Special Provisions

विशेष प्रावधान

विशेष प्रावधान का अर्थ और संवैधानिक उद्देश्य

भारतीय संविधान सामान्य शासन व्यवस्था के साथ कुछ राज्यों और क्षेत्रों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान भी करता है। इनका उद्देश्य ऐतिहासिक परिस्थितियों, जनजातीय पहचान, सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं, भौगोलिक कठिनाइयों और क्षेत्रीय विकास की असमानताओं को ध्यान में रखते हुए प्रशासन की उपयुक्त व्यवस्था करना है।

भारत में सभी राज्यों की संवैधानिक स्थिति समान होते हुए भी उनकी कुछ प्रशासनिक व्यवस्थाएँ अलग हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों में प्रथागत कानूनों और भूमि संबंधी परंपराओं को विशेष संरक्षण मिलता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में स्थानीय विकास, शिक्षा, रोजगार या स्वायत्त प्रशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

  • क्षेत्रीय विविधता और विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों को संवैधानिक मान्यता देना।
  • जनजातीय समुदायों की भूमि, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण में सहायता करना।
  • क्षेत्रीय विकास में असमानताओं को कम करने के लिए विशेष व्यवस्था करना।
  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी और स्वशासन को बढ़ावा देना।
  • राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच संवैधानिक संतुलन स्थापित करना।

संविधान का भाग XXI और विशेष राज्य प्रावधान

संविधान के भाग XXI का शीर्षक अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान (Temporary, Transitional and Special Provisions) है। अनुच्छेद 371 से 371J तक विभिन्न राज्यों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ दी गई हैं।

इन सभी अनुच्छेदों का उद्देश्य एक जैसा नहीं है। कुछ प्रावधान राज्यपाल की विशेष जिम्मेदारियों से संबंधित हैं, कुछ सांस्कृतिक और प्रथागत अधिकारों की रक्षा करते हैं तथा कुछ शिक्षा, रोजगार और क्षेत्रीय विकास पर केंद्रित हैं।

ध्यान दें कि भाग XXI में अनुच्छेद 370 और 371 से संबंधित प्रावधान भी आते हैं, लेकिन अनुच्छेद 370 की वर्तमान संवैधानिक स्थिति और अनुच्छेद 371 से 371J की विशेष राज्य व्यवस्थाओं को एक ही विषय मानना सही नहीं होगा।

अनुच्छेद 371 से 371J : राज्यों के विशेष प्रावधान

UPSC के लिए इन अनुच्छेदों को केवल क्रम से याद करना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक अनुच्छेद का संबंधित राज्य और उसका मुख्य उद्देश्य भी समझना चाहिए।

अनुच्छेद संबंधित राज्य मुख्य संवैधानिक प्रावधान
371 महाराष्ट्र और गुजरात निर्दिष्ट क्षेत्रों के विकास, विकास निधियों के वितरण तथा शिक्षा और रोजगार के अवसरों से संबंधित विशेष जिम्मेदारियाँ।
371A नागालैंड नागा धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत कानून तथा भूमि और संसाधनों से संबंधित संरक्षण।
371B असम असम विधानसभा में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के सदस्यों की समिति से संबंधित व्यवस्था।
371C मणिपुर पहाड़ी क्षेत्रों की समिति और उनके प्रशासन के संबंध में विशेष व्यवस्था।
371D आंध्र प्रदेश और तेलंगाना स्थानीय अवसरों, शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार से संबंधित विशेष व्यवस्थाएँ।
371E आंध्र प्रदेश संसद को केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए कानून बनाने की शक्ति।
371F सिक्किम सिक्किम के भारत में एकीकरण के बाद उसकी विशिष्ट परिस्थितियों से संबंधित प्रावधान।
371G मिजोरम मिजो धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत कानून तथा भूमि संबंधी संरक्षण।
371H अरुणाचल प्रदेश राज्यपाल की कानून-व्यवस्था संबंधी विशेष जिम्मेदारी और विधानसभा की न्यूनतम सदस्य संख्या।
371I गोवा गोवा विधानसभा की न्यूनतम सदस्य संख्या से संबंधित प्रावधान।
371J कर्नाटक कल्याण कर्नाटक क्षेत्र के विकास, शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार से संबंधित विशेष व्यवस्थाएँ।

परीक्षा उपयोगिता: अनुच्छेद 371A और 371G को सांस्कृतिक एवं प्रथागत संरक्षण से, 371D और 371J को स्थानीय अवसरों से तथा 371B और 371C को क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और प्रशासन से जोड़कर याद करें।

