ऐसे निकाय जिनकी स्थापना सीधे भारतीय संविधान के किसी अनुच्छेद द्वारा नहीं की गई है, सामान्यतः गैर-संवैधानिक निकाय (Non-Constitutional Bodies) कहलाते हैं। इनकी स्थापना कानून अथवा कार्यपालिका के निर्णय के आधार पर की जा सकती है।
गैर-संवैधानिक निकायों को समझने के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गैर-संवैधानिक और गैर-वैधानिक एक ही अर्थ वाले शब्द नहीं हैं। कोई निकाय संविधान द्वारा स्थापित न होने के बावजूद संसद के अधिनियम से स्थापित हो सकता है और इस कारण वैधानिक निकाय कहलाता है।
उदाहरण के लिए, केंद्रीय सतर्कता आयोग एक वैधानिक निकाय है, नीति आयोग एक कार्यपालिका निकाय है, जबकि GST परिषद एक संवैधानिक निकाय है।
| आधार | संवैधानिक निकाय | वैधानिक निकाय | कार्यपालिका निकाय |
|---|---|---|---|
| गठन का आधार | भारतीय संविधान | संसद या राज्य विधानमंडल का अधिनियम | सरकारी आदेश, संकल्प या कार्यपालिका का निर्णय |
| उदाहरण | निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग, GST परिषद | CVC, CIC, NHRC, SEBI | नीति आयोग |
| प्रमुख नियम | संवैधानिक प्रावधानों से निर्धारित | संबंधित अधिनियम से निर्धारित | स्थापना संबंधी आदेश तथा लागू नियमों से निर्धारित |
| बदलाव की प्रक्रिया | विषय के अनुसार संवैधानिक संशोधन या अन्य संवैधानिक प्रक्रिया आवश्यक हो सकती है | संबंधित कानून में संशोधन या निरसन किया जा सकता है | सामान्यतः सक्षम कार्यपालिका द्वारा आदेश या संकल्प में बदलाव संभव |
परीक्षा उपयोगी तथ्य: किसी निकाय की स्वतंत्रता, शक्तियाँ और जवाबदेही केवल इस बात से तय नहीं होतीं कि वह संवैधानिक है या वैधानिक। उसके गठन संबंधी प्रावधान, नियुक्ति प्रक्रिया, वित्तीय व्यवस्था और अधिकार-क्षेत्र भी महत्वपूर्ण होते हैं।
संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून के आधार पर स्थापित निकायों को वैधानिक निकाय कहा जाता है। संबंधित अधिनियम में उनके गठन, संरचना, नियुक्ति, कार्यकाल, शक्तियों और कार्यों से जुड़े प्रावधान दिए जाते हैं।
प्रमुख उदाहरण हैं:
ध्यान दें कि सभी वैधानिक निकायों की शक्तियाँ समान नहीं होतीं। कुछ मुख्यतः सलाह देते हैं, कुछ नियमन करते हैं, कुछ शिकायतों की जाँच करते हैं और कुछ विशेष प्रकार के विवादों का न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निपटारा करते हैं।
ऐसे निकाय जिनकी स्थापना संविधान के किसी विशिष्ट अनुच्छेद या किसी विशेष स्थापना-अधिनियम के बजाय सरकार के संकल्प, आदेश अथवा कार्यपालिका के निर्णय से होती है, कार्यपालिका निकाय कहलाते हैं।
नीति आयोग (NITI Aayog) इसका प्रमुख उदाहरण है। इसकी स्थापना 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर की गई थी।
कार्यपालिका निकाय का अर्थ यह नहीं है कि वह कानून से ऊपर है। उसे संविधान, लागू कानूनों और वैध प्रशासनिक सीमाओं के भीतर काम करना होता है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission—CVC) केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार में आने वाले संगठनों में सतर्कता प्रशासन और भ्रष्टाचार-विरोधी व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय है।
इसकी स्थापना वर्ष 1964 में केंद्र सरकार के कार्यपालिका संकल्प द्वारा की गई थी। बाद में केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 (Central Vigilance Commission Act, 2003) के माध्यम से इसे वैधानिक दर्जा मिला।
महत्वपूर्ण अंतर: CVC स्वयं सामान्य पुलिस बल या सर्वव्यापी आपराधिक जाँच एजेंसी नहीं है। इसका कार्य सतर्कता प्रशासन की निगरानी, संबंधित मामलों में सलाह और कानून के अनुसार निर्धारित जाँच-निगरानी संबंधी जिम्मेदारियों से जुड़ा है।
नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। यदि लोकसभा में विपक्ष का कोई मान्यता प्राप्त नेता न हो, तो कानून में निर्धारित विकल्प लागू होता है।
CVC की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों के संबंध में केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 के प्रावधान लागू होते हैं। संस्थागत स्वतंत्रता के लिए नियुक्ति और पद से हटाने की निर्धारित प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।
CVC का अधिकार-क्षेत्र कानून द्वारा निर्धारित है। इसे प्रत्येक सरकारी विभाग, राज्य सरकार या हर प्रकार के भ्रष्टाचार संबंधी मामले पर स्वतः समान अधिकार प्राप्त नहीं होते।
केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission—CIC) सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत स्थापित वैधानिक निकाय है। इसका प्रमुख कार्य केंद्रीय सार्वजनिक प्राधिकरणों से संबंधित सूचना-अधिकार शिकायतों और दूसरी अपीलों का निपटारा करना है।
सूचना का अधिकार नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के नियंत्रण में उपलब्ध सूचना प्राप्त करने का कानूनी अधिकार देता है। यह शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का महत्वपूर्ण साधन है।
यह अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं है। अधिनियम की धारा 8 और अन्य लागू प्रावधानों के अंतर्गत कुछ सूचनाओं को प्रकटीकरण से छूट प्राप्त हो सकती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुसार केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस सूचना आयुक्त हो सकते हैं।
इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति की सिफारिश पर होती है। समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक मंत्री शामिल होता है।
वर्तमान कानून के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल तथा सेवा शर्तें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अधीन हैं। इसलिए पुराने अध्ययन-सामग्री में दिए गए कार्यकाल संबंधी तथ्यों को बिना जाँच के वर्तमान कानून नहीं मानना चाहिए।
CIC और राज्य सूचना आयोग अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में काम करते हैं। केंद्रीय सार्वजनिक प्राधिकरणों से संबंधित मामलों के लिए CIC, जबकि राज्य सार्वजनिक प्राधिकरणों से संबंधित मामलों के लिए सामान्यतः राज्य सूचना आयोग संबंधित होता है।
लोकपाल केंद्र स्तर पर निर्धारित श्रेणी के लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जाँच और संबंधित कार्रवाई की व्यवस्था के लिए स्थापित वैधानिक संस्था है।
इसका आधार लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (Lokpal and Lokayuktas Act, 2013) है। इस कानून का उद्देश्य लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों के निपटारे के लिए संस्थागत व्यवस्था प्रदान करना है।
लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में कौन-से व्यक्ति और मामले आते हैं, यह अधिनियम के प्रावधानों पर निर्भर करता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि लोकपाल को हर सरकारी कर्मचारी या हर शिकायत पर असीमित अधिकार प्राप्त हैं।
लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं। कानून के अनुसार सदस्यों में न्यायिक सदस्यों की संख्या तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान भी हैं।
अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है।
लोकपाल की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया में कानून द्वारा निर्धारित चयन समिति और खोज समिति की भूमिकाएँ महत्वपूर्ण हैं।
