भारत में शासन की व्यवस्था संविधान द्वारा निर्धारित की गई है। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियों का विभाजन किया गया है। इस व्यवस्था को संघवाद (Federalism) कहा जाता है।
संघीय व्यवस्था में सरकार के विभिन्न स्तर संविधान से अपनी शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। भारत में केंद्र और राज्यों की सरकारें अपने-अपने संवैधानिक क्षेत्र में कार्य करती हैं, लेकिन उनके अधिकार पूरी तरह समान नहीं हैं। भारतीय संविधान ने राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय स्वायत्तता और प्रशासनिक समन्वय को ध्यान में रखते हुए केंद्र को अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति प्रदान की है।
भारत को समझने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वह संघीय या एकात्मक देश है। भारतीय व्यवस्था में संघीय विशेषताओं के साथ केंद्रीकरण की प्रवृत्तियाँ भी मौजूद हैं। इसलिए इसे प्रायः मजबूत केंद्र वाली संघीय व्यवस्था कहा जाता है।
परीक्षा उपयोगिता: भारतीय संघवाद की प्रकृति का प्रश्न संविधान की सर्वोच्चता, शक्तियों के विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका, केंद्र की विशेष शक्तियों और राज्यों की स्वायत्तता के संयुक्त अध्ययन से समझना चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 1 में कहा गया है: “India, that is Bharat, shall be a Union of States.” अर्थात भारत, जिसे इंडिया भी कहा जाता है, राज्यों का संघ होगा।
संविधान में Union of States शब्द का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। भारत का संघ राज्यों के बीच किसी ऐसे समझौते का परिणाम नहीं है जिसके आधार पर राज्य अपनी इच्छा से संघ से अलग हो सकें। किसी राज्य को संविधान के अंतर्गत एकतरफा अलग होने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत का क्षेत्र तीन श्रेणियों से मिलकर बनता है:
अनुच्छेद 2 संसद को नए राज्यों को संघ में प्रवेश देने या नए राज्यों की स्थापना करने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 3 नए राज्यों के गठन तथा मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन से संबंधित है।
भारत में संविधान के सभी संशोधनों के लिए राज्यों की स्वीकृति आवश्यक नहीं होती। कुछ संशोधनों के लिए संसद का विशेष बहुमत पर्याप्त है, जबकि संघीय प्रावधानों से संबंधित निर्दिष्ट संशोधनों के लिए कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की पुष्टि भी आवश्यक होती है। यह प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है।
इन विशेषताओं का अर्थ यह नहीं है कि राज्य केवल केंद्र की प्रशासनिक इकाइयाँ हैं। राज्य सरकारों के पास संविधान द्वारा निर्धारित विधायी और कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ हैं, जिनकी रक्षा संवैधानिक व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा के माध्यम से की जाती है।
संघीय शासन में संविधान सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है। एकात्मक शासन में सामान्यतः राष्ट्रीय स्तर की सरकार के पास अधीनस्थ इकाइयों की शक्तियों को निर्धारित करने की अधिक व्यापक क्षमता होती है।
संघीय व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के अधिकारों का आधार संविधान होता है। भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संवैधानिक है, लेकिन केंद्र को कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यों के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की शक्ति भी दी गई है।
मुख्य अंतर: भारत में संघीय ढाँचा सामान्य परिस्थितियों में कार्य करता है, जबकि आपातकाल तथा संविधान में निर्दिष्ट अन्य परिस्थितियों में शासन अधिक केंद्रीकृत हो सकता है।
संविधान के भाग XI में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों की व्यवस्था है। अनुच्छेद 245 और 246 तथा सातवीं अनुसूची इस विषय के प्रमुख आधार हैं।
सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं:
अनुच्छेद 246 के अंतर्गत संघ सूची पर संसद को विशेष विधायी अधिकार प्राप्त हैं। राज्य सूची पर सामान्यतः राज्य विधानमंडल कानून बनाता है। समवर्ती सूची में दोनों स्तरों को कानून बनाने की शक्ति है, लेकिन टकराव की स्थिति में अनुच्छेद 254 का महत्त्व सामने आता है।
सूचियों में विषयों की प्रविष्टियों की व्याख्या करते समय केवल विषय का सामान्य नाम देखना पर्याप्त नहीं होता। संबंधित प्रविष्टि की संवैधानिक सीमा और अन्य प्रविष्टियों के साथ उसके संबंध को भी देखना आवश्यक है।
संघ सूची में मुख्यतः ऐसे विषय हैं जिनमें राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता, सुरक्षा या समन्वय की आवश्यकता होती है। इन विषयों पर सामान्यतः संसद कानून बनाती है।
ध्यान दें: किसी विषय का राष्ट्रीय महत्त्व होना अपने-आप यह निर्धारित नहीं करता कि वह संघ सूची में ही होगा। विधायी अधिकार का निर्धारण संविधान की संबंधित प्रविष्टियों से किया जाता है।
राज्य सूची में मुख्यतः ऐसे विषय हैं जिनका संबंध स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य स्तर की आवश्यकताओं से होता है। सामान्य परिस्थितियों में इन विषयों पर राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।
राज्य सूची का अर्थ यह नहीं है कि संसद इन विषयों पर कभी कानून नहीं बना सकती। संविधान के अनुच्छेद 249, 250, 252 और 253 तथा राष्ट्रपति शासन से संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत संसद को निर्दिष्ट परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की शक्ति मिल सकती है।
समवर्ती सूची में ऐसे विषय हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य कानूनी ढाँचा बनाने के साथ राज्यों को भी भूमिका देना है।
समवर्ती सूची में कानून बनाते समय केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक है। यदि दोनों कानूनों में वास्तविक असंगति हो, तो अनुच्छेद 254 लागू हो सकता है।
| आधार | संघ सूची | राज्य सूची | समवर्ती सूची |
|---|---|---|---|
| मुख्य विधायी स्तर | संसद | राज्य विधानमंडल | संसद और राज्य विधानमंडल |
| प्रमुख उदाहरण | रक्षा, विदेश मामले, मुद्रा | पुलिस, लोक व्यवस्था, कृषि | शिक्षा, वन, विवाह |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची | अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची | अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची |
| टकराव की स्थिति | संविधान के अनुसार संघ की विधायी प्रधानता | विशेष परिस्थितियों में संसद कानून बना सकती है | अनुच्छेद 254 महत्त्वपूर्ण |
यह सारणी सामान्य नियम बताती है। वास्तविक प्रश्नों में संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद, अपवाद और विषय की सटीक प्रविष्टि को ध्यान में रखना चाहिए।
ऐसे विषय जो सातवीं अनुसूची की संघ, राज्य या समवर्ती सूची में शामिल नहीं हैं, उनसे संबंधित अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ संसद के पास हैं।
अनुच्छेद 248 तथा संघ सूची की प्रविष्टि 97 अवशिष्ट विधायी शक्तियों से संबंधित हैं। इसमें ऐसे कर लगाने की शक्ति भी शामिल है जो इन सूचियों में निर्दिष्ट नहीं हैं।
यह व्यवस्था भारत को उन संघीय व्यवस्थाओं से अलग करती है जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों या प्रांतों के पास होती हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में संघीय सरकार की शक्तियाँ मुख्यतः संविधान में निर्दिष्ट हैं और दसवें संशोधन के अंतर्गत अन्य शक्तियाँ राज्यों या जनता के लिए सुरक्षित हैं।
अनुच्छेद 254 समवर्ती सूची के विषयों पर संसद और राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों में असंगति से संबंधित है।
सामान्य नियम के अनुसार, यदि राज्य का कानून संसद के कानून से असंगत है और दोनों एक ही विषय पर लागू होते हैं, तो असंगति की सीमा तक संसद का कानून प्रभावी होता है तथा राज्य का कानून निष्प्रभावी हो सकता है।
अपवाद: यदि राज्य का विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखा गया हो और उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाए, तो वह उस राज्य में प्रभावी रह सकता है, भले ही उसमें संसद के पहले के कानून से असंगति हो।
लेकिन राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद भी संसद को उसी विषय पर कानून बनाने, बदलने या राज्य के कानून को निरस्त करने की संवैधानिक शक्ति बनी रहती है।
सामान्यतः राज्य सूची के विषयों पर राज्य विधानमंडल कानून बनाता है। संविधान ने कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में संसद को भी इन विषयों पर कानून बनाने की अनुमति दी है।
इन प्रावधानों में अंतर समझना महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 249 में राज्यसभा का विशेष बहुमत वाला प्रस्ताव आवश्यक है, जबकि अनुच्छेद 252 राज्यों की सहमति पर आधारित है।
यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में संसद के लिए राज्य सूची के किसी निर्दिष्ट विषय पर कानून बनाना आवश्यक या उचित है, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है।
प्रस्ताव एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक प्रभावी रहता है। इसे प्रत्येक बार अधिकतम एक वर्ष के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है।
प्रस्ताव समाप्त होने के बाद भी उसके आधार पर बने कानून का प्रभाव तुरंत समाप्त नहीं होता। अनुच्छेद 249 के अनुसार, प्रस्ताव समाप्त होने के छह महीने बाद तक वह कानून प्रभावी रह सकता है, बशर्ते वह किसी अन्य आधार पर पहले समाप्त न हो गया हो।
परीक्षा तथ्य: अनुच्छेद 249 में विशेष भूमिका राज्यसभा की है, क्योंकि वह राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला सदन है।
जब राष्ट्रीय आपातकाल लागू होता है, तब संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
इस आधार पर बनाया गया कानून आपातकाल समाप्त होने के बाद भी तत्काल समाप्त नहीं होता। अनुच्छेद 250 के अनुसार, आपातकाल समाप्त होने के छह महीने बाद तक उसका प्रभाव बना रह सकता है, उस अवधि के बाद कानून केवल इसी आधार पर प्रभावी नहीं रहेगा।
यह प्रावधान राष्ट्रीय संकट के समय पूरे देश में आवश्यक कानूनी समन्वय स्थापित करने के लिए बनाया गया है।
यदि दो या अधिक राज्यों के विधानमंडल प्रस्ताव पारित करते हैं कि राज्य सूची के किसी विषय पर संसद कानून बनाए, तो संसद उन राज्यों के लिए कानून बना सकती है।
अन्य राज्य भी बाद में अपने विधानमंडल के प्रस्ताव द्वारा उस कानून को अपना सकते हैं। इस प्रकार कानून का दायरा अन्य राज्यों तक बढ़ सकता है।
इस अनुच्छेद के अंतर्गत बने कानून में संशोधन या उसे निरस्त करने का अधिकार सामान्यतः संसद के पास होता है; संबंधित राज्य विधानमंडल अकेले उसमें संशोधन नहीं कर सकता।
अंतरराष्ट्रीय संधि, समझौते या सम्मेलन को लागू करने के लिए संसद कानून बना सकती है। यह शक्ति राज्य सूची के विषयों तक भी विस्तृत हो सकती है।
इस प्रावधान के माध्यम से भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को घरेलू कानून में लागू कर सकता है। इस शक्ति के प्रयोग के लिए अनुच्छेद 249 जैसी राज्यसभा की राष्ट्रीय हित संबंधी अनुमति आवश्यक नहीं है।
केंद्र और राज्यों के बीच संबंध केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं हैं। संविधान के भाग XI के अध्याय II में प्रशासनिक संबंधों से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग संविधान और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुरूप होना चाहिए। इसी उद्देश्य से संविधान ने केंद्र को कुछ परिस्थितियों में राज्यों को निर्देश देने की शक्ति प्रदान की है।
प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और राज्य में लागू अन्य कानूनों का पालन सुनिश्चित हो।
संघ सरकार इस उद्देश्य से राज्य को आवश्यक निर्देश दे सकती है। यह प्रावधान केंद्र और राज्यों के बीच कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने का माध्यम है।
राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार नहीं होना चाहिए जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में बाधा उत्पन्न हो।
संविधान के अंतर्गत संघ राज्यों को कुछ निर्दिष्ट मामलों में निर्देश दे सकता है। इनमें राष्ट्रीय या सामरिक महत्त्व के संचार साधनों के निर्माण और रखरखाव तथा रेलवे की सुरक्षा से संबंधित कुछ विषय शामिल हैं।
ऐसे निर्देशों से राज्यों पर अतिरिक्त व्यय होने की स्थिति में संविधान के अनुसार वित्तीय व्यवस्था भी प्रासंगिक हो सकती है।
अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को ऐसी परिषद स्थापित करने का अधिकार देता है, यदि उसे लगे कि सार्वजनिक हित में इसकी स्थापना आवश्यक है।
परिषद के संभावित कार्यों में शामिल हैं:
अंतर्राज्यीय परिषद का उद्देश्य सहयोग और परामर्श के माध्यम से विवादों को सुलझाने तथा नीतिगत समन्वय को बढ़ावा देना है। यह स्वयं न्यायालय नहीं है और इसकी भूमिका संवैधानिक प्रावधान तथा निर्धारित कार्यों के अनुसार होती है।
एक से अधिक राज्यों से होकर बहने वाली नदियों के जल के बँटवारे, उपयोग और प्रबंधन को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। इनका संबंध कृषि, पेयजल, सिंचाई, ऊर्जा और पर्यावरण से होता है।
अनुच्छेद 262 संसद को अंतर्राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
संसद कानून द्वारा सर्वोच्च न्यायालय या अन्य न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को ऐसे विवादों में सीमित या बाहर कर सकती है। अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 इस क्षेत्र का प्रमुख वैधानिक कानून है।
ध्यान दें: अनुच्छेद 262 स्वयं किसी विशेष नदी विवाद का निर्णय नहीं करता; यह संसद को संबंधित कानूनी व्यवस्था बनाने की शक्ति देता है।
अखिल भारतीय सेवाएँ केंद्र और राज्यों के प्रशासन के बीच संस्थागत संबंध स्थापित करती हैं। इनके अधिकारी राज्य तथा केंद्र दोनों स्तरों पर कार्य कर सकते हैं।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) इसके प्रमुख उदाहरण हैं। भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service) भी अखिल भारतीय सेवा है।
अनुच्छेद 312 के अंतर्गत राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रीय हित में प्रस्ताव पारित कर सकती है। इसके बाद संसद कानून बनाकर एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के गठन का प्रावधान कर सकती है।
ये सेवाएँ प्रशासनिक निरंतरता और राष्ट्रीय स्तर पर समान मानकों को प्रोत्साहित कर सकती हैं, लेकिन इनके संचालन में केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका रहती है।
केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व, कराधान अधिकारों, अनुदानों तथा व्यय दायित्वों के वितरण को वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) कहा जाता है।
केंद्र के पास कई व्यापक कराधान स्रोत हैं, जबकि राज्यों पर स्वास्थ्य, पुलिस, कृषि, स्थानीय शासन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े महत्त्वपूर्ण व्यय दायित्व होते हैं। इससे केंद्र और राज्यों की वित्तीय क्षमताओं तथा आवश्यकताओं में अंतर पैदा हो सकता है।
इस अंतर को कम करने के लिए करों का बँटवारा, वित्त आयोग की सिफारिशें, अनुदान और केंद्र प्रायोजित योजनाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वित्तीय संघवाद में दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं:
संविधान केंद्र और राज्यों को विभिन्न कर लगाने तथा उनसे संबंधित कानून बनाने की शक्तियाँ प्रदान करता है। इन शक्तियों का निर्धारण संवैधानिक प्रावधानों और संबंधित कर की प्रकृति से होता है।
वस्तु एवं सेवा कर (GST) के लागू होने से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। GST में केंद्र और राज्यों दोनों की भूमिका है। अंतरराज्यीय आपूर्ति पर GST से संबंधित प्रावधानों में केंद्र की विशेष भूमिका होती है, जबकि राज्य के भीतर की आपूर्ति में केंद्रीय GST और राज्य GST का ढाँचा लागू होता है, जहाँ संबंधित कानून लागू हों।
GST ने कराधान में सहयोग की आवश्यकता बढ़ाई है, लेकिन इससे केंद्र और राज्यों के सभी कराधिकार समाप्त नहीं हुए हैं। पेट्रोलियम पदार्थों और कुछ अन्य विषयों के संबंध में संवैधानिक तथा वैधानिक प्रावधान अलग महत्त्व रखते हैं।
अनुच्छेद 280 के अंतर्गत राष्ट्रपति सामान्यतः प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर या उससे पहले वित्त आयोग का गठन करता है। आयोग की संरचना और सदस्यों की योग्यता संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार निर्धारित होती है।
वित्त आयोग के प्रमुख कार्य हैं:
वित्त आयोग की सिफारिशें केंद्र–राज्य वित्तीय संबंधों का प्रमुख आधार हैं। आयोग की सिफारिशों को समझते समय करों में राज्यों की हिस्सेदारी, राज्यों के बीच वितरण और अनुदान को अलग-अलग अवधारणाओं के रूप में पढ़ना चाहिए।
GST परिषद एक संवैधानिक निकाय है, जिसकी व्यवस्था अनुच्छेद 279A में की गई है। इसका उद्देश्य GST से संबंधित महत्त्वपूर्ण मामलों में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना है।
परिषद की संरचना में शामिल हैं:
परिषद GST की दरों, छूट, मॉडल कानूनों और GST से संबंधित अन्य विषयों पर सिफारिशें करती है। इसकी निर्णय प्रक्रिया में केंद्र और राज्यों के मतों को निर्धारित भार दिया गया है।
परीक्षा तथ्य: GST परिषद संवैधानिक निकाय है। इसे वित्त आयोग या अंतर्राज्यीय परिषद के साथ एक ही प्रकार का निकाय नहीं समझना चाहिए, क्योंकि इनके संवैधानिक आधार और कार्य अलग-अलग हैं।
राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संविधान विभिन्न प्रकार के अनुदानों की व्यवस्था करता है।
अनुच्छेद 275 के अंतर्गत संसद द्वारा कानून के अनुसार राज्यों को भारत की संचित निधि से सहायता अनुदान दिया जा सकता है। इसमें कुछ विशेष उद्देश्यों, जैसे अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के स्तर को बढ़ाने, के लिए अनुदान की व्यवस्था भी शामिल है।
अनुच्छेद 282 संघ या राज्य को किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनुदान देने की अनुमति देता है, भले ही वह उद्देश्य उस सरकार की सामान्य विधायी शक्ति के क्षेत्र में न आता हो।
इन दोनों अनुच्छेदों में अंतर महत्त्वपूर्ण है: अनुच्छेद 275 संवैधानिक रूप से निर्धारित सहायता अनुदान से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 282 सार्वजनिक उद्देश्य के लिए विवेकाधीन अनुदान देने का व्यापक आधार प्रदान करता है।
क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils) राज्यों के बीच सहयोग, आर्थिक और सामाजिक नियोजन तथा क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान को प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई हैं।
इनका आधार राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 है। इसलिए ये संवैधानिक निकाय नहीं, बल्कि वैधानिक निकाय हैं। वर्तमान व्यवस्था में पाँच क्षेत्रीय परिषदें हैं।
उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए उत्तर-पूर्वी परिषद (North Eastern Council) की अलग वैधानिक व्यवस्था है, जिसका आधार North Eastern Council Act, 1971 है। इसे पाँच क्षेत्रीय परिषदों में से एक नहीं समझना चाहिए।
क्षेत्रीय परिषदों का उद्देश्य राज्यों के बीच राजनीतिक विवादों का न्यायिक निर्णय देना नहीं, बल्कि परामर्श और सहयोग के माध्यम से साझा समस्याओं का समाधान प्रोत्साहित करना है।
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति संविधान के अनुसार राज्यपाल में निहित होती है, लेकिन सामान्यतः उसका प्रयोग मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर किया जाता है।
राज्यपाल की नियुक्ति और पद से हटाए जाने की प्रक्रिया केंद्र और राज्यों के संबंधों में महत्त्वपूर्ण है। फिर भी राज्यपाल का पद किसी राज्य सरकार के दैनिक राजनीतिक नियंत्रण का साधन नहीं, बल्कि संविधान के अनुरूप कार्य करने वाला संवैधानिक पद है।
मुख्यमंत्री राज्य सरकार की वास्तविक कार्यपालिका का प्रमुख होता है। अनुच्छेद 163 के अनुसार, कुछ संवैधानिक अपवादों को छोड़कर राज्यपाल को अपने कार्यों में सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद होती है।
अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है।
अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के कुछ कर्तव्यों को निर्धारित करता है, जिनमें राज्य के प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित जानकारी राज्यपाल को देना शामिल है।
राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है। हालांकि कुछ संवैधानिक परिस्थितियों में उसे विवेकाधीन भूमिका निभानी पड़ सकती है।
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति असीमित नहीं है। इसका प्रयोग संविधान, प्रासंगिक न्यायिक निर्णयों और संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
बहुमत का प्रश्न उत्पन्न होने पर सामान्यतः विधानसभा के पटल पर शक्ति-परीक्षण लोकतांत्रिक बहुमत निर्धारित करने का उपयुक्त माध्यम है।
यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्यथा यह संतोष हो कि किसी राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत उद्घोषणा जारी की जा सकती है।
राष्ट्रपति शासन के दौरान राष्ट्रपति राज्य सरकार के कुछ कार्य अपने अधीन ले सकता है तथा राज्य विधानमंडल की शक्तियों का प्रयोग संसद द्वारा या उसके प्राधिकरण के अंतर्गत किया जा सकता है।
अनुच्छेद 356 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शक्तियाँ राष्ट्रपति द्वारा अपने अधीन नहीं ली जा सकतीं। राष्ट्रपति शासन का अर्थ यह भी नहीं है कि राज्य का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
संसद के दोनों सदनों से निर्धारित अवधि में अनुमोदन आवश्यक होता है। सामान्यतः उद्घोषणा दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से अनुमोदित होनी चाहिए। अनुमोदन के बाद यह छह महीने तक प्रभावी रहती है और संवैधानिक शर्तों के अधीन इसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
अनुच्छेद 356 भारतीय संघवाद में केंद्र की विशेष शक्ति का उदाहरण है। इसका उद्देश्य किसी राज्य में संवैधानिक शासन की विफलता की स्थिति से निपटना है, न कि सामान्य राजनीतिक असहमति के कारण राज्य सरकार को हटाना।
राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है। न्यायालय यह जाँच सकता है कि संवैधानिक शक्ति का प्रयोग वैध आधार पर किया गया है या नहीं।
अनुच्छेद 356 का प्रयोग करते समय विधानसभा में बहुमत, संवैधानिक प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को महत्त्व दिया जाना चाहिए।
S. R. Bommai v. Union of India (1994) भारतीय संघवाद और अनुच्छेद 356 से संबंधित ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है।
इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है। बहुमत के प्रश्न का निर्धारण सामान्यतः विधानसभा में शक्ति-परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक दावों के आधार पर।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 356 की शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। यदि उद्घोषणा असंवैधानिक पाई जाती है, तो न्यायालय उचित परिस्थितियों में संबंधित संवैधानिक स्थिति बहाल करने का आदेश दे सकता है।
UPSC महत्त्व: यह निर्णय संघवाद, लोकतंत्र, बहुमत-परीक्षण और राष्ट्रपति शासन की न्यायिक समीक्षा को समझने के लिए प्रमुख उदाहरण है।
अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा की जा सकती है, बशर्ते संविधान में निर्धारित शर्तें पूरी हों।
राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है। केंद्र की कार्यपालिका शक्ति भी राज्यों को निर्देश देने के संबंध में विस्तृत हो सकती है।
अनुच्छेद 353 आपातकाल के प्रभावों में महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान केंद्र–राज्य संबंधों में केंद्रीकरण बढ़ सकता है, लेकिन यह संवैधानिक व्यवस्था के भीतर ही होता है।
| आधार | राष्ट्रीय आपातकाल | राष्ट्रपति शासन | वित्तीय आपातकाल |
|---|---|---|---|
| अनुच्छेद | 352 | 356 | 360 |
| मुख्य आधार | युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा |
| मुख्य प्रभाव | केंद्र की शक्तियों में वृद्धि | राज्य की संवैधानिक शासन व्यवस्था प्रभावित | वित्तीय मामलों में केंद्र के निर्देशों की व्यवस्था |
| क्षेत्र | पूरा भारत या उसका कोई भाग | संबंधित राज्य | भारत या उसका कोई भाग |
तीनों आपातकालीन प्रावधानों का आधार और प्रभाव अलग-अलग है। विशेष रूप से अनुच्छेद 360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों से अनुमोदित होना आवश्यक है। भारत में अब तक वित्तीय आपातकाल घोषित नहीं किया गया है।
सहकारी संघवाद में केंद्र और राज्य साझा राष्ट्रीय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए परामर्श, समन्वय और सहयोग के माध्यम से कार्य करते हैं।
इसके प्रमुख उदाहरण हैं:
सहकारी संघवाद तभी प्रभावी होता है जब राज्यों की आवश्यकताओं, वित्तीय क्षमताओं और स्थानीय परिस्थितियों को नीतिगत निर्णयों में उचित स्थान मिले।
प्रतिस्पर्धी संघवाद में राज्य निवेश, रोजगार, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक दक्षता और सुशासन जैसे क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं।
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से नवाचार और प्रशासनिक सुधार को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, राज्यों की वित्तीय क्षमता और प्रारंभिक विकास स्तर अलग-अलग होने के कारण केवल प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय असमानताओं को समाप्त नहीं कर सकती।
नीति आयोग केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत सहयोग को बढ़ावा देने वाला संस्थागत मंच है। इसमें राज्यों की विकास संबंधी प्राथमिकताओं, नीति निर्माण और अनुभवों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है।
नीति आयोग का गठन 2015 में केंद्रीय मंत्रिमंडल के संकल्प द्वारा किया गया था। यह संवैधानिक या वैधानिक निकाय नहीं, बल्कि कार्यपालिका के संकल्प से स्थापित संस्था है।
परीक्षा तथ्य: नीति आयोग और वित्त आयोग अलग-अलग संस्थाएँ हैं। वित्त आयोग का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 280 है, जबकि नीति आयोग का गठन कार्यपालिका के संकल्प से हुआ है।
भारतीय राज्यों के बीच प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना और राजस्व क्षमता में अंतर पाया जाता है। इससे राज्यों की सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
वित्त आयोग के माध्यम से करों का वितरण, सहायता अनुदान, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और राज्यों की विकास नीतियाँ इन असमानताओं को कम करने में भूमिका निभा सकती हैं।
वित्तीय हस्तांतरण में जनसंख्या, आय संबंधी अंतर, क्षेत्रफल, वन एवं पर्यावरण तथा अन्य निर्धारित मानदंडों को संबंधित आयोग की सिफारिशों के अनुसार महत्त्व मिल सकता है। प्रत्येक वित्त आयोग के मानदंड और भार एक जैसे हों, यह आवश्यक नहीं है।
इन समस्याओं का समाधान केवल शक्तियों के कानूनी विभाजन से नहीं हो सकता। नियमित परामर्श, पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं का निष्पक्ष संचालन और न्यायिक समीक्षा भी महत्त्वपूर्ण हैं।
केंद्र–राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए 1983 में सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission) का गठन किया गया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1988 में प्रस्तुत की।
आयोग ने केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, राज्यपाल की नियुक्ति और भूमिका, अनुच्छेद 356 के प्रयोग तथा अंतर्राज्यीय परिषद जैसे विषयों पर सिफारिशें दीं।
आयोग ने केंद्र–राज्य संबंधों में परामर्श और सहयोग को महत्त्व दिया। राष्ट्रपति शासन का प्रयोग असाधारण स्थिति में और संवैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप करने पर भी जोर दिया।
केंद्र–राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए पुंछी आयोग (Punchhi Commission) का गठन 2007 में किया गया था। इसने 2010 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
आयोग ने राज्यपाल की भूमिका, केंद्र–राज्य विवाद, आपातकालीन प्रावधान, स्थानीय शासन और संघीय सहयोग से संबंधित विषयों पर सुझाव दिए।
सरकारिया और पुंछी आयोग का अध्ययन करते समय उनके गठन के वर्ष, रिपोर्ट प्रस्तुत करने के वर्ष और प्रमुख विषयों को अलग-अलग याद रखना चाहिए।
स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता तथा केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों के संतुलन की रक्षा करती है।
अनुच्छेद 131 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को संघ और एक या अधिक राज्यों अथवा राज्यों के बीच कुछ प्रकार के विवादों में मूल अधिकारिता प्राप्त है, बशर्ते विवाद में कानून या तथ्य का ऐसा प्रश्न हो जिस पर किसी कानूनी अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर करता हो।
अनुच्छेद 131 की अधिकारिता हर प्रकार के राजनीतिक मतभेद पर लागू नहीं होती। विवाद का पक्षकार, उसका स्वरूप और कानूनी अधिकार से उसका संबंध संवैधानिक शर्तों के अनुरूप होना चाहिए।
न्यायिक समीक्षा के माध्यम से न्यायालय यह जाँच सकता है कि संसद या राज्य विधानमंडल ने अपनी संवैधानिक विधायी सीमाओं के भीतर कानून बनाया है या नहीं।
अनुच्छेद 3 संसद को नया राज्य बनाने, किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ाने या घटाने, उसकी सीमाएँ बदलने तथा उसका नाम बदलने की शक्ति देता है।
ऐसा विधेयक संसद में प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक है। यदि प्रस्ताव किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार के लिए भेजता है।
राज्य विधानमंडल को अपनी राय देने के लिए निर्धारित अवधि दी जाती है। राज्य की राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं है। इस प्रकार राज्य के पुनर्गठन में राज्य विधानमंडल से विचार माँगा जाता है, लेकिन अंतिम विधायी निर्णय संसद के पास रहता है।
परीक्षा तथ्य: अनुच्छेद 3 के अंतर्गत राज्य की सीमा या नाम बदलने के लिए संबंधित राज्य की सहमति अनिवार्य नहीं है।
न्यायिक समीक्षा का अर्थ है कि न्यायालय किसी कानून या सरकारी कार्रवाई की संवैधानिक वैधता की जाँच कर सकता है। यह संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण साधन है।
यदि संसद या राज्य विधानमंडल अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कानून बनाता है, तो न्यायालय उपयुक्त मामले में उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
न्यायिक समीक्षा संघवाद की रक्षा में महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे केंद्र और राज्य दोनों संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य करने के लिए उत्तरदायी रहते हैं।
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 1 | भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ |
| 2–3 | नए राज्यों का प्रवेश, स्थापना तथा राज्यों का पुनर्गठन |
| 131 | सर्वोच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता |
| 245–246 | विधायी शक्तियों का क्षेत्र और वितरण |
| 248 | अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ |
| 249 | राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद की शक्ति |
| 250 | राष्ट्रीय आपातकाल में राज्य सूची पर संसद की शक्ति |
| 252 | राज्यों की सहमति से संसद का कानून |
| 253 | अंतरराष्ट्रीय समझौतों का कार्यान्वयन |
| 254 | समवर्ती सूची के कानूनों में असंगति |
| 256–257 | प्रशासनिक संबंध और संघ के निर्देश |
| 262 | अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद |
| 263 | अंतर्राज्यीय परिषद |
| 275 और 282 | अनुदान और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए सहायता |
| 280 | वित्त आयोग |
| 279A | GST परिषद |
| 312 | अखिल भारतीय सेवाएँ |
| 352 | राष्ट्रीय आपातकाल |
| 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता |
| 360 | वित्तीय आपातकाल |
| 368 | संविधान संशोधन की प्रक्रिया |
भारतीय संघवाद का उद्देश्य केवल शक्तियों का विभाजन करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।
केंद्र रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा और राष्ट्रीय स्तर के अनेक विषयों में प्रमुख भूमिका निभाता है। दूसरी ओर, राज्य पुलिस, लोक व्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन जैसे विषयों में महत्त्वपूर्ण अधिकार रखते हैं।
समवर्ती सूची, अंतर्राज्यीय परिषद, GST परिषद, वित्त आयोग और न्यायपालिका जैसी व्यवस्थाएँ इस शक्ति-संतुलन को संस्थागत रूप देती हैं।
प्रभावी संघवाद के लिए संवैधानिक सीमाओं का सम्मान, राज्यों की आवश्यकताओं पर विचार, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और विवादों का समयबद्ध समाधान आवश्यक है।
भारतीय संघवाद को समझने के लिए संवैधानिक प्रावधानों, राजनीतिक व्यवहार, वित्तीय संसाधनों और संस्थागत सहयोग का एक साथ अध्ययन करना आवश्यक है।
मजबूत केंद्र राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक समन्वय और देशव्यापी नीतियों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है। वहीं राज्यों की स्वायत्तता स्थानीय आवश्यकताओं, भाषायी-सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के लिए आवश्यक है।
यदि केंद्र और राज्य संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करते हुए परामर्श, संसाधन-वितरण और नीति-निर्माण में सहयोग करें, तो संघवाद सुशासन और संतुलित विकास का प्रभावी माध्यम बन सकता है।