अनुच्छेद 371 — महाराष्ट्र और गुजरात

अनुच्छेद 371 महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ क्षेत्रों के संतुलित विकास से संबंधित विशेष व्यवस्था प्रदान करता है। इसके अंतर्गत राष्ट्रपति राज्यपाल को कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ सौंप सकते हैं।

महाराष्ट्र में विदर्भ, मराठवाड़ा और शेष महाराष्ट्र तथा गुजरात में सौराष्ट्र, कच्छ और शेष गुजरात से संबंधित विकास संबंधी व्यवस्थाएँ इस प्रावधान के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।

  • क्षेत्रीय विकास के लिए विकास बोर्डों की व्यवस्था।
  • विकास व्यय के लिए निधियों का न्यायसंगत वितरण।
  • तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण की पर्याप्त सुविधाओं पर ध्यान।
  • राज्य सेवाओं में विभिन्न क्षेत्रों के लिए रोजगार के अवसरों पर ध्यान।

इस अनुच्छेद का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय असंतुलन कम करना है। इसे नागालैंड या मिजोरम की तरह प्रथागत कानूनों के संरक्षण वाला प्रावधान नहीं समझना चाहिए।

अनुच्छेद 371A — नागालैंड

अनुच्छेद 371A नागालैंड की विशिष्ट सामाजिक, धार्मिक और प्रथागत व्यवस्थाओं को संवैधानिक संरक्षण देता है।

संसद का कोई कानून निम्नलिखित विषयों से संबंधित होने पर नागालैंड में तब तक लागू नहीं होता, जब तक नागालैंड विधानसभा ऐसा करने का निर्णय न करे:

  • नागाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ।
  • नागा प्रथागत कानून और प्रक्रियाएँ।
  • प्रथागत कानून के अनुसार नागरिक और आपराधिक न्याय का प्रशासन।
  • भूमि और उसके संसाधनों का स्वामित्व तथा हस्तांतरण।

यह संरक्षण प्रत्येक विषय पर लागू होने वाला सामान्य अपवाद नहीं है। यह अनुच्छेद में निर्दिष्ट विषयों और उसकी संवैधानिक शर्तों के अधीन है।

अनुच्छेद 371A के अंतर्गत राज्यपाल को कानून-व्यवस्था के संबंध में विशेष जिम्मेदारी भी दी गई है। इस जिम्मेदारी के निर्वहन में राज्यपाल राष्ट्रपति के निर्देशों के अधीन कार्य करते हैं; अनुच्छेद में दी गई शर्तों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

अनुच्छेद 371B — असम

अनुच्छेद 371B राष्ट्रपति को आदेश द्वारा असम विधानसभा में एक विशेष समिति के गठन का प्रावधान करने की शक्ति देता है। इस समिति में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों से निर्वाचित विधानसभा सदस्य शामिल हो सकते हैं।

समिति की संरचना और कार्य राष्ट्रपति के आदेश में निर्धारित किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित मामलों को विधानसभा की कार्यवाही में विशेष रूप से उठाने का अवसर प्रदान करना है।

इसे छठी अनुसूची के अंतर्गत बनने वाली स्वायत्त जिला परिषदों के समान संस्था नहीं समझना चाहिए। दोनों की संवैधानिक प्रकृति अलग है।

अनुच्छेद 371C — मणिपुर

अनुच्छेद 371C मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों से संबंधित विशेष संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करता है।

  • राष्ट्रपति के आदेश द्वारा विधानसभा की पहाड़ी क्षेत्रों संबंधी समिति की व्यवस्था की जा सकती है।
  • समिति में पहाड़ी क्षेत्रों से निर्वाचित विधानसभा सदस्य शामिल होते हैं।
  • राज्यपाल पहाड़ी क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को रिपोर्ट देते हैं।
  • राष्ट्रपति राज्यपाल को आवश्यक निर्देश दे सकते हैं।

इस अनुच्छेद का उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों की विशिष्ट प्रशासनिक आवश्यकताओं को संवैधानिक व्यवस्था में स्थान देना है। इसे पूरे मणिपुर में लागू सामान्य प्रशासनिक नियमों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

अनुच्छेद 371D — आंध्र प्रदेश और तेलंगाना

अनुच्छेद 371D का संबंध स्थानीय अवसरों में संतुलन स्थापित करने से है। इसके अंतर्गत राष्ट्रपति शिक्षा और राज्य सरकार के अधीन सार्वजनिक रोजगार के कुछ मामलों में स्थानीय क्षेत्रों तथा स्थानीय उम्मीदवारों के संबंध में विशेष आदेश जारी कर सकते हैं।