लोकपाल का कार्य केवल शिकायत प्राप्त करना नहीं है; उसकी प्रक्रिया में प्रारंभिक जाँच, विस्तृत जाँच, अभियोजन और अन्य सक्षम संस्थाओं की भूमिकाएँ कानून के अनुसार निर्धारित होती हैं।
लोकायुक्त राज्य स्तर पर लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों के निपटारे के लिए स्थापित संस्था है।
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में राज्यों द्वारा लोकायुक्त से संबंधित कानून बनाने का प्रावधान किया गया। राज्यों में लोकायुक्त की संरचना, शक्तियाँ, कार्यक्षेत्र और नियुक्ति प्रक्रिया एक जैसी नहीं हैं; ये संबंधित राज्य कानूनों पर निर्भर करती हैं।
परीक्षा तथ्य: लोकपाल केंद्र स्तर की संस्था है, जबकि लोकायुक्त राज्य स्तर की व्यवस्था है। दोनों की शक्तियों और अधिकार-क्षेत्र को समान नहीं मानना चाहिए।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission—NHRC) मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए स्थापित वैधानिक निकाय है। इसका आधार मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993) है।
मानवाधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से जुड़े वे अधिकार शामिल हैं, जिन्हें संविधान या अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में मान्यता प्राप्त है और जो भारत में न्यायालयों द्वारा लागू किए जा सकते हैं।
NHRC की संरचना और नियुक्ति संबंधी प्रावधान मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम में दिए गए हैं। आयोग में अध्यक्ष, निर्धारित न्यायिक पृष्ठभूमि वाले सदस्य और मानवाधिकार से संबंधित ज्ञान या अनुभव रखने वाले सदस्य शामिल होते हैं।
आयोग में कुछ राष्ट्रीय आयोगों के अध्यक्षों तथा अन्य पदाधिकारियों से संबंधित पदेन सदस्यता की व्यवस्था भी कानून के अनुसार होती है। इसलिए इसकी संरचना समझते समय केवल अध्यक्ष और सदस्यों की संख्या याद करना पर्याप्त नहीं है; पदेन सदस्यता और संशोधित कानूनी प्रावधानों पर भी ध्यान देना चाहिए।
NHRC की सिफारिशें सामान्यतः बाध्यकारी न्यायिक आदेश के समान नहीं होतीं। आयोग अपनी जाँच और सिफारिशों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन कार्रवाई संबंधित सरकार या प्राधिकरण के कानूनी दायित्वों और निर्णयों पर भी निर्भर करती है।
अधिनियम में शिकायतों की जाँच के लिए समय-सीमा संबंधी सीमाएँ भी हैं। सामान्यतः आयोग घटना के एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद उस मामले की जाँच नहीं करता।
राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women—NCW) महिलाओं के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा तथा उनके हितों से संबंधित विषयों की समीक्षा करने वाला वैधानिक निकाय है।
इसका आधार राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 (National Commission for Women Act, 1990) है।
NCW की भूमिका मुख्यतः जाँच, समीक्षा, शिकायतों पर संज्ञान और सिफारिशों से जुड़ी है। इसे सभी मामलों में बाध्यकारी न्यायिक निर्णय देने वाली अदालत नहीं समझना चाहिए।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights—NCPCR) बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन से संबंधित वैधानिक निकाय है।
इसका आधार बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005) है।
बच्चों के अधिकारों में सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और शोषण से संरक्षण जैसे विषय शामिल हैं। आयोग इन अधिकारों से संबंधित कानूनों और नीतियों के क्रियान्वयन की समीक्षा करता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal—NGT) पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित कुछ विशिष्ट कानूनी विवादों के प्रभावी निपटारे के लिए स्थापित वैधानिक अधिकरण है।
