भारतीय संविधान के भाग VI में राज्यों की शासन-व्यवस्था से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद और राज्य का महाधिवक्ता प्रमुख संवैधानिक घटक हैं।
संसदीय शासन प्रणाली में राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका के रूप में शासन चलाती है। राज्यपाल की अधिकांश शक्तियों का प्रयोग संविधान के अनुसार मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर किया जाता है।
परीक्षा उपयोगिता: राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों और मुख्यमंत्री की वास्तविक राजनीतिक-प्रशासनिक भूमिका में अंतर समझना इस अध्याय का आधार है।
अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा। एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।
अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित अधिपत्र द्वारा करता है। राज्यपाल का प्रत्यक्ष चुनाव जनता या राज्य विधानमंडल नहीं करता।
राज्यपाल का पद केंद्र और राज्य के संवैधानिक संबंधों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। फिर भी राज्यपाल का अर्थ केंद्र सरकार का सामान्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं है; उसे संविधान में निर्धारित भूमिका और सीमाओं के भीतर कार्य करना होता है।
अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल बनने के लिए निम्नलिखित दो योग्यताएँ आवश्यक हैं:
संविधान राज्यपाल के लिए किसी विशेष शैक्षणिक डिग्री या न्यूनतम प्रशासनिक अनुभव को अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित नहीं करता।
अनुच्छेद 158 के प्रमुख प्रावधान:
अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल सामान्यतः पाँच वर्ष तक पद पर रहता है। लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the President) पद धारण करता है।
महत्वपूर्ण अंतर: पाँच वर्ष राज्यपाल के पद का सामान्य कार्यकाल है, पद पर बने रहने की पूर्ण गारंटी नहीं।
अनुच्छेद 159 के अनुसार राज्यपाल पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान करता है।
शपथ राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं। यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध न हों, तो उस न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।
शपथ में संविधान की रक्षा, संरक्षण और परिरक्षण करने तथा राज्य की जनता की सेवा और कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करने की प्रतिज्ञा शामिल होती है।
अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल सामान्यतः व्यक्तिगत रूप से राज्य सरकार चलाता है। संसदीय प्रणाली में वास्तविक प्रशासन मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के माध्यम से संचालित होता है।
राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 317 में विशेष प्रावधान हैं। इसलिए नियुक्ति और पद से हटाने की शक्तियों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।
अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है। सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।
यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, तो राज्यपाल को ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे विधानसभा में बहुमत प्राप्त कर सकने वाले नेता की पहचान हो सके। परिस्थितियों के अनुसार इसमें गठबंधन, समर्थन-पत्र और सदन में बहुमत परीक्षण महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
बहुमत को लेकर वास्तविक विवाद होने पर सामान्यतः उसका परीक्षण विधानसभा के पटल पर कराया जाना चाहिए। राज्यपाल की व्यक्तिगत धारणा को सदन के बहुमत का स्थायी विकल्प नहीं माना जा सकता।
संविधान में मुख्यमंत्री के लिए कोई अलग शैक्षणिक योग्यता या न्यूनतम प्रशासनिक अनुभव निर्धारित नहीं है। मुख्यमंत्री को विधानमंडल का सदस्य होने संबंधी संवैधानिक और वैधानिक योग्यताओं का पालन करना होता है।
यह छह महीने की व्यवस्था किसी व्यक्ति को सदस्यता की अन्य कानूनी अयोग्यताओं से छूट नहीं देती।
मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित रूप से पाँच वर्ष का नहीं होता। वह तब तक पद पर बना रह सकता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो और वह संवैधानिक एवं कानूनी शर्तें पूरी करता हो।
यदि मुख्यमंत्री विधानसभा में बहुमत खो देता है, तो उससे सदन में बहुमत सिद्ध करने की अपेक्षा की जा सकती है। बहुमत सिद्ध न कर पाने की स्थिति में उसे इस्तीफा देना पड़ सकता है। यदि वह इस्तीफा नहीं देता, तो राज्यपाल स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप आगे कार्रवाई कर सकता है।
राज्यपाल को मुख्यमंत्री हटाने की असीमित व्यक्तिगत शक्ति प्राप्त नहीं है। इस विषय में विधानसभा का वास्तविक बहुमत और संसदीय शासन के सिद्धांत निर्णायक महत्व रखते हैं।
अनुच्छेद 163 के अनुसार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है, सिवाय उन परिस्थितियों के जहाँ संविधान राज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करने की अनुमति देता है।
