भारत में प्रधानमंत्री संसदीय शासन व्यवस्था के अंतर्गत संघ की वास्तविक कार्यपालिका का प्रमुख तथा मंत्रिपरिषद का नेता होता है। संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देती है।
राष्ट्रपति राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जबकि शासन की नीतियों का निर्माण और उनका सामान्य प्रशासनिक संचालन प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के माध्यम से होता है। इस व्यवस्था में कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है।
महत्वपूर्ण अवधारणा: प्रधानमंत्री की शक्ति केवल संवैधानिक पद से नहीं, बल्कि लोकसभा में समर्थन, राजनीतिक दल के भीतर स्थिति, गठबंधन की प्रकृति और संवैधानिक संस्थाओं के साथ उसके संबंधों से भी प्रभावित होती है।
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद से संबंधित प्रमुख प्रावधान संविधान के भाग V में दिए गए हैं। इन अनुच्छेदों को उनके विषय के साथ याद रखना UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए उपयोगी है।
ध्यान दें: अनुच्छेद 74 और 75 प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की स्थिति समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं, जबकि अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री की राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेही को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 75(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। संविधान में प्रधानमंत्री के चयन की पूरी प्रक्रिया का विस्तृत उल्लेख नहीं है; संसदीय परंपराओं और लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने की क्षमता के आधार पर नियुक्ति की जाती है।
राष्ट्रपति की भूमिका मनमानी नहीं है। संसदीय शासन व्यवस्था में सरकार को लोकसभा का विश्वास प्राप्त होना आवश्यक है। बहुमत को लेकर विवाद होने पर सदन का परीक्षण राजनीतिक समर्थन निर्धारित करने का प्रमुख संवैधानिक माध्यम है।
प्रधानमंत्री संसद के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है। संविधान यह अनिवार्य नहीं करता कि प्रधानमंत्री केवल लोकसभा से ही चुना जाए।
यदि वह छह महीने के भीतर संसद का सदस्य नहीं बनता, तो वह मंत्री पद पर बना नहीं रह सकता। यह नियम केवल प्रधानमंत्री पर नहीं, बल्कि संसद का सदस्य न रहते हुए मंत्री नियुक्त किए गए व्यक्ति पर भी लागू होता है।
UPSC तथ्य: राज्यसभा का सदस्य प्रधानमंत्री बन सकता है, लेकिन मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व लोकसभा के प्रति ही होता है।
संविधान में प्रधानमंत्री के लिए अलग से विस्तृत योग्यता-सूची नहीं दी गई है। व्यवहार में प्रधानमंत्री को संसद के किसी सदन का सदस्य होना चाहिए अथवा नियुक्ति के छह महीने के भीतर सदस्य बनना चाहिए। संबंधित सदन की सदस्यता के लिए निर्धारित संवैधानिक योग्यताएँ लागू होती हैं।
भ्रम से बचें: प्रधानमंत्री बनने के लिए लोकसभा सदस्य होना अनिवार्य नहीं है। राज्यसभा सदस्य भी प्रधानमंत्री नियुक्त किया जा सकता है।
संविधान प्रधानमंत्री के लिए पाँच वर्ष का कोई निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं करता। प्रधानमंत्री पद पर तब तक बना रह सकता है, जब तक उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त है और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार उसका पद बना रहता है।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के संबंधों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री केवल राष्ट्रपति की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर नहीं होता; उसकी सरकार की संसदीय स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
अनुच्छेद 75(4) के अनुसार प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों को पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति पद तथा गोपनीयता की शपथ दिलाता है। शपथ का प्रारूप संविधान की तीसरी अनुसूची में दिया गया है।
