आपातकालीन प्रावधान वे संवैधानिक व्यवस्थाएँ हैं, जिनके माध्यम से युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह, राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता अथवा गंभीर वित्तीय संकट जैसी असाधारण परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है। इनका उद्देश्य संवैधानिक शासन और देश की सुरक्षा बनाए रखना है।
भारतीय संविधान के भाग XVIII में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधान दिए गए हैं। इन प्रावधानों के अंतर्गत सामान्य परिस्थितियों की तुलना में केंद्र की शक्तियाँ बढ़ सकती हैं, लेकिन उनका प्रयोग संविधान में निर्धारित शर्तों और नियंत्रणों के अधीन होता है।
भारतीय व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता यह है कि आपातकालीन स्थिति में संघीय शासन अधिक केंद्रीकृत हो सकता है। इसलिए इन प्रावधानों का अध्ययन राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ संघवाद, मौलिक अधिकारों, संसदीय नियंत्रण और न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में भी किया जाता है।
भारतीय संविधान में तीन प्रमुख आपातकालीन व्यवस्थाएँ हैं। इनका आधार, उद्देश्य, संसदीय स्वीकृति और अवधि अलग-अलग हैं।
| आपातकाल का प्रकार | अनुच्छेद | घोषणा का आधार | संसदीय स्वीकृति |
|---|---|---|---|
| राष्ट्रीय आपातकाल | 352 | युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह | एक महीने के भीतर विशेष बहुमत |
| राष्ट्रपति शासन | 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | दो महीने के भीतर सामान्य बहुमत |
| वित्तीय आपातकाल | 360 | भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरा | दो महीने के भीतर सामान्य बहुमत |
महत्वपूर्ण: भारत में राष्ट्रीय आपातकाल तीन बार घोषित किया गया है। राष्ट्रपति शासन का अनेक राज्यों में प्रयोग हुआ है, जबकि वित्तीय आपातकाल आज तक घोषित नहीं किया गया है।
| अनुच्छेद | विषय | परीक्षा के लिए महत्त्व |
|---|---|---|
| 352 | राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा | आधार, प्रक्रिया और संसदीय स्वीकृति |
| 353 | राष्ट्रीय आपातकाल के प्रभाव | संघ की कार्यपालिका एवं विधायी शक्तियों का विस्तार |
| 354 | राजस्व वितरण संबंधी प्रावधानों का अनुप्रयोग | केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध |
| 355 | राज्यों की रक्षा करना संघ का कर्तव्य | बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से सुरक्षा |
| 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | राष्ट्रपति शासन |
| 357 | अनुच्छेद 356 के अंतर्गत विधायी शक्तियों का प्रयोग | राज्य की विधायी शक्तियों का संसद द्वारा प्रयोग |
| 358 | अनुच्छेद 19 से संबंधित प्रावधान | केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण आधारित राष्ट्रीय आपातकाल |
| 359 | मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार पर रोक | अनुच्छेद 20 और 21 अपवाद हैं |
| 360 | वित्तीय आपातकाल | वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरा |
यदि राष्ट्रपति को यह संतोष हो कि युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण भारत अथवा उसके किसी भाग की सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है, तो राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की जा सकती है।
राष्ट्रीय आपातकाल पूरे भारत या भारत के किसी विशेष भाग के संबंध में घोषित किया जा सकता है। इसकी घोषणा वास्तविक घटना घटित होने से पहले भी की जा सकती है, यदि राष्ट्रपति को यह संतोष हो कि ऐसा खतरा आसन्न है।
परीक्षा तथ्य: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने राष्ट्रीय आपातकाल के आधार के रूप में प्रयुक्त “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” शब्द स्थापित किया।
अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति करता है, लेकिन इसके लिए संघ मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय आवश्यक है। केवल प्रधानमंत्री की मौखिक सलाह के आधार पर यह घोषणा नहीं की जा सकती।
44वें संविधान संशोधन का महत्त्व: मंत्रिमंडल के लिखित निर्णय की शर्त का उद्देश्य राष्ट्रीय आपातकाल जैसे गंभीर निर्णय को एक व्यक्ति के अनौपचारिक निर्णय पर निर्भर होने से रोकना है।
राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा एक महीने के भीतर स्वीकृति मिलना आवश्यक है। इसके लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है।
विशेष बहुमत के लिए दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए:
यदि लोकसभा भंग हो और राज्यसभा उद्घोषणा को स्वीकृति दे दे, तो लोकसभा के पुनर्गठन के बाद उसकी पहली बैठक से 30 दिनों के भीतर लोकसभा की स्वीकृति आवश्यक होती है। इस अवधि में लोकसभा द्वारा स्वीकृति न मिलने पर उद्घोषणा समाप्त हो जाती है।
संसद की स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रीय आपातकाल छह महीने तक जारी रह सकता है। इसे आगे जारी रखने के लिए प्रत्येक छह महीने पर संसद के दोनों सदनों से पुनः विशेष बहुमत द्वारा स्वीकृति लेनी होती है।
संविधान राष्ट्रीय आपातकाल के लिए कोई अधिकतम कुल अवधि निर्धारित नहीं करता। इसलिए आवश्यक संसदीय स्वीकृति मिलती रहने पर यह लंबे समय तक जारी रह सकता है।
ध्यान दें: छह महीने की अवधि का अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रीय आपातकाल हर छह महीने बाद अपने-आप समाप्त हो जाएगा। उसे जारी रखने के लिए निर्धारित समय पर पुनः संसदीय स्वीकृति जरूरी है।
राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को बाद में दूसरी उद्घोषणा द्वारा वापस ले सकता है। इसे वापस लेने के लिए संसद की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है।
लोकसभा को भी आपातकाल समाप्त कराने में विशेष भूमिका दी गई है। यदि लोकसभा राष्ट्रीय आपातकाल की निरंतरता के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करती है, तो राष्ट्रपति को उद्घोषणा वापस लेनी होती है।
लोकसभा के कुल सदस्यों के कम-से-कम एक-दसवें सदस्य लिखित सूचना देकर इस विषय पर विशेष बैठक की मांग कर सकते हैं। ऐसी सूचना अध्यक्ष को दी जाती है, यदि लोकसभा सत्र में हो; अन्यथा राष्ट्रपति को दी जाती है। बैठक 14 दिनों के भीतर आयोजित की जानी चाहिए।
अनुच्छेद 353 के अनुसार राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संघ की कार्यपालिका और विधायी शक्तियों का विस्तार हो सकता है। इससे केंद्र-राज्य संबंध सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अधिक केंद्रीकृत हो जाते हैं।
अनुच्छेद 354 के अंतर्गत जारी आदेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है। ऐसा आदेश उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति के बाद प्रभावी नहीं रहता, जिसमें राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त हो जाता है, जब तक उसे पहले वापस न ले लिया जाए।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है। यह शक्ति सामान्य संघीय व्यवस्था में संसद की विधायी शक्तियों के विस्तार का उदाहरण है।
राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त होने के बाद ऐसे कानून तुरंत समाप्त नहीं होते। आपातकाल समाप्त होने के बाद छह महीने की अवधि पूरी होने पर, उस कानून का प्रभाव समाप्त हो जाता है, जहाँ तक वह संसद की इस विशेष आपातकालीन शक्ति के आधार पर उस विषय पर लागू था। इससे पहले सक्षम विधायिका कानून को समाप्त या संशोधित कर सकती है।
यह प्रावधान राज्य सूची पर संसद की शक्ति को स्थायी रूप से स्थानांतरित नहीं करता, बल्कि असाधारण परिस्थिति के लिए अस्थायी संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करता है।
राष्ट्रीय आपातकाल लागू रहने के दौरान संसद कानून बनाकर लोकसभा का कार्यकाल एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ा सकती है। ऐसा विस्तार एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।
