भारतीय न्यायपालिका संविधान की व्याख्या, कानूनों की संवैधानिकता की जाँच, मौलिक अधिकारों की रक्षा तथा विवादों के न्यायपूर्ण निपटारे का कार्य करती है। भारतीय संविधान ने एकीकृत न्यायपालिका की व्यवस्था अपनाई है। इसका अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय एक व्यापक न्यायिक व्यवस्था के अंग हैं।
सर्वोच्च न्यायालय इस व्यवस्था का शीर्ष न्यायालय है। इसके नीचे उच्च न्यायालय और उनके अधीन जिला तथा अन्य अधीनस्थ न्यायालय कार्य करते हैं। हालाँकि कुछ न्यायाधिकरण भी न्याय-प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन वे सामान्य न्यायालयों की इसी श्रेणी के समान नहीं हैं।
सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित प्रमुख प्रावधान संविधान के भाग V, अध्याय IV, अनुच्छेद 124 से 147 में दिए गए हैं। संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और सर्वोच्च न्यायालय ने 28 जनवरी 1950 को अपना कार्य प्रारंभ किया।
सर्वोच्च न्यायालय ने ब्रिटिश शासनकाल के संघीय न्यायालय (Federal Court) का स्थान लिया। संघीय न्यायालय की स्थापना भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत हुई थी और उसने 1937 में कार्य शुरू किया था।
सर्वोच्च न्यायालय केवल अंतिम अपीलीय न्यायालय नहीं है। इसे मूल, अपीलीय, परामर्शदात्री और संवैधानिक अधिकार-क्षेत्र भी प्राप्त हैं। इन अधिकारों का प्रयोग संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और लागू कानूनों के अनुसार किया जाता है।
अनुच्छेद 124 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीश होते हैं। संविधान में अन्य न्यायाधीशों की स्थायी संख्या निश्चित नहीं की गई है। संसद कानून बनाकर न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित कर सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय का मुख्यालय नई दिल्ली में है। अनुच्छेद 130 के अनुसार न्यायालय दिल्ली में या ऐसे अन्य स्थान पर बैठ सकता है जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की स्वीकृति से निर्धारित करें।
न्यायालय सामान्यतः विभिन्न पीठों के माध्यम से मामलों की सुनवाई करता है। संविधान की व्याख्या से संबंधित किसी महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न पर निर्णय देने के लिए अनुच्छेद 145(3) के अनुसार कम-से-कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ आवश्यक होती है।
अनुच्छेद 124(3) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए तथा निम्नलिखित में से कोई एक योग्यता पूरी करनी चाहिए:
महत्वपूर्ण तथ्य: विशिष्ट विधिवेत्ता का प्रावधान संविधान में मौजूद है। इसे हटाकर केवल न्यायाधीश या अधिवक्ता के अनुभव को अनिवार्य मानना सही नहीं है।
अनुच्छेद 124 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में वर्तमान व्यवस्था न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित कॉलेजियम प्रणाली पर आधारित है।
सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में परंपरागत रूप से सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को प्राथमिकता दी जाती है, बशर्ते उसकी उपयुक्तता पर कोई असाधारण कारण न हो।
कॉलेजियम की सिफारिशें सरकार को भेजी जाती हैं और नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। यह समझना आवश्यक है कि कॉलेजियम संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित संस्था नहीं है; इसका विकास सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से हुआ है।
परीक्षा उपयोगी तथ्य: कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक नियुक्तियों की वर्तमान व्यवस्था है, जबकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) लागू व्यवस्था नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर बना रहता है। वह राष्ट्रपति को संबोधित लिखित त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकता है।
न्यायाधीश को केवल संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है। उसकी पदावधि की सुरक्षा न्यायिक स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण आधार है।
अनुच्छेद 124(4) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour) या अक्षमता (Incapacity) के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
संसद के प्रत्येक सदन में उसी सत्र के दौरान प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है। इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
संविधान में न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग शब्द का औपचारिक प्रयोग नहीं किया गया है, हालाँकि सामान्य चर्चा में इस प्रक्रिया को अक्सर न्यायाधीशों का महाभियोग कहा जाता है। विस्तृत प्रक्रिया न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 में दी गई है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है कि न्यायाधीश किसी मामले का निर्णय संविधान, कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करें, न कि राजनीतिक या बाहरी दबाव के कारण। यह संविधान की मूल संरचना से जुड़ा सिद्धांत है।