  • निर्दिष्ट शैक्षणिक संस्थानों में स्थानीय अवसरों की व्यवस्था।
  • राज्य सेवाओं के कुछ पदों के लिए स्थानीय उम्मीदवारों से संबंधित प्रावधान।
  • स्थानीय क्षेत्रों के आधार पर सेवाओं के संगठन की व्यवस्था।
  • निर्दिष्ट सेवा विवादों के निपटारे के लिए प्रशासनिक अधिकरण की व्यवस्था का संवैधानिक आधार।

यह प्रावधान क्षेत्रीय असंतुलन और अवसरों के वितरण से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए बनाया गया था। इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को संबंधित संवैधानिक आदेशों और लागू कानूनी व्यवस्था के साथ समझना चाहिए।

अनुच्छेद 371E — आंध्र प्रदेश

अनुच्छेद 371E संसद को कानून द्वारा आंध्र प्रदेश राज्य में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रावधान करने की शक्ति देता है।

यह अनुच्छेद अन्य कई विशेष राज्य प्रावधानों से अलग है, क्योंकि इसका मुख्य विषय विश्वविद्यालय की स्थापना से संबंधित है। इसे अपने आप में स्थानीय रोजगार या सांस्कृतिक संरक्षण का प्रावधान नहीं मानना चाहिए।

अनुच्छेद 371F — सिक्किम

सिक्किम के भारत में एकीकरण के बाद संविधान में अनुच्छेद 371F जोड़ा गया। यह सिक्किम की विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों और भारत की संवैधानिक व्यवस्था में उसके एकीकरण से संबंधित है।

  • सिक्किम विधानसभा के संबंध में विशेष संवैधानिक व्यवस्था।
  • विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिनिधित्व संबंधी व्यवस्था।
  • एकीकरण के समय मौजूद कानूनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से संबंधित प्रावधान।
  • राज्यपाल की विशेष जिम्मेदारियों से संबंधित व्यवस्था।

अनुच्छेद 371F का अध्ययन करते समय यह समझना जरूरी है कि यह केवल विकास-संबंधी प्रावधान नहीं है, बल्कि सिक्किम के संवैधानिक एकीकरण और उसकी विशिष्ट परिस्थितियों से भी जुड़ा है।

अनुच्छेद 371G — मिजोरम

अनुच्छेद 371G मिजो समाज की धार्मिक, सामाजिक और प्रथागत व्यवस्थाओं तथा भूमि संबंधी अधिकारों को विशेष संरक्षण देता है।

संसद का कोई कानून निम्नलिखित विषयों से संबंधित होने पर मिजोरम में स्वतः लागू नहीं होता, जब तक विधानसभा ऐसा करने का निर्णय न करे:

  • मिजो लोगों की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ।
  • मिजो प्रथागत कानून और प्रक्रियाएँ।
  • प्रथागत कानून के आधार पर नागरिक और आपराधिक न्याय का प्रशासन।
  • भूमि के स्वामित्व और हस्तांतरण से संबंधित विषय।

अनुच्छेद 371G के अंतर्गत मिजोरम विधानसभा में कम-से-कम 40 सदस्य होने का प्रावधान है।

तुलना: अनुच्छेद 371A नागालैंड और अनुच्छेद 371G मिजोरम से संबंधित हैं। दोनों में निर्दिष्ट प्रथागत विषयों का संरक्षण है, लेकिन इन्हें एक ही अनुच्छेद नहीं समझना चाहिए।

अनुच्छेद 371H — अरुणाचल प्रदेश

अनुच्छेद 371H अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल को कानून-व्यवस्था के संबंध में विशेष जिम्मेदारी प्रदान करता है। इस जिम्मेदारी का निर्वहन राष्ट्रपति के निर्देशों के अधीन किया जाता है।

अन्य मामलों में राज्यपाल सामान्य संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करते हैं, जहाँ संविधान विशेष विवेकाधिकार प्रदान नहीं करता।

इस अनुच्छेद के अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में कम-से-कम 30 सदस्य होने का प्रावधान है।

अनुच्छेद 371I — गोवा

अनुच्छेद 371I गोवा विधानसभा की न्यूनतम सदस्य संख्या से संबंधित है। इसके अंतर्गत विधानसभा में कम-से-कम 30 सदस्य होने का प्रावधान है।

