Local Self-Government

स्थानीय स्वशासन

स्थानीय स्वशासन: अर्थ और संवैधानिक महत्व

स्थानीय स्वशासन वह व्यवस्था है जिसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़े कार्य निर्वाचित स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से संचालित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य निर्णय लेने की प्रक्रिया को जनता के निकट लाना और लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक विस्तारित करना है।

भारत में स्थानीय स्वशासन मुख्यतः दो रूपों में कार्य करता है: ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाएँ और शहरी क्षेत्रों में नगरपालिकाएँ। इनके गठन, संरचना, चुनाव, कार्यकाल तथा अन्य प्रमुख विषयों के लिए संविधान में विशेष प्रावधान हैं।

  • विकेंद्रीकरण: निर्णय लेने की शक्तियों को उच्च स्तर से स्थानीय स्तर तक पहुँचाना।
  • जनभागीदारी: नागरिकों को स्थानीय निर्णयों और विकास योजनाओं में शामिल करना।
  • जवाबदेही: स्थानीय प्रतिनिधियों को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाना।
  • सामाजिक न्याय: महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य वंचित समूहों की भागीदारी बढ़ाना।
  • स्थानीय विकास: स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएँ बनाना और लागू करना।

स्थानीय स्वशासन का वास्तविक उद्देश्य केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि निर्वाचित संस्थाओं को पर्याप्त कार्य, वित्तीय संसाधन और कर्मचारी उपलब्ध कराकर उन्हें प्रभावी बनाना है।

भारत में स्थानीय स्वशासन का ऐतिहासिक विकास

भारत में ग्राम समुदायों और स्थानीय संस्थाओं की ऐतिहासिक परंपरा रही है। आधुनिक स्थानीय स्वशासन का विकास औपनिवेशिक शासन के दौरान हुआ और स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के उद्देश्य से इसे अधिक व्यवस्थित बनाने के प्रयास किए गए।

  • लॉर्ड रिपन का प्रस्ताव, 1882: स्थानीय स्वशासन के विकास में महत्वपूर्ण कदम। इसी कारण लॉर्ड रिपन को सामान्यतः भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919: स्थानीय स्वशासन को प्रांतीय शासन के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान मिला।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935: प्रांतीय स्वायत्तता के विस्तार से प्रांतीय सरकारों की भूमिका बढ़ी।
  • संविधान का अनुच्छेद 40: राज्य को ग्राम पंचायतों के संगठन और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य शक्तियाँ देने का निर्देश देता है।
  • 1957: बलवंत राय मेहता समिति ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिए त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश की।
  • 24 अप्रैल 1993: 73वाँ संविधान संशोधन प्रभावी हुआ।
  • 1 जून 1993: 74वाँ संविधान संशोधन प्रभावी हुआ।

परीक्षा में ध्यान दें: अनुच्छेद 40 राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों में शामिल है। यह अपने आप में मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक अवधारणा का महत्वपूर्ण आधार है।

पंचायती राज के लिए प्रमुख समितियाँ

स्वतंत्रता के बाद पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न समितियों ने सुझाव दिए। इनके सुझावों ने स्थानीय स्वशासन की संरचना, प्रशासनिक भूमिका और संवैधानिक दर्जे पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।

समिति वर्ष प्रमुख सुझाव या योगदान
बलवंत राय मेहता समिति 1957 लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश।
अशोक मेहता समिति 1977 द्विस्तरीय व्यवस्था: जिला परिषद और मंडल पंचायत; संवैधानिक मान्यता पर जोर।
जी. वी. के. राव समिति 1985 ग्रामीण विकास प्रशासन में जिला स्तर और पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका मजबूत करने पर जोर।
एल. एम. सिंहवी समिति 1986 पंचायतों को संवैधानिक मान्यता और ग्राम सभा को लोकतंत्र की आधारभूत इकाई बनाने की सिफारिश।