अनुच्छेद 121 के अनुसार संसद में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा नहीं की जा सकती, सिवाय उस प्रस्ताव के जो न्यायाधीश को हटाने के लिए प्रस्तुत किया गया हो।
अनुच्छेद 131 सर्वोच्च न्यायालय को संघीय विवादों में मूल अधिकार-क्षेत्र प्रदान करता है। यह अधिकार-क्षेत्र उन विवादों पर लागू होता है जिनमें संघ और एक या अधिक राज्यों अथवा दो या अधिक राज्यों के बीच किसी कानूनी अधिकार का अस्तित्व या विस्तार प्रश्नगत हो।
उदाहरण के लिए, केंद्र और किसी राज्य के बीच संवैधानिक या कानूनी अधिकार से संबंधित विवाद इस अनुच्छेद के अंतर्गत आ सकता है, यदि वह अनुच्छेद 131 की शर्तें पूरी करता हो।
प्रत्येक केंद्र-राज्य विवाद स्वतः अनुच्छेद 131 के अंतर्गत नहीं आता। निजी पक्षों से जुड़े विवाद और कुछ प्रकार के विवाद इसके मूल अधिकार-क्षेत्र में नहीं आते। अनुच्छेद 131 के अंतर्गत विवाद का कानूनी अधिकार से संबंधित होना आवश्यक है।
अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में अनुच्छेद 32 को संविधान का हृदय और आत्मा कहा था।
सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए पाँच प्रमुख प्रकार की रिट जारी कर सकता है:
अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है। हालाँकि, इसका अधिकार-क्षेत्र मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तक सीमित है; सामान्य कानूनी अधिकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के आधार पर हर प्रकार की रिट जारी नहीं करता।
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण: अवैध हिरासत के विरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने तथा हिरासत की वैधता की जाँच कराने के लिए जारी की जाती है।
2. परमादेश: किसी सार्वजनिक प्राधिकारी को उसके कानूनी सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करने का आदेश दिया जाता है। सामान्यतः यह निजी व्यक्ति के विरुद्ध उसके विशुद्ध निजी दायित्व के लिए जारी नहीं की जाती।
3. प्रतिषेध: उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय अथवा अधिकरण को उसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर कार्यवाही करने से रोकने के लिए जारी की जाती है। इसका प्रयोग सामान्यतः कार्यवाही पूरी होने से पहले किया जाता है।
4. उत्प्रेषण: अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण के आदेश को अधिकार-क्षेत्र संबंधी त्रुटि, अधिकार-क्षेत्र के अतिक्रमण या अन्य मान्य विधिक आधारों पर निरस्त करने के लिए जारी की जा सकती है। वर्तमान विधि में इसकी भूमिका केवल मामले को अपने पास मँगाने तक सीमित नहीं है।
5. अधिकार-पृच्छा: किसी व्यक्ति से पूछा जाता है कि वह किस कानूनी अधिकार के आधार पर सार्वजनिक पद धारण कर रहा है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक पद पर अवैध नियुक्ति या पदधारण को चुनौती देना है।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों रिट जारी कर सकते हैं, लेकिन उनके अधिकार-क्षेत्र का संवैधानिक आधार और विस्तार अलग है।
| आधार | अनुच्छेद 32 | अनुच्छेद 226 |
|---|---|---|
| न्यायालय | सर्वोच्च न्यायालय | उच्च न्यायालय |
| मुख्य उद्देश्य | मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन | मौलिक अधिकार तथा अन्य कानूनी अधिकार |
| संवैधानिक स्थिति | स्वयं एक मौलिक अधिकार | संवैधानिक शक्ति, लेकिन स्वयं मौलिक अधिकार नहीं |
| विषयगत विस्तार | मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तक | मौलिक अधिकारों के साथ अन्य कानूनी अधिकार भी |
| क्षेत्रीय संबंध | राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय | संबंधित उच्च न्यायालय का क्षेत्रीय और विधिक अधिकार-क्षेत्र |
UPSC तथ्य: विषयगत दृष्टि से अनुच्छेद 226 का अधिकार-क्षेत्र अनुच्छेद 32 से व्यापक है। इसका अर्थ यह नहीं कि उच्च न्यायालय प्रत्येक मामले में सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है।
सर्वोच्च न्यायालय देश का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है। संविधान के अनुच्छेद 132, 133 और 134 क्रमशः कुछ संवैधानिक, दीवानी और आपराधिक मामलों में अपील से संबंधित प्रावधान करते हैं। अनुच्छेद 134A प्रमाणपत्र दिए जाने से संबंधित है।
कुछ मामलों में उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र दिए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। अन्य परिस्थितियों में संविधान और संबंधित कानूनों में निर्धारित शर्तें लागू होती हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का अपीलीय अधिकार-क्षेत्र यह सुनिश्चित करने में सहायक है कि महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर पूरे देश में कानून की व्याख्या में एकरूपता बनी रहे।
अनुच्छेद 136 सर्वोच्च न्यायालय को अपने विवेक से किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा दिए गए निर्णय, डिक्री, निर्धारण, दंड या आदेश के विरुद्ध अपील की विशेष अनुमति देने की शक्ति प्रदान करता है।
विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition—SLP) सामान्य अपील का स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय पहले यह तय करता है कि मामले में विशेष अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं।
अनुच्छेद 136 का प्रावधान सशस्त्र बलों से संबंधित कानूनों के अंतर्गत गठित न्यायालयों या अधिकरणों पर लागू नहीं होता। यह संवैधानिक अपवाद प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी विधि या तथ्य के ऐसे प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय की राय माँग सकते हैं जो सार्वजनिक महत्व का हो या संविधान में निर्दिष्ट विशेष परिस्थितियों से संबंधित हो।
अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय राय देने से इनकार कर सकता है। इसके विपरीत अनुच्छेद 143(2) में निर्दिष्ट विवादों के संदर्भ में न्यायालय राय दे सकता है।
परामर्शदात्री अधिकारिता के अंतर्गत दी गई राय सामान्यतः न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय के समान नहीं मानी जाती। राष्ट्रपति पर ऐसी राय को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है।
अनुच्छेद 129 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है। उसके अभिलेखों को प्रामाणिक महत्व प्राप्त होता है और न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति भी प्राप्त है।
न्यायालय की अवमानना का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा, न्याय-प्रशासन और न्यायालय के आदेशों के प्रभावी पालन की रक्षा करना है। इस शक्ति का प्रयोग कानून के अनुरूप किया जाता है।
अनुच्छेद 137 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णयों और आदेशों का पुनर्विचार कर सकता है। पुनर्विचार याचिका सामान्य अपील का विकल्प नहीं है; इसके लिए लागू नियमों के अनुसार मान्य आधार प्रस्तुत करना आवश्यक है।
पुनर्विचार के बाद भी न्याय की गंभीर विफलता दूर करने के लिए असाधारण परिस्थितियों में उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) का प्रयोग किया जा सकता है। इसका विकास सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों से हुआ है, न कि संविधान में किसी अलग अनुच्छेद के रूप में।
अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून भारत के क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होता है। इस सिद्धांत से न्यायिक मिसालों को संवैधानिक महत्व मिलता है और कानून की व्याख्या में एकरूपता स्थापित होती है।
न्यायालय के निर्णय में घोषित विधिक सिद्धांत बाध्यकारी होता है। प्रत्येक टिप्पणी या मामले से असंबंधित अवलोकन स्वतः अनुच्छेद 141 के अंतर्गत बाध्यकारी कानून नहीं बन जाता।
अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को अपने समक्ष लंबित किसी मामले या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री जारी करने की शक्ति देता है।
इस शक्ति का उद्देश्य किसी विशेष मामले में न्यायपूर्ण परिणाम सुनिश्चित करना है। इसका प्रयोग संविधान और लागू कानूनों की समग्र व्यवस्था के संदर्भ में किया जाता है।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) वह संवैधानिक शक्ति है जिसके माध्यम से न्यायालय कानूनों, कार्यपालिका के निर्णयों और सरकारी कार्रवाइयों की संवैधानिक वैधता की जाँच करते हैं।
यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसे संबंधित सीमा तक असंवैधानिक घोषित कर सकता है। इसी प्रकार कार्यपालिका का कोई आदेश भी संवैधानिक या कानूनी आधारों पर न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकता है।
न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान की सर्वोच्चता और मौलिक अधिकारों के संरक्षण का प्रमुख साधन है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों इसका प्रयोग अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र में करते हैं।
1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया।
इस सिद्धांत के अनुसार संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
न्यायिक समीक्षा, संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, विधि का शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे तत्वों को विभिन्न निर्णयों में मूल संरचना से जोड़ा गया है। मूल संरचना की कोई एक संपूर्ण और स्थिर सूची संविधान में लिखी हुई नहीं है।
जनहित याचिका (Public Interest Litigation—PIL) के माध्यम से सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर न्यायालय का हस्तक्षेप प्राप्त किया जा सकता है। इसका विकास न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ है।
जनहित याचिका ने उन व्यक्तियों और समूहों के लिए न्याय तक पहुँच आसान बनाने में भूमिका निभाई है जो गरीबी, सामाजिक वंचना या अन्य कारणों से स्वयं न्यायालय तक नहीं पहुँच पाते।