UPSC के लिए यह याद रखना उपयोगी है कि गोवा के संबंध में इस अनुच्छेद का दायरा अन्य कुछ राज्यों के विस्तृत सांस्कृतिक या प्रशासनिक विशेष प्रावधानों की तुलना में सीमित है।

अनुच्छेद 371J — कर्नाटक का कल्याण कर्नाटक क्षेत्र

अनुच्छेद 371J कर्नाटक के पूर्ववर्ती हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र, जिसे अब सामान्यतः कल्याण कर्नाटक कहा जाता है, के विकास और अवसरों से संबंधित विशेष व्यवस्था करता है।

  • क्षेत्र के लिए विकास बोर्ड की स्थापना की व्यवस्था।
  • विकास व्यय के लिए निधियों के न्यायसंगत वितरण पर ध्यान।
  • शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण में क्षेत्र के लोगों के लिए अवसर।
  • राज्य सरकार की सेवाओं में स्थानीय क्षेत्र से संबंधित अवसरों की व्यवस्था।

इसका उद्देश्य क्षेत्रीय विकास की असमानता को कम करना और शिक्षा तथा सार्वजनिक रोजगार में अवसरों के वितरण को अधिक संतुलित बनाना है।

विशेष प्रावधानों की प्रकृति में अंतर

सभी अनुच्छेद 371 से 371J एक ही प्रकार की स्वायत्तता नहीं देते। कुछ में राज्यपाल की विशेष जिम्मेदारियाँ हैं, कुछ में विधानसभा की समितियाँ या स्थानीय अवसरों की व्यवस्था है और कुछ में प्रथागत कानूनों का संरक्षण है।

  • सांस्कृतिक एवं प्रथागत संरक्षण: नागालैंड और मिजोरम के अनुच्छेद 371A तथा 371G।
  • क्षेत्रीय विकास: महाराष्ट्र-गुजरात के लिए अनुच्छेद 371 तथा कर्नाटक के लिए 371J।
  • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और प्रशासन: असम के लिए 371B तथा मणिपुर के लिए 371C।
  • शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार के अवसर: अनुच्छेद 371D।
  • विशिष्ट प्रशासनिक जिम्मेदारी: नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के संबंधित प्रावधान।

अनुच्छेद 244 और पाँचवीं-छठी अनुसूची

अनुच्छेद 244 अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है। इसके साथ पाँचवीं और छठी अनुसूची को पढ़ना आवश्यक है।

  • अनुच्छेद 244(1): पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन से संबंधित।
  • अनुच्छेद 244(2): छठी अनुसूची के अंतर्गत निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित।
  • अनुच्छेद 275(1): राज्यों को अनुदान से संबंधित प्रावधान, जिसमें अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के स्तर को बढ़ाने के लिए अनुदान भी शामिल हैं।

पाँचवीं और छठी अनुसूची दोनों जनजातीय हितों की रक्षा से जुड़ी हैं, लेकिन उनकी संस्थागत व्यवस्था और प्रशासनिक शक्तियाँ अलग-अलग हैं।

पाँचवीं अनुसूची

पाँचवीं अनुसूची संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन तथा नियंत्रण से संबंधित है। यह मुख्यतः उन राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होती है जो छठी अनुसूची के अंतर्गत निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में शामिल नहीं हैं।

पाँचवीं अनुसूची का उद्देश्य जनजातीय समुदायों की भूमि, सामाजिक हितों और विकास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रशासनिक संरक्षण प्रदान करना है।

  • राज्यपाल की विशेष प्रशासनिक भूमिका।
  • जनजातीय सलाहकार परिषद की व्यवस्था।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में कुछ कानूनों के अनुप्रयोग में विशेष व्यवस्था।
  • शांति और सुशासन के लिए विनियम बनाने की संवैधानिक व्यवस्था।

अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Areas)

अनुसूचित क्षेत्र वे क्षेत्र हैं जिन्हें संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत विशेष प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अधिसूचित किया जाता है। इन क्षेत्रों का निर्धारण केवल जनजातीय आबादी के प्रतिशत के आधार पर स्वतः नहीं हो जाता; संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार अधिसूचना आवश्यक है।

पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकते हैं तथा निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार उसकी सीमा में परिवर्तन, क्षेत्रफल बढ़ाने या घटाने और अधिसूचना वापस लेने से संबंधित निर्णय कर सकते हैं।