तथ्यात्मक अंतर: बलवंत राय मेहता समिति ने त्रिस्तरीय व्यवस्था का समर्थन किया, जबकि अशोक मेहता समिति ने द्विस्तरीय व्यवस्था की सिफारिश की थी। दोनों की सिफारिशों को एक-दूसरे से नहीं मिलाना चाहिए।

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पारित किया गया। यह 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसने संविधान में भाग IX जोड़ा, जिसमें अनुच्छेद 243 से 243-O तक पंचायतों से संबंधित प्रावधान हैं।

  • संविधान में भाग IX जोड़ा गया।
  • ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें 29 विषय शामिल हैं।
  • ग्राम सभा को संवैधानिक आधार दिया गया।
  • पंचायतों के नियमित चुनाव की व्यवस्था की गई।
  • अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।
  • राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई।
  • राज्य वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।
  • पंचायतों के कार्यकाल और चुनाव संबंधी प्रावधान निर्धारित किए गए।

महत्वपूर्ण: 73वें संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक आधार दिया, लेकिन ग्यारहवीं अनुसूची के सभी 29 विषय अपने आप पंचायतों को हस्तांतरित नहीं हो जाते। वास्तविक शक्तियों का हस्तांतरण राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों पर निर्भर करता है।

ग्राम सभा

अनुच्छेद 243(b) के अनुसार ग्राम सभा वह निकाय है जिसमें ग्राम स्तर की पंचायत के क्षेत्र से संबंधित गाँव या गाँवों की मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्ति शामिल होते हैं। ग्राम सभा प्रत्यक्ष लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संस्था है।

  • स्थानीय आवश्यकताओं और विकास प्राथमिकताओं पर विचार करना।
  • ग्राम पंचायत के कार्यों के प्रति जन-जवाबदेही को मजबूत करना।
  • स्थानीय योजनाओं और कार्यक्रमों पर चर्चा करना।
  • लागू नियमों के अनुसार लाभार्थियों की पहचान या अनुमोदन की प्रक्रिया में भाग लेना।
  • सामाजिक लेखा-परीक्षा और सार्वजनिक निगरानी में भूमिका निभाना।

ग्राम सभा की शक्तियाँ और बैठक की प्रक्रिया संबंधित राज्य के कानूनों से भी निर्धारित होती हैं। इसलिए सभी राज्यों में इसकी कार्यप्रणाली बिल्कुल एक जैसी होना आवश्यक नहीं है।

ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में अंतर: ग्राम सभा मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्तियों का निकाय है, जबकि ग्राम पंचायत ग्राम स्तर पर निर्वाचित स्थानीय शासन संस्था है।

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था

संविधान के अनुच्छेद 243B के अनुसार सामान्यतः गाँव, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों की व्यवस्था की जाती है।

  • ग्राम स्तर: ग्राम पंचायत।
  • मध्यवर्ती स्तर: पंचायत समिति, क्षेत्र पंचायत या राज्य में प्रचलित अन्य नाम।
  • जिला स्तर: जिला परिषद या जिला पंचायत।

जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से अधिक नहीं है, वहाँ मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है। इस अपवाद का आधार अनुच्छेद 243B है।

पंचायतों की संरचना और निर्वाचन

अनुच्छेद 243C पंचायतों की संरचना से संबंधित है। पंचायतों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधि सामान्यतः प्रत्यक्ष चुनाव से चुने जाते हैं। अध्यक्षों के चुनाव की पद्धति राज्य के कानून द्वारा निर्धारित की जाती है।

मध्यवर्ती और जिला स्तर की पंचायतों में ग्राम स्तर की पंचायतों के अध्यक्षों या अन्य प्रतिनिधियों की भागीदारी की व्यवस्था राज्य कानून के अनुसार हो सकती है।

पंचायतों के चुनावों का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण अनुच्छेद 243K के अंतर्गत राज्य निर्वाचन आयोग के पास होता है।

