Governor and CM

राज्यपाल और मुख्यमंत्री

राज्य की कार्यपालिका का परिचय

भारतीय संविधान के भाग VI में राज्यों की शासन-व्यवस्था से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद और राज्य का महाधिवक्ता प्रमुख संवैधानिक घटक हैं।

संसदीय शासन प्रणाली में राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका के रूप में शासन चलाती है। राज्यपाल की अधिकांश शक्तियों का प्रयोग संविधान के अनुसार मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर किया जाता है।

  • राज्यपाल: राज्य का संवैधानिक प्रमुख।
  • मुख्यमंत्री: राज्य सरकार का राजनीतिक नेता।
  • मंत्रिपरिषद: राज्य की नीतियों और प्रशासन का संचालन।
  • महाधिवक्ता: राज्य सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी।

परीक्षा उपयोगिता: राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों और मुख्यमंत्री की वास्तविक राजनीतिक-प्रशासनिक भूमिका में अंतर समझना इस अध्याय का आधार है।

राज्यपाल — संवैधानिक स्थिति और नियुक्ति

अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा। एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।

अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित अधिपत्र द्वारा करता है। राज्यपाल का प्रत्यक्ष चुनाव जनता या राज्य विधानमंडल नहीं करता।

राज्यपाल का पद केंद्र और राज्य के संवैधानिक संबंधों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। फिर भी राज्यपाल का अर्थ केंद्र सरकार का सामान्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं है; उसे संविधान में निर्धारित भूमिका और सीमाओं के भीतर कार्य करना होता है।

राज्यपाल की योग्यताएँ

अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल बनने के लिए निम्नलिखित दो योग्यताएँ आवश्यक हैं:

  • व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु कम-से-कम 35 वर्ष हो।

संविधान राज्यपाल के लिए किसी विशेष शैक्षणिक डिग्री या न्यूनतम प्रशासनिक अनुभव को अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित नहीं करता।

राज्यपाल के पद की शर्तें

अनुच्छेद 158 के प्रमुख प्रावधान:

  • राज्यपाल संसद या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं हो सकता।
  • यदि संसद या राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य राज्यपाल नियुक्त होता है, तो पद ग्रहण करने की तारीख से उसकी सीट रिक्त मानी जाती है।
  • राज्यपाल कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।
  • राज्यपाल को आधिकारिक निवास बिना किराए के उपलब्ध कराया जाता है तथा संविधान और कानून के अनुसार वेतन-भत्ते मिलते हैं।

राज्यपाल का कार्यकाल और पद से हटाना

अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल सामान्यतः पाँच वर्ष तक पद पर रहता है। लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the President) पद धारण करता है।

  • राज्यपाल अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को देता है।
  • राष्ट्रपति राज्यपाल को उसके पाँच वर्ष के कार्यकाल से पहले भी हटा सकता है।
  • पाँच वर्ष पूरे होने के बाद उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक राज्यपाल पद पर बना रह सकता है।
  • राज्यपाल के लिए राष्ट्रपति की तरह महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित नहीं है।

महत्वपूर्ण अंतर: पाँच वर्ष राज्यपाल के पद का सामान्य कार्यकाल है, पद पर बने रहने की पूर्ण गारंटी नहीं।

राज्यपाल की शपथ

अनुच्छेद 159 के अनुसार राज्यपाल पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान करता है।

शपथ राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं। यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध न हों, तो उस न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।

शपथ में संविधान की रक्षा, संरक्षण और परिरक्षण करने तथा राज्य की जनता की सेवा और कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करने की प्रतिज्ञा शामिल होती है।

राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियाँ

अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल सामान्यतः व्यक्तिगत रूप से राज्य सरकार चलाता है। संसदीय प्रणाली में वास्तविक प्रशासन मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के माध्यम से संचालित होता है।