मंत्रिपरिषद प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य करने वाला संवैधानिक निकाय है, जो राष्ट्रपति को शासन के संबंध में सहायता और सलाह देता है। संघ की संसदीय कार्यपालिका में प्रधानमंत्री और मंत्री इसी व्यवस्था के माध्यम से सरकारी नीतियों तथा प्रशासनिक निर्णयों को आगे बढ़ाते हैं।
अनुच्छेद 74(1) के अनुसार राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है। राष्ट्रपति एक बार मंत्रिपरिषद को अपनी सलाह पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है। पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करना राष्ट्रपति के लिए आवश्यक है।
मंत्रिपरिषद के सभी मंत्री समान स्तर के नहीं होते। प्रशासनिक जिम्मेदारियों, राजनीतिक महत्व और मंत्रिमंडलीय निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी के आधार पर उनके बीच व्यावहारिक अंतर होता है।
व्यवहार में मंत्रियों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में समझा जाता है। ये श्रेणियाँ प्रशासनिक व्यवस्था और कार्य-विभाजन को स्पष्ट करती हैं।
इन श्रेणियों का विस्तृत प्रशासनिक कार्य-विभाजन सरकारी नियमों और आवंटित जिम्मेदारियों के अनुसार होता है। प्रत्येक राज्य मंत्री को मंत्रिमंडल का सदस्य मानना सही नहीं है।
मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल एक-दूसरे से संबंधित हैं, लेकिन दोनों समान नहीं हैं। मंत्रिपरिषद व्यापक निकाय है, जबकि मंत्रिमंडल उसके भीतर प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों का अपेक्षाकृत छोटा समूह है।
| आधार | मंत्रिपरिषद | मंत्रिमंडल |
|---|---|---|
| स्वरूप | प्रधानमंत्री सहित सभी श्रेणियों के मंत्रियों का व्यापक समूह। | प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों का छोटा समूह। |
| संरचना | कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री तथा अन्य राज्य मंत्री शामिल हो सकते हैं। | मुख्यतः कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। |
| प्रमुख भूमिका | संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देना तथा सामूहिक उत्तरदायित्व निभाना। | प्रमुख नीतिगत निर्णयों और मंत्रिमंडलीय कार्यों का संचालन। |
| संवैधानिक उल्लेख | अनुच्छेद 74 और 75 में स्पष्ट प्रावधान। | अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपातकाल के संदर्भ में मंत्रिमंडल का विशेष उल्लेख। |
| आपातकाल संबंधी विशेष तथ्य | सामान्य संवैधानिक निकाय। | अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के लिए संघीय मंत्रिमंडल का निर्णय लिखित रूप में आवश्यक है। |
परीक्षा में ध्यान दें: अनुच्छेद 352 में प्रयुक्त “संघीय मंत्रिमंडल” से आशय प्रधानमंत्री और कैबिनेट स्तर के उन मंत्रियों से है, जो प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिमंडल का गठन करते हैं; यह पूरे मंत्रिपरिषद के समान व्यापक समूह नहीं है।
मंत्रिमंडल सरकार की प्रमुख नीतिगत निर्णय-प्रक्रिया का केंद्रीय मंच है। यह विभिन्न मंत्रालयों के प्रस्तावों पर विचार करता है और सरकार की नीतियों में समन्वय स्थापित करता है।
मंत्रिमंडल के निर्णय सरकार की सामूहिक नीति का हिस्सा होते हैं। इन निर्णयों को लागू करने की जिम्मेदारी संबंधित मंत्रालयों और प्रशासनिक संस्थाओं की होती है।
अनुच्छेद 75(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, जबकि अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है। इस प्रकार मंत्रिपरिषद के गठन में प्रधानमंत्री की केंद्रीय भूमिका होती है।
मंत्रालयों और विभागों का आवंटन सरकारी कार्य-संचालन से संबंधित नियमों के अनुसार किया जाता है। प्रधानमंत्री की सलाह और सरकार के निर्णयों के आधार पर विभागों में परिवर्तन भी किया जा सकता है।
91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा केंद्र और राज्यों में मंत्रिपरिषद के आकार पर संवैधानिक सीमा निर्धारित की गई।