पंचायतों में आरक्षण

अनुच्छेद 243D पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान करता है।

  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पंचायत क्षेत्र की जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
  • प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरी जाने वाली कुल सीटों में कम-से-कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित।
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में भी कम-से-कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित।
  • पंचायत अध्यक्षों के पदों में कम-से-कम एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित।
  • राज्य विधानमंडल पिछड़े वर्गों के पक्ष में भी आरक्षण का प्रावधान कर सकता है।

महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण संविधान का न्यूनतम प्रावधान है। कई राज्यों ने अपने कानूनों के माध्यम से इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया है। यह व्यवस्था राज्य के कानून के अनुसार लागू होती है।

पंचायतों का कार्यकाल और समयपूर्व विघटन

अनुच्छेद 243E के अनुसार पंचायत का सामान्य कार्यकाल उसकी पहली बैठक के लिए निर्धारित तारीख से पाँच वर्ष होता है, जब तक कि उसे कानून के अनुसार पहले भंग न कर दिया जाए।

  • पंचायत के कार्यकाल की समाप्ति से पहले चुनाव पूरा कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • समयपूर्व विघटन होने पर सामान्यतः विघटन की तारीख से छह महीने के भीतर चुनाव कराया जाना चाहिए।
  • यदि भंग पंचायत के शेष कार्यकाल की अवधि छह महीने से कम है, तो उस अवधि के लिए चुनाव कराना आवश्यक नहीं है।
  • समयपूर्व विघटन के बाद गठित पंचायत सामान्यतः केवल पिछली पंचायत के शेष कार्यकाल के लिए कार्य करती है।

राज्य निर्वाचन आयोग

अनुच्छेद 243K पंचायतों के चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग का प्रावधान करता है। नगरपालिकाओं के चुनावों से संबंधित प्रावधान अनुच्छेद 243ZA में है।

  • राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल करता है।
  • पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग करता है।
  • राज्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की सुरक्षा संविधान में निर्धारित है।
  • सेवा-शर्तों से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण है।

परीक्षा में अंतर: भारत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों से संबंधित है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के अधीन हैं।

राज्य वित्त आयोग

अनुच्छेद 243I के अंतर्गत राज्यपाल प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन करता है। यह पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है। अनुच्छेद 243Y के अंतर्गत नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति पर भी राज्य वित्त आयोग की भूमिका निर्धारित है।

  • राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों, शुल्कों और अन्य राजस्व के वितरण के सिद्धांत सुझाना।
  • पंचायतों और नगरपालिकाओं को दिए जाने वाले अनुदानों के सिद्धांत सुझाना।
  • स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति सुधारने के उपाय सुझाना।
  • राज्यपाल को रिपोर्ट प्रस्तुत करना।

राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें स्थानीय निकायों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण हैं। इन सिफारिशों पर राज्य सरकार की कार्रवाई और संसाधनों का वास्तविक हस्तांतरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पंचायतों के कार्य और ग्यारहवीं अनुसूची

अनुच्छेद 243G राज्य विधानमंडल को पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए शक्तियाँ और अधिकार देने की अनुमति देता है। ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों से संबंधित 29 विषय दिए गए हैं।

  • कृषि और कृषि विस्तार।
  • भूमि सुधार, भूमि समेकन और मृदा संरक्षण।
  • लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जलागम विकास।
  • पशुपालन, डेयरी और कुक्कुट पालन।
  • मत्स्य पालन और सामाजिक वानिकी।
  • लघु वन उपज और ग्रामीण उद्योग।
  • ग्रामीण आवास और पेयजल।
  • ग्रामीण सड़कें, पुलिया और संचार सुविधाएँ।
  • ग्रामीण विद्युतीकरण और ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोत।
  • गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।
  • प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा सहित शैक्षिक विषय।
  • तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।
  • वयस्क और अनौपचारिक शिक्षा तथा पुस्तकालय।
  • सांस्कृतिक गतिविधियाँ, बाजार और मेले।
  • स्वास्थ्य, स्वच्छता और परिवार कल्याण।
  • महिला एवं बाल विकास।
  • सामाजिक कल्याण और कमजोर वर्गों का कल्याण।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
  • सामुदायिक संपत्तियों का रखरखाव।