  • मुख्यमंत्री की नियुक्ति करना।
  • मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करना।
  • राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करना।
  • राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करना; उन्हें हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग है और सामान्यतः राज्यपाल के हाथ में नहीं होती।
  • संविधान और कानून के अनुसार राज्य सरकार के कार्यों के संचालन के लिए नियम बनाना।
  • राज्य प्रशासन से संबंधित संवैधानिक औपचारिकताओं का निर्वहन करना।

राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 317 में विशेष प्रावधान हैं। इसलिए नियुक्ति और पद से हटाने की शक्तियों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।

मुख्यमंत्री की नियुक्ति

अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है। सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।

यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, तो राज्यपाल को ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे विधानसभा में बहुमत प्राप्त कर सकने वाले नेता की पहचान हो सके। परिस्थितियों के अनुसार इसमें गठबंधन, समर्थन-पत्र और सदन में बहुमत परीक्षण महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

बहुमत को लेकर वास्तविक विवाद होने पर सामान्यतः उसका परीक्षण विधानसभा के पटल पर कराया जाना चाहिए। राज्यपाल की व्यक्तिगत धारणा को सदन के बहुमत का स्थायी विकल्प नहीं माना जा सकता।

मुख्यमंत्री की योग्यता और विधानमंडल की सदस्यता

संविधान में मुख्यमंत्री के लिए कोई अलग शैक्षणिक योग्यता या न्यूनतम प्रशासनिक अनुभव निर्धारित नहीं है। मुख्यमंत्री को विधानमंडल का सदस्य होने संबंधी संवैधानिक और वैधानिक योग्यताओं का पालन करना होता है।

  • मुख्यमंत्री राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है, यदि राज्य में द्विसदनीय विधानमंडल है।
  • यदि नियुक्ति के समय वह विधानमंडल का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर सदस्य बनना आवश्यक है।
  • छह महीने के भीतर सदस्य न बनने पर वह मंत्री पद पर नहीं रह सकता।
  • सदस्यता प्राप्त करने के लिए संबंधित सदन की पात्रता और अन्य संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होती हैं।

यह छह महीने की व्यवस्था किसी व्यक्ति को सदस्यता की अन्य कानूनी अयोग्यताओं से छूट नहीं देती।

मुख्यमंत्री का कार्यकाल और बहुमत

मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित रूप से पाँच वर्ष का नहीं होता। वह तब तक पद पर बना रह सकता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो और वह संवैधानिक एवं कानूनी शर्तें पूरी करता हो।

यदि मुख्यमंत्री विधानसभा में बहुमत खो देता है, तो उससे सदन में बहुमत सिद्ध करने की अपेक्षा की जा सकती है। बहुमत सिद्ध न कर पाने की स्थिति में उसे इस्तीफा देना पड़ सकता है। यदि वह इस्तीफा नहीं देता, तो राज्यपाल स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप आगे कार्रवाई कर सकता है।

राज्यपाल को मुख्यमंत्री हटाने की असीमित व्यक्तिगत शक्ति प्राप्त नहीं है। इस विषय में विधानसभा का वास्तविक बहुमत और संसदीय शासन के सिद्धांत निर्णायक महत्व रखते हैं।

मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद

अनुच्छेद 163 के अनुसार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है, सिवाय उन परिस्थितियों के जहाँ संविधान राज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करने की अनुमति देता है।

अनुच्छेद 164 के अनुसार अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है। व्यवहार में मुख्यमंत्री मंत्रियों के चयन, विभागों के आवंटन, नीतिगत प्राथमिकताओं और मंत्रिपरिषद के समन्वय में प्रमुख भूमिका निभाता है।

मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

इसका अर्थ है कि मंत्रिपरिषद को विधानसभा का विश्वास बनाए रखना चाहिए। यदि सरकार विधानसभा में विश्वास खो देती है और कोई संवैधानिक विकल्प उपलब्ध नहीं रहता, तो पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ सकता है।

सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत मंत्रिपरिषद को एक सामूहिक राजनीतिक इकाई के रूप में स्थापित करता है। मंत्रियों के बीच नीतिगत मतभेद होने पर भी सरकार विधानसभा के सामने सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहती है।