इसका आधार राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (National Green Tribunal Act, 2010) है।
NGT में न्यायिक सदस्यों के साथ विशेषज्ञ सदस्य भी होते हैं, जिससे पर्यावरणीय विवादों में कानूनी और वैज्ञानिक विशेषज्ञता का उपयोग किया जा सके।
NGT का अधिकार-क्षेत्र हर प्रकार के पर्यावरणीय विवाद पर स्वतः लागू नहीं होता। इसकी अधिकारिता राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम और उसमें निर्दिष्ट पर्यावरणीय कानूनों से निर्धारित होती है। कुछ विषय इसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर भी हैं।
ये सिद्धांत भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र में महत्वपूर्ण हैं और पर्यावरणीय मामलों के विश्लेषण में उपयोगी हैं।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (Central Bureau of Investigation—CBI) भारत की प्रमुख केंद्रीय जाँच एजेंसियों में से एक है। यह भ्रष्टाचार, गंभीर आर्थिक अपराधों और कानून के अनुसार सौंपे गए अन्य मामलों की जाँच करती है।
CBI की स्थापना 1963 में केंद्र सरकार के संकल्प द्वारा की गई थी। इसकी विशेष पुलिस शक्तियों का महत्वपूर्ण कानूनी आधार दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (Delhi Special Police Establishment Act, 1946) है।
इसलिए CBI को न तो संवैधानिक निकाय कहा जाता है और न ही इसे किसी एक अलग, समग्र CBI स्थापना-अधिनियम के तहत गठित संवैधानिक संस्था समझना चाहिए।
दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत राज्य के क्षेत्र में DSPE की शक्तियों और अधिकार-क्षेत्र के विस्तार के लिए सामान्यतः संबंधित राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होती है। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय उपयुक्त मामलों में राज्य की सहमति के बिना भी CBI जाँच का निर्देश दे सकते हैं।
| आधार | CBI | CVC |
|---|---|---|
| प्रमुख भूमिका | कानून के अनुसार निर्धारित मामलों की जाँच | सतर्कता प्रशासन की निगरानी और सलाहकारी भूमिका |
| स्थापना | 1963 में सरकारी संकल्प द्वारा | 1964 में सरकारी संकल्प द्वारा; 2003 में वैधानिक दर्जा |
| प्रमुख कानूनी आधार | DSPE Act, 1946 सहित लागू कानून | CVC Act, 2003 |
| संवैधानिक स्थिति | संवैधानिक निकाय नहीं | वैधानिक निकाय |
दोनों संस्थाओं की भूमिकाएँ संबंधित कानूनों के अनुसार एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं, लेकिन CVC को जाँच एजेंसी और CBI को सतर्कता आयोग मानना गलत होगा।
NITI Aayog (National Institution for Transforming India) भारत सरकार का नीति-निर्माण, विकास रणनीति और केंद्र-राज्य सहयोग से संबंधित प्रमुख मंच है।
इसकी स्थापना 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर कार्यपालिका के संकल्प द्वारा की गई थी। यह न तो संवैधानिक निकाय है और न ही किसी विशेष संसदीय अधिनियम द्वारा स्थापित वैधानिक निकाय।
योजना आयोग की तुलना में नीति आयोग राज्यों के साथ परामर्श, सहकारी संघवाद, नीति-नवाचार और साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण पर जोर देता है।
नीति आयोग की संरचना में प्रधानमंत्री अध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं। इसमें उपाध्यक्ष, पूर्णकालिक सदस्य, पदेन सदस्य, विशेष आमंत्रित सदस्य तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
इसकी शासी परिषद (Governing Council) में राज्यों के मुख्यमंत्री तथा केंद्रशासित प्रदेशों के लिए निर्धारित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है। इससे राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच संवाद को संस्थागत आधार मिलता है।