UPSC तथ्य: केंद्र के लिए 15 प्रतिशत की सीमा लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या पर आधारित है, जबकि राज्यों में यह विधानसभा की कुल सदस्य संख्या पर आधारित है।
मंत्री संसद के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति मंत्री नियुक्त किए जाने के समय संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर संसद के किसी एक सदन का सदस्य बनना होगा।
यदि वह निर्धारित छह महीने की अवधि में सदस्य नहीं बनता, तो वह मंत्री पद पर बना नहीं रह सकता। छह महीने का यह प्रावधान किसी गैर-सदस्य को लगातार मंत्री बने रहने की अनुमति नहीं देता।
संबंधित प्रावधान: अनुच्छेद 75(5) संघीय मंत्रियों के लिए और अनुच्छेद 164(4) राज्य मंत्रियों के लिए यह व्यवस्था निर्धारित करता है।
प्रधानमंत्री की सभी शक्तियाँ किसी एक अनुच्छेद में सूचीबद्ध नहीं हैं। उसका पद अनुच्छेद 74, 75 और 78 सहित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों, संसदीय परंपराओं और राजनीतिक व्यवहार के संयुक्त प्रभाव से संचालित होता है।
अनुच्छेद 75(2) के अनुसार केंद्रीय मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं। संसदीय व्यवस्था में इसका व्यवहारिक संचालन प्रधानमंत्री की सलाह और मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा होता है।
यदि प्रधानमंत्री किसी मंत्री का समर्थन वापस लेता है या उससे त्यागपत्र देने के लिए कहता है, तो मंत्री के पद पर बने रहने की राजनीतिक संभावना प्रभावित होती है। मंत्री त्यागपत्र न दे, तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को उसे पद से हटाने की सलाह दे सकता है।
ध्यान दें: राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करने का अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रपति संसदीय परंपराओं से अलग होकर सामान्यतः अपनी व्यक्तिगत इच्छा से मंत्रियों को हटाता है।
अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री के कुछ विशेष कर्तव्य निर्धारित करता है। इनका उद्देश्य राष्ट्रपति को संघ की कार्यपालिका और विधायी गतिविधियों के बारे में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना है।
इस प्रकार प्रधानमंत्री केवल सरकार का राजनीतिक प्रमुख नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच सूचना तथा संवैधानिक समन्वय की महत्वपूर्ण कड़ी भी है।
अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ है कि मंत्रिपरिषद को एक संयुक्त इकाई के रूप में लोकसभा का विश्वास बनाए रखना होता है।
मुख्य बात: सामूहिक उत्तरदायित्व लोकसभा के प्रति है, राज्यसभा के प्रति नहीं। राज्यसभा सरकार के कार्यों की चर्चा और समीक्षा कर सकती है, लेकिन मंत्रिपरिषद का बने रहना लोकसभा के विश्वास पर निर्भर करता है।
अनुच्छेद 75(2) के अंतर्गत मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं। संसदीय शासन में प्रधानमंत्री की सलाह इस प्रावधान के व्यवहारिक प्रयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यदि कोई मंत्री अपने विभाग के संचालन में गंभीर समस्या उत्पन्न करता है या सरकार की सामूहिक नीति के विपरीत कार्य करता है, तो प्रधानमंत्री उससे त्यागपत्र मांग सकता है अथवा उसे पद से हटाने की सलाह दे सकता है।
सामूहिक उत्तरदायित्व पूरी मंत्रिपरिषद की जवाबदेही सुनिश्चित करता है, जबकि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व किसी मंत्री के विभागीय आचरण और जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करता है।
भारतीय संसदीय शासन में मंत्रिपरिषद की राजनीतिक वैधता लोकसभा के विश्वास पर निर्भर करती है। लोकसभा प्रश्नों, बहसों, प्रस्तावों और अन्य संसदीय साधनों के माध्यम से सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करती है।
यदि सरकार बहुमत खो देती है, तो प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ सकता है। वैकल्पिक सरकार बनने की संभावना हो तो राष्ट्रपति संवैधानिक परंपराओं के अनुरूप आगे की प्रक्रिया तय करता है। लोकसभा भंग करने का प्रश्न भी परिस्थितियों और संवैधानिक परंपराओं के अनुसार देखा जाता है; यह प्रधानमंत्री का असीमित व्यक्तिगत अधिकार नहीं है।