परीक्षा में ध्यान दें: अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति एक ही अवधारणा नहीं हैं। अनुसूचित जनजाति एक संवैधानिक श्रेणी है, जबकि अनुसूचित क्षेत्र एक भौगोलिक क्षेत्र है जिसे विशेष प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अधिसूचित किया गया है।

पाँचवीं अनुसूची में राज्यपाल की भूमिका

  • राज्यपाल राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट देते हैं या राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई जानकारी उपलब्ध कराते हैं।
  • राष्ट्रपति राज्यपाल से किसी भी समय अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन संबंधी रिपोर्ट माँग सकते हैं।
  • राज्यपाल अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकते हैं कि संसद या राज्य विधानमंडल का कोई कानून किसी अनुसूचित क्षेत्र में लागू नहीं होगा अथवा निर्दिष्ट अपवादों और संशोधनों के साथ लागू होगा।
  • राज्यपाल शांति और सुशासन के लिए विनियम बना सकते हैं।
  • भूमि हस्तांतरण, जनजातीय भूमि के आवंटन और साहूकारी से संबंधित विषय ऐसे विनियमों में शामिल किए जा सकते हैं।

पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा बनाए गए विनियमों के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य जनजातीय हितों के संरक्षण और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संवैधानिक संतुलन स्थापित करना है।

जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council)

पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय सलाहकार परिषद की व्यवस्था अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और उन्नति से जुड़े विषयों पर सलाह देने के लिए की गई है।

  • जहाँ पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र हैं, वहाँ परिषद की स्थापना का प्रावधान है।
  • परिषद में अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं।
  • जहाँ राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधि उपलब्ध हैं, वहाँ सामान्यतः परिषद के लगभग तीन-चौथाई सदस्य विधानसभा के अनुसूचित जनजाति प्रतिनिधियों में से होते हैं।
  • परिषद का मुख्य कार्य जनजातीय कल्याण और उन्नति से संबंधित विषयों पर सलाह देना है।

जिन राज्यों में अनुसूचित जनजातियाँ हैं, लेकिन अनुसूचित क्षेत्र नहीं हैं, वहाँ भी राष्ट्रपति के निर्देश पर जनजातीय सलाहकार परिषद की स्थापना की जा सकती है, यदि संवैधानिक शर्तें पूरी होती हों।

महत्वपूर्ण अंतर: जनजातीय सलाहकार परिषद मुख्यतः सलाहकार संस्था है। इसके विपरीत, छठी अनुसूची की स्वायत्त जिला परिषदों को निर्दिष्ट विषयों पर विधायी और अन्य प्रशासनिक शक्तियाँ प्राप्त हैं।

छठी अनुसूची

छठी अनुसूची संविधान के अनुच्छेद 244(2) और 275(1) से संबंधित है। यह पूर्वोत्तर भारत के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त प्रशासन की विशेष व्यवस्था प्रदान करती है।

छठी अनुसूची निम्नलिखित चार राज्यों के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है:

  • असम
  • मेघालय
  • त्रिपुरा
  • मिजोरम

इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों की पारंपरिक संस्थाओं और स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्वायत्त प्रशासन की व्यवस्था करना है। यह इन चार राज्यों के प्रत्येक क्षेत्र पर समान रूप से लागू नहीं होती; इसका प्रयोग अनुसूची में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के लिए होता है।

स्वायत्त जिला परिषद और क्षेत्रीय परिषद

छठी अनुसूची के अंतर्गत निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदें (Autonomous District Councils) और आवश्यकतानुसार क्षेत्रीय परिषदें (Regional Councils) गठित की जा सकती हैं।

इन परिषदों को अनुसूची में निर्दिष्ट विषयों पर स्थानीय विधायी, प्रशासनिक, न्यायिक और वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। ये शक्तियाँ असीमित नहीं हैं; इनका प्रयोग छठी अनुसूची और लागू संवैधानिक प्रावधानों के अधीन होता है।

  • भूमि के उपयोग और आवंटन से संबंधित कुछ विषयों का विनियमन।
  • गैर-संरक्षित वनों और स्थानीय संसाधनों से संबंधित निर्दिष्ट विषय।
  • झूम खेती से संबंधित विनियमन।
  • ग्राम और स्थानीय परिषदों के गठन से संबंधित व्यवस्था।
  • विवाह, तलाक और सामाजिक प्रथाओं से संबंधित निर्दिष्ट विषय।
  • उत्तराधिकार और प्रथागत कानून से संबंधित विषय।
  • निर्धारित सीमाओं के भीतर कुछ कर और शुल्क लगाने की शक्ति।
  • निर्दिष्ट मामलों में पारंपरिक विवादों के निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था।

