Parliament and President

संसद और राष्ट्रपति

भारतीय संसद का परिचय

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ के लिए एक संसद होगी, जिसमें राष्ट्रपति तथा दो सदन—राज्यसभा और लोकसभा—शामिल होंगे। राष्ट्रपति किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता, फिर भी वह संसद का संवैधानिक अंग है।

भारत ने द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature) अपनाई है। इसके दो सदनों की संरचना और भूमिका अलग-अलग है। लोकसभा जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है, जबकि राज्यसभा संघीय व्यवस्था में राज्यों और कुछ संघ राज्य क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देती है।

संसद का कार्य केवल कानून बनाना नहीं है। यह सरकारी व्यय की जाँच, कार्यपालिका की जवाबदेही, राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा, संविधान संशोधन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का भी प्रमुख मंच है।

  • राष्ट्रपति — संसद का संवैधानिक अंग
  • राज्यसभा — राज्यों की परिषद
  • लोकसभा — जनता का सदन
  • मुख्य कार्य — कानून निर्माण, वित्तीय नियंत्रण और कार्यपालिका की जवाबदेही

संसद की संरचना और संवैधानिक आधार

संसद के तीन घटक हैं—राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा। संविधान के अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद की संरचना, सदस्यों, अधिकारियों, कार्यवाही, विशेषाधिकारों और विधायी प्रक्रिया से संबंधित अनेक प्रावधान दिए गए हैं।

अनुच्छेद 80 राज्यसभा और अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना से संबंधित है। अनुच्छेद 83 दोनों सदनों की अवधि निर्धारित करता है, जबकि अनुच्छेद 85 संसद के सत्रों से संबंधित है।

राष्ट्रपति संसद का अंग है, लेकिन वह सदन की बैठकों में सांसद की तरह मतदान नहीं करता। विधेयकों पर स्वीकृति, संसद को आहूत करना, सत्रावसान करना और लोकसभा को भंग करना उसकी प्रमुख संवैधानिक भूमिकाओं में शामिल हैं।

राज्यसभा

राज्यसभा को Council of States अर्थात राज्यों की परिषद कहा जाता है। यह एक स्थायी सदन है, इसलिए इसे भंग नहीं किया जाता। इसके सदस्यों का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष होता है और प्रत्येक दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।

  • संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्यसभा की संरचना दी गई है।
  • राज्यसभा की अधिकतम संवैधानिक सदस्य संख्या 250 है।
  • इनमें 12 सदस्यों को राष्ट्रपति नामित कर सकता है।
  • नामित सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से होते हैं।
  • उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
  • राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव राज्यसभा अपने सदस्यों में से करती है।

राज्यों के प्रतिनिधियों का चुनाव संबंधित राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली तथा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के माध्यम से करते हैं। सीटों का आवंटन राज्यों की जनसंख्या और संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित है।

राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या समान नहीं है। उदाहरण के लिए, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को सामान्यतः अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है। यह अमेरिकी सीनेट की उस व्यवस्था से अलग है, जिसमें प्रत्येक राज्य को समान संख्या में सीनेटर मिलते हैं।

राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ

राज्यसभा को कुछ ऐसी विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं जो भारतीय संघीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

  • अनुच्छेद 249: राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संसद को राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी निर्दिष्ट विषय पर कानून बनाने की शक्ति दे सकती है। ऐसा प्रस्ताव अधिकतम एक वर्ष तक प्रभावी रहता है और इसे निर्धारित प्रक्रिया से आगे बढ़ाया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 312: राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर सकती है कि राष्ट्रीय हित में एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण आवश्यक है।
  • उपराष्ट्रपति को हटाना: उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव सबसे पहले राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है। इसे राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित करना और लोकसभा की सहमति प्राप्त करना आवश्यक है।

राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार करके रोक नहीं सकती, लेकिन साधारण विधेयकों और संविधान संशोधन विधेयकों में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। संविधान संशोधन विधेयक दोनों सदनों से अलग-अलग आवश्यक बहुमत से पारित होना चाहिए।

लोकसभा

लोकसभा को House of the People अर्थात जनता का सदन कहा जाता है। इसके सदस्य सामान्यतः जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से चुने जाते हैं।

  • लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष है।
  • संविधान के अनुच्छेद 83 के अंतर्गत लोकसभा की अवधि निर्धारित है।
  • लोकसभा को राष्ट्रपति संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार भंग कर सकता है।
  • मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • धन विधेयक के मामले में लोकसभा को विशेष प्रधानता प्राप्त है।
  • लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही संचालित करता है और धन विधेयक के वर्गीकरण पर प्रमाणन करता है।

राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद कानून द्वारा लोकसभा का कार्यकाल एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ा सकती है। यह विस्तार आपातकाल समाप्त होने के बाद छह महीने से अधिक जारी नहीं रह सकता।

मंत्रिपरिषद को लोकसभा में बहुमत का समर्थन बनाए रखना आवश्यक है। यदि लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर देती है, तो मंत्रिपरिषद को संवैधानिक परंपरा के अनुसार पद छोड़ना पड़ता है।