मंत्रिपरिषद की संख्या की सीमा

91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के अनुसार मुख्यमंत्री सहित राज्य के मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

साथ ही, मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या 12 से कम नहीं हो सकती। यह न्यूनतम सीमा संविधान में निर्धारित है।

यह नियम छोटे राज्यों में भी लागू होता है; इसलिए केवल 15 प्रतिशत की गणना करना पर्याप्त नहीं है, न्यूनतम 12 मंत्रियों की संवैधानिक शर्त को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

मुख्यमंत्री की प्रमुख शक्तियाँ और कार्य

  • मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करना और उसकी बैठकों का संचालन करना।
  • मंत्रियों के विभागों के आवंटन और पुनर्वितरण में प्रमुख भूमिका निभाना।
  • राज्य सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं का निर्धारण करना।
  • विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना।
  • राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के निर्णयों और प्रशासनिक मामलों की जानकारी देना।
  • विधानसभा में सरकार का नेतृत्व करना।
  • राज्य के विकास कार्यक्रमों और प्रशासनिक सुधारों को दिशा देना।
  • केंद्र सरकार तथा अन्य राज्यों के साथ राज्य के संबंधों में नेतृत्व करना।

अनुच्छेद 167 — मुख्यमंत्री के संवैधानिक कर्तव्य

अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के उन कर्तव्यों से संबंधित है जिनके माध्यम से राज्यपाल को राज्य सरकार के कामकाज की संवैधानिक जानकारी उपलब्ध होती है।

  • मंत्रिपरिषद के प्रशासनिक निर्णयों और विधायी प्रस्तावों की जानकारी राज्यपाल को देना।
  • राज्यपाल द्वारा मांगी गई राज्य प्रशासन और विधायी मामलों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना।
  • यदि राज्यपाल अपेक्षा करे, तो किसी मंत्री द्वारा लिए गए ऐसे निर्णय को मंत्रिपरिषद के विचार के लिए रखना, जिस पर मंत्रिपरिषद ने विचार न किया हो।

परीक्षा तथ्य: अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच सूचना एवं संवैधानिक संवाद की व्यवस्था स्थापित करता है।

राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ

राज्यपाल राज्य विधानमंडल का संवैधानिक अंग है। उसकी प्रमुख विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  • विधानमंडल का सत्र बुलाना और सत्रावसान करना।
  • संवैधानिक शर्तों के अनुसार विधानसभा को भंग करना।
  • विधानमंडल को संबोधित करना तथा संदेश भेजना।
  • विधेयकों पर संवैधानिक विकल्पों के अनुसार कार्रवाई करना।
  • कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना।
  • विधानमंडल के सत्र में न होने पर अनुच्छेद 213 के अंतर्गत अध्यादेश जारी करना।

राज्यपाल की इन शक्तियों का प्रयोग संविधान में निर्धारित प्रक्रिया और संसदीय शासन के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है।

राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई — अनुच्छेद 200

राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत होने पर अनुच्छेद 200 लागू होता है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल के पास संविधान द्वारा निर्धारित विकल्प होते हैं।

  • विधेयक को स्वीकृति देना।
  • स्वीकृति रोकना।
  • धन विधेयक को छोड़कर किसी विधेयक को संदेश सहित पुनर्विचार के लिए विधानमंडल को लौटाना।
  • विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना।

यदि लौटाया गया साधारण विधेयक विधानमंडल द्वारा पुनः पारित करके प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्यपाल स्वीकृति रोक नहीं सकता; हालांकि संविधान कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी करता है।

विधेयकों पर निर्णय में देरी और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका महत्वपूर्ण न्यायिक एवं संघीय बहस के विषय रहे हैं। इस विषय में उत्तर लिखते समय संविधान के पाठ, लागू न्यायिक निर्णयों और संबंधित परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए।

राज्यपाल की वीटो शक्तियाँ

राज्यपाल की विधेयक संबंधी शक्तियों को सामान्यतः निम्नलिखित श्रेणियों में समझाया जाता है:

  • पूर्ण वीटो (Absolute Veto): विधेयक को स्वीकृति न देना।
  • निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): धन विधेयक को छोड़कर किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना।
  • आरक्षित विधेयक (Reserved Bill): विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना।

राज्यपाल के लिए संविधान में राष्ट्रपति जैसी स्पष्ट Pocket Veto व्यवस्था अलग से निर्धारित नहीं है। फिर भी विधेयकों पर निर्णय में देरी संवैधानिक विवाद का विषय बन सकती है। इसलिए वीटो की पारंपरिक श्रेणियों को अनुच्छेद 200 के वास्तविक प्रावधानों से अलग करके नहीं पढ़ना चाहिए।

राज्यपाल और धन विधेयक

राज्य में धन विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक होती है। धन विधेयक को राज्यपाल विधानमंडल के पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता।

यह सामान्य विधेयक से महत्वपूर्ण अंतर है। धन विधेयक के संबंध में राज्यपाल की भूमिका संविधान में निर्धारित विशेष प्रक्रिया के अनुसार होती है।

राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति — अनुच्छेद 213

अनुच्छेद 213 के अंतर्गत राज्यपाल उस समय अध्यादेश जारी कर सकता है, जब राज्य विधानमंडल का सत्र नहीं चल रहा हो और ऐसी परिस्थिति हो जिसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो।

  • अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के अधिनियम के समान प्रभाव और बल प्राप्त होता है, लेकिन वह संविधान की सीमाओं के अधीन होता है।
  • विधानमंडल के पुनः एकत्र होने पर अध्यादेश को निर्धारित अवधि के भीतर स्वीकृति न मिलने पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
  • सामान्य संवैधानिक नियम के अनुसार विधानमंडल के पुनः एकत्र होने से छह सप्ताह बाद अध्यादेश समाप्त हो जाता है, यदि उससे पहले उसे अस्वीकृत या वापस न ले लिया जाए।
  • कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल राष्ट्रपति के निर्देश के बिना अध्यादेश जारी नहीं कर सकता।

अध्यादेश की शक्ति असाधारण और अस्थायी है। इसका उपयोग नियमित विधायी प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक टालने के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

राज्यपाल की वित्तीय शक्तियाँ

  • राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण विधानमंडल के समक्ष रखवाना।
  • धन विधेयक की प्रस्तुति के लिए आवश्यक सिफारिश देना।
  • अनुदान की मांगों से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया में भूमिका निभाना।
  • राज्य की आकस्मिक निधि से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कार्य करना।

राज्य की वित्तीय प्रक्रिया में राज्यपाल की औपचारिक संवैधानिक भूमिका होती है, जबकि बजट और व्यय से संबंधित नीतिगत निर्णय निर्वाचित सरकार तथा विधानमंडल की संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं।

राज्यपाल की क्षमादान शक्ति — अनुच्छेद 161

अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल को उन विषयों से संबंधित कानूनों के अंतर्गत अपराधों के लिए दंड में क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार या लघुकरण देने की शक्ति प्राप्त है, जिन विषयों पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है।

  • क्षमा (Pardon): दंड और दोषसिद्धि के प्रभाव को समाप्त करना।
  • लघुकरण (Commutation): दंड के स्वरूप को हल्का करना।
  • परिहार (Remission): दंड की अवधि घटाना।
  • विराम (Respite): विशेष परिस्थितियों के कारण कम दंड देना।
  • प्रविलंबन (Reprieve): दंड के निष्पादन को अस्थायी रूप से टालना।

राज्यपाल की यह शक्ति राष्ट्रपति की अनुच्छेद 72 के अंतर्गत क्षमादान शक्ति से अलग है। दोनों की संवैधानिक सीमाएँ और कार्यपालिका शक्तियों का क्षेत्र समान नहीं हैं।

राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ

सामान्यतः राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है। लेकिन संविधान और स्थापित संवैधानिक सिद्धांत कुछ परिस्थितियों में उसे विवेकाधीन भूमिका प्रदान करते हैं।