ध्यान दें: ऊपर विषयों के समूह उदाहरण के रूप में दिए गए हैं; ग्यारहवीं अनुसूची में कुल 29 प्रविष्टियाँ हैं। अनुसूची में किसी विषय का उल्लेख होने मात्र से पंचायत को उस पर स्वतः पूर्ण विधायी या प्रशासनिक अधिकार नहीं मिल जाता।

पंचायतों की वित्तीय व्यवस्था

पंचायतों के वित्तीय संसाधन मुख्यतः स्थानीय राजस्व, राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान, केंद्र और राज्य की योजनाओं तथा वित्त आयोगों की सिफारिशों पर निर्भर करते हैं।

  • स्थानीय कर, शुल्क और फीस, जहाँ राज्य कानून अनुमति देता है।
  • राज्य सरकार द्वारा लगाए गए कुछ करों से प्राप्त हिस्सेदारी।
  • राज्य सरकार और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अंतर्गत प्राप्त धन।
  • राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर वित्तीय हस्तांतरण।
  • केंद्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार स्थानीय निकायों को अनुदान।

स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता का आकलन केवल उन्हें मिले धन से नहीं, बल्कि अपने स्रोत से राजस्व जुटाने की क्षमता, बजट बनाने की स्वतंत्रता और खर्च की जवाबदेही से भी किया जाना चाहिए।

अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज: PESA अधिनियम, 1996

PESA का पूरा नाम Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 है। इस अधिनियम के माध्यम से पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का विशेष रूप से विस्तार किया गया।

  • ग्राम सभा की भूमिका और अधिकारों को विशेष महत्व देना।
  • आदिवासी समुदायों की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक जीवन की रक्षा करना।
  • सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देना।
  • लघु वन उपज, स्थानीय बाजारों और परंपरागत संसाधनों से जुड़े विषयों पर ग्राम सभा तथा पंचायतों की भूमिका निर्धारित करना।
  • भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास से जुड़े मामलों में कानून के अनुसार परामर्श और ग्राम सभा की भूमिका सुनिश्चित करना।

PESA का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को आदिवासी समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य कानूनों और प्रशासनिक व्यवस्था का अनुरूप होना आवश्यक है।

महत्वपूर्ण अंतर: PESA पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित है। छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों में जिला और क्षेत्रीय परिषदों की अलग संवैधानिक व्यवस्था है।

74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पारित किया गया। यह 1 जून 1993 से प्रभावी हुआ।

  • संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया।
  • नगरपालिकाओं से संबंधित अनुच्छेद 243P से 243ZG तक प्रावधान किए गए।
  • बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें 18 विषय शामिल हैं।
  • नगरपालिकाओं के नियमित चुनाव और पाँच वर्ष के सामान्य कार्यकाल की व्यवस्था की गई।
  • आरक्षण, राज्य निर्वाचन आयोग और वित्तीय प्रावधानों को संवैधानिक आधार मिला।
  • जिला योजना समिति और महानगरीय योजना समिति का प्रावधान किया गया।

नगरपालिकाओं की शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ अनुच्छेद 243W तथा राज्य कानूनों से संबंधित हैं। बारहवीं अनुसूची के विषयों का वास्तविक हस्तांतरण राज्य सरकारों और विधानमंडलों की व्यवस्था पर निर्भर करता है।

नगरीय स्थानीय निकायों के प्रकार

अनुच्छेद 243Q के अनुसार सामान्यतः तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का प्रावधान है:

  • नगर पंचायत: ऐसा क्षेत्र जो ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में संक्रमण कर रहा हो।
  • नगर परिषद: छोटा शहरी क्षेत्र।
  • नगर निगम: बड़ा शहरी क्षेत्र।

किसी क्षेत्र को किस प्रकार की नगरपालिका के अंतर्गत रखा जाएगा, यह निर्धारित करते समय जनसंख्या, जनसंख्या घनत्व, स्थानीय राजस्व, गैर-कृषि रोजगार का अनुपात, आर्थिक महत्व और अन्य संबंधित कारकों को ध्यान में रखा जा सकता है।