लोकसभा और राज्यसभा में अंतर

आधार लोकसभा राज्यसभा
प्रतिनिधित्व जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व राज्यों और संबंधित संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व
निर्वाचन सामान्यतः प्रत्यक्ष निर्वाचन अधिकांश सदस्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने जाते हैं
संवैधानिक प्रकृति स्थायी सदन नहीं स्थायी सदन
कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष प्रत्येक सदस्य का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष
भंग होना भंग की जा सकती है भंग नहीं की जा सकती
मंत्रिपरिषद की जवाबदेही मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी मंत्रिपरिषद राज्यसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी नहीं
धन विधेयक केवल यहीं प्रस्तुत होता है; निर्णायक भूमिका केवल सिफारिश कर सकती है
संयुक्त बैठक संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संभव संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संभव

ध्यान दें: संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों की समान भूमिका होती है। इसमें मतभेद दूर करने के लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।

संसद की प्रमुख शक्तियाँ और कार्य

संसद की शक्तियों को केवल विधायी शक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह वित्तीय नियंत्रण, कार्यपालिका की जवाबदेही, संविधान संशोधन और कुछ संवैधानिक पदों के निर्वाचन या हटाने की प्रक्रिया में भी भाग लेती है।

  • विधायी कार्य: कानून बनाना और पुराने कानूनों में संशोधन करना।
  • वित्तीय कार्य: बजट, कराधान और सरकारी व्यय पर नियंत्रण।
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण: प्रश्न, चर्चाएँ, प्रस्ताव और समितियाँ।
  • संवैधानिक कार्य: अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन।
  • निर्वाचन संबंधी कार्य: राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में संवैधानिक भूमिका।
  • न्यायिक प्रकृति के कार्य: राष्ट्रपति के महाभियोग और कुछ संवैधानिक पदाधिकारियों को हटाने की प्रक्रियाएँ।
  • प्रतिनिधित्व: जनता की समस्याओं और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा।

संसद की विधायी शक्ति

संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची दी गई हैं। संसद संघ सूची के विषयों पर कानून बनाती है। समवर्ती सूची पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन टकराव की स्थिति में अनुच्छेद 254 के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार मुख्यतः राज्य विधानमंडलों के पास होता है। हालांकि संविधान कुछ विशेष परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की अनुमति देता है।

  • अनुच्छेद 249 — राष्ट्रीय हित में राज्यसभा के प्रस्ताव के आधार पर।
  • अनुच्छेद 250 — राष्ट्रीय आपातकाल लागू रहने के दौरान।
  • अनुच्छेद 252 — दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर।
  • अनुच्छेद 253 — अंतरराष्ट्रीय संधियों, समझौतों या निर्णयों को लागू करने के लिए।
  • अनुच्छेद 356 — राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद द्वारा राज्य की विधायी शक्ति का प्रयोग।

संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति अनुच्छेद 368 से मिलती है। यह शक्ति असीमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के मूल संरचना सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

संसद की कार्यपालिका पर नियंत्रण

संसदीय शासन प्रणाली में सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।

  • प्रश्नकाल
  • शून्यकाल
  • अल्पकालिक चर्चा
  • स्थगन प्रस्ताव
  • अविश्वास प्रस्ताव
  • निंदा प्रस्ताव
  • अनुदान की माँगों पर कटौती प्रस्ताव
  • संसदीय समितियाँ

इन साधनों से सांसद सरकारी नीतियों, योजनाओं, व्यय और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न उठा सकते हैं। हालांकि प्रत्येक संसदीय साधन के अपने अलग नियम और उद्देश्य होते हैं; सभी साधनों का प्रयोग समान परिस्थितियों में नहीं किया जा सकता।

प्रश्नकाल और शून्यकाल

प्रश्नकाल (Question Hour): इसमें सांसद मंत्रियों से सरकारी नीतियों, योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और सार्वजनिक महत्व के मामलों पर प्रश्न पूछते हैं। प्रश्न तारांकित, अतारांकित और अल्प सूचना प्रश्न जैसे प्रकारों में हो सकते हैं, जिनकी प्रक्रिया सदन के नियमों से निर्धारित होती है।

तारांकित प्रश्न का उत्तर मौखिक रूप से दिया जाता है और पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अतारांकित प्रश्न का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है और सामान्यतः पूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते।

शून्यकाल (Zero Hour): यह संसदीय कार्यप्रणाली से विकसित व्यवस्था है, जिसका स्पष्ट उल्लेख संविधान में नहीं है। इसमें सांसद तत्काल सार्वजनिक महत्व के विषय उठा सकते हैं। इसकी प्रक्रिया संबंधित सदन के नियमों और अध्यक्ष/सभापति के निर्देशों से प्रभावित होती है।

संसद का सत्र

अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को आहूत करता है। दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।

सामान्यतः संसद के तीन प्रमुख सत्र आयोजित किए जाते हैं— बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। हालांकि संविधान इन तीन नामों या इनकी निश्चित संख्या को अनिवार्य नहीं बनाता।

