भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ के लिए एक संसद होगी, जिसमें राष्ट्रपति तथा दो सदन—राज्यसभा और लोकसभा—शामिल होंगे। राष्ट्रपति किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता, फिर भी वह संसद का संवैधानिक अंग है।
भारत ने द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature) अपनाई है। इसके दो सदनों की संरचना और भूमिका अलग-अलग है। लोकसभा जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है, जबकि राज्यसभा संघीय व्यवस्था में राज्यों और कुछ संघ राज्य क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देती है।
संसद का कार्य केवल कानून बनाना नहीं है। यह सरकारी व्यय की जाँच, कार्यपालिका की जवाबदेही, राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा, संविधान संशोधन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का भी प्रमुख मंच है।
संसद के तीन घटक हैं—राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा। संविधान के अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद की संरचना, सदस्यों, अधिकारियों, कार्यवाही, विशेषाधिकारों और विधायी प्रक्रिया से संबंधित अनेक प्रावधान दिए गए हैं।
अनुच्छेद 80 राज्यसभा और अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना से संबंधित है। अनुच्छेद 83 दोनों सदनों की अवधि निर्धारित करता है, जबकि अनुच्छेद 85 संसद के सत्रों से संबंधित है।
राष्ट्रपति संसद का अंग है, लेकिन वह सदन की बैठकों में सांसद की तरह मतदान नहीं करता। विधेयकों पर स्वीकृति, संसद को आहूत करना, सत्रावसान करना और लोकसभा को भंग करना उसकी प्रमुख संवैधानिक भूमिकाओं में शामिल हैं।
राज्यसभा को Council of States अर्थात राज्यों की परिषद कहा जाता है। यह एक स्थायी सदन है, इसलिए इसे भंग नहीं किया जाता। इसके सदस्यों का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष होता है और प्रत्येक दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
राज्यों के प्रतिनिधियों का चुनाव संबंधित राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली तथा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के माध्यम से करते हैं। सीटों का आवंटन राज्यों की जनसंख्या और संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित है।
राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या समान नहीं है। उदाहरण के लिए, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को सामान्यतः अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है। यह अमेरिकी सीनेट की उस व्यवस्था से अलग है, जिसमें प्रत्येक राज्य को समान संख्या में सीनेटर मिलते हैं।
राज्यसभा को कुछ ऐसी विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं जो भारतीय संघीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार करके रोक नहीं सकती, लेकिन साधारण विधेयकों और संविधान संशोधन विधेयकों में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। संविधान संशोधन विधेयक दोनों सदनों से अलग-अलग आवश्यक बहुमत से पारित होना चाहिए।
लोकसभा को House of the People अर्थात जनता का सदन कहा जाता है। इसके सदस्य सामान्यतः जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से चुने जाते हैं।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद कानून द्वारा लोकसभा का कार्यकाल एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ा सकती है। यह विस्तार आपातकाल समाप्त होने के बाद छह महीने से अधिक जारी नहीं रह सकता।
मंत्रिपरिषद को लोकसभा में बहुमत का समर्थन बनाए रखना आवश्यक है। यदि लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर देती है, तो मंत्रिपरिषद को संवैधानिक परंपरा के अनुसार पद छोड़ना पड़ता है।
| आधार | लोकसभा | राज्यसभा |
|---|---|---|
| प्रतिनिधित्व | जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व | राज्यों और संबंधित संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व |
| निर्वाचन | सामान्यतः प्रत्यक्ष निर्वाचन | अधिकांश सदस्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने जाते हैं |
| संवैधानिक प्रकृति | स्थायी सदन नहीं | स्थायी सदन |
| कार्यकाल | सामान्यतः पाँच वर्ष | प्रत्येक सदस्य का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष |
| भंग होना | भंग की जा सकती है | भंग नहीं की जा सकती |
| मंत्रिपरिषद की जवाबदेही | मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी | मंत्रिपरिषद राज्यसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी नहीं |
| धन विधेयक | केवल यहीं प्रस्तुत होता है; निर्णायक भूमिका | केवल सिफारिश कर सकती है |
| संयुक्त बैठक | संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संभव | संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संभव |
ध्यान दें: संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों की समान भूमिका होती है। इसमें मतभेद दूर करने के लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
संसद की शक्तियों को केवल विधायी शक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह वित्तीय नियंत्रण, कार्यपालिका की जवाबदेही, संविधान संशोधन और कुछ संवैधानिक पदों के निर्वाचन या हटाने की प्रक्रिया में भी भाग लेती है।
संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची दी गई हैं। संसद संघ सूची के विषयों पर कानून बनाती है। समवर्ती सूची पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन टकराव की स्थिति में अनुच्छेद 254 के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार मुख्यतः राज्य विधानमंडलों के पास होता है। हालांकि संविधान कुछ विशेष परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की अनुमति देता है।
संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति अनुच्छेद 368 से मिलती है। यह शक्ति असीमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के मूल संरचना सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
संसदीय शासन प्रणाली में सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
इन साधनों से सांसद सरकारी नीतियों, योजनाओं, व्यय और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न उठा सकते हैं। हालांकि प्रत्येक संसदीय साधन के अपने अलग नियम और उद्देश्य होते हैं; सभी साधनों का प्रयोग समान परिस्थितियों में नहीं किया जा सकता।
प्रश्नकाल (Question Hour): इसमें सांसद मंत्रियों से सरकारी नीतियों, योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और सार्वजनिक महत्व के मामलों पर प्रश्न पूछते हैं। प्रश्न तारांकित, अतारांकित और अल्प सूचना प्रश्न जैसे प्रकारों में हो सकते हैं, जिनकी प्रक्रिया सदन के नियमों से निर्धारित होती है।
तारांकित प्रश्न का उत्तर मौखिक रूप से दिया जाता है और पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अतारांकित प्रश्न का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है और सामान्यतः पूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते।
शून्यकाल (Zero Hour): यह संसदीय कार्यप्रणाली से विकसित व्यवस्था है, जिसका स्पष्ट उल्लेख संविधान में नहीं है। इसमें सांसद तत्काल सार्वजनिक महत्व के विषय उठा सकते हैं। इसकी प्रक्रिया संबंधित सदन के नियमों और अध्यक्ष/सभापति के निर्देशों से प्रभावित होती है।
अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को आहूत करता है। दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।
सामान्यतः संसद के तीन प्रमुख सत्र आयोजित किए जाते हैं— बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। हालांकि संविधान इन तीन नामों या इनकी निश्चित संख्या को अनिवार्य नहीं बनाता।
राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को संबोधित कर सकता है और अनुच्छेद 87 के अंतर्गत प्रत्येक आम चुनाव के बाद लोकसभा के प्रथम सत्र तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में विशेष अभिभाषण देता है।
गणपूर्ति (Quorum) किसी सदन की बैठक संचालित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्यों की संख्या है। संविधान के अनुच्छेद 100(3) के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन की गणपूर्ति उसके कुल सदस्यों की संख्या का दसवाँ भाग होती है।
यदि बैठक के दौरान गणपूर्ति नहीं रहती, तो पीठासीन अधिकारी सदन को स्थगित कर सकता है या बैठक को तब तक निलंबित कर सकता है, जब तक गणपूर्ति पूरी न हो जाए।
संविधान का अनुच्छेद 105 संसद, उसके सदस्यों और समितियों के विशेषाधिकारों से संबंधित है। इनका उद्देश्य संसदीय कार्यों को अनावश्यक बाहरी दबाव से बचाना और विधायी कार्यवाही की स्वतंत्रता बनाए रखना है।
विशेषाधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक सांसद को सभी परिस्थितियों में पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त है। विशेषाधिकारों की सीमा संविधान, कानून और न्यायिक निर्णयों से प्रभावित होती है।
संसद का पूरा सदन प्रत्येक विषय की विस्तृत तकनीकी जाँच नहीं कर सकता। इसलिए संसदीय समितियाँ विधेयकों, सरकारी व्यय, प्रशासन और नीतियों की अधिक गहराई से जाँच करने में सहायता करती हैं।
प्रमुख वित्तीय समितियाँ:
समितियों की सिफारिशें सामान्यतः सलाहकारी प्रकृति की होती हैं, लेकिन वे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही और संसदीय निगरानी को मजबूत करती हैं।
विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ भी मंत्रालयों की अनुदान माँगों, विधेयकों और नीतिगत विषयों की जाँच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रस्तावित कानून को विधेयक (Bill) कहा जाता है। सामान्यतः विधेयक को संबंधित सदन में प्रस्तुत किया जाता है, उस पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विचार-विमर्श और मतदान होता है, तथा आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।
विधेयकों की प्रमुख श्रेणियों में साधारण विधेयक, धन विधेयक, वित्तीय विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक शामिल हैं। इनकी प्रस्तुति, पारित होने की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की भूमिका एक जैसी नहीं होती।
साधारण विधेयक (Ordinary Bill) संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। सामान्यतः इसे दोनों सदनों द्वारा समान रूप से पारित किया जाना आवश्यक है।
यदि एक सदन विधेयक को अस्वीकार कर दे, संशोधनों पर अंतिम असहमति हो या दूसरा सदन निर्धारित छह महीने से अधिक समय तक विधेयक पारित न करे, तो अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक की संभावना उत्पन्न हो सकती है। यह व्यवस्था संवैधानिक शर्तों और अपवादों के अधीन है।