औद्योगिक नगरों या विशेष परिस्थितियों वाले क्षेत्रों के संबंध में संविधान में अपवादों की व्यवस्था भी है। इसलिए प्रत्येक शहरी क्षेत्र में एक जैसी संस्थागत संरचना होना आवश्यक नहीं है।

नगरपालिकाओं का गठन और निर्वाचन

नगरपालिकाओं के क्षेत्रीय प्रतिनिधि सामान्यतः वार्डों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं। नगरपालिका के अध्यक्ष या महापौर के निर्वाचन की पद्धति राज्य के कानून द्वारा निर्धारित की जाती है।

  • नगरपालिका चुनावों का नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग के पास होता है।
  • नगरपालिका की संरचना और प्रतिनिधित्व राज्य कानून के अधीन निर्धारित होते हैं।
  • नगर निकायों की जवाबदेही में निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारियों की भी भूमिका होती है।

नगरपालिकाओं में आरक्षण और कार्यकाल

अनुच्छेद 243T नगरपालिकाओं में आरक्षण और अनुच्छेद 243U उनके कार्यकाल से संबंधित है।

  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
  • प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरी जाने वाली कुल सीटों में कम-से-कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित।
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में महिलाओं के लिए भी निर्धारित आरक्षण।
  • नगरपालिका अध्यक्षों के पदों में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान।
  • राज्य कानूनों के माध्यम से पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है।

नगरपालिका का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष होता है। समयपूर्व विघटन की स्थिति में सामान्यतः छह महीने के भीतर चुनाव कराना आवश्यक होता है। यदि शेष कार्यकाल छह महीने से कम है, तो संविधान के अनुसार उस अवधि के लिए चुनाव कराना अनिवार्य नहीं है।

नगरपालिकाओं के कार्य: बारहवीं अनुसूची

बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय शामिल हैं। इनमें शहरी नियोजन, नागरिक सुविधाएँ, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र आते हैं।

  • शहरी नियोजन और नगर योजना।
  • भूमि उपयोग तथा भवन निर्माण का विनियमन।
  • आर्थिक और सामाजिक विकास की योजना।
  • सड़कें और पुल।
  • घरेलू, औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए जलापूर्ति।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े कार्य।
  • अग्निशमन सेवाएँ।
  • शहरी वानिकी और पर्यावरण संरक्षण।
  • कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा।
  • झुग्गी-बस्तियों का सुधार और उन्नयन।
  • शहरी गरीबी उन्मूलन।
  • पार्क, उद्यान और सार्वजनिक सुविधाएँ।
  • सांस्कृतिक, शैक्षिक और सौंदर्यपरक पहलू।
  • श्मशान, कब्रिस्तान और विद्युत शवदाह गृह।
  • कांजी हाउस और पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम।
  • जन्म और मृत्यु का पंजीकरण।
  • सार्वजनिक सुविधाएँ, जैसे सड़क प्रकाश व्यवस्था और पार्किंग।
  • वधशालाओं और चर्मशोधनशालाओं का विनियमन।

परीक्षा उपयोगी तथ्य: बारहवीं अनुसूची में ठीक 18 प्रविष्टियाँ हैं। नगरपालिका को इन विषयों पर वास्तविक शक्तियाँ देने की सीमा संबंधित राज्य के कानूनों से निर्धारित होती है।

वार्ड समितियाँ

अनुच्छेद 243S के अनुसार तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिका के क्षेत्र में एक या अधिक वार्डों को मिलाकर वार्ड समितियों के गठन का प्रावधान है।

इन समितियों का उद्देश्य नागरिकों की स्थानीय भागीदारी बढ़ाना, वार्ड स्तर की समस्याओं को सामने लाना और नगरपालिका प्रशासन की जवाबदेही को मजबूत करना है। उनकी संरचना और कार्य राज्य के कानून के अनुसार निर्धारित होते हैं।