नीति आयोग मुख्यतः नीतिगत सुझाव और समन्वय प्रदान करता है। इसे संसद द्वारा कानून बनाने या किसी स्वतंत्र नियामक की तरह बाध्यकारी आदेश जारी करने वाली संस्था नहीं समझना चाहिए।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India—SEBI) भारत के प्रतिभूति बाजार का प्रमुख नियामक है।
इसकी स्थापना 1988 में हुई थी। बाद में SEBI अधिनियम, 1992 (SEBI Act, 1992) के माध्यम से इसे वैधानिक दर्जा और निर्धारित शक्तियाँ प्राप्त हुईं।
इसका प्रमुख उद्देश्य निवेशकों के हितों की रक्षा करना, प्रतिभूति बाजार के विकास को बढ़ावा देना और बाजार को विनियमित करना है।
Telecom Regulatory Authority of India—TRAI भारत के दूरसंचार क्षेत्र का वैधानिक नियामक है। इसकी स्थापना TRAI अधिनियम, 1997 के अंतर्गत हुई।
इसके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:
TRAI की भूमिका को समझते समय यह अंतर भी ध्यान में रखना चाहिए कि सिफारिश करना और अंतिम नीतिगत या लाइसेंस-संबंधी निर्णय लेना हमेशा एक ही कार्य नहीं होते।
Pension Fund Regulatory and Development Authority—PFRDA पेंशन क्षेत्र के विनियमन और विकास से संबंधित वैधानिक निकाय है। इसका आधार PFRDA Act, 2013 है।
इसके प्रमुख कार्य हैं:
Insurance Regulatory and Development Authority of India—IRDAI भारत के बीमा क्षेत्र का प्रमुख वैधानिक नियामक है। इसका वर्तमान वैधानिक आधार Insurance Regulatory and Development Authority Act, 1999 है।
इसके प्रमुख कार्य हैं:
National Company Law Tribunal—NCLT कंपनी कानून से संबंधित निर्दिष्ट विवादों और कार्यवाहियों के निपटारे के लिए स्थापित वैधानिक अधिकरण है।
इसका गठन कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत किया गया। यह कंपनी मामलों से संबंधित कानून में निर्धारित अधिकार-क्षेत्र के भीतर कार्य करता है।
इसके कार्यक्षेत्र में कानून के अनुसार निम्न विषय शामिल हो सकते हैं:
अधिकरण विशेष प्रकार के विवादों के निपटारे के लिए कानून के अंतर्गत स्थापित न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संस्थाएँ हैं। इनमें न्यायिक विशेषज्ञता के साथ संबंधित विषय का तकनीकी या व्यावसायिक ज्ञान भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
अधिकरणों का उद्देश्य विशेष क्षेत्रों में विशेषज्ञतापूर्ण और अपेक्षाकृत प्रभावी विवाद-निपटारा उपलब्ध कराना है। हालाँकि अधिकरणों की स्वतंत्रता, सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और न्यायिक समीक्षा से संबंधित प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं।
उदाहरण: NGT पर्यावरणीय मामलों के लिए, NCLT कंपनी कानून के निर्दिष्ट मामलों के लिए तथा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) सेवा-संबंधी मामलों के निर्धारित वर्गों के लिए कार्य करता है।
वस्तु एवं सेवा कर परिषद (GST Council) भारत की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण संस्थागत मंच है।
इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 279A है, जिसे 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा जोड़ा गया। इसलिए GST परिषद एक संवैधानिक निकाय है, सामान्य वैधानिक निकाय नहीं।
केंद्रीय वित्त मंत्री परिषद के अध्यक्ष होते हैं। परिषद में केंद्रीय वित्त या कराधान से संबंधित मंत्री तथा राज्यों और कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के निर्धारित प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