राष्ट्रपति साधारण विधेयक को स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है या—धन विधेयक न होने पर—पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है। यदि संसद उसे पुनः पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति रोक नहीं सकता।
धन विधेयक (Money Bill) संविधान के अनुच्छेद 110 में परिभाषित है। इसमें केवल उन विषयों से संबंधित प्रावधान होते हैं जिन्हें अनुच्छेद 110 में निर्दिष्ट किया गया है, जैसे कर लगाना, समाप्त करना या बदलना, भारत की संचित निधि से धन का विनियोजन, सरकारी उधार और संचित निधि या आकस्मिक निधि की अभिरक्षा से संबंधित विषय।
महत्त्वपूर्ण अंतर: प्रत्येक वित्तीय विषय वाला विधेयक धन विधेयक नहीं होता। किसी विधेयक को धन विधेयक मानने के लिए अनुच्छेद 110 की शर्तें पूरी होनी चाहिए।
वित्तीय विधेयक (Financial Bill) उन विधेयकों के लिए व्यापक शब्द है जिनमें वित्तीय विषयों से संबंधित प्रावधान होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 117 में वित्तीय विधेयकों से जुड़े विशेष प्रावधान दिए गए हैं।
धन विधेयक और वित्तीय विधेयक में मुख्य अंतर यह है कि धन विधेयक में केवल अनुच्छेद 110 में सूचीबद्ध विषय ही होने चाहिए, जबकि वित्तीय विधेयक में उन विषयों के साथ अन्य प्रावधान भी हो सकते हैं।
संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है। संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
संशोधन के प्रकार के अनुसार अलग-अलग बहुमत आवश्यक हो सकते हैं। अधिकांश संशोधनों के लिए प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।
संघीय ढाँचे के कुछ प्रावधानों में संशोधन के लिए संसद के अतिरिक्त कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की पुष्टि भी आवश्यक होती है। दोनों सदनों को विधेयक अलग-अलग पारित करना होता है; संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से पारित होने पर राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है और राष्ट्रपति को उस पर स्वीकृति देनी होती है।
अनुच्छेद 108 के अंतर्गत साधारण विधेयक या अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत आने वाले वित्तीय विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है, यदि संवैधानिक शर्तें पूरी हों।
गतिरोध की प्रमुख परिस्थितियाँ:
संयुक्त बैठक की अध्यक्षता सामान्यतः लोकसभा अध्यक्ष करता है। यदि वह उपस्थित न हो, तो संविधान और संबंधित नियमों के अनुसार अन्य पीठासीन अधिकारी अध्यक्षता कर सकता है।
संयुक्त बैठक नहीं होती: धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक के मामले में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है। इसे वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement) कहा जाता है।
भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए संवैधानिक अनुमति आवश्यक है। संसद का वित्तीय नियंत्रण लोकतांत्रिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण आधार है।
संविधान के अनुच्छेद 52 में भारत के राष्ट्रपति के पद का प्रावधान है। अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है और उसका प्रयोग संविधान के अनुसार प्रत्यक्ष रूप से या उसके अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से किया जाता है।
भारत संसदीय शासन प्रणाली अपनाता है। इसलिए राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) है, जबकि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद सरकार की वास्तविक राजनीतिक कार्यपालिका है।
अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति की सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद होती है। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने का अनुरोध कर सकता है, लेकिन पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करना आवश्यक है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं किया जाता। संविधान के अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचन मंडल (Electoral College) करता है।
निर्वाचन मंडल में शामिल हैं:
निर्वाचन मंडल में शामिल नहीं हैं:
राष्ट्रपति का निर्वाचन संघ और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से मत-मूल्य की संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर होता है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) तथा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा होता है। मतदान गुप्त मतपत्र से किया जाता है।
राष्ट्रपति के निर्वाचन में प्रत्येक सांसद और विधायक के मत का मूल्य समान नहीं होता। विधायकों के मत-मूल्य की गणना संबंधित राज्य की जनसंख्या और निर्वाचित विधायकों की संख्या से जुड़े संवैधानिक सूत्र के आधार पर होती है। सांसदों के मत-मूल्य की गणना भी निर्धारित संवैधानिक पद्धति से की जाती है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन सामान्य बहुमत से नहीं, बल्कि मतों के निर्धारित मूल्य और प्राथमिकताओं की गणना के आधार पर होता है।
संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार राष्ट्रपति पद के लिए व्यक्ति:
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल और केंद्र या राज्य के मंत्री को इस उद्देश्य से लाभ का पद धारण करने वाला नहीं माना जाता।
अनुच्छेद 56 के अनुसार राष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तारीख से पाँच वर्ष होता है। राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित करके देता है।
संविधान राष्ट्रपति के पुनर्निर्वाचन की संख्या पर कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं करता।
अनुच्छेद 61 के अंतर्गत राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के लिए महाभियोग द्वारा पद से हटाया जा सकता है। संविधान में “संविधान का उल्लंघन” शब्द की अलग से विस्तृत परिभाषा नहीं दी गई है।
इस प्रक्रिया में प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। यह केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से अलग है।
संघ की कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से की जाती है। राष्ट्रपति विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ करता है, लेकिन अनेक नियुक्तियों में मंत्रिपरिषद की सलाह और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया लागू होती है।
राष्ट्रपति की नियुक्ति संबंधी शक्तियों को व्यक्तिगत राजनीतिक विवेक के रूप में नहीं समझना चाहिए। सामान्यतः वे संसदीय शासन प्रणाली और संवैधानिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत प्रयोग की जाती हैं।
राष्ट्रपति संसद की विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण संवैधानिक अंग है। राष्ट्रपति की प्रमुख विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
सामान्यतः संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है। कुछ विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा आवश्यक होती है।
संसद द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में राष्ट्रपति की स्वीकृति से जुड़ी शक्तियों को सामान्यतः वीटो शक्ति कहा जाता है। इनके माध्यम से राष्ट्रपति विधायी प्रक्रिया में अपनी संवैधानिक भूमिका निभाता है।
राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर सामान्य विधेयक की तरह वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता; संसद द्वारा विधिवत पारित संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देना आवश्यक है।
अनुच्छेद 111 के अनुसार राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस नहीं भेज सकता। हालांकि वह उस पर स्वीकृति रोक सकता है।
साधारण विधेयक के मामले में राष्ट्रपति विधेयक को संदेश सहित पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। यदि संसद विधेयक को संशोधनों सहित या बिना संशोधन के पुनः पारित कर देती है और उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करती है, तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति नहीं रोक सकता।
अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति प्राप्त है। जब संसद के दोनों सदन एक साथ सत्र में न हों और ऐसी परिस्थितियाँ हों जिनमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तब अध्यादेश जारी किया जा सकता है।
यदि संसद के दोनों सदन एक साथ सत्र में नहीं हैं, तो निर्धारित संवैधानिक परिस्थितियों में अध्यादेश जारी किया जा सकता है, भले ही एक सदन सत्र में हो और दूसरा सत्र में न हो।
अध्यादेश शक्ति राष्ट्रपति की औपचारिक संवैधानिक शक्ति है, जिसका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के आधार पर होता है। अध्यादेश न्यायिक समीक्षा के अधीन भी हो सकता है।
राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ भी संसदीय नियंत्रण के अधीन हैं। सरकार सार्वजनिक धन का उपयोग संविधान और संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार करती है।
अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को क्षमादान आदि की शक्ति प्राप्त है। इसका प्रयोग निर्धारित मामलों में दोषसिद्धि या दंड के संबंध में किया जा सकता है।
राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति सैन्य न्यायालयों के मामलों, उन अपराधों से संबंधित मामलों जिनमें संघ की कार्यपालिका शक्ति विस्तृत होती है, और मृत्युदंड के मामलों में संविधान के अनुसार लागू होती है।
यह शक्ति न्यायिक निर्णय को सामान्य अपील की तरह दोबारा सुनने के समान नहीं है। इसका प्रयोग संवैधानिक व्यवस्था के भीतर और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार किया जाता है।
भारतीय संविधान में तीन प्रमुख प्रकार की आपातकालीन व्यवस्थाएँ दी गई हैं:
ये घोषणाएँ राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार की जाती हैं और संसद की निर्धारित स्वीकृति तथा अन्य संवैधानिक शर्तों के अधीन होती हैं।
राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन और वित्तीय आपातकाल के आधार, अवधि, प्रभाव तथा संसदीय अनुमोदन की प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से अलग हैं।
राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष है और प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक राजनीतिक प्रमुख है। अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है।
राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने का अनुरोध कर सकता है। यदि मंत्रिपरिषद पुनर्विचार के बाद वही सलाह देती है, तो राष्ट्रपति उस सलाह के अनुसार कार्य करता है।
प्रधानमंत्री का दायित्व अनुच्छेद 78 के अंतर्गत राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद के निर्णयों और प्रशासन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना तथा राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई जानकारी देना भी है।
राष्ट्रपति और संसद भारतीय विधायी व्यवस्था के परस्पर जुड़े संवैधानिक घटक हैं। संसद कानून निर्माण करती है, जबकि राष्ट्रपति विधायी प्रक्रिया में निर्धारित संवैधानिक भूमिका निभाता है।
राष्ट्रपति कोई स्वतंत्र निरंकुश शासक नहीं है। उसकी शक्तियों का प्रयोग संविधान, मंत्रिपरिषद की सलाह और संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुरूप होता है।
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 52 | भारत के राष्ट्रपति का पद |
| 53 | संघ की कार्यपालिका शक्ति |
| 54–55 | राष्ट्रपति का निर्वाचन और निर्वाचन की पद्धति |
| 56 | राष्ट्रपति का कार्यकाल |
| 58 | राष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ |
| 61 | राष्ट्रपति पर महाभियोग |
| 72 | राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति |
| 74–75 | मंत्रिपरिषद और मंत्रियों से संबंधित प्रावधान |
| 78 | प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति के प्रति कर्तव्य |
| 79 | संसद की संरचना |
| 80–81 | राज्यसभा और लोकसभा की संरचना |
| 83 | संसद के सदनों की अवधि |
| 85 | संसद के सत्र |
| 100 | मतदान, रिक्तियों के बावजूद कार्यवाही और गणपूर्ति |
| 105 | संसदीय विशेषाधिकार |
| 108 | संसद की संयुक्त बैठक |
| 109–110 | धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया और परिभाषा |
| 111 | विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति |
| 112 | वार्षिक वित्तीय विवरण |
| 117 | वित्तीय विधेयकों के विशेष प्रावधान |
| 123 | राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति |
| 249 | राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद की विधायी शक्ति |
| 280 | वित्त आयोग |
| 312 | अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण से संबंधित प्रावधान |
| 352 | राष्ट्रीय आपातकाल |
| 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति |
| 360 | वित्तीय आपातकाल |
| 368 | संविधान संशोधन |
राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियाँ व्यापक हैं, लेकिन भारत की संसदीय शासन प्रणाली में उनका प्रयोग संविधान और मंत्रिपरिषद की सलाह से नियंत्रित होता है।
भारत में राष्ट्रपति को अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह स्वतंत्र वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख नहीं माना जाता। भारत में कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी मंत्रिपरिषद के माध्यम से कार्य करती है।
फिर भी राष्ट्रपति का पद केवल औपचारिक नहीं है। संविधान द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में राष्ट्रपति को नियुक्तियों, विधेयकों पर पुनर्विचार और सरकार से जानकारी प्राप्त करने जैसे कार्यों में महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका निभानी होती है।
सामान्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है। कुछ असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों में राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति का विवेक असीमित नहीं है। संविधान, संसदीय परंपराएँ, न्यायिक निर्णय और लोकतांत्रिक जवाबदेही उसकी भूमिका की सीमाएँ निर्धारित करते हैं।
भारत में संविधान सर्वोच्च है। संसद की विधायी शक्ति व्यापक होने के बावजूद वह संविधान के प्रावधानों के अधीन है।
संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय कर सकते हैं। यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकते हैं।
संविधान संशोधन की शक्ति भी मूल संरचना सिद्धांत से सीमित है। संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
सुधार के लिए संसदीय समितियों को पर्याप्त समय देना, विधेयकों पर व्यापक चर्चा, शोध सहायता, वित्तीय निगरानी और संसदीय नियमों का प्रभावी पालन महत्वपूर्ण है।
संसद और राष्ट्रपति भारतीय संसदीय लोकतंत्र के परस्पर जुड़े संवैधानिक संस्थान हैं। संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है, कानून बनाती है और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती है। राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में विधायी और कार्यपालिका प्रक्रियाओं में निर्धारित भूमिका निभाता है।
संसद की प्रभावशीलता केवल पारित कानूनों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। विधेयकों की गुणवत्ता, बहस की गहराई, समितियों की जाँच, सरकारी व्यय पर नियंत्रण और विपक्ष की प्रभावी भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानदंड हैं।
इसी प्रकार राष्ट्रपति की भूमिका समझने के लिए केवल उसकी शक्तियों की सूची याद करना पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रपति की वास्तविक संवैधानिक भूमिका को समझने के लिए अनुच्छेद 74, 75, 78, 111 और 123 तथा संसदीय शासन प्रणाली के सिद्धांतों को साथ पढ़ना चाहिए।