स्वायत्त जिला परिषद की संरचना

छठी अनुसूची के अंतर्गत सामान्य व्यवस्था में स्वायत्त जिला परिषद में अधिकतम 30 सदस्य हो सकते हैं। इनमें सामान्यतः अधिकतम चार सदस्यों को राज्यपाल नामित कर सकते हैं और शेष सदस्य निर्वाचन के माध्यम से चुने जाते हैं। विशिष्ट क्षेत्रों और संवैधानिक संशोधनों के कारण लागू व्यवस्था की जाँच संबंधित प्रावधानों के अनुसार की जानी चाहिए।

सामान्यतः परिषद का कार्यकाल पाँच वर्ष होता है। परिषद की शक्तियाँ और संरचना पाँचवीं अनुसूची की जनजातीय सलाहकार परिषद से अलग हैं।

परिषदों के अधिकारों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वे राज्य या संसद के समान सार्वभौम विधायिका नहीं हैं। उनकी शक्तियाँ संविधान और छठी अनुसूची द्वारा निर्धारित विषयों तक सीमित रहती हैं।

पाँचवीं और छठी अनुसूची में अंतर

आधार पाँचवीं अनुसूची छठी अनुसूची
संवैधानिक आधार अनुच्छेद 244(1) अनुच्छेद 244(2) और 275(1)
मुख्य क्षेत्र छठी अनुसूची के निर्दिष्ट क्षेत्रों से बाहर के अनुसूचित क्षेत्र असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्र
प्रमुख संस्था जनजातीय सलाहकार परिषद स्वायत्त जिला परिषद और क्षेत्रीय परिषद
संस्था की प्रकृति जनजातीय हितों पर सलाह देने वाली परिषद निर्दिष्ट विषयों पर विधायी और प्रशासनिक शक्तियों वाली परिषदें
राज्यपाल की भूमिका अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन में महत्वपूर्ण विशेष भूमिका राज्य और संबंधित परिषदों की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार भूमिका
मुख्य उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय हितों का संरक्षण निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त प्रशासन

याद रखने का तरीका: पाँचवीं अनुसूची में राज्यपाल और जनजातीय सलाहकार परिषद की भूमिका प्रमुख है; छठी अनुसूची में स्वायत्त जिला तथा क्षेत्रीय परिषदें केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।

अनुच्छेद 275(1) और जनजातीय क्षेत्रों का विकास

अनुच्छेद 275(1) राज्यों को केंद्र से अनुदान देने की संवैधानिक व्यवस्था से संबंधित है। इसमें अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के स्तर को बढ़ाने के लिए विशेष अनुदान देने का प्रावधान भी शामिल है।

इन अनुदानों का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों में प्रशासन, कल्याण और विकास से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करना भी है।

UPSC के लिए अनुच्छेद 244, पाँचवीं अनुसूची, छठी अनुसूची और अनुच्छेद 275(1) के संबंध को एक साथ समझना उपयोगी है।

PESA अधिनियम, 1996

PESA का पूरा नाम Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 है। हिंदी में इसे अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों के विस्तार से संबंधित अधिनियम कहा जाता है।

संविधान के भाग IX में पंचायतों की व्यवस्था है। PESA अधिनियम ने पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत संबंधी प्रावधानों का विस्तार करते हुए ग्राम सभा और स्थानीय समुदायों की भूमिका को विशेष महत्व दिया।

  • ग्राम सभा को स्थानीय परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • स्थानीय विकास योजनाओं और कार्यक्रमों में भागीदारी।
  • लाभार्थियों की पहचान और विकास कार्यक्रमों की निगरानी में निर्धारित भूमिका।
  • भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास से संबंधित मामलों में लागू कानून के अनुसार परामर्श और अन्य अधिकार।
  • लघु वनोपज, स्थानीय संसाधनों तथा परंपरागत संस्थाओं से संबंधित विषयों में ग्राम सभा और पंचायतों की भूमिका।
  • साहूकारी, स्थानीय बाजार और सामाजिक प्रथाओं से संबंधित निर्दिष्ट विषयों में स्थानीय स्वशासन को महत्व।

PESA के प्रावधानों को राज्य के कानूनों और उनके कार्यान्वयन के संदर्भ में पढ़ना चाहिए। सभी राज्यों में इसके क्रियान्वयन की स्थिति एक जैसी नहीं है।