जिला योजना समिति

अनुच्छेद 243ZD के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर जिला योजना समिति का प्रावधान है। यह जिले की पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित करके पूरे जिले के लिए प्रारूप विकास योजना तैयार करती है।

  • ग्रामीण और शहरी योजनाओं के बीच समन्वय करना।
  • जल और प्राकृतिक संसाधनों के साझा उपयोग पर विचार करना।
  • बुनियादी ढाँचे और पर्यावरण संरक्षण की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखना।
  • उपलब्ध वित्तीय और अन्य संसाधनों को ध्यान में रखकर विकास योजना तैयार करना।

समिति के कम-से-कम चार-पाँचवें सदस्य जिला स्तर की पंचायतों और नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने बीच से चुने जाते हैं। प्रतिनिधित्व का अनुपात ग्रामीण और शहरी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार निर्धारित किया जाता है।

महानगरीय योजना समिति

अनुच्छेद 243ZE महानगरीय क्षेत्र के लिए महानगरीय योजना समिति का प्रावधान करता है। इसका उद्देश्य पूरे महानगरीय क्षेत्र के लिए प्रारूप विकास योजना तैयार करना है।

संविधान के अनुच्छेद 243P(c) के अनुसार महानगरीय क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसकी जनसंख्या दस लाख या उससे अधिक हो, जो एक या अधिक जिलों में फैला हो और जिसमें दो या अधिक नगरपालिकाएँ, पंचायतें या अन्य समीपवर्ती क्षेत्र शामिल हों; इसे राज्यपाल अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट करता है।

समिति में कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य महानगरीय क्षेत्र की नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों तथा पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा अपने बीच से चुने जाते हैं। शेष संरचना संविधान और संबंधित राज्य कानूनों के अनुसार निर्धारित होती है।

73वें और 74वें संविधान संशोधनों में अंतर

आधार 73वाँ संविधान संशोधन 74वाँ संविधान संशोधन
मुख्य क्षेत्र ग्रामीण स्थानीय स्वशासन शहरी स्थानीय स्वशासन
प्रभावी तिथि 24 अप्रैल 1993 1 जून 1993
संवैधानिक भाग भाग IX भाग IX-A
अनुच्छेद 243 से 243-O 243P से 243ZG
अनुसूची ग्यारहवीं अनुसूची बारहवीं अनुसूची
विषयों की संख्या 29 18
प्रमुख संस्थाएँ ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती पंचायत, जिला पंचायत नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर निगम
निर्वाचन व्यवस्था राज्य निर्वाचन आयोग राज्य निर्वाचन आयोग
वित्तीय समीक्षा राज्य वित्त आयोग राज्य वित्त आयोग
योजना समिति जिला योजना समिति से संबंधित व्यवस्था भाग IX-A में जिला योजना समिति और महानगरीय योजना समिति के प्रावधान

स्थानीय स्वशासन से संबंधित प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद

अनुच्छेद विषय परीक्षा के लिए महत्व
40 ग्राम पंचायतों का संगठन राज्य के नीति निदेशक तत्त्व
243A ग्राम सभा प्रत्यक्ष लोकतंत्र
243B पंचायतों का गठन त्रिस्तरीय व्यवस्था और जनसंख्या संबंधी अपवाद
243D पंचायतों में आरक्षण SC, ST और महिलाओं का प्रतिनिधित्व
243E पंचायतों की अवधि पाँच वर्ष का सामान्य कार्यकाल
243G पंचायतों की शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ ग्यारहवीं अनुसूची से संबंध
243H पंचायतों की वित्तीय शक्तियाँ कर और निधियाँ
243I राज्य वित्त आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा
243K पंचायत चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग
243O पंचायत चुनावों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर प्रतिबंध चुनावी विवादों की संवैधानिक प्रक्रिया
243Q नगरपालिकाओं का गठन नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम
243T नगरपालिकाओं में आरक्षण प्रतिनिधित्व
243U नगरपालिकाओं की अवधि पाँच वर्ष का सामान्य कार्यकाल
243W नगरपालिकाओं की शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ बारहवीं अनुसूची से संबंध
243X नगरपालिकाओं की वित्तीय शक्तियाँ कर और निधियाँ
243Y वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति
243ZA नगरपालिका चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग
243ZD जिला योजना समिति ग्रामीण और शहरी योजनाओं का समेकन
243ZE महानगरीय योजना समिति महानगरीय क्षेत्र की समन्वित योजना