जनहित याचिका का उद्देश्य वास्तविक सार्वजनिक हित की रक्षा करना है। इसका उपयोग निजी स्वार्थ, राजनीतिक प्रचार या व्यक्तिगत विवाद को अनुचित रूप से जनहित का रूप देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) ऐसी न्यायिक प्रवृत्ति को दर्शाती है जिसमें न्यायालय संविधान और कानून की व्याख्या करते हुए अधिकारों की रक्षा तथा सार्वजनिक हित के मामलों में सक्रिय भूमिका निभाता है।
जनहित याचिकाओं का विकास और अनुच्छेद 21 की विस्तृत व्याख्या इसके प्रमुख उदाहरणों में गिने जाते हैं। हालाँकि, न्यायिक सक्रियता की सीमा पर न्यायपालिका की भूमिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न भी उठता है।
न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach) एक आलोचनात्मक अवधारणा है। इसका प्रयोग तब किया जाता है जब न्यायालय की कार्रवाई को विधायिका या कार्यपालिका के संवैधानिक क्षेत्र में अनुचित हस्तक्षेप माना जाता है।
न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रमण समानार्थी नहीं हैं। सक्रियता अधिकारों और संवैधानिक दायित्वों के प्रभावी संरक्षण में उपयोगी हो सकती है, जबकि अतिक्रमण की आलोचना शक्तियों के पृथक्करण और संस्थागत सीमाओं के संदर्भ में की जाती है।
उच्च न्यायालयों से संबंधित प्रमुख प्रावधान संविधान के भाग VI, अध्याय V, अनुच्छेद 214 से 231 में दिए गए हैं।
अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 231 संसद को दो या अधिक राज्यों अथवा दो या अधिक राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के लिए साझा उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति देता है।
उच्च न्यायालय अपने अधिकार-क्षेत्र में संवैधानिक मामलों, दीवानी और आपराधिक अपीलों, रिट याचिकाओं तथा कानून द्वारा निर्धारित अन्य मामलों की सुनवाई करता है।
प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा आवश्यक समझे जाने वाले अन्य न्यायाधीश होते हैं। संविधान में सभी उच्च न्यायालयों के लिए एक समान निश्चित संख्या निर्धारित नहीं है।
न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या संबंधित उच्च न्यायालय के कार्यभार और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित की जाती है। उच्च न्यायालय की विभिन्न पीठें उसके क्षेत्राधिकार के भीतर मामलों की सुनवाई करती हैं।
अनुच्छेद 217 के अनुसार उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए और निम्नलिखित में से कोई एक योग्यता पूरी करनी चाहिए:
महत्वपूर्ण अंतर: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए संविधान विशिष्ट विधिवेत्ता होने की योग्यता भी स्वीकार करता है, लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अनुच्छेद 217 में ऐसी अलग योग्यता नहीं है।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 217 के अंतर्गत की जाती है। नियुक्ति से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से संवैधानिक परामर्श की व्यवस्था है।
वर्तमान नियुक्ति व्यवस्था में उच्च न्यायालय के कॉलेजियम की सिफारिशें तथा सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। नियुक्ति की प्रक्रिया न्यायिक निर्णयों से विकसित व्यवस्था के अनुसार संचालित होती है।
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद पर बना रहता है। वह राष्ट्रपति को संबोधित लिखित त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को भी सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर वही संसदीय हटाने की प्रक्रिया अपनाकर पद से हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए निर्धारित है।
अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को पाँचों प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। इस शक्ति का उपयोग मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए भी किया जा सकता है।
उच्च न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र क्षेत्रीय और अन्य संवैधानिक शर्तों के अधीन होता है। अनुच्छेद 226(2) के अनुसार यदि किसी मामले में कार्रवाई का कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से संबंधित उच्च न्यायालय के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो, तो निर्धारित शर्तों के अधीन वह रिट जारी कर सकता है।
अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी करने की शक्ति व्यापक है, लेकिन यह न्यायालय के विवेकाधिकार और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अधीन रहती है।
अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले अधिकांश अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति प्राप्त है।
इस शक्ति के माध्यम से उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर संवैधानिक निगरानी रखता है। हालाँकि, अनुच्छेद 227 के अंतर्गत अधीक्षण शक्ति का प्रयोग कानून में निर्धारित अपवादों और सीमाओं के अधीन है।
अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है। उसके अभिलेखों को प्रामाणिक महत्व प्राप्त होता है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति भी प्राप्त है।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों अभिलेख न्यायालय हैं। संबंधित संवैधानिक आधार क्रमशः अनुच्छेद 129 और अनुच्छेद 215 हैं।
उच्च न्यायालयों का अधिकार-क्षेत्र संबंधित कानूनों, संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के क्षेत्राधिकार पर निर्भर करता है। वे जिला तथा अन्य अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुन सकते हैं।
कुछ उच्च न्यायालयों को विशिष्ट दीवानी मामलों में मूल अधिकार-क्षेत्र भी प्राप्त है। यह सुविधा सभी उच्च न्यायालयों में एक समान नहीं है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि प्रत्येक उच्च न्यायालय के पास सभी प्रकार के मामलों में समान मूल अधिकार-क्षेत्र है।
अनुच्छेद 222 के अनुसार राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर सकते हैं।
न्यायाधीशों के स्थानांतरण की प्रक्रिया में न्यायिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और प्रशासनिक आवश्यकताओं का महत्व होता है। इस प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका महत्वपूर्ण है।
| आधार | सर्वोच्च न्यायालय | उच्च न्यायालय |
|---|---|---|
| संवैधानिक भाग | भाग V | भाग VI |
| प्रमुख अनुच्छेद | 124–147 | 214–231 |
| न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु | 65 वर्ष | 62 वर्ष |
| रिट अधिकार-क्षेत्र | अनुच्छेद 32 | अनुच्छेद 226 |
| रिट का उद्देश्य | मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन | मौलिक अधिकार और अन्य कानूनी अधिकार |
| अभिलेख न्यायालय | अनुच्छेद 129 | अनुच्छेद 215 |
| मूल अधिकार-क्षेत्र | अनुच्छेद 131 के अंतर्गत निर्दिष्ट संघीय विवाद | संविधान और संबंधित कानूनों के अनुसार |
| अपीलीय स्थिति | देश का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय | अपने क्षेत्राधिकार में अधीनस्थ न्यायालयों के ऊपर |
जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 233 से 237 तक दिए गए हैं। ये न्यायालय दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अनुच्छेद 233 के अनुसार जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है।
अनुच्छेद 235 अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित करता है। इसमें जिला न्यायालयों और उनके अधीन न्यायालयों से संबंधित नियंत्रण के महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। यह व्यवस्था अधीनस्थ न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने में सहायक है।
भारतीय न्यायपालिका को अक्सर संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution) कहा जाता है। यह संविधान की व्याख्या करती है, मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है और विधायिका तथा कार्यपालिका की शक्तियों को संवैधानिक सीमाओं के भीतर रखने में भूमिका निभाती है।
न्यायपालिका का कार्य नीति बनाना या सरकार का स्थान लेना नहीं है। उसका प्रमुख दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की संस्थाएँ संविधान और कानून के अनुरूप कार्य करें तथा विवादों का समाधान विधिसम्मत तरीके से हो।
स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतांत्रिक शासन और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है। दूसरी ओर न्यायिक संस्थाओं से निष्पक्षता, पारदर्शिता, समयबद्ध कार्यवाही और अपने संवैधानिक दायित्वों के प्रति जवाबदेही की अपेक्षा भी की जाती है।
सुधारों में न्यायिक रिक्तियों को समय पर भरना, न्यायालयों की अवसंरचना मजबूत करना, मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान को प्रोत्साहित करना, प्रक्रियाओं को सरल बनाना तथा डिजिटल सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाना शामिल हो सकता है।
सुधारों का उद्देश्य न्यायपालिका पर अनुचित बाहरी नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता बनाए रखते हुए न्याय-प्रशासन को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाना होना चाहिए।
भारतीय न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता, मौलिक अधिकारों की रक्षा और विधि के शासन को सुनिश्चित करने वाली प्रमुख संवैधानिक संस्था है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक शासन तथा संघीय व्यवस्था के संतुलन के लिए आवश्यक है।
न्यायिक समीक्षा असंवैधानिक कानूनों और सरकारी कार्रवाइयों पर नियंत्रण का साधन है। जनहित याचिका और अनुच्छेद 21 की विस्तृत व्याख्या ने न्याय तक पहुँच और अधिकारों के संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका को व्यापक बनाया है।
दूसरी ओर लंबित मामलों, न्यायिक रिक्तियों, नियुक्तियों में देरी और न्याय तक असमान पहुँच जैसी चुनौतियों का समाधान भी आवश्यक है। न्यायिक स्वतंत्रता तथा जवाबदेही के बीच संतुलन, संस्थागत सहयोग और प्रभावी न्यायिक प्रशासन के माध्यम से न्यायपालिका की विश्वसनीयता और कार्यक्षमता को मजबूत किया जा सकता है।