यदि प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं रहता, तो सरकार की स्थिरता प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर किया जा सकता है।
राष्ट्रपति की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि सरकार संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप चले। बहुमत का प्रश्न राजनीतिक दावों के बजाय सदन में परीक्षण से तय किया जाना अधिक उपयुक्त है।
प्रधानमंत्री सरकार और संसद के बीच प्रमुख राजनीतिक कड़ी है। संसदीय शासन में सरकार की नीतियों को प्रस्तुत करने, विधायी कार्यक्रम आगे बढ़ाने और सदन में जवाबदेही निभाने में प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
प्रधानमंत्री राज्यसभा का सदस्य होने पर भी लोकसभा के प्रति मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व की संवैधानिक व्यवस्था बनी रहती है।
केंद्र सरकार के कार्य व्यापक और जटिल होने के कारण मंत्रिमंडलीय समितियों का गठन किया जाता है। ये समितियाँ विशिष्ट विषयों पर विचार करती हैं, नीतिगत समन्वय में सहायता देती हैं और मंत्रिमंडल के कार्यभार को व्यवस्थित करती हैं।
मंत्रिमंडलीय समितियों का गठन, उनकी सदस्यता और कार्यक्षेत्र समय-समय पर बदल सकते हैं। इसलिए किसी समिति की वर्तमान संरचना या सदस्य संख्या से संबंधित प्रश्न में नवीनतम सरकारी जानकारी का संदर्भ महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का नेता होता है और उसकी बैठकों की अध्यक्षता करता है। वह विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करता है तथा सरकार की नीतियों में एकरूपता बनाए रखने का प्रयास करता है।
मंत्रिमंडल के निर्णय सामान्यतः सामूहिक विचार-विमर्श के माध्यम से लिए जाते हैं। प्रधानमंत्री की केंद्रीय भूमिका होने के बावजूद मंत्रिमंडलीय शासन का आधार सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया और उत्तरदायित्व है।
प्रधानमंत्री कार्यालय (Prime Minister's Office — PMO) प्रधानमंत्री को प्रशासनिक, नीतिगत और समन्वय संबंधी कार्यों में सहायता देने वाला संस्थागत तंत्र है।
UPSC तथ्य: PMO स्वयं संविधान द्वारा स्थापित संवैधानिक निकाय नहीं है। यह प्रधानमंत्री को सहायता देने वाली प्रशासनिक व्यवस्था है।
दोनों प्रशासनिक व्यवस्थाएँ सरकार के सुचारु संचालन में सहायता करती हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएँ और कार्यक्षेत्र समान नहीं हैं।
किचन कैबिनेट प्रधानमंत्री के निकट सहयोगियों का अनौपचारिक समूह होता है। इसमें कुछ मंत्री, राजनीतिक सहयोगी या अन्य विश्वसनीय व्यक्ति शामिल हो सकते हैं।
यह संविधान में वर्णित कोई औपचारिक संवैधानिक निकाय नहीं है। इसे मंत्रिपरिषद, मंत्रिमंडल या मंत्रिमंडलीय समितियों के समान नहीं माना जाना चाहिए।
इसका प्रभाव प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत कार्यशैली और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अनौपचारिक सलाह की उपयोगिता के साथ-साथ ऐसी व्यवस्था में औपचारिक जवाबदेही और पारदर्शिता से संबंधित प्रश्न भी उत्पन्न हो सकते हैं।
जब किसी एक दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता और कई दल मिलकर सरकार बनाते हैं, तब प्रधानमंत्री को सहयोगी दलों के साथ निरंतर राजनीतिक और नीतिगत समन्वय करना पड़ सकता है।
गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की प्रभावशीलता केवल औपचारिक संवैधानिक शक्तियों पर निर्भर नहीं करती; सहयोगी दलों के समर्थन और सरकार की समन्वय क्षमता का भी बड़ा महत्व होता है।
प्रधानमंत्री भारतीय शासन व्यवस्था में केंद्रीय स्थान रखता है, क्योंकि वह राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद, संसद और प्रशासन के बीच महत्वपूर्ण समन्वय स्थापित करता है।