यह विस्तार राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त होने के बाद छह महीने से अधिक जारी नहीं रह सकता।
परीक्षा तथ्य: लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाना स्वतः होने वाली प्रक्रिया नहीं है; इसके लिए संसद द्वारा कानून बनाना आवश्यक है।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के संदर्भ में अनुच्छेद 358 और अनुच्छेद 359 विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। दोनों का प्रभाव अलग है, इसलिए इन्हें एक ही अर्थ में नहीं समझना चाहिए।
अनुच्छेद 358 का संबंध केवल अनुच्छेद 19 से है। यह व्यवस्था राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान तभी लागू होती है, जब आपातकाल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित किया गया हो।
ऐसे समय में अनुच्छेद 19 के अधिकारों से असंगत कानून बनाने और कार्यपालिका की कार्रवाई के संबंध में संविधान विशेष व्यवस्था प्रदान करता है। इस सुरक्षा का लाभ हर कानून या हर सरकारी कार्रवाई को स्वतः नहीं मिलता; संविधान में निर्धारित शर्तें लागू होती हैं।
44वें संविधान संशोधन के बाद सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 358 की यह व्यवस्था लागू नहीं होती।
याद रखें: अनुच्छेद 358 का विषय अनुच्छेद 19 है; यह सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित करने वाला प्रावधान नहीं है।
अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति आदेश जारी करके निर्दिष्ट मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है। यह व्यवस्था केवल उन अधिकारों पर लागू होती है, जिन्हें आदेश में निर्दिष्ट किया गया हो।
इस अनुच्छेद के अंतर्गत अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता। यह संरक्षण 44वें संविधान संशोधन द्वारा सुनिश्चित किया गया।
अनुच्छेद 359 का अर्थ यह नहीं है कि सभी मौलिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं। इसका प्रभाव राष्ट्रपति के आदेश, उसमें निर्दिष्ट अधिकारों और संविधान की सीमाओं के अनुसार निर्धारित होता है।
| आधार | अनुच्छेद 358 | अनुच्छेद 359 |
|---|---|---|
| संबंधित अधिकार | केवल अनुच्छेद 19 | राष्ट्रपति के आदेश में निर्दिष्ट मौलिक अधिकार |
| लागू होने की स्थिति | युद्ध या बाहरी आक्रमण आधारित राष्ट्रीय आपातकाल | राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति के आदेश पर |
| मुख्य प्रभाव | अनुच्छेद 19 से संबंधित संवैधानिक संरक्षण की व्यवस्था प्रभावित होती है | निर्दिष्ट अधिकारों के प्रवर्तन हेतु न्यायालय जाने के अधिकार पर रोक लग सकती है |
| अनुच्छेद 20 और 21 | यह अनुच्छेद 19 से संबंधित है; 20 और 21 इसका विषय नहीं हैं | इनके प्रवर्तन हेतु न्यायालय जाने का अधिकार निलंबित नहीं किया जा सकता |
अनुच्छेद 355 के अनुसार संघ का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक राज्य को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से सुरक्षित रखे तथा यह सुनिश्चित करे कि राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार चलाई जाए।
यह अनुच्छेद स्वयं राष्ट्रीय आपातकाल या राष्ट्रपति शासन की घोषणा नहीं करता। इसे संघ के संवैधानिक दायित्व के रूप में समझना चाहिए। अनुच्छेद 356 का प्रयोग अलग संवैधानिक शर्तों के अधीन होता है।
भारत में अब तक राष्ट्रीय आपातकाल तीन बार घोषित किया गया है।
1975 में घोषित राष्ट्रीय आपातकाल 1977 तक जारी रहा। इस अनुभव ने आपातकालीन शक्तियों, नागरिक स्वतंत्रताओं और संसदीय नियंत्रण के विषय में व्यापक संवैधानिक बहस को जन्म दिया।
बाद में 44वें संविधान संशोधन ने आपातकाल की घोषणा और उसे जारी रखने से संबंधित कई सुरक्षा उपाय मजबूत किए।
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 आपातकालीन प्रावधानों के अध्ययन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग की संभावना कम करना और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को मजबूत करना था।
यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्यथा यह संतोष हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें किसी राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा जारी की जा सकती है।
राष्ट्रपति शासन को सामान्यतः राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के संदर्भ में समझा जाता है। राज्यपाल की रिपोर्ट इसका एक संभावित आधार है, लेकिन संविधान राष्ट्रपति को अन्य उपलब्ध सामग्री के आधार पर भी कार्रवाई की अनुमति देता है।
राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्णय मनमाना नहीं हो सकता। यह संविधान के प्रावधानों, संसदीय नियंत्रण और न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
महत्त्वपूर्ण: राष्ट्रपति शासन लागू होने पर विधानसभा को निलंबित अवस्था में रखा जा सकता है या भंग किया जा सकता है। उसे हर स्थिति में तत्काल भंग करना अनिवार्य नहीं है।
राष्ट्रपति शासन के दौरान उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति समाप्त नहीं होती। राष्ट्रपति उच्च न्यायालय की शक्तियाँ अपने हाथ में नहीं ले सकता।
अनुच्छेद 356 के अंतर्गत जारी उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों से दो महीने के भीतर स्वीकृति प्राप्त करनी होती है। इसके लिए प्रत्येक सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का सामान्य बहुमत पर्याप्त होता है।
यदि लोकसभा भंग हो और राज्यसभा उद्घोषणा को स्वीकृति दे दे, तो लोकसभा के पुनर्गठन के बाद उसकी पहली बैठक से 30 दिनों के भीतर लोकसभा की स्वीकृति आवश्यक होती है। निर्धारित अवधि में स्वीकृति न मिलने पर उद्घोषणा समाप्त हो जाती है।
संसदीय स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रपति शासन छह महीने तक जारी रह सकता है। इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रत्येक छह महीने पर संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
इसकी सामान्य अधिकतम अवधि तीन वर्ष है। हालांकि, एक वर्ष से आगे जारी रखने के लिए संविधान में अतिरिक्त शर्तें निर्धारित हैं।
ध्यान दें: राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने के लिए केवल संसद की सामान्य इच्छा पर्याप्त नहीं है। एक वर्ष के बाद विस्तार के लिए अनुच्छेद 356 में निर्धारित अतिरिक्त संवैधानिक शर्तें पूरी होनी चाहिए।
यदि कोई राज्य संघ द्वारा दिए गए संवैधानिक निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो अनुच्छेद 365 के अंतर्गत राष्ट्रपति यह मान सकता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती।
ऐसी स्थिति अनुच्छेद 356 के अंतर्गत कार्रवाई का आधार बन सकती है, लेकिन राष्ट्रपति शासन की घोषणा अपने-आप और अनिवार्य रूप से नहीं हो जाती। संवैधानिक परिस्थितियों का मूल्यांकन आवश्यक है।
राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 मामले में अनुच्छेद 356 के प्रयोग पर महत्त्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट किए।
मुख्य परीक्षा के लिए: एस. आर. बोम्मई निर्णय को संघवाद, लोकतांत्रिक जनादेश, राज्यपाल की भूमिका और अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर नियंत्रण के संदर्भ में समझें।
यदि राष्ट्रपति को यह संतोष हो कि भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता या साख (Financial Stability or Credit) को खतरा उत्पन्न हो गया है, तो अनुच्छेद 360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल की घोषणा की जा सकती है।
इसका उद्देश्य ऐसी असाधारण वित्तीय परिस्थिति में वित्तीय अनुशासन और स्थिरता बनाए रखने के लिए संवैधानिक व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
महत्त्वपूर्ण: भारत में आज तक वित्तीय आपातकाल घोषित नहीं किया गया है।
वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है और इसे दो महीने के भीतर दोनों सदनों से स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