अनुच्छेद 164 के अनुसार अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है। व्यवहार में मुख्यमंत्री मंत्रियों के चयन, विभागों के आवंटन, नीतिगत प्राथमिकताओं और मंत्रिपरिषद के समन्वय में प्रमुख भूमिका निभाता है।
अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
इसका अर्थ है कि मंत्रिपरिषद को विधानसभा का विश्वास बनाए रखना चाहिए। यदि सरकार विधानसभा में विश्वास खो देती है और कोई संवैधानिक विकल्प उपलब्ध नहीं रहता, तो पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ सकता है।
सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत मंत्रिपरिषद को एक सामूहिक राजनीतिक इकाई के रूप में स्थापित करता है। मंत्रियों के बीच नीतिगत मतभेद होने पर भी सरकार विधानसभा के सामने सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहती है।
91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के अनुसार मुख्यमंत्री सहित राज्य के मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।
साथ ही, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या 12 से कम नहीं हो सकती। यह न्यूनतम सीमा संविधान में निर्धारित है।
यह नियम छोटे राज्यों में भी लागू होता है; इसलिए केवल 15 प्रतिशत की गणना करना पर्याप्त नहीं है, न्यूनतम 12 मंत्रियों की संवैधानिक शर्त को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के उन कर्तव्यों से संबंधित है जिनके माध्यम से राज्यपाल को राज्य सरकार के कामकाज की संवैधानिक जानकारी उपलब्ध होती है।
परीक्षा तथ्य: अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच सूचना एवं संवैधानिक संवाद की व्यवस्था स्थापित करता है।
राज्यपाल राज्य विधानमंडल का संवैधानिक अंग है। उसकी प्रमुख विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
राज्यपाल की इन शक्तियों का प्रयोग संविधान में निर्धारित प्रक्रिया और संसदीय शासन के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है।
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत होने पर अनुच्छेद 200 लागू होता है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल के पास संविधान द्वारा निर्धारित विकल्प होते हैं।
यदि लौटाया गया साधारण विधेयक विधानमंडल द्वारा पुनः पारित करके प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्यपाल स्वीकृति रोक नहीं सकता; हालांकि संविधान कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी करता है।
विधेयकों पर निर्णय में देरी और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका महत्वपूर्ण न्यायिक एवं संघीय बहस के विषय रहे हैं। इस विषय में उत्तर लिखते समय संविधान के पाठ, लागू न्यायिक निर्णयों और संबंधित परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए।
राज्यपाल की विधेयक संबंधी शक्तियों को सामान्यतः निम्नलिखित श्रेणियों में समझाया जाता है:
राज्यपाल के लिए संविधान में राष्ट्रपति जैसी स्पष्ट Pocket Veto व्यवस्था अलग से निर्धारित नहीं है। फिर भी विधेयकों पर निर्णय में देरी संवैधानिक विवाद का विषय बन सकती है। इसलिए वीटो की पारंपरिक श्रेणियों को अनुच्छेद 200 के वास्तविक प्रावधानों से अलग करके नहीं पढ़ना चाहिए।
राज्य में धन विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक होती है। धन विधेयक को राज्यपाल विधानमंडल के पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता।
यह सामान्य विधेयक से महत्वपूर्ण अंतर है। धन विधेयक के संबंध में राज्यपाल की भूमिका संविधान में निर्धारित विशेष प्रक्रिया के अनुसार होती है।
अनुच्छेद 213 के अंतर्गत राज्यपाल उस समय अध्यादेश जारी कर सकता है, जब राज्य विधानमंडल का सत्र नहीं चल रहा हो और ऐसी परिस्थिति हो जिसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो।
अध्यादेश की शक्ति असाधारण और अस्थायी है। इसका उपयोग नियमित विधायी प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक टालने के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
राज्य की वित्तीय प्रक्रिया में राज्यपाल की औपचारिक संवैधानिक भूमिका होती है, जबकि बजट और व्यय से संबंधित नीतिगत निर्णय निर्वाचित सरकार तथा विधानमंडल की संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं।
अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल को उन विषयों से संबंधित कानूनों के अंतर्गत अपराधों के लिए दंड में क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार या लघुकरण देने की शक्ति प्राप्त है, जिन विषयों पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है।
राज्यपाल की यह शक्ति राष्ट्रपति की अनुच्छेद 72 के अंतर्गत क्षमादान शक्ति से अलग है। दोनों की संवैधानिक सीमाएँ और कार्यपालिका शक्तियों का क्षेत्र समान नहीं हैं।
सामान्यतः राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है। लेकिन संविधान और स्थापित संवैधानिक सिद्धांत कुछ परिस्थितियों में उसे विवेकाधीन भूमिका प्रदान करते हैं।
ध्यान दें: विवेकाधीन शक्ति का अर्थ मनमानी शक्ति नहीं है। इसका प्रयोग संविधान, न्यायिक समीक्षा और संसदीय शासन के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