महत्वपूर्ण अंतर: PESA संसद द्वारा बनाया गया अधिनियम है, संविधान का अनुच्छेद नहीं। यह पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित है; इसे छठी अनुसूची की स्वायत्त जिला परिषदों के समान व्यवस्था नहीं समझना चाहिए।

विशेष प्रावधान और असममित संघवाद

भारतीय संघवाद को समझने के लिए असममित संघवाद (Asymmetrical Federalism) एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसका अर्थ है कि सभी राज्यों और क्षेत्रों के लिए संवैधानिक व्यवस्थाएँ हर विषय में बिल्कुल एक जैसी होना आवश्यक नहीं है।

कुछ क्षेत्रों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, जनजातीय या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संविधान विशेष व्यवस्थाएँ प्रदान करता है। इसका उद्देश्य देश की संवैधानिक एकता को बनाए रखते हुए क्षेत्रीय विविधता और स्थानीय आकांक्षाओं को स्थान देना है।

असममित संघवाद का अर्थ अलग संप्रभुता या संविधान से बाहर की स्थिति नहीं है। विशेष प्रावधान स्वयं भारतीय संविधान का हिस्सा हैं और उन्हीं के अधीन लागू होते हैं।

विशेष प्रावधानों का महत्व

  • राष्ट्रीय एकता: क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय आकांक्षाओं को संवैधानिक स्थान देकर संघ के साथ जुड़ाव मजबूत करने में सहायता।
  • सांस्कृतिक संरक्षण: निर्दिष्ट धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं और प्रथागत कानूनों को संरक्षण।
  • क्षेत्रीय विकास: शिक्षा, रोजगार और विकास निधियों में क्षेत्रीय असंतुलन कम करने का प्रयास।
  • जनजातीय अधिकार: भूमि, परंपराओं और स्थानीय संस्थाओं से जुड़े हितों की रक्षा।
  • लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण: स्थानीय समुदायों की भागीदारी और स्वशासन को प्रोत्साहन।
  • प्रशासनिक लचीलापन: विविध परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग संवैधानिक व्यवस्थाओं की अनुमति।

विशेष प्रावधानों से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ

  • क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन बनाना।
  • प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और स्थानीय समुदायों के अधिकारों में संतुलन।
  • औपचारिक प्रशासन और पारंपरिक संस्थाओं के बीच समन्वय।
  • विकास योजनाओं का वास्तविक लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुँचाना।
  • स्वायत्त परिषदों और स्थानीय संस्थाओं की वित्तीय एवं प्रशासनिक क्षमता बढ़ाना।
  • ग्राम सभा और जनजातीय समुदायों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • संवैधानिक प्रावधानों और उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच अंतर कम करना।

मुख्य परीक्षा में यह तर्क उपयोगी है कि विशेष प्रावधान तभी प्रभावी होते हैं जब संवैधानिक संरक्षण के साथ पर्याप्त संसाधन, जवाबदेही, स्थानीय भागीदारी और प्रभावी प्रशासन भी उपलब्ध हों।

UPSC के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

  • अनुच्छेद 371 — महाराष्ट्र और गुजरात।
  • अनुच्छेद 371A — नागालैंड।
  • अनुच्छेद 371B — असम।
  • अनुच्छेद 371C — मणिपुर।
  • अनुच्छेद 371D — आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से संबंधित विशेष व्यवस्थाएँ।
  • अनुच्छेद 371E — आंध्र प्रदेश में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए संसद की कानून बनाने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 371F — सिक्किम।
  • अनुच्छेद 371G — मिजोरम।
  • अनुच्छेद 371H — अरुणाचल प्रदेश।
  • अनुच्छेद 371I — गोवा।
  • अनुच्छेद 371J — कर्नाटक का कल्याण कर्नाटक क्षेत्र।
  • अनुच्छेद 244(1) — पाँचवीं अनुसूची।
  • अनुच्छेद 244(2) — छठी अनुसूची।
  • अनुच्छेद 275(1) — राज्यों को अनुदान और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के स्तर को बढ़ाने के लिए अनुदान का प्रावधान।
  • पाँचवीं अनुसूची — अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन और जनजातीय सलाहकार परिषद।
  • छठी अनुसूची — चार राज्यों के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला और क्षेत्रीय परिषदें।
  • PESA अधिनियम, 1996 — पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत व्यवस्था का विस्तार।