यदि लोकसभा भंग हो और राज्यसभा उद्घोषणा को स्वीकृति दे दे, तो लोकसभा के पुनर्गठन के बाद उसकी पहली बैठक से 30 दिनों के भीतर लोकसभा की स्वीकृति आवश्यक होती है। निर्धारित अवधि में स्वीकृति न मिलने पर उद्घोषणा समाप्त हो जाती है।
संसद की स्वीकृति मिलने के बाद संविधान वित्तीय आपातकाल के लिए कोई अधिकतम कुल अवधि निर्धारित नहीं करता। यह तब तक जारी रह सकता है, जब तक इसे वापस न ले लिया जाए।
वित्तीय आपातकाल के दौरान संघ की कार्यपालिका राज्यों को वित्तीय अनुशासन से संबंधित निर्देश दे सकती है। अनुच्छेद 360 के अंतर्गत राष्ट्रपति को निम्नलिखित प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं:
वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना आवश्यक है। इसकी संसदीय स्वीकृति और संवैधानिक प्रभाव अनुच्छेद 360 के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होते हैं।
| आधार | राष्ट्रीय आपातकाल | राष्ट्रपति शासन | वित्तीय आपातकाल |
|---|---|---|---|
| अनुच्छेद | 352 | 356 | 360 |
| मुख्य आधार | युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा |
| संसदीय स्वीकृति | एक महीने में | दो महीने में | दो महीने में |
| स्वीकृति का बहुमत | विशेष बहुमत | सामान्य बहुमत | सामान्य बहुमत |
| अवधि | प्रत्येक छह महीने पर पुनः स्वीकृति आवश्यक | प्रत्येक छह महीने पर स्वीकृति; सामान्य अधिकतम सीमा तीन वर्ष | संविधान में अधिकतम कुल अवधि निर्धारित नहीं |
| भारत में प्रयोग | तीन बार | कई राज्यों में | आज तक नहीं |
नोट: अवधि और स्वीकृति संबंधी विवरण में संविधान के विशेष अपवाद भी लागू हो सकते हैं। राष्ट्रपति शासन की तीन वर्ष की अधिकतम सीमा अतिरिक्त संवैधानिक शर्तों के अधीन है।
भारतीय संविधान सामान्य परिस्थितियों में संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है। आपातकालीन परिस्थितियों में यह व्यवस्था कुछ सीमा तक अधिक केंद्रीकृत हो सकती है।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है और संघ राज्यों को व्यापक निर्देश दे सकता है। राष्ट्रपति शासन में राज्य की कार्यपालिका और विधायी व्यवस्था पर केंद्र की भूमिका बढ़ जाती है। वित्तीय आपातकाल राज्यों के वित्तीय निर्णयों पर केंद्र के नियंत्रण को बढ़ा सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की संघीय व्यवस्था समाप्त हो जाती है। इन शक्तियों का प्रयोग संविधान की शर्तों, संसद की स्वीकृति और न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
इन चिंताओं के कारण आपातकालीन प्रावधानों का प्रयोग केवल संवैधानिक आधार पर और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप किया जाना आवश्यक है।
भारतीय संविधान में आपातकाल की तीन प्रमुख व्यवस्थाएँ हैं: राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन और वित्तीय आपातकाल। इनके क्रमशः अनुच्छेद 352, 356 और 360 हैं।
राष्ट्रीय आपातकाल युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित किया जा सकता है। राष्ट्रपति शासन का संबंध राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता से है, जबकि वित्तीय आपातकाल का आधार वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा है।
राष्ट्रीय आपातकाल की संसदीय स्वीकृति एक महीने के भीतर विशेष बहुमत से आवश्यक है। राष्ट्रपति शासन और वित्तीय आपातकाल के लिए सामान्यतः दो महीने के भीतर संसदीय स्वीकृति आवश्यक होती है।
अनुच्छेद 358 का संबंध अनुच्छेद 19 से है और यह युद्ध या बाहरी आक्रमण आधारित राष्ट्रीय आपातकाल में लागू होता है। अनुच्छेद 359 के अंतर्गत निर्दिष्ट मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार पर रोक लग सकती है, लेकिन अनुच्छेद 20 और 21 के लिए यह रोक नहीं लगाई जा सकती।
यूपीएससी के लिए विशेष ध्यान: अनुच्छेदों को केवल याद करने के बजाय घोषणा की प्रक्रिया, संसदीय नियंत्रण, मौलिक अधिकारों पर प्रभाव, 44वें संविधान संशोधन और एस. आर. बोम्मई निर्णय को परस्पर जोड़कर समझें।