राज्यपाल राज्य में संवैधानिक तंत्र की स्थिति के बारे में राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज सकता है। यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य सामग्री के आधार पर यह संतोष हो कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की घोषणा का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।
राष्ट्रपति शासन केवल राज्यपाल की रिपोर्ट पर ही निर्भर नहीं है; संविधान में राष्ट्रपति को अन्य सामग्री के आधार पर भी कार्रवाई करने की अनुमति है।
अनुच्छेद 356 का प्रयोग असाधारण परिस्थिति में किया जाना चाहिए। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता और वास्तविक संवैधानिक विफलता के बीच अंतर करना आवश्यक है।
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जबकि मुख्यमंत्री निर्वाचित सरकार का राजनीतिक नेतृत्व करता है। दोनों की भूमिकाएँ अलग होते हुए भी राज्य की संवैधानिक व्यवस्था में परस्पर जुड़ी हैं।
| आधार | राज्यपाल | मुख्यमंत्री |
|---|---|---|
| स्थिति | राज्य का संवैधानिक प्रमुख | राज्य सरकार का राजनीतिक प्रमुख |
| नियुक्ति | राष्ट्रपति द्वारा | राज्यपाल द्वारा |
| कार्यपालिका में भूमिका | संवैधानिक शक्तियाँ राज्यपाल में निहित | मंत्रिपरिषद के नेतृत्व में वास्तविक शासन संचालन |
| कार्यकाल | सामान्यतः पाँच वर्ष; राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत | विधानसभा के विश्वास पर निर्भर |
| उत्तरदायित्व | संवैधानिक कर्तव्यों के अनुसार कार्य | मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी |
| विधायी भूमिका | सत्र, विधेयक, अध्यादेश आदि में संवैधानिक भूमिका | सरकार का विधायी कार्यक्रम और सदन में नेतृत्व |
| बहुमत | विधानसभा में बहुमत का व्यक्तिगत विकल्प नहीं | सरकार चलाने के लिए विधानसभा का विश्वास आवश्यक |
| आधार | राष्ट्रपति | राज्यपाल |
|---|---|---|
| क्षेत्र | संघ का संवैधानिक प्रमुख | राज्य का संवैधानिक प्रमुख |
| नियुक्ति/चुनाव | निर्वाचन मंडल द्वारा निर्वाचित | राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त |
| कार्यपालिका शक्ति | अनुच्छेद 53 | अनुच्छेद 154 |
| मंत्रिपरिषद की सलाह | अनुच्छेद 74 | अनुच्छेद 163 |
| क्षमादान | अनुच्छेद 72 | अनुच्छेद 161 |
| अध्यादेश | अनुच्छेद 123 | अनुच्छेद 213 |
| सामान्य कार्यकाल | पाँच वर्ष | पाँच वर्ष, लेकिन राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत |
परीक्षा संकेत: राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों संवैधानिक प्रमुख हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति, पद की शर्तों, क्षमादान शक्ति और अध्यादेश शक्ति के संवैधानिक प्रावधानों में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
भारतीय संघवाद में राज्यपाल की भूमिका को लेकर कई संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न उठते रहे हैं। ये प्रश्न मुख्यतः नियुक्ति, निष्पक्षता, विवेकाधिकार और राज्य सरकार के साथ संबंधों से जुड़े हैं।
केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए गठित सरकारिया आयोग ने राज्यपाल के पद को निष्पक्ष और संवैधानिक रूप से प्रभावी बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
ये आयोग की सिफारिशें हैं; इन्हें अपने-आप संविधान के बाध्यकारी प्रावधान नहीं समझना चाहिए।
केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा करने वाले पुंछी आयोग ने भी राज्यपाल के पद, संवैधानिक निष्पक्षता और संघीय संतुलन से जुड़े विषयों पर विचार किया।
आयोग की चर्चाओं में राज्यपाल की भूमिका को स्पष्ट करने, संवैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग की आशंका कम करने और केंद्र तथा राज्यों के बीच विश्वास मजबूत करने पर जोर दिया गया।
मुख्य परीक्षा में सरकारिया और पुंछी आयोग का उल्लेख करते समय उनकी सिफारिशों को संवैधानिक प्रावधानों और लागू कानून से अलग पहचानना चाहिए।
एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) भारतीय संघवाद और अनुच्छेद 356 के प्रयोग से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय है।
यह निर्णय दिखाता है कि राज्यपाल की रिपोर्ट और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियाँ न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः बाहर नहीं हैं।
राज्य की संसदीय शासन व्यवस्था में राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख और मुख्यमंत्री राज्य सरकार का राजनीतिक प्रमुख होता है। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, जबकि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है।
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है और सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच महत्वपूर्ण संवैधानिक संपर्क का माध्यम भी है।
इस अध्याय में विशेष रूप से अनुच्छेद 153, 154, 155, 156, 161, 163, 164, 167, 174, 200, 201, 213 और 356 को आपस में जोड़कर समझना चाहिए। राज्यपाल की शक्तियों के अध्ययन में संवैधानिक पाठ, संसदीय उत्तरदायित्व, न्यायिक समीक्षा और संघवाद के बीच संबंध महत्वपूर्ण हैं।