सामान्य भ्रम और सही तथ्य

भ्रम 1: अनुच्छेद 371 से 371J तक सभी राज्यों को एक जैसी विशेष शक्तियाँ देते हैं।
सही तथ्य: प्रत्येक अनुच्छेद का उद्देश्य, दायरा और संवैधानिक व्यवस्था अलग-अलग है।

भ्रम 2: पाँचवीं अनुसूची केवल पूर्वोत्तर राज्यों पर लागू होती है।
सही तथ्य: पाँचवीं अनुसूची उन अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित है जो छठी अनुसूची के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों में शामिल नहीं हैं।

भ्रम 3: पाँचवीं अनुसूची में स्वायत्त जिला परिषदों की प्रमुख व्यवस्था है।
सही तथ्य: स्वायत्त जिला और क्षेत्रीय परिषदों की प्रमुख व्यवस्था छठी अनुसूची में है।

भ्रम 4: अनुच्छेद 371A सभी पूर्वोत्तर राज्यों पर लागू होता है।
सही तथ्य: अनुच्छेद 371A विशेष रूप से नागालैंड से संबंधित है।

भ्रम 5: अनुच्छेद 371J पूरे कर्नाटक में समान विशेष विकास व्यवस्था लागू करता है।
सही तथ्य: यह कर्नाटक के कल्याण कर्नाटक क्षेत्र से संबंधित विशेष प्रावधान है।

भ्रम 6: PESA संविधान का अनुच्छेद है।
सही तथ्य: PESA वर्ष 1996 में बनाया गया संसद का अधिनियम है।

भ्रम 7: जनजातीय सलाहकार परिषद और स्वायत्त जिला परिषद समान शक्तियों वाली संस्थाएँ हैं।
सही तथ्य: पाँचवीं अनुसूची की जनजातीय सलाहकार परिषद मुख्यतः सलाह देती है, जबकि छठी अनुसूची की स्वायत्त जिला परिषदों को निर्दिष्ट विषयों पर विधायी और अन्य शक्तियाँ प्राप्त हैं।

भ्रम 8: छठी अनुसूची चारों पूर्वोत्तर राज्यों के सभी क्षेत्रों में समान रूप से लागू है।
सही तथ्य: यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है।

मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

भारतीय संविधान के विशेष प्रावधान संघवाद की उस विशेषता को दर्शाते हैं जिसमें राष्ट्रीय एकता के साथ क्षेत्रीय विविधता को भी महत्व दिया जाता है। अनुच्छेद 371 से 371J तक की व्यवस्थाएँ राज्यों की विशिष्ट ऐतिहासिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग समाधान प्रस्तुत करती हैं।

दूसरी ओर, पाँचवीं और छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन, भूमि और सांस्कृतिक हितों के संरक्षण तथा स्थानीय संस्थाओं की भूमिका को मजबूत करने का प्रयास करती हैं। PESA अधिनियम इस व्यवस्था में ग्राम सभा और स्थानीय लोकतंत्र के महत्व को रेखांकित करता है।

हालांकि केवल संवैधानिक प्रावधान बना देना पर्याप्त नहीं है। उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वित्तीय संसाधन, पारदर्शिता, जवाबदेही, स्थानीय भागीदारी और प्रशासनिक क्षमता आवश्यक हैं। इस प्रकार विशेष प्रावधान भारतीय संघवाद को अधिक लचीला और विविधता के प्रति संवेदनशील बनाने का साधन हैं।

एक नज़र में पूरा अध्याय

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 371 से 371J तक विभिन्न राज्यों के लिए अलग-अलग विशेष व्यवस्थाएँ हैं। इनमें सांस्कृतिक संरक्षण, क्षेत्रीय विकास, शिक्षा, सार्वजनिक रोजगार और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।

अनुच्छेद 244 के अंतर्गत पाँचवीं और छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ प्रदान करती हैं। पाँचवीं अनुसूची में राज्यपाल और जनजातीय सलाहकार परिषद की भूमिका प्रमुख है, जबकि छठी अनुसूची निर्दिष्ट क्षेत्रों में स्वायत्त जिला और क्षेत्रीय परिषदों की व्यवस्था करती है।

PESA अधिनियम, 1996 पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत व्यवस्था और ग्राम सभा की भूमिका को महत्व देता है। इन सभी व्यवस्थाओं का व्यापक उद्देश्य क्षेत्रीय विविधता, जनजातीय हितों, विकास और राष्ट्रीय एकता के बीच संवैधानिक संतुलन स्थापित करना है।