स्थानीय स्वशासन और 3F का सिद्धांत

स्थानीय निकायों की प्रभावशीलता का आकलन अक्सर 3F के आधार पर किया जाता है। इसका अर्थ है Funds, Functions और Functionaries।

  • Funds (वित्त): स्थानीय कार्यों के लिए पर्याप्त और समय पर वित्तीय संसाधन।
  • Functions (कार्य): स्पष्ट रूप से परिभाषित जिम्मेदारियाँ और निर्णय लेने की शक्तियाँ।
  • Functionaries (कर्मचारी): योजनाओं को लागू करने के लिए प्रशिक्षित और पर्याप्त कर्मचारी।

यदि स्थानीय निकायों को जिम्मेदारियाँ तो दे दी जाएँ, लेकिन पर्याप्त धन और कर्मचारी न दिए जाएँ, तो वे अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर पाते। इसलिए वास्तविक विकेंद्रीकरण के लिए तीनों का एक साथ हस्तांतरण आवश्यक है।

स्थानीय स्वशासन की प्रमुख समस्याएँ

  • वित्तीय निर्भरता: कई स्थानीय निकाय अपने स्रोत से पर्याप्त राजस्व नहीं जुटा पाते।
  • अधिकारों का अधूरा हस्तांतरण: संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद सभी विषयों पर पर्याप्त अधिकार नहीं मिलते।
  • कर्मचारियों की कमी: तकनीकी और प्रशासनिक विशेषज्ञता का अभाव योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित करता है।
  • कमजोर ग्राम सभा और वार्ड समितियाँ: बैठकों में कम भागीदारी और निगरानी की सीमित क्षमता जवाबदेही घटाती है।
  • राज्य सरकार पर निर्भरता: वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों में स्थानीय संस्थाओं की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
  • समानांतर संस्थाएँ: विभिन्न विभागों और विकास एजेंसियों के बीच जिम्मेदारियों का बिखराव समन्वय में कठिनाई पैदा कर सकता है।
  • प्रतिनिधित्व और वास्तविक भागीदारी का अंतर: आरक्षण से प्रतिनिधित्व बढ़ता है, लेकिन सभी प्रतिनिधियों की स्वतंत्र निर्णयकारी भूमिका सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
  • शहरी चुनौतियाँ: तेजी से बढ़ती आबादी, अनियोजित विस्तार, कचरा प्रबंधन और बुनियादी सेवाओं की बढ़ती माँग।
  • कमजोर योजना और लेखा प्रणाली: स्थानीय जरूरतों के आकलन, बजट, लेखा-परीक्षा और परिणामों के मूल्यांकन में क्षमता की कमी।

स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के उपाय

  • 3F—वित्त, कार्य और कर्मचारी—का वास्तविक और स्पष्ट हस्तांतरण।
  • राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन और उनकी सिफारिशों पर प्रभावी कार्रवाई।
  • स्थानीय कर संग्रह और राजस्व प्रबंधन की क्षमता बढ़ाना।
  • ग्राम सभा और वार्ड समितियों की नियमित बैठकों तथा जनभागीदारी को बढ़ावा देना।
  • स्थानीय प्रतिनिधियों और कर्मचारियों का प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण।
  • डिजिटल लेखा प्रणाली, सार्वजनिक बजट और योजनाओं की प्रगति का खुला विवरण।
  • सामाजिक लेखा-परीक्षा और शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करना।
  • जिला योजना समितियों और महानगरीय योजना समितियों को प्रभावी बनाना।
  • महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और कमजोर वर्गों की वास्तविक निर्णयकारी भागीदारी बढ़ाना।
  • स्थानीय योजनाओं को जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सतत विकास के उद्देश्यों से जोड़ना।