  • त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में मुख्यमंत्री की नियुक्ति से संबंधित निर्णय।
  • जहाँ बहुमत पर वास्तविक संदेह हो, वहाँ सदन में बहुमत परीक्षण की आवश्यकता सुनिश्चित करने की भूमिका।
  • संविधान के अनुसार कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखना।
  • राज्य में संवैधानिक तंत्र की स्थिति पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना।
  • कुछ राज्यों और क्षेत्रों में संविधान द्वारा निर्धारित विशेष जिम्मेदारियों का निर्वहन करना।

ध्यान दें: विवेकाधीन शक्ति का अर्थ मनमानी शक्ति नहीं है। इसका प्रयोग संविधान, न्यायिक समीक्षा और संसदीय शासन के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

राज्यपाल की रिपोर्ट और अनुच्छेद 356

राज्यपाल राज्य में संवैधानिक तंत्र की स्थिति के बारे में राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज सकता है। यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य सामग्री के आधार पर यह संतोष हो कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की घोषणा का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।

राष्ट्रपति शासन केवल राज्यपाल की रिपोर्ट पर ही निर्भर नहीं है; संविधान में राष्ट्रपति को अन्य सामग्री के आधार पर भी कार्रवाई करने की अनुमति है।

अनुच्छेद 356 का प्रयोग असाधारण परिस्थिति में किया जाना चाहिए। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता और वास्तविक संवैधानिक विफलता के बीच अंतर करना आवश्यक है।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच संबंध

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जबकि मुख्यमंत्री निर्वाचित सरकार का राजनीतिक नेतृत्व करता है। दोनों की भूमिकाएँ अलग होते हुए भी राज्य की संवैधानिक व्यवस्था में परस्पर जुड़ी हैं।

  • राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है।
  • मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद के निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देता है।
  • राज्यपाल संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार विधानमंडल और कार्यपालिका से संबंधित कार्य करता है।
  • मुख्यमंत्री राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक दिशा का नेतृत्व करता है।
  • बहुमत, विधेयकों और संवैधानिक तंत्र से जुड़े विवादों में दोनों की शक्तियों का निर्धारण संविधान के अनुसार होता है।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री में अंतर

आधार राज्यपाल मुख्यमंत्री
स्थिति राज्य का संवैधानिक प्रमुख राज्य सरकार का राजनीतिक प्रमुख
नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल द्वारा
कार्यपालिका में भूमिका संवैधानिक शक्तियाँ राज्यपाल में निहित मंत्रिपरिषद के नेतृत्व में वास्तविक शासन संचालन
कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष; राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत विधानसभा के विश्वास पर निर्भर
उत्तरदायित्व संवैधानिक कर्तव्यों के अनुसार कार्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी
विधायी भूमिका सत्र, विधेयक, अध्यादेश आदि में संवैधानिक भूमिका सरकार का विधायी कार्यक्रम और सदन में नेतृत्व
बहुमत विधानसभा में बहुमत का व्यक्तिगत विकल्प नहीं सरकार चलाने के लिए विधानसभा का विश्वास आवश्यक

राज्यपाल और राष्ट्रपति में तुलना

आधार राष्ट्रपति राज्यपाल
क्षेत्र संघ का संवैधानिक प्रमुख राज्य का संवैधानिक प्रमुख
नियुक्ति/चुनाव निर्वाचन मंडल द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त
कार्यपालिका शक्ति अनुच्छेद 53 अनुच्छेद 154
मंत्रिपरिषद की सलाह अनुच्छेद 74 अनुच्छेद 163
क्षमादान अनुच्छेद 72 अनुच्छेद 161
अध्यादेश अनुच्छेद 123 अनुच्छेद 213
सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष पाँच वर्ष, लेकिन राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत

परीक्षा संकेत: राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों संवैधानिक प्रमुख हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति, पद की शर्तों, क्षमादान शक्ति और अध्यादेश शक्ति के संवैधानिक प्रावधानों में महत्वपूर्ण अंतर हैं।

