुच्छेद 338B वाले कार्य और पिछड़े वर्गों की सूची से संबंधित अनुच्छेद 342A को एक ही प्रावधान न समझें।
भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की व्यवस्था अनुच्छेद 350B में की गई है।
अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को ऐसी परिषद स्थापित करने का अधिकार देता है, जो राज्यों के बीच तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को बढ़ावा दे सके।
परिषद के संभावित कार्यों में शामिल हैं:
अंतरराज्यीय परिषद सहकारी संघवाद को मजबूत करने का एक महत्त्वपूर्ण मंच है। यह ध्यान रखना चाहिए कि अनुच्छेद 263 परिषद की स्थापना के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है; परिषद के वास्तविक गठन और कार्यक्षेत्र का निर्धारण संबंधित आदेश से होता है।
| आधार | संवैधानिक निकाय | वैधानिक निकाय | कार्यपालिका निकाय |
|---|---|---|---|
| स्थापना का आधार | संविधान | संसद या राज्य विधानमंडल का कानून | सरकार का कार्यपालिका आदेश या निर्णय |
| उदाहरण | निर्वाचन आयोग, UPSC, वित्त आयोग | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय सूचना आयोग | नीति आयोग |
| स्थिति में परिवर्तन | संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन की प्रक्रिया लागू हो सकती है | संबंधित कानून में संशोधन या निरसन किया जा सकता है | कार्यपालिका निर्णय से पुनर्गठन या समाप्ति संभव हो सकती है |
संवैधानिक निकाय को केवल इस आधार पर अधिक प्रभावी नहीं माना जा सकता कि उसका आधार संविधान है। उसकी वास्तविक भूमिका, अधिकार, स्वतंत्रता और जवाबदेही संबंधित संवैधानिक प्रावधानों तथा लागू कानूनों पर निर्भर करती है।
उदाहरण के लिए, केंद्रीय सूचना आयोग सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत स्थापित वैधानिक निकाय है, जबकि नीति आयोग कार्यपालिका द्वारा स्थापित संस्था है।
संवैधानिक निकाय भारतीय लोकतंत्र में निष्पक्षता, जवाबदेही, वित्तीय अनुशासन और संवैधानिक संरक्षणों को संस्थागत आधार देते हैं। फिर भी, केवल संवैधानिक दर्जा इनकी प्रभावशीलता सुनिश्चित नहीं करता। समय पर नियुक्तियाँ, पर्याप्त संसाधन, पारदर्शी कार्यप्रणाली और सिफारिशों पर कार्रवाई भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं।
उदाहरण के लिए, CAG की रिपोर्टें विधायिका को सार्वजनिक व्यय की जाँच में सहायता देती हैं; वित्त आयोग वित्तीय संघवाद को मजबूत करता है; UPSC योग्यता आधारित भर्ती में योगदान देता है; और निर्वाचन आयोग चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की निगरानी करता है।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में निम्न क्रम उपयोगी है: संवैधानिक आधार → संरचना एवं नियुक्ति → प्रमुख कार्य → स्वतंत्रता एवं जवाबदेही → चुनौतियाँ → सुधार → लोकतांत्रिक महत्व।