स्थानीय स्वशासन और सतत विकास लक्ष्य

स्थानीय निकाय सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) को स्थानीय स्तर पर लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, लैंगिक समानता और टिकाऊ शहरों जैसे लक्ष्य स्थानीय योजनाओं से सीधे जुड़े हैं।

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर जरूरतों की पहचान, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और योजनाओं के परिणामों की निगरानी की जा सकती है। इस प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों का स्थानीयकरण कहा जाता है।

UPSC के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • अनुच्छेद 40 — ग्राम पंचायतों के संगठन से संबंधित नीति निदेशक तत्त्व।
  • 73वाँ संविधान संशोधन — ग्रामीण स्थानीय स्वशासन; 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी।
  • 74वाँ संविधान संशोधन — शहरी स्थानीय स्वशासन; 1 जून 1993 से प्रभावी।
  • भाग IX — पंचायतें।
  • भाग IX-A — नगरपालिकाएँ।
  • ग्यारहवीं अनुसूची — पंचायतों से संबंधित 29 विषय।
  • बारहवीं अनुसूची — नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय।
  • अनुच्छेद 243A — ग्राम सभा।
  • अनुच्छेद 243I — पंचायतों के लिए राज्य वित्त आयोग।
  • अनुच्छेद 243K — पंचायत चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग।
  • अनुच्छेद 243ZD — जिला योजना समिति।
  • अनुच्छेद 243ZE — महानगरीय योजना समिति।
  • PESA अधिनियम — 1996; पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित।
  • पंचायतों और नगरपालिकाओं का सामान्य कार्यकाल — पाँच वर्ष।
  • 20 लाख से अधिक जनसंख्या न होने वाले राज्य में मध्यवर्ती स्तर की पंचायत अनिवार्य नहीं है।
  • तीन लाख या अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिका में वार्ड समितियों के गठन का संवैधानिक प्रावधान है।
  • स्थानीय निकायों के चुनाव — राज्य निर्वाचन आयोग; राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग नहीं।

त्वरित पुनरावृत्ति

स्थानीय स्वशासन लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का महत्वपूर्ण माध्यम है। 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों और 74वें संविधान संशोधन ने नगरपालिकाओं को संवैधानिक आधार प्रदान किया।

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन में ग्राम सभा और पंचायतें महत्वपूर्ण हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम प्रमुख संस्थाएँ हैं। दोनों व्यवस्थाओं में नियमित चुनाव, आरक्षण, राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है।

स्थानीय निकायों की वास्तविक सफलता केवल संवैधानिक दर्जे पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, स्पष्ट कार्य, प्रशिक्षित कर्मचारी, प्रभावी योजना, पारदर्शिता और नागरिकों की वास्तविक भागीदारी आवश्यक है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र को केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित न रखकर नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया के निकट लाता है। इससे स्थानीय समस्याओं की पहचान, सार्वजनिक संसाधनों की निगरानी और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिल सकता है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने इस व्यवस्था को संवैधानिक आधार देकर लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को मजबूत किया।

फिर भी संवैधानिक मान्यता और वास्तविक स्वायत्तता में अंतर बना रह सकता है। यदि स्थानीय निकायों के पास पर्याप्त धन, कर्मचारी और निर्णय लेने की शक्तियाँ नहीं हैं, तो वे प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पाते। इसलिए स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के लिए 3F का हस्तांतरण, नियमित वित्त आयोग, पारदर्शी प्रशासन, स्थानीय योजना और नागरिक भागीदारी पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

निष्कर्षतः, प्रभावी स्थानीय स्वशासन सहकारी संघवाद, सहभागी लोकतंत्र और समावेशी विकास को जमीनी स्तर पर साकार करने का महत्वपूर्ण साधन है।