GST परिषद कर की दरों, छूट, मॉडल कानून और GST से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर सिफारिशें करती है। इसके निर्णयों और सिफारिशों का संवैधानिक एवं कानूनी प्रभाव समझने के लिए संबंधित न्यायिक व्याख्याओं और GST कानूनों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
| निकाय | श्रेणी | प्रमुख कानूनी या स्थापना आधार | मुख्य भूमिका |
|---|---|---|---|
| CVC | वैधानिक | CVC Act, 2003 | सतर्कता प्रशासन |
| CIC | वैधानिक | RTI Act, 2005 | सूचना-अधिकार अपील और शिकायतें |
| लोकपाल | वैधानिक | Lokpal and Lokayuktas Act, 2013 | निर्धारित लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें |
| NHRC | वैधानिक | Protection of Human Rights Act, 1993 | मानवाधिकार संरक्षण |
| NCW | वैधानिक | National Commission for Women Act, 1990 | महिला अधिकार |
| NCPCR | वैधानिक | Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005 | बाल अधिकार |
| NGT | वैधानिक अधिकरण | National Green Tribunal Act, 2010 | निर्दिष्ट पर्यावरणीय विवाद |
| CBI | कार्यपालिका स्थापना; वैधानिक शक्तियों का आधार भी लागू | 1963 का सरकारी संकल्प; DSPE Act, 1946 | निर्धारित मामलों की जाँच |
| नीति आयोग | कार्यपालिका | 2015 का सरकारी संकल्प | नीति-परामर्श और केंद्र-राज्य सहयोग |
| SEBI | वैधानिक | SEBI Act, 1992 | प्रतिभूति बाजार का नियमन |
| TRAI | वैधानिक | TRAI Act, 1997 | दूरसंचार क्षेत्र का नियमन |
| PFRDA | वैधानिक | PFRDA Act, 2013 | पेंशन क्षेत्र का नियमन |
| IRDAI | वैधानिक | IRDA Act, 1999 | बीमा क्षेत्र का नियमन |
| NCLT | वैधानिक अधिकरण | Companies Act, 2013 | निर्दिष्ट कंपनी कानून संबंधी मामले |
| GST परिषद | संवैधानिक | अनुच्छेद 279A | GST से संबंधित सिफारिशें |
ध्यान दें: CBI के मामले में उसकी स्थापना का आधार और जाँच शक्तियों का कानूनी आधार अलग-अलग समझना चाहिए। इसी तरह, किसी निकाय के वैधानिक होने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी प्रत्येक सिफारिश या कार्रवाई न्यायालय के बाध्यकारी आदेश के समान है।
नियामक निकाय किसी विशिष्ट क्षेत्र में लागू कानूनों और नियमों के अनुसार संस्थाओं के व्यवहार, सेवाओं, बाजार की गतिविधियों या मानकों की निगरानी करते हैं।
नियामक निकायों का प्रमुख उद्देश्य बाजार में पारदर्शिता, उपभोक्ता या निवेशक हितों की सुरक्षा, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और कानूनों के अनुपालन को बढ़ावा देना है। इनके अधिकार संबंधित कानूनों द्वारा निर्धारित होते हैं।
सुधारों का उद्देश्य केवल संस्थाओं की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनके पास स्पष्ट अधिकार, पर्याप्त क्षमता, निष्पक्ष प्रक्रिया और जवाबदेही सुनिश्चित करने के साधन हों।
वैधानिक और कार्यपालिका निकाय आधुनिक शासन व्यवस्था में विशेषज्ञता, नियमन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण साधन हैं। फिर भी किसी संस्था का केवल कानून द्वारा स्थापित होना उसकी वास्तविक स्वतंत्रता या प्रभावशीलता की गारंटी नहीं देता।
किसी निकाय का विश्लेषण करते समय उसके गठन का आधार, नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल, वित्तीय स्वायत्तता, अधिकार-क्षेत्र, निर्णयों की प्रकृति और जवाबदेही के तंत्र का मूल्यांकन करना चाहिए।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में निम्न ढाँचा अपनाया जा सकता है:
गठन का आधार → संरचना → कार्य और शक्तियाँ → स्वतंत्रता → जवाबदेही → चुनौतियाँ → सुधार।
उदाहरण के लिए, NHRC की भूमिका का मूल्यांकन करते समय उसके मानवाधिकार संरक्षण संबंधी कार्यों के साथ सिफारिशों की प्रकृति, जाँच की सीमाओं और उनके अनुपालन की स्थिति पर भी चर्चा की जा सकती है।