फिर भी प्रधानमंत्री की शक्ति निरंकुश नहीं है। उसकी प्रभावशीलता लोकसभा में बहुमत, दल या गठबंधन के भीतर समर्थन, संवैधानिक सीमाओं, संसदीय नियंत्रण, न्यायिक समीक्षा और संघीय व्यवस्था से प्रभावित होती है।
स्पष्ट बहुमत वाली सरकार और गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्वतंत्रता का स्तर अलग हो सकता है। हालांकि दोनों ही स्थितियों में सरकार को संविधान के अनुरूप कार्य करना और लोकसभा के प्रति उत्तरदायी रहना होता है।
प्रधानमंत्री का पद शक्तिशाली है, लेकिन वह संविधान से ऊपर नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में अनेक संवैधानिक और राजनीतिक व्यवस्थाएँ कार्यपालिका को जवाबदेह बनाए रखती हैं।
| अनुच्छेद | विषय | परीक्षा के लिए महत्व |
|---|---|---|
| 74 | राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने वाली मंत्रिपरिषद | राष्ट्रपति की सलाह पर पुनर्विचार और पुनर्विचार के बाद सलाह की बाध्यकारी प्रकृति। |
| 75 | प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों से संबंधित प्रावधान | नियुक्ति, पदावधि, शपथ, सामूहिक उत्तरदायित्व, छह महीने का नियम और मंत्रियों की संख्या की सीमा। |
| 77 | भारत सरकार के कार्यों का संचालन | सरकारी कार्यों का औपचारिक संचालन और आदेशों का प्रमाणीकरण। |
| 78 | राष्ट्रपति के प्रति प्रधानमंत्री के कर्तव्य | निर्णयों की जानकारी देना, मांगी गई सूचना देना और आवश्यक विषय मंत्रिपरिषद के सामने रखना। |
| 88 | संसद में मंत्रियों के अधिकार | संसदीय कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार; केवल इस अनुच्छेद के आधार पर मतदान का अधिकार नहीं। |
| 352 | राष्ट्रीय आपातकाल | राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के लिए संघीय मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय आवश्यक। |
| 164 | राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद | राज्य स्तर पर नियुक्ति, सामूहिक उत्तरदायित्व और छह महीने की सदस्यता व्यवस्था। |
त्वरित पुनरावृत्ति: 74 = सलाह, 75 = मंत्री, 77 = सरकारी कार्य-संचालन, 78 = राष्ट्रपति के प्रति प्रधानमंत्री के कर्तव्य।
भारतीय संसदीय शासन में प्रधानमंत्री का पद राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासनिक समन्वय और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का केंद्र है। मजबूत नेतृत्व सरकार की नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने में सहायता कर सकता है, लेकिन अत्यधिक केंद्रीकरण से मंत्रिमंडलीय विचार-विमर्श और संस्थागत जवाबदेही प्रभावित होने की आशंका भी रहती है।
मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व संसदीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार केवल प्रशासनिक रूप से कार्य न करे, बल्कि निर्वाचित लोकसभा के प्रति जवाबदेह भी रहे। प्रभावी संसदीय बहस, पारदर्शिता, संसदीय समितियाँ और स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा इस जवाबदेही को मजबूत करने में योगदान देते हैं।
निष्कर्ष: प्रधानमंत्री का प्रभावी नेतृत्व और मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि संसदीय शासन के पूरक तत्व हैं। एक उत्तरदायी सरकार के लिए नेतृत्व, सामूहिक विचार-विमर्श और संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन आवश्यक है।
भारतीय संसदीय शासन प्रणाली में प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका का केंद्रीय नेतृत्वकर्ता है। वह मंत्रिपरिषद के गठन, नेतृत्व और समन्वय में प्रमुख भूमिका निभाता है तथा राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच महत्वपूर्ण संवैधानिक कड़ी के रूप में कार्य करता है।
दूसरी ओर, मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व लोकतांत्रिक जवाबदेही का आधार है। प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद को लोकसभा का विश्वास बनाए रखते हुए संविधान, संसदीय नियंत्रण, न्यायिक समीक्षा और संघीय व्यवस्था की सीमाओं के भीतर कार्य करना होता है।