  • आह्वान (Summoning): सदन की बैठक बुलाना।
  • सत्रावसान (Prorogation): राष्ट्रपति द्वारा सत्र समाप्त करना।
  • स्थगन (Adjournment): सदन की बैठक को कुछ समय के लिए रोकना; यह सामान्यतः पीठासीन अधिकारी करता है।
  • लोकसभा का विघटन (Dissolution): लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होना या उसे समय से पहले भंग करना।

राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को संबोधित कर सकता है और अनुच्छेद 87 के अंतर्गत प्रत्येक आम चुनाव के बाद लोकसभा के प्रथम सत्र तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में विशेष अभिभाषण देता है।

संसद में गणपूर्ति

गणपूर्ति (Quorum) किसी सदन की बैठक संचालित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्यों की संख्या है। संविधान के अनुच्छेद 100(3) के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन की गणपूर्ति उसके कुल सदस्यों की संख्या का दसवाँ भाग होती है।

यदि बैठक के दौरान गणपूर्ति नहीं रहती, तो पीठासीन अधिकारी सदन को स्थगित कर सकता है या बैठक को तब तक निलंबित कर सकता है, जब तक गणपूर्ति पूरी न हो जाए।

संसदीय विशेषाधिकार

संविधान का अनुच्छेद 105 संसद, उसके सदस्यों और समितियों के विशेषाधिकारों से संबंधित है। इनका उद्देश्य संसदीय कार्यों को अनावश्यक बाहरी दबाव से बचाना और विधायी कार्यवाही की स्वतंत्रता बनाए रखना है।

  • संविधान और सदन के नियमों के अधीन संसद में भाषण की स्वतंत्रता।
  • संसद या उसकी समिति में कही गई बात अथवा दिए गए मत के संबंध में संवैधानिक संरक्षण।
  • संसदीय कार्यवाही और सदन की व्यवस्था बनाए रखने के लिए सदन की शक्तियाँ।
  • संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन या सदन की अवमानना के मामलों में नियमों के अनुसार कार्रवाई।

विशेषाधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक सांसद को सभी परिस्थितियों में पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त है। विशेषाधिकारों की सीमा संविधान, कानून और न्यायिक निर्णयों से प्रभावित होती है।

संसदीय समितियाँ

संसद का पूरा सदन प्रत्येक विषय की विस्तृत तकनीकी जाँच नहीं कर सकता। इसलिए संसदीय समितियाँ विधेयकों, सरकारी व्यय, प्रशासन और नीतियों की अधिक गहराई से जाँच करने में सहायता करती हैं।

प्रमुख वित्तीय समितियाँ:

  • लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee): सरकारी व्यय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों की जाँच करती है।
  • प्राक्कलन समिति (Estimates Committee): सरकारी व्यय में मितव्ययिता, दक्षता और प्रशासनिक सुधारों की संभावनाओं पर विचार करती है।
  • लोक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings): निर्धारित नियमों के अनुसार सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज और संबंधित रिपोर्टों की जाँच करती है।

समितियों की सिफारिशें सामान्यतः सलाहकारी प्रकृति की होती हैं, लेकिन वे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही और संसदीय निगरानी को मजबूत करती हैं।

विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ भी मंत्रालयों की अनुदान माँगों, विधेयकों और नीतिगत विषयों की जाँच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

विधेयक और कानून निर्माण

प्रस्तावित कानून को विधेयक (Bill) कहा जाता है। सामान्यतः विधेयक को संबंधित सदन में प्रस्तुत किया जाता है, उस पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विचार-विमर्श और मतदान होता है, तथा आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

विधेयकों की प्रमुख श्रेणियों में साधारण विधेयक, धन विधेयक, वित्तीय विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक शामिल हैं। इनकी प्रस्तुति, पारित होने की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की भूमिका एक जैसी नहीं होती।

साधारण विधेयक

साधारण विधेयक (Ordinary Bill) संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। सामान्यतः इसे दोनों सदनों द्वारा समान रूप से पारित किया जाना आवश्यक है।

यदि एक सदन विधेयक को अस्वीकार कर दे, संशोधनों पर अंतिम असहमति हो या दूसरा सदन निर्धारित छह महीने से अधिक समय तक विधेयक पारित न करे, तो अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक की संभावना उत्पन्न हो सकती है। यह व्यवस्था संवैधानिक शर्तों और अपवादों के अधीन है।

राष्ट्रपति साधारण विधेयक को स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है या—धन विधेयक न होने पर—पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है। यदि संसद उसे पुनः पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति रोक नहीं सकता।

धन विधेयक

धन विधेयक (Money Bill) संविधान के अनुच्छेद 110 में परिभाषित है। इसमें केवल उन विषयों से संबंधित प्रावधान होते हैं जिन्हें अनुच्छेद 110 में निर्दिष्ट किया गया है, जैसे कर लगाना, समाप्त करना या बदलना, भारत की संचित निधि से धन का विनियोजन, सरकारी उधार और संचित निधि या आकस्मिक निधि की अभिरक्षा से संबंधित विषय।

  • धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • इसे प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा आवश्यक है।
  • लोकसभा अध्यक्ष यह प्रमाणित करता है कि विधेयक धन विधेयक है।
  • राज्यसभा धन विधेयक में संशोधन नहीं कर सकती; वह केवल सिफारिशें दे सकती है।
  • लोकसभा राज्यसभा की सभी, कुछ या कोई भी सिफारिश स्वीकार न करने का निर्णय ले सकती है।
  • राज्यसभा को धन विधेयक प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर उसे सिफारिशों सहित लौटाना होता है।
  • यदि राज्यसभा 14 दिनों में विधेयक वापस नहीं करती, तो वह लोकसभा द्वारा पारित रूप में दोनों सदनों से पारित माना जाता है।
  • धन विधेयक पर संयुक्त बैठक नहीं होती।

महत्त्वपूर्ण अंतर: प्रत्येक वित्तीय विषय वाला विधेयक धन विधेयक नहीं होता। किसी विधेयक को धन विधेयक मानने के लिए अनुच्छेद 110 की शर्तें पूरी होनी चाहिए।

वित्तीय विधेयक

वित्तीय विधेयक (Financial Bill) उन विधेयकों के लिए व्यापक शब्द है जिनमें वित्तीय विषयों से संबंधित प्रावधान होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 117 में वित्तीय विधेयकों से जुड़े विशेष प्रावधान दिए गए हैं।

  • अनुच्छेद 117(1): ऐसे विधेयक जिनमें अनुच्छेद 110 के विषयों के साथ अन्य विषय भी शामिल हों, निर्धारित शर्तों के अधीन केवल लोकसभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं और राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा आवश्यक होती है।
  • अनुच्छेद 117(3): ऐसे विधेयक या संशोधन जिनमें भारत की संचित निधि से व्यय का प्रावधान हो, निर्धारित संवैधानिक शर्तों के अधीन राष्ट्रपति की अनुशंसा के बिना पारित नहीं किए जा सकते।

धन विधेयक और वित्तीय विधेयक में मुख्य अंतर यह है कि धन विधेयक में केवल अनुच्छेद 110 में सूचीबद्ध विषय ही होने चाहिए, जबकि वित्तीय विधेयक में उन विषयों के साथ अन्य प्रावधान भी हो सकते हैं।

संविधान संशोधन विधेयक

संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है। संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।

संशोधन के प्रकार के अनुसार अलग-अलग बहुमत आवश्यक हो सकते हैं। अधिकांश संशोधनों के लिए प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।

संघीय ढाँचे के कुछ प्रावधानों में संशोधन के लिए संसद के अतिरिक्त कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की पुष्टि भी आवश्यक होती है। दोनों सदनों को विधेयक अलग-अलग पारित करना होता है; संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।

संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से पारित होने पर राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है और राष्ट्रपति को उस पर स्वीकृति देनी होती है।

संसद की संयुक्त बैठक

अनुच्छेद 108 के अंतर्गत साधारण विधेयक या अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत आने वाले वित्तीय विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है, यदि संवैधानिक शर्तें पूरी हों।

गतिरोध की प्रमुख परिस्थितियाँ:

  • एक सदन द्वारा विधेयक को अस्वीकार करना।
  • दोनों सदनों के बीच संशोधनों पर अंतिम असहमति।
  • दूसरे सदन द्वारा विधेयक प्राप्त होने के बाद छह महीने से अधिक समय तक उसे पारित न करना, निर्धारित गणना और अपवादों के अधीन।

संयुक्त बैठक की अध्यक्षता सामान्यतः लोकसभा अध्यक्ष करता है। यदि वह उपस्थित न हो, तो संविधान और संबंधित नियमों के अनुसार अन्य पीठासीन अधिकारी अध्यक्षता कर सकता है।

संयुक्त बैठक नहीं होती: धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक के मामले में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।

बजट और संसद

संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है। इसे वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement) कहा जाता है।

  • वार्षिक वित्तीय विवरण: सरकार की अनुमानित आय और व्यय का विवरण।
  • अनुदान की माँगें: मंत्रालयों और विभागों के व्यय के लिए लोकसभा की स्वीकृति माँगी जाती है।
  • विनियोग विधेयक: भारत की संचित निधि से स्वीकृत धन निकालने के लिए कानूनी प्राधिकार प्रदान करता है।
  • वित्त विधेयक: बजट में प्रस्तावित कराधान संबंधी बदलावों को लागू करने से संबंधित हो सकता है।
  • कटौती प्रस्ताव: लोकसभा में अनुदान की माँगों पर चर्चा के दौरान सरकारी व्यय या नीति पर असहमति जताने का संसदीय साधन।

भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए संवैधानिक अनुमति आवश्यक है। संसद का वित्तीय नियंत्रण लोकतांत्रिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण आधार है।

राष्ट्रपति का संवैधानिक स्थान

संविधान के अनुच्छेद 52 में भारत के राष्ट्रपति के पद का प्रावधान है। अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है और उसका प्रयोग संविधान के अनुसार प्रत्यक्ष रूप से या उसके अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से किया जाता है।

भारत संसदीय शासन प्रणाली अपनाता है। इसलिए राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष (Head of State) है, जबकि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद सरकार की वास्तविक राजनीतिक कार्यपालिका है।

अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति की सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद होती है। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने का अनुरोध कर सकता है, लेकिन पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करना आवश्यक है।

राष्ट्रपति का निर्वाचन

राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं किया जाता। संविधान के अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचन मंडल (Electoral College) करता है।

निर्वाचन मंडल में शामिल हैं:

  • संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य।
  • राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
  • दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और पुडुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।

निर्वाचन मंडल में शामिल नहीं हैं:

  • संसद के मनोनीत सदस्य।
  • राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य, जहाँ ऐसी व्यवस्था हो।
  • राज्य विधान परिषदों के सदस्य।

राष्ट्रपति का निर्वाचन संघ और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से मत-मूल्य की संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर होता है।

राष्ट्रपति के निर्वाचन की मतदान प्रणाली

राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) तथा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा होता है। मतदान गुप्त मतपत्र से किया जाता है।

राष्ट्रपति के निर्वाचन में प्रत्येक सांसद और विधायक के मत का मूल्य समान नहीं होता। विधायकों के मत-मूल्य की गणना संबंधित राज्य की जनसंख्या और निर्वाचित विधायकों की संख्या से जुड़े संवैधानिक सूत्र के आधार पर होती है। सांसदों के मत-मूल्य की गणना भी निर्धारित संवैधानिक पद्धति से की जाती है।

राष्ट्रपति का निर्वाचन सामान्य बहुमत से नहीं, बल्कि मतों के निर्धारित मूल्य और प्राथमिकताओं की गणना के आधार पर होता है।

राष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ

संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार राष्ट्रपति पद के लिए व्यक्ति:

  • भारत का नागरिक होना चाहिए।
  • कम-से-कम 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  • भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या उनके नियंत्रण वाले स्थानीय अथवा अन्य प्राधिकरण के अधीन लाभ का पद धारण न करता हो; संविधान में निर्धारित अपवाद लागू होते हैं।

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल और केंद्र या राज्य के मंत्री को इस उद्देश्य से लाभ का पद धारण करने वाला नहीं माना जाता।

राष्ट्रपति का कार्यकाल और पदत्याग

अनुच्छेद 56 के अनुसार राष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तारीख से पाँच वर्ष होता है। राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित करके देता है।

  • राष्ट्रपति का पुनर्निर्वाचन संभव है।
  • राष्ट्रपति उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद पर बना रहता है।
  • राष्ट्रपति संविधान के उल्लंघन के लिए महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है।
  • राष्ट्रपति के पद में रिक्ति होने पर संविधान में चुनाव और कार्यवाहक व्यवस्था से संबंधित प्रावधान हैं।

संविधान राष्ट्रपति के पुनर्निर्वाचन की संख्या पर कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं करता।

राष्ट्रपति पर महाभियोग

अनुच्छेद 61 के अंतर्गत राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के लिए महाभियोग द्वारा पद से हटाया जा सकता है। संविधान में “संविधान का उल्लंघन” शब्द की अलग से विस्तृत परिभाषा नहीं दी गई है।

  • महाभियोग की प्रक्रिया संसद के किसी भी सदन में शुरू हो सकती है।
  • प्रस्ताव लाने से पहले निर्धारित लिखित सूचना देना आवश्यक है।
  • संबंधित सदन में आरोप के लिए विशेष बहुमत आवश्यक है।
  • दूसरा सदन आरोप की जाँच करता है या जाँच करवाता है।
  • राष्ट्रपति को जाँच के दौरान उपस्थित होने और अपना पक्ष रखने का अधिकार है।
  • दूसरे सदन द्वारा निर्धारित विशेष बहुमत से आरोप सिद्ध किए जाने पर राष्ट्रपति पद से हट जाता है।

इस प्रक्रिया में प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। यह केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से अलग है।

राष्ट्रपति की कार्यपालिका शक्तियाँ

संघ की कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से की जाती है। राष्ट्रपति विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ करता है, लेकिन अनेक नियुक्तियों में मंत्रिपरिषद की सलाह और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया लागू होती है।

  • प्रधानमंत्री की नियुक्ति।
  • प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति।
  • भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति।
  • राज्यपालों की नियुक्ति।
  • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति।
  • संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति।
  • वित्त आयोग का गठन।
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, लागू संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार।

राष्ट्रपति की नियुक्ति संबंधी शक्तियों को व्यक्तिगत राजनीतिक विवेक के रूप में नहीं समझना चाहिए। सामान्यतः वे संसदीय शासन प्रणाली और संवैधानिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत प्रयोग की जाती हैं।

राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ

राष्ट्रपति संसद की विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण संवैधानिक अंग है। राष्ट्रपति की प्रमुख विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  • संसद के सत्र को आहूत करना।
  • संसद के सत्र का सत्रावसान करना।
  • संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार लोकसभा को भंग करना।
  • संसद के दोनों सदनों को संबोधित करना और संदेश भेजना।
  • विधेयकों पर स्वीकृति देना, रोकना या निर्धारित मामलों में पुनर्विचार के लिए लौटाना।
  • अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश जारी करना।

सामान्यतः संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है। कुछ विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा आवश्यक होती है।

राष्ट्रपति की वीटो शक्ति

संसद द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में राष्ट्रपति की स्वीकृति से जुड़ी शक्तियों को सामान्यतः वीटो शक्ति कहा जाता है। इनके माध्यम से राष्ट्रपति विधायी प्रक्रिया में अपनी संवैधानिक भूमिका निभाता है।

  • पूर्ण वीटो (Absolute Veto): राष्ट्रपति विधेयक पर स्वीकृति रोक देता है।
  • निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): राष्ट्रपति धन विधेयक के अतिरिक्त किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को लौटा सकता है।
  • जेबी वीटो (Pocket Veto): संविधान राष्ट्रपति के लिए प्रत्येक विधेयक पर स्वीकृति देने या रोकने की कोई सामान्य निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं करता। इस स्थिति को प्रचलित भाषा में जेबी वीटो कहा जाता है।

राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर सामान्य विधेयक की तरह वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता; संसद द्वारा विधिवत पारित संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देना आवश्यक है।

राष्ट्रपति की पुनर्विचार शक्ति

अनुच्छेद 111 के अनुसार राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस नहीं भेज सकता। हालांकि वह उस पर स्वीकृति रोक सकता है।

साधारण विधेयक के मामले में राष्ट्रपति विधेयक को संदेश सहित पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। यदि संसद विधेयक को संशोधनों सहित या बिना संशोधन के पुनः पारित कर देती है और उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करती है, तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति नहीं रोक सकता।

राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति

अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति प्राप्त है। जब संसद के दोनों सदन एक साथ सत्र में न हों और ऐसी परिस्थितियाँ हों जिनमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तब अध्यादेश जारी किया जा सकता है।

यदि संसद के दोनों सदन एक साथ सत्र में नहीं हैं, तो निर्धारित संवैधानिक परिस्थितियों में अध्यादेश जारी किया जा सकता है, भले ही एक सदन सत्र में हो और दूसरा सत्र में न हो।

  • अध्यादेश का प्रभाव संसद के कानून के समान होता है।
  • अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है।
  • संसद के पुनः समवेत होने के बाद छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने पर अध्यादेश समाप्त हो जाता है, यदि उससे पहले उसे समाप्त न कर दिया जाए।
  • दोनों सदन अलग-अलग तारीखों पर पुनः समवेत हों, तो छह सप्ताह की गणना बाद वाली तारीख से की जाती है।
  • संसद अध्यादेश को अस्वीकार कर सकती है।
  • अध्यादेश स्थायी कानून का विकल्प नहीं है और उसका प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।

अध्यादेश शक्ति राष्ट्रपति की औपचारिक संवैधानिक शक्ति है, जिसका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के आधार पर होता है। अध्यादेश न्यायिक समीक्षा के अधीन भी हो सकता है।

राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ

  • अनुच्छेद 112 के अंतर्गत वार्षिक वित्तीय विवरण संसद के समक्ष रखवाना।
  • धन विधेयक को प्रस्तुत करने के लिए पूर्व अनुशंसा देना।
  • निर्धारित वित्तीय विधेयकों और अनुदान संबंधी प्रक्रियाओं में संवैधानिक भूमिका निभाना।
  • अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग का गठन करना।
  • भारत की आकस्मिक निधि से संबंधित संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था में भूमिका निभाना।

राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ भी संसदीय नियंत्रण के अधीन हैं। सरकार सार्वजनिक धन का उपयोग संविधान और संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार करती है।

राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियाँ

अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को क्षमादान आदि की शक्ति प्राप्त है। इसका प्रयोग निर्धारित मामलों में दोषसिद्धि या दंड के संबंध में किया जा सकता है।

  • क्षमा (Pardon): दंड और दोषसिद्धि के कानूनी प्रभावों को समाप्त करने की शक्ति।
  • लघुकरण (Commutation): दंड के स्वरूप को हल्के दंड में बदलना।
  • परिहार (Remission): दंड का स्वरूप बदले बिना उसकी अवधि कम करना।
  • विराम (Respite): विशेष परिस्थितियों में कम दंड देना।
  • प्रविलंबन (Reprieve): दंड के क्रियान्वयन को कुछ समय के लिए टालना।

राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति सैन्य न्यायालयों के मामलों, उन अपराधों से संबंधित मामलों जिनमें संघ की कार्यपालिका शक्ति विस्तृत होती है, और मृत्युदंड के मामलों में संविधान के अनुसार लागू होती है।

यह शक्ति न्यायिक निर्णय को सामान्य अपील की तरह दोबारा सुनने के समान नहीं है। इसका प्रयोग संवैधानिक व्यवस्था के भीतर और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार किया जाता है।

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ

भारतीय संविधान में तीन प्रमुख प्रकार की आपातकालीन व्यवस्थाएँ दी गई हैं:

  • राष्ट्रीय आपातकाल — अनुच्छेद 352: युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में संवैधानिक शर्तों के अधीन।
  • राज्य में राष्ट्रपति शासन — अनुच्छेद 356: जब राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति उत्पन्न हो और संवैधानिक शर्तें पूरी हों।
  • वित्तीय आपातकाल — अनुच्छेद 360: जब भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा हो।