राज्यपाल के पद से संबंधित प्रमुख विवाद

भारतीय संघवाद में राज्यपाल की भूमिका को लेकर कई संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न उठते रहे हैं। ये प्रश्न मुख्यतः नियुक्ति, निष्पक्षता, विवेकाधिकार और राज्य सरकार के साथ संबंधों से जुड़े हैं।

  • राज्यपाल की नियुक्ति में राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखना।
  • त्रिशंकु विधानसभा में सरकार गठन के लिए पारदर्शी मानदंड।
  • बहुमत परीक्षण कराने में अनुचित देरी या हस्तक्षेप की आशंका।
  • विधेयकों पर निर्णय में देरी और अनुच्छेद 200 की व्याख्या।
  • अनुच्छेद 356 की सिफारिश में निष्पक्षता।
  • राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका और निर्वाचित सरकार के जनादेश के बीच संतुलन।

सरकारिया आयोग की सिफारिशें

केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए गठित सरकारिया आयोग ने राज्यपाल के पद को निष्पक्ष और संवैधानिक रूप से प्रभावी बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

  • राज्यपाल के रूप में प्रतिष्ठित और सार्वजनिक जीवन में अनुभवी व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाए।
  • राज्यपाल को राज्य की सक्रिय राजनीति से यथासंभव दूर व्यक्ति बनाया जाए।
  • सामान्यतः राज्यपाल उस राज्य से बाहर का व्यक्ति हो, ताकि स्थानीय राजनीतिक गुटों से दूरी बनी रहे।
  • राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श को नियुक्ति प्रक्रिया में महत्व दिया जाए।
  • राज्यपाल की भूमिका निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख के रूप में बनी रहे।

ये आयोग की सिफारिशें हैं; इन्हें अपने-आप संविधान के बाध्यकारी प्रावधान नहीं समझना चाहिए।

पुंछी आयोग और राज्यपाल

केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा करने वाले पुंछी आयोग ने भी राज्यपाल के पद, संवैधानिक निष्पक्षता और संघीय संतुलन से जुड़े विषयों पर विचार किया।

आयोग की चर्चाओं में राज्यपाल की भूमिका को स्पष्ट करने, संवैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग की आशंका कम करने और केंद्र तथा राज्यों के बीच विश्वास मजबूत करने पर जोर दिया गया।

मुख्य परीक्षा में सरकारिया और पुंछी आयोग का उल्लेख करते समय उनकी सिफारिशों को संवैधानिक प्रावधानों और लागू कानून से अलग पहचानना चाहिए।

एस. आर. बोम्मई मामला और राज्यपाल

एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) भारतीय संघवाद और अनुच्छेद 356 के प्रयोग से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय है।

  • अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
  • विधानसभा में बहुमत का प्रश्न सामान्यतः सदन के पटल पर परीक्षण से तय किया जाना चाहिए।
  • केवल राज्यपाल की धारणा को विधानसभा के वास्तविक बहुमत का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
  • संघवाद संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
  • अनुच्छेद 356 का प्रयोग मनमाने या राजनीतिक आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

यह निर्णय दिखाता है कि राज्यपाल की रिपोर्ट और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियाँ न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः बाहर नहीं हैं।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक अनुच्छेद

  • अनुच्छेद 153: राज्यों में राज्यपाल।
  • अनुच्छेद 154: राज्य की कार्यपालिका शक्ति।
  • अनुच्छेद 155: राज्यपाल की नियुक्ति।
  • अनुच्छेद 156: राज्यपाल का कार्यकाल।
  • अनुच्छेद 157: राज्यपाल की योग्यताएँ।
  • अनुच्छेद 158: राज्यपाल के पद की शर्तें।
  • अनुच्छेद 159: राज्यपाल की शपथ।
  • अनुच्छेद 161: राज्यपाल की क्षमादान शक्ति।
  • अनुच्छेद 163: राज्यपाल को सहायता और सलाह देने वाली मंत्रिपरिषद।
  • अनुच्छेद 164: मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति तथा मंत्रिपरिषद से संबंधित प्रावधान।
  • अनुच्छेद 167: मुख्यमंत्री के राज्यपाल के प्रति कर्तव्य।
  • अनुच्छेद 174: राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाना, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन।
  • अनुच्छेद 175: राज्यपाल का सदनों को संबोधित करना और संदेश भेजना।
  • अनुच्छेद 176: राज्यपाल का विशेष अभिभाषण।
  • अनुच्छेद 200: राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई।
  • अनुच्छेद 201: राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित विधेयक।
  • अनुच्छेद 213: राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति।
  • अनुच्छेद 356: राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता।

अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

  • राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
  • राज्यपाल बनने की न्यूनतम आयु 35 वर्ष है।
  • राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष है, लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
  • राज्यपाल अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को देता है।
  • मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है।
  • अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल करता है।
  • राज्य मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
  • विधानमंडल का सदस्य न होने पर नियुक्त मुख्यमंत्री को छह महीने के भीतर सदस्य बनना होता है।
  • राज्य मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती और यह संख्या 12 से कम नहीं हो सकती।
  • अनुच्छेद 163 राज्यपाल को सहायता और सलाह देने वाली मंत्रिपरिषद से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 164 मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति तथा मंत्रिपरिषद के उत्तरदायित्व से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के राज्यपाल के प्रति संवैधानिक कर्तव्यों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 161 राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 200 विधेयकों पर राज्यपाल की कार्रवाई से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 213 राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता से संबंधित है।
  • एस. आर. बोम्मई मामला (1994) अनुच्छेद 356, न्यायिक समीक्षा और संघवाद के लिए महत्वपूर्ण है।

परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियाँ

  • गलती: राज्यपाल का चुनाव जनता करती है।
    सही: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
  • गलती: राज्यपाल का कार्यकाल हर परिस्थिति में निश्चित पाँच वर्ष का होता है।
    सही: सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष है, लेकिन राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है।
  • गलती: मुख्यमंत्री की नियुक्ति विधानसभा करती है।
    सही: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है; सामान्यतः विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को नियुक्त किया जाता है।
  • गलती: राज्यपाल हमेशा अपनी व्यक्तिगत इच्छा से कार्य करता है।
    सही: सामान्यतः वह मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है; विवेकाधीन भूमिका केवल संवैधानिक परिस्थितियों में होती है।
  • गलती: राज्यपाल स्वयं तय कर सकता है कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं।
    सही: वास्तविक बहुमत का परीक्षण सामान्यतः विधानसभा के पटल पर किया जाना चाहिए।
  • गलती: राज्यपाल किसी भी धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है।
    सही: धन विधेयक को राज्यपाल पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता।
  • गलती: राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री को हटाने की असीमित शक्ति है।
    सही: मुख्यमंत्री का पद विधानसभा के विश्वास और संसदीय शासन के सिद्धांतों से जुड़ा है।
  • गलती: सरकारिया आयोग की सभी सिफारिशें संविधान के बाध्यकारी नियम हैं।
    सही: आयोग की सिफारिशें सुधार के सुझाव हैं; उन्हें संविधान के प्रावधानों से अलग पहचानना चाहिए।

त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)

राज्य की संसदीय शासन व्यवस्था में राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख और मुख्यमंत्री राज्य सरकार का राजनीतिक प्रमुख होता है। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, जबकि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है।

मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है और सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच महत्वपूर्ण संवैधानिक संपर्क का माध्यम भी है।

इस अध्याय में विशेष रूप से अनुच्छेद 153, 154, 155, 156, 161, 163, 164, 167, 174, 200, 201, 213 और 356 को आपस में जोड़कर समझना चाहिए। राज्यपाल की शक्तियों के अध्ययन में संवैधानिक पाठ, संसदीय उत्तरदायित्व, न्यायिक समीक्षा और संघवाद के बीच संबंध महत्वपूर्ण हैं।