ये घोषणाएँ राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार की जाती हैं और संसद की निर्धारित स्वीकृति तथा अन्य संवैधानिक शर्तों के अधीन होती हैं।

राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन और वित्तीय आपातकाल के आधार, अवधि, प्रभाव तथा संसदीय अनुमोदन की प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से अलग हैं।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का संबंध

राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष है और प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक राजनीतिक प्रमुख है। अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है।

राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने का अनुरोध कर सकता है। यदि मंत्रिपरिषद पुनर्विचार के बाद वही सलाह देती है, तो राष्ट्रपति उस सलाह के अनुसार कार्य करता है।

प्रधानमंत्री का दायित्व अनुच्छेद 78 के अंतर्गत राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद के निर्णयों और प्रशासन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना तथा राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई जानकारी देना भी है।

राष्ट्रपति और संसद का संबंध

राष्ट्रपति और संसद भारतीय विधायी व्यवस्था के परस्पर जुड़े संवैधानिक घटक हैं। संसद कानून निर्माण करती है, जबकि राष्ट्रपति विधायी प्रक्रिया में निर्धारित संवैधानिक भूमिका निभाता है।

  • राष्ट्रपति संसद का अंग है, लेकिन किसी सदन का सदस्य नहीं।
  • राष्ट्रपति संसद के सत्र को आहूत कर सकता है और सत्रावसान कर सकता है।
  • राष्ट्रपति संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार लोकसभा को भंग कर सकता है।
  • संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं।
  • राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति संसद के सत्र में न होने की परिस्थितियों से जुड़ी है।

राष्ट्रपति कोई स्वतंत्र निरंकुश शासक नहीं है। उसकी शक्तियों का प्रयोग संविधान, मंत्रिपरिषद की सलाह और संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुरूप होता है।

संसद और राष्ट्रपति से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक अनुच्छेद

अनुच्छेद विषय
52 भारत के राष्ट्रपति का पद
53 संघ की कार्यपालिका शक्ति
54–55 राष्ट्रपति का निर्वाचन और निर्वाचन की पद्धति
56 राष्ट्रपति का कार्यकाल
58 राष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ
61 राष्ट्रपति पर महाभियोग
72 राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति
74–75 मंत्रिपरिषद और मंत्रियों से संबंधित प्रावधान
78 प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति के प्रति कर्तव्य
79 संसद की संरचना
80–81 राज्यसभा और लोकसभा की संरचना
83 संसद के सदनों की अवधि
85 संसद के सत्र
100 मतदान, रिक्तियों के बावजूद कार्यवाही और गणपूर्ति
105 संसदीय विशेषाधिकार
108 संसद की संयुक्त बैठक
109–110 धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया और परिभाषा
111 विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति
112 वार्षिक वित्तीय विवरण
117 वित्तीय विधेयकों के विशेष प्रावधान
123 राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति
249 राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद की विधायी शक्ति
280 वित्त आयोग
312 अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण से संबंधित प्रावधान
352 राष्ट्रीय आपातकाल
356 राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति
360 वित्तीय आपातकाल
368 संविधान संशोधन

राष्ट्रपति की शक्तियों की संवैधानिक सीमाएँ

राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियाँ व्यापक हैं, लेकिन भारत की संसदीय शासन प्रणाली में उनका प्रयोग संविधान और मंत्रिपरिषद की सलाह से नियंत्रित होता है।

भारत में राष्ट्रपति को अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह स्वतंत्र वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख नहीं माना जाता। भारत में कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी मंत्रिपरिषद के माध्यम से कार्य करती है।

फिर भी राष्ट्रपति का पद केवल औपचारिक नहीं है। संविधान द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में राष्ट्रपति को नियुक्तियों, विधेयकों पर पुनर्विचार और सरकार से जानकारी प्राप्त करने जैसे कार्यों में महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका निभानी होती है।

राष्ट्रपति की विवेकाधीन भूमिका

सामान्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है। कुछ असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों में राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

  • लोकसभा में स्पष्ट बहुमत न होने पर प्रधानमंत्री की नियुक्ति।
  • प्रधानमंत्री द्वारा बहुमत खोने पर सदन में बहुमत सिद्ध करने की आवश्यकता से संबंधित परिस्थितियाँ।
  • लोकसभा भंग करने की सलाह पर संवैधानिक परंपराओं के अनुरूप विचार।
  • साधारण विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना।
  • प्रधानमंत्री से प्रशासन और मंत्रिपरिषद के निर्णयों की जानकारी प्राप्त करना।

इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति का विवेक असीमित नहीं है। संविधान, संसदीय परंपराएँ, न्यायिक निर्णय और लोकतांत्रिक जवाबदेही उसकी भूमिका की सीमाएँ निर्धारित करते हैं।

संसदीय संप्रभुता और संवैधानिक सर्वोच्चता

भारत में संविधान सर्वोच्च है। संसद की विधायी शक्ति व्यापक होने के बावजूद वह संविधान के प्रावधानों के अधीन है।

संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय कर सकते हैं। यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकते हैं।

संविधान संशोधन की शक्ति भी मूल संरचना सिद्धांत से सीमित है। संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

संसदीय कार्यप्रणाली से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ

  • संसद की कार्यवाही में व्यवधान और उपलब्ध समय का नुकसान।
  • विधेयकों की पर्याप्त चर्चा और संसदीय समितियों द्वारा जाँच की आवश्यकता।
  • कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने में संसदीय साधनों की प्रभावशीलता।
  • दलीय अनुशासन और सांसदों की स्वतंत्र विचार-विमर्श भूमिका के बीच संतुलन।
  • धन विधेयक के वर्गीकरण और उसके दायरे को लेकर उठने वाले संवैधानिक प्रश्न।
  • बजट और सरकारी व्यय पर प्रभावी निगरानी।
  • संसद की कार्यवाही में शोध, विशेषज्ञता और साक्ष्य-आधारित चर्चा को बढ़ावा देना।

सुधार के लिए संसदीय समितियों को पर्याप्त समय देना, विधेयकों पर व्यापक चर्चा, शोध सहायता, वित्तीय निगरानी और संसदीय नियमों का प्रभावी पालन महत्वपूर्ण है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • अनुच्छेद 79 — संसद = राष्ट्रपति + राज्यसभा + लोकसभा।
  • राज्यसभा स्थायी सदन है; इसे भंग नहीं किया जा सकता।
  • राज्यसभा के प्रत्येक सदस्य का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष है।
  • लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष है।
  • अनुच्छेद 249 और 312 के अंतर्गत राज्यसभा विशेष भूमिका निभाती है।
  • मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
  • धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
  • धन विधेयक का प्रमाणन लोकसभा अध्यक्ष करता है।
  • धन विधेयक पर राज्यसभा को 14 दिन के भीतर सिफारिशों सहित विधेयक लौटाना होता है।
  • धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक नहीं होती।
  • राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं होता।
  • राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में निर्वाचित सांसद और निर्धारित विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।
  • राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष है; पुनर्निर्वाचन संभव है।
  • राष्ट्रपति पर महाभियोग अनुच्छेद 61 के अंतर्गत होता है।
  • राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति अनुच्छेद 72 में है।
  • मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह अनुच्छेद 74 में दी गई है।
  • संसदीय विशेषाधिकार अनुच्छेद 105 से संबंधित हैं।
  • संयुक्त बैठक अनुच्छेद 108 में है।
  • धन विधेयक की परिभाषा अनुच्छेद 110 में है।
  • वार्षिक वित्तीय विवरण अनुच्छेद 112 में है।
  • राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति अनुच्छेद 123 में है।
  • संविधान संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत होता है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

संसद और राष्ट्रपति भारतीय संसदीय लोकतंत्र के परस्पर जुड़े संवैधानिक संस्थान हैं। संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है, कानून बनाती है और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती है। राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में विधायी और कार्यपालिका प्रक्रियाओं में निर्धारित भूमिका निभाता है।

संसद की प्रभावशीलता केवल पारित कानूनों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। विधेयकों की गुणवत्ता, बहस की गहराई, समितियों की जाँच, सरकारी व्यय पर नियंत्रण और विपक्ष की प्रभावी भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानदंड हैं।

इसी प्रकार राष्ट्रपति की भूमिका समझने के लिए केवल उसकी शक्तियों की सूची याद करना पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रपति की वास्तविक संवैधानिक भूमिका को समझने के लिए अनुच्छेद 74, 75, 78, 111 और 123 तथा संसदीय शासन प्रणाली के सिद्धांतों को साथ पढ़ना चाहिए।

त्वरित पुनरावृत्ति

  • अनुच्छेद 79 — संसद की संरचना।
  • अनुच्छेद 80 — राज्यसभा।
  • अनुच्छेद 81 — लोकसभा।
  • अनुच्छेद 83 — सदनों की अवधि।
  • अनुच्छेद 85 — संसद के सत्र।
  • अनुच्छेद 105 — संसदीय विशेषाधिकार।
  • अनुच्छेद 108 — संयुक्त बैठक।
  • अनुच्छेद 110 — धन विधेयक।
  • अनुच्छेद 111 — विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति।
  • अनुच्छेद 112 — वार्षिक वित्तीय विवरण।
  • अनुच्छेद 117 — वित्तीय विधेयक।
  • अनुच्छेद 123 — राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति।
  • अनुच्छेद 52–53 — राष्ट्रपति का पद और संघ की कार्यपालिका शक्ति।
  • अनुच्छेद 54–55 — राष्ट्रपति का निर्वाचन।
  • अनुच्छेद 61 — राष्ट्रपति पर महाभियोग।
  • अनुच्छेद 72 — राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति।
  • अनुच्छेद 74 — राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने वाली मंत्रिपरिषद।
  • अनुच्छेद 249 — राज्य सूची पर संसद की विशेष विधायी शक्ति।
  • अनुच्छेद 352, 356 और 360 — तीन प्रकार की आपातकालीन व्यवस्थाएँ।
  • अनुच्छेद 368 